फेक न्यूज जैसी साजिशों को उजागर करने की जिम्मेदारी...

संपादकीय
13 नवम्बर 2018


भारत आए हुए ट्विटर के सीईओ के साथ राहुल गांधी सहित कुछ लोगों की मुलाकात हुई और इस बात पर फिक्र हुई कि अफवाह और फेक न्यूज को कैसे रोका जाए। आज ही देश के एक बड़े हिन्दी समाचार चैनल ने सार्वजनिक रूप से कुछ तस्वीरों को दिखाकर कहा है कि उसके स्क्रीनशॉट के साथ दिखाई गईं ये तस्वीरें नकली हैं, और एक नेता के जो बयान उसकी स्क्रीन पर दिखाए जा रहे हैं उनसे उनका कोई लेना-देना नहीं है। अभी-अभी बीबीसी और कुछ दूसरे संस्थानों ने फेक न्यूज पर फिक्र करते हुए एक कार्यक्रम भी किया है। जिन लोगों के हाथ में मोबाइल फोन है, और जो वॉट्सऐप जैसे संदेशों को देखते हैं, या फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर रहते हैं वे जानते हैं कि किस तरह और कितने झूठ रात-दिन फैलाए जा रहे हैं। इन दिनों हिन्दुस्तान के तीन बड़े राज्यों में चुनाव चल रहा है, इसलिए झूठ को गढऩे और फैलाने का काम भारी रफ्तार से चल रहा है, और पहली नजर में किसी समझदार को जो झूठ दिख जाए, उसे भी लोग शायद जानते-समझते हुए आगे बढ़ाते चलते हैं।
अब एक तरफ तो भारत में आईटी कानून इतना कड़क बनाया गया है कि उसमें लंबी-चौड़ी सजा का इंतजाम है, लेकिन उसका असर शून्य दिखता है। झूठ को आगे बढ़ाते हुए शायद ही कोई जरा सी भी फिक्र करते हों कि उन पर कोई कानूनी कार्रवाई हो सकती है। नतीजा यह है कि किसी अच्छे काम को तो आगे बढ़ाने में किसी की कोई दिलचस्पी नहीं रहती, नफरत और झूठ को आगे बढ़ाने में लोग अपना ढेर सारा वक्त लगाकर दूसरे नफरतजीवी लोगों को अपने से जोड़ते हैं, उनसे रिश्ता कायम रखते हैं। ऐसे में भारत में जिन एजेंसियों पर ऐसे झूठ पकडऩे की जिम्मेदारी है, उनको अधिक इंतजाम करने की जरूरत है। ऐसा भी नहीें है कि ऑनलाईन और डिजिटल माध्यमों से फैलाए जा रहे झूठ की साजिश को पकडऩा मुश्किल हो। आज भारत में अधिकतर लोग डिजिटल-शिक्षित नहीं हैं, और वे लापरवाही से सुबूत छोड़ते चलते हैं। वे मानो कदम-कदम पर उंगलियों के निशान और जूतों के निशान छोड़ते जाते हैं। ऐसे में नमूने के तौर पर ही अगर हर दिन दो-चार लोग सजा पा सकें, तो भी बाकी लोगों का हौसला पस्त होगा। 
दरअसल डिजिटल औजार इस तेजी से बाजार में आए हैं कि उनको हथियार में तब्दील करना आसान काम था, और उनको पकडऩे का इंतजाम उसके मुकाबले खासा मुश्किल। नतीजा यह है कि जिस तरह बैंक और एटीएम या क्रेडिट कार्ड फ्रॉड करने वाले ठग पुलिस या जांच एजेंसियों से सौ कदम आगे-आगे चलते हैं, उसी तरह इंटरनेट और सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वाले लोग भी पुलिस से बहुत आगे चलते हैं। भारत में राज्य सरकारों को, और केन्द्र सरकार को भी अपने पुराने ढर्रों को बदलने की जरूरत है, और आज की टेक्नालॉजी के साथ बढ़ रहे फेक न्यूज जैसे अपराधों को रोकने के लिए उसे भी नई कंपनियों के अंदाज में नए विशेषज्ञों की सेवाएं लेनी पड़ेगी। वर्दीधारी पुराने पुलिस वाले इस काम को नहीं कर पाएंगे, लेकिन आज इससे जो खतरा पैदा हुआ है वह पूरे देश की एकता को टुकड़ा-टुकड़ा कर देने वाला है, और सरकारों से परे आम लोग भी ऐसे झूठ का भांडाफोड़ कर सकते हैं, यह सबकी साझी जिम्मेदारी है। 
(Daily Chhattisgarh)

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