तीन हफ्ते सबको जीत के दावे जारी रखने होंगे क्योंकि...

संपादकीय
21 नवम्बर 2018


आज जब पूरा छत्तीसगढ़ तूफान के बाद के सन्नाटे में डूबा हुआ है, तब क्या किसी और मुद्दे पर कुछ लिखा जा सकता है? शायद नहीं। इसलिए एक बार फिर चुनाव से थके हुए राज्य में कुछ चुनाव चर्चा और करने की मजबूरी लग रही है क्योंकि लोगों के बीच कल हुए मतदान और उसके संभावित नतीजों से परे और किसी बात को लेकर कोई चर्चा नहीं हो रही है। लेकिन कल के मतदान के बाद जब 90 सीटों को देखें तो लगता है कि पचहत्तर फीसदी से अधिक वोटरों ने वोट तो डाला है, लेकिन राज्य के भीतर अलग-अलग सीटों पर जो उतार-चढ़ाव है, वह हैरान करता है। नक्सल धमाकों में जान खोने वाले चुनाव अभियान के बीच वहां के मतदाताओं ने सुरक्षित, सुविधा-संपन्न, शिक्षित और संपन्न शहरी इलाकों के मुकाबले कहीं अधिक वोट डाला। और जिस रायपुर शहर पर हजारों करोड़ रूपए अधिक खर्च करके सरकार ने इसे अधिक सुविधा का बनाया है, वहां पर वोट बहुत कम गिरे हैं। जिस बिलासपुर को प्रदेश की दूसरी स्मार्टसिटी बनाया जा रहा है, वहां भी वोट कम गिरे हैं, और गांव-जंगल के नक्सल-आदिवासी इलाकों से 20 फीसदी कम वोट गिरे हैं। पढ़े-लिखे लोगों को अपने शिक्षित होने का दंभ छोड़कर आत्मविश्लेषण करना चाहिए, और यह सोचना चाहिए कि उनकी गाडिय़ां किस काम की हैं जो वे आधे किलोमीटर के पोलिंग बूथ पर भी नहीं जा पाए, और नक्सल इलाकों के वोटर कई-कई किलोमीटर बमों के बीच से गुजरते हुए जाकर वोट डालकर आए हैं। वोटों की इस गिनती को देखने के बाद यह सोचने की जरूरत पड़ती है कि क्या गांव के लोगों को गंवार कहने का शहरी अधिकार एक जुर्म नहीं है? 
लेकिन गांव और शहर, आदिवासी और गैरआदिवासी इलाकों के फर्क को छोड़ भी दें तो भी कुछ और बातें समझ नहीं आती हैं। कस्बों में पड़े वोटों को देखें, तो प्रदेश के एक सबसे ताकतवर मंत्री अजय चंद्राकर की कुरूद विधानसभा में 88.99 फीसदी वोट पडऩे की खबर है, और कुछ दूसरे कस्बाई इलाकों में वोट 60 फीसदी तक ही रह गए हैं। प्रदेश में कुल मिलाकर वोट पिछले बार के वोटों के आसपास ही हैं, इसलिए यह कहना जायज नहीं होगा कि इस बार जनता ने बड़ी संख्या में बाहर निकलकर सरकार को पलटने के लिए वोट डाला है, या किसी एक पार्टी को जिताने के लिए पूरे प्रदेश में जनता कसम खाकर बैठी थी। इतने ही वोट पिछली बार भी पड़े थे, और कांग्रेस और भाजपा के बीच का फासला महज पौन फीसदी का था। इसलिए उतने ही वोटों को लेकर दो बड़ी पार्टियों, और दो-तीन अन्य पार्टियों के बीच वोट किस तरह से बंटेगा, उसे लेकर आंकड़ों का अंदाज आसान नहीं है, लेकिन कुछ लोग अलग-अलग सीटों पर अपना अंदाज लगाकर किसी नतीजे पर पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए इस बार के चुनाव में पूरे तीन हफ्ते दिए हैं, और आज की 21 तारीख के ठीक बीस दिन बाद 11 दिसंबर को नतीजे आएंगे, और तब तक लोग आपस में शर्त भी लगा सकते हैं, और जिन्हें सट्टे से परहेज न हो वे सट्टा भी लगा सकते हैं, कानूनी खतरे झेलते हुए। 
लेकिन छत्तीसगढ़ के इस चुनाव को लेकर सभी पार्टियां, और सभी लोग सामने खड़े लोकसभा चुनाव को लेकर अपनी समझ सुधार सकते हैं, और उस चुनाव में वोटरों के बीच उनका भरोसा जीतने के लिए बेहतर तैयारी कर सकते हैं। छत्तीसगढ़ में अगली सरकार चाहे जिस पार्टी की बने, यह तो तय है कि सभी लोग लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटेंगे, और इस बार के नतीजे उनके खासे काम के रहेंगे। शहरी वोटों को भी अभी से प्रायश्चित की तैयारी करनी चाहिए, क्योंकि राज्य सरकार से, केन्द्र सरकार से सबसे अधिक रकम पाकर शहर को खूबसूरत और सुविधाजनक बनाने के बाद भी उनको वोट डालने की फुर्सत नहीं है, अक्ल नहीं है, जिम्मेदारी का एहसास नहीं है। आने वाले दिन नेताओं के लिए लंबी बेचैनी के दिन हैं, और हर किसी को अपने दावे जारी रखने होंगे क्योंकि जिन लोगों को जिन लोगों से चुनाव के पहले चंदा नहीं मिल पाया है, उनको भी अपनी जीत का भरोसा दिलाकर अभी भी कुछ हासिल किया जा सकता है।  (Daily Chhattisgarh)

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