वोट का हक न चूकें

संपादकीय
19 नवम्बर 2018


अठारह बरस पहले राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ इस बार सबसे अधिक संघर्ष वाला चुनाव देख रहा है जिसमें पहली बार एक तीसरी शक्ति भी मैदान में है। अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त से कांग्रेस और भाजपा ही दो पार्टियां रही हैं, लेकिन इस बार छत्तीसगढ़ के एक जुझारू नेता अजीत जोगी ने बसपा की मायावती के साथ हाथ मिलाकर एक अलग तस्वीर पेश कर दी है। बहुत सी सीटों पर वोटों की गिनती काफी कुछ हो जाने तक तस्वीर शायद साफ नहीं रहेगी। लेकिन दूसरी तरफ तकरीबन तमाम मीडिया ने, और राजनीतिक विश्लेषकों ने छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी के इस पहले दाखिले को अनदेखा कर दिया है, और उसे महत्वहीन माना है। लेकिन हकीकत इससे काफी अलग भी हो सकती है, और यह हो सकता है कि कुछ सीटों पर आम आदमी पार्टी को मिलने वाले वोट जीत-हार का फैसला करने वाले वोटों से काफी अधिक भी हों। छत्तीसगढ़ में विद्याचरण शुक्ल ने एक वक्त कांग्रेस से नाराज होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बैनरतले चुनाव लड़ा था, और उन्हें प्रदेश में सात फीसदी वोट मिले थे जो कि जोगी को सरकार से बेदखल करने के लिए काफी था। लेकिन उसके बाद से हर चुनाव में प्रदेश स्तर पर पार्टियों की जीत-हार के वोटों का फासला घटते गया। आज हालत यह है कि इतने कम वोटों से कई सीटों पर फैसला हो सकता है कि बाद में वहां के वोटरों को यह मलाल है कि वे अगर सुस्ती छोड़कर चले गए होते तो शायद उनके चहेते उम्मीदवार जीत जाते। 
जब धुंध इतनी छाई हुई हो, और टक्कर कांटे की हो, तो लोगों को अपनी जिम्मेदारी बेहतर तरीके से निभानी चाहिए। हम इसी जगह पर मतदाताओं से पहले भी कई बार यह अपील कर चुके हैं कि उन्हें न केवल खुद वोट डालने जाना चाहिए, बल्कि उन्हें अपने आसपास के कुछ और लोगों को भी साथ ले जाना चाहिए ताकि अगली सरकार चुनने के फैसले में अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी हो। अभी छत्तीसगढ़ चुनाव के पहले दौर की जिन अठारह सीटों पर मतदान हुआ है, उनके आंकड़े देखें तो हैरानी होती है कि किस तरह वे पिछले चुनाव के आंकड़ों के एकदम आसपास रहे, जबकि हालात इस बार काफी कुछ अलग थे। पहले दौर में आदिवासी और नक्सल प्रभावित इलाकों की सीटें अधिक थीं, लेकिन अब होने वाले मतदान में शहर-कस्बों के इलाके अधिक हैं, और ऐसे में कोई नक्सली बम-धमाके का खतरा भी नहीं है, इसलिए अधिक से अधिक लोगों को वोट डालने निकलना चाहिए। 
दरअसल जब वोटर उतने के उतने बने रहते हैं, तो राजनीतिक दलों पर भी चर्बी चढ़ जाती है, और वे भी जनता के बीच एक सीमा तक मेहनत करके बैठ जाते हैं। जैसे ही छत्तीसगढ़ में दो पार्टियों से तीन पार्टियां हुईं, और चौथी आम आदमी पार्टी भी मैदान में उतरी, तो नजारा कुछ बदला है। दोनों बड़ी पार्टियों के लोगों को यह आशंका होने लगी है कि जोगी, बसपा, आप, सीपीआई, सीपीएम, और पार्टियों के बागी पता नहीं कितने वोट ले जाएंगे, और उससे हाथ आई हुई जीत किस तरह निकल जाएगी। ऐसे में सभी को अधिक से अधिक वोटरों के बीच जाने की मजबूरी समझ में आ रही है। वोटरों को भी अपने हक और अपनी जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए, और उन्हें खूब मेहनत करके खुद भी निकलना चाहिए, और आसपास के कुछ और लोगों को लेकर जाने की कोशिश करनी चाहिए। लोग वोट डालने न निकलें, और बाद में पांच बरस सरकार को कोसते रहें, वह लोकतंत्र में अच्छी नौबत नहीं है। यह मौका छत्तीसगढ़ की जनता को अगले पांच बरस के लिए अपने पसंद की सरकार चुनने का है, और इसे चूकना नहीं चाहिए।  (Daily Chhattisgarh)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें