संपादकीय
15 नवम्बर 2018

भारतीय लोकतंत्र में चुनावी राजनीति, या राजनीतिक चुनाव एक ऐसा जटिल समीकरण हैं कि जिसका जोड़-घटाना, जिसका गुणा-भाग लोगों के सिर के ऊपर से निकल जाता है। हर प्रदेश में सरकारें अपनी राजनीतिक विचारधारा और वायदों के मुताबिक अलग-अलग किस्म से काम करती हैं। कहीं वे कम बेईमान होती हैं, और कहीं पर अधिक बेईमान भी। गिनी-चुनी एक-दो सरकारें ऐसी भी रहती हैं जो बेईमानी से परे रहती हैं, लेकिन फिर भी वे पश्चिम बंगाल या त्रिपुरा की तरह सत्ता से बाहर कर दी जाती हैं। दूसरी तरफ बहुत सी जगहों पर भ्रष्ट नेता और भ्रष्ट पार्टियां चुनाव जीत भी जाते हैं। लोगों को अविभाजित मध्यप्रदेश के आखिरी कांग्रेसी मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की कही हुई एक बात याद पड़ती है, और खटकती भी है, कि चुनाव विकास से नहीं, मैनेजमेंट से जीता जाता है। दिग्विजय सिंह की मैनेजमेंट की समझ कमजोर रही होगी जो वे दस बरस मुख्यमंत्री रहकर मध्यप्रदेश खो बैठे, और ऐसा खोए कि उनकी पार्टी तब से अब तक सत्ता पर वापिस नहीं आ सकी।
लेकिन कुछ दूसरे प्रदेशों में ऐसा भी देखने में आया है कि सरकार ने खूब जमकर काम किया, जनकल्याण का काम भी किया, और प्रदेश का विकास भी किया। और इसके साथ-साथ चुनाव के वक्त पर जमकर तैयारी की, और जमकर खर्च भी किया। मैनेजमेंट भी अच्छा किया, और इन सबसे सत्ता में वापिसी भी हुई। इसलिए भारत के प्रदेशों में राज्य सरकारों का चुनाव कई बार समझ से परे भी हो जाता है कि जिसके जीतने की उम्मीद रहती है, वह पार्टी निपट जाती है, और पीछे चल रही पार्टी को लोग घोड़ी पर बिठाकर दूल्हा बना देते हैं।
छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान, हिन्दी भाषी भारत के ये तीन राज्य अभी चुनाव से गुजर रहे हैं। इन तीनों में भाजपा की सरकार हैं, और इन तीनों राज्यों का वोटरों का मिजाज अलग-अलग किस्म का माना जाता है। इन तीनों में सरकार के मुखिया, मुख्यमंत्रियों के तौर-तरीके अलग-अलग माने जाते हैं, दिखते हैं। तीनों राज्यों में मुद्दे अलग-अलग हैं, और एक तरफ जहां राजस्थान आंदोलनों का शिकार रहा है, जहां पर मुख्यमंत्री का मिजाज राजसी है, जहां मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष से टकराव भी लेते रहती हैं, वहां पर सत्ता जाने की खबर सुनाई पड़ रही है। दूसरी तरफ मध्यप्रदेश है जहां पर भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने गरीबों के कल्याण के दिखने वाले अनगिनत कार्यक्रम लागू किए, अपने आपको खुद होकर प्रदेश की महिलाओं का भाई, बच्चियों का मामा घोषित किया, जहां एक आक्रामक हिन्दुत्व का एजेंडा सामने रखा, और बुरी चर्चाओं से घिरे हुए साधुओं को भी मंत्री का दर्जा दिया, लेकिन प्रदेश जातिवाद और साम्प्रदायिकता से उठ नहीं पाया। अब इस दौर का तीसरा राज्य छत्तीसगढ़ है जहां मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने एक सज्जन आदमी की छवि पाई है जो कि लोगों से राजनीतिक बदला नहीं लेता। उन्होंने पिछले पन्द्रह बरस में पार्टी के भीतर बेमिसाल और बेचुनौती लीडरशिप भी पाई है, और सबसे गरीब लोगों के लिए लागू की गई योजनाओं में अभूतपूर्व कामयाबी भी दर्ज की है। लेकिन बाकी दोनों राज्यों की तरह छत्तीसगढ़ में भी सत्तारूढ़ नेता भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हुए हैं, सरकारी मशीनरी में भी ईमानदारी कम है, और हैरानी की बात यह है कि इसके बावजूद राज्य में बेमिसाल ढांचा विकसित हुआ है। छत्तीसगढ़ में अधिक करीब से देखने पर यह भी दिखा है कि सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार ने मिलकर मौजूदा चुनाव के साल भर पहले से मिलकर जमकर तैयारी की है, और शायद इससे अधिक कोई चुनावी तैयारी हो नहीं सकती है। ऐसी चर्चा जरूर है कि पार्टी ने मुख्यमंत्री की मर्जी के खिलाफ बहुत से ऐसे लोगों को टिकट दिया है जिनके जीतने पर खतरा है। लेकिन यहां पर दिग्विजय सिंह की वह बात लागू होती है कि चुनाव मैनेजमेंट से जीता जाता है, और छत्तीसगढ़ में सत्ता में यह मैनेजमेंट खूब कर रखा है। पन्द्रह बरस से विपक्ष में रही कांग्रेस पार्टी के पास इस मैनेजमेंट के मुकाबले की क्षमता नहीं है, तैयारी नहीं है, लेकिन कांग्रेस जनता के भरोसे है कि वही अगर सत्ता पर बिठाने पर आमादा हो जाएगी, तो उसे कौन रोक सकता है। छत्तीसगढ़ के चुनाव शुरू हो चुके हैं, और आज से हफ्ते भर के भीतर आखिरी वोट भी डल चुका होगा। इतने जटिल समीकरण वाले भारतीय चुनाव के नतीजों का कई किस्म से विश्लेषण किया जा सकेगा कि किन बातों की वजह से कौन सी पार्टी या कौन से नेता जीते या हारे। फिलहाल छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ भाजपा की ओर से डॉ. रमन सिंह ने दिग्विजय के शब्दों में मैनेजमेंट तो पूरा किया ही है, लेकिन दिग्विजय को गैरजरूरी लगने वाला विकास भी उन्होंने खूब किया है, अब देखना यह है कि पन्द्रह बरस के बाद जनता पर सत्तारूढ़ पार्टी, उसके उम्मीदवारों, और उसके कामकाज का मिलाजुला असर वोटों में तब्दील करने का मैनेजमेंट कामयाब होता है या नहीं। (Daily Chhattisgarh)
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