संपादकीय
17 नवम्बर 2018

छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश और राजस्थान में अलग-अलग पार्टियों के चुनावी वायदों को देखें तो यह समझ पड़ता है कि मतदाताओं को सीधे तोहफा, फायदा, और रियायत देने की घोषणाओं में सभी पार्टियों का गलाकाट मुकाबला चल रहा है। ये सारी रियायतें सुनने में भली लगती हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद जब इन पार्टियों पर इन वायदों को पूरा करने की जिम्मेदारी आएगी, तो उसके बाद शायद प्रदेश के एक समझदार बजट की गुंजाइश खत्म ही हो जाएगी। पार्टियों के राजनीतिक-अकाऊंटेंट यह हिसाब लगाते हैं कि फायदा पाने के वायदे से कोई तबका छूट तो नहीं जा रहा है, और फिर उसी हिसाब से वायदे तैयार किए जाते हैं, उनका असली अर्थव्यवस्था से और असली संभावनाओं से कोई लेना-देना नहीं रहता है। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ उन राज्यों में से है जो विधानसभा चुनाव के छह महीने बाद लोकसभा चुनाव झेलेगा, और उसके छह महीने बाद म्युनिसिपल-पंचायतों के चुनाव। इस तरह पांच में से करीब दो बरस इस राज्य में तोहफों और, और अधिक तोहफों के वायदों में गुजर जाते हैं, यह एक अलग बात है कि पिछले पन्द्रह बरस में डॉ. रमन सिंह अकेले ऐसे रहे हैं जिन्होंने तीन विधानसभा चुनाव, तीन लोकसभा चुनाव, और तीन स्थानीय संस्था चुनाव में अपनी पार्टी को बहुमत दिलवाया, और वायदे भी शायद कुछ हद तक पूरे किए हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने किसी वायदे को पूरा करने की नौबत आई ही नहीं, और वही हाल पहली बार चुनाव में उतरने वाली जोगी कांग्रेस का है।
अब सवाल यह है कि राज्य की अर्थव्यवस्था की व्यापक समझदारी से परे हटकर जब आम जनता को सीधे मिलने वाले सरकारी फायदे से सत्तारूढ़ पार्टी का दुबारा सत्ता पर आना जुड़ जाता है, तो फिर किसी सरकार को लुभावने फैसले लेने से कैसे रोका जा सकता है? अब ऐसे में छत्तीसगढ़ में काफी हद तक एक संतुलन दिखाया है कि उसने इन पन्द्रह बरसों में लुभावनी योजनाओं, और वोटर-तोहफों के अलावा राज्य का मोटे तौर पर विकास भी किया है। लेकिन बात अकेले छत्तीसगढ़ की नहीं है, और न ही महज इस चुनाव की है। अगले एक बरस में यह राज्य दो चुनाव और देखेगा, उन दोनों के आने तक सरकार बनाने वाली पार्टी के सामने अपने अभी के वायदों को पूरा करना शुरू करने का दबाव भी रहेगा। मतलब यह कि अर्थव्यवस्था का संतुलन बिगडऩे की शुरुआत सरकार बनते ही शुरू हो जाएगी, और अर्थव्यवस्था से परे भी जनता पर किसी कड़े अनुशासन को लागू करने जैसा अप्रिय काम भी सरकार नहीं कर पाएगी। एक बरस पूरा होने के बाद ही छत्तीसगढ़ की सरकार चुनावमुफ्त हो सकेगी, और एक संतुलित समझदारी का मौका आ सकेगा।
सरकारों की सारी की सारी लुभावनी योजनाएं फिजूल नहीं होती हैं, उनमें से कुछ ऐसी भी रहती हैं जो कि जनता के सबसे गरीब, सबसे कमजोर, और सबसे जरूरतमंद तबके की जिंदगी बदल पाती हैं। लोगों को याद होगा कि अविभाजित मध्यप्रदेश में कांग्रेस के एक मुख्यमंत्री, सामंती पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाले अर्जुन सिंह ने व्यापक जनहित के, खासकर गरीब हित के चार ऐसे फैसले लिए थे जिन्हें उनके बाद का कोई मुख्यमंत्री भी नहीं बदल पाया। जो जहां बसा है, उसे उस जमीन पर रिहायशी पट्टा, एकबत्ती कनेक्शन, रिक्शे का मालिकाना हक, और आदिवासियों को तेंदूपत्ता का मालिकाना हक, इन चार फैसलों से मध्यप्रदेश में एकमुश्त करोड़ों गरीबों की जिंदगी में फर्क आया था, और छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद यहां भी रमन सरकार ने जिस तरह सबसे गरीब के लिए तकरीबन मुफ्त चावल का जैसा इंतजाम किया, उससे भुखमरी झेलने वाले इस प्रदेश में जनता की जिंदगी बदली थी। लोग दो वक्त पेट भर खाने लगे हैं, कुपोषण घटा, और जिंदगी बेहतर हुई। इसलिए कुछ बुनियादी जरूरतों में सामाजिक न्याय लाने के लिए अगर चुनावी या गैरचुनावी तोहफे दिए जाते हैं, तो वे इंसाफ अधिक हैं, लुभावने तोहफे कम। छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के बाद बनने वाली सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती का साल लेकर आने वाला है, और आने वाले दो चुनावों तक सरकार को अर्थव्यवस्था सम्हालने के साथ-साथ वायदों को पूरा करने की एक बाजीगरी दिखानी होगी। (Daily Chhattisgarh)
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