संपादकीय
10 नवम्बर 2018

दो दिन बाद इसी वक्त छत्तीसगढ़ में डेढ़ दर्जन सीटों पर वोट डलते रहेंगे। मतदाताओं के सामने उम्मीदवारों का चेहरा, उनके चुनाव चिन्ह, उन्हें वोट देने पर बनने वाले मुख्यमंत्री, इन तमाम सवालों की भीड़ खड़ी होगी। अगर वोटर जिम्मेदारी से वोट डालें, तो यह बात एक बड़ी पहेली की तरह रहती है कि उसकी पसंद क्या होगी। और अगर वोटर लापरवाही से काम करे, तो लापरवाही से तो हर काम आसान हो जाता है, खासकर ऐसा काम जिसके लिए बाद में कोई जवाबदेही नहीं रहती, कोई सुबूत नहीं रहता। भारत के चुनाव में वोटरों का एक बड़ा हिस्सा घर बैठे रहता है, या मटरगश्ती करते रहता है, लेकिन वोट डालने नहीं जाता जो कि मुफ्त का काम है, और जिससे अगले पांच बरस तक उसका खुद का भविष्य तय होता है।
भारत में औसत मतदान साठ फीसदी के आसपास होता है, और इसका मतलब है कि चालीस फीसदी लोग वोट नहीं डालते। दिलचस्प बात यह है कि छत्तीसगढ़ में पिछला चुनाव कांग्रेस और भाजपा के बीच कुल पौन फीसदी वोटों के फासले से तय हुआ था, और वोट न डालने वाले लोगों में से थोड़े से लोग और वोट डालने आ जाते, तो पता नहीं तस्वीर क्या होती। चुनाव आयोग सहित बहुत सी संस्थाएं लगातार यह कोशिश करती हैं कि मतदान बढ़े। और यह मतदान बढऩा लोगों के लिए खासी दिक्कत की बात हो सकता है क्योंकि लोग पिछले चुनावों के साठ फीसदी, या उससे कम मतदान को ही पैमाना बनाकर आगे का काम करते हैं। किसी भी राजनीतिक दल या नेता की यह तैयारी नहीं रहती कि पिछले चुनाव के मुकाबले दस फीसदी वोट बढ़ जाएं, तो उनका क्या होगा। लेकिन मतदाता की जागरूकता बढऩा इसलिए जरूरी है कि पिछले चुनावों के आंकड़ों को लेकर जब लोग अगले चुनाव तक सीमित दिलचस्पी से सत्ता या विपक्ष का काम करते हैं, तब उनको एक झटका लगना जरूरी है ताकि पांच बरस वे टिक कर न बैठे रहें, और मेहनत करते हुए अपने पंजों पर रहें।
चूंकि दो दिनों में ही मतदान शुरू होना है, इसलिए आम जनता के बीच के लोगों को यह चाहिए कि वे खुद तो वोट देने जाएं ही, अपने साथ वे किसी ऐसे व्यक्ति को जरूर ले जाएं जो कि खुद होकर वोट डालने जाने के उत्साही न हों। आधे से अधिक लोग वोट डालने जाते ही हैं, वे जाते हुए या लौटने के बाद एक-दो ऐसे लोगों को तलाश लें जो कि वोट डालने नहीं गए हैं, तो वोट साठ से सौ फीसदी की तरफ बढऩा शुरू हो जाएगा। यह भागीदारी इसलिए जरूरी है कि कम वोटों के पडऩे पर कई बार इतने वोटों से ही सरकार बन जाती है कि जिससे अधिक वोट घर बैठे रहते हैं। कई जगहों पर पिछले चुनाव में नोटा में इतने वोट पड़े थे जितने कि जीतने वालों की लीड में भी नहीं थे। इसलिए अगर देश की जनता का सही फैसला पाकर अगली सरकार बननी है, तो अधिक से अधिक लोगों को वोट डालने के लिए भेजना चाहिए, ले जाना चाहिए। यह एक मौका उन जिम्मेदार लोगों के लिए है जो खुद तो वोट डालने जाते हैं। ऐसे लोग अपने साथ एक-एक, दो-दो और लोगों को भी ले जाएं, तो उससे देश में राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए पूरे पांच बरस मेहनत के रहेंगे, आज की तरह की नौबत नहीं रहेगी। (Daily Chhattisgarh)
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