संपादकीय
29 नवम्बर 2018

राजस्थान में भाजपा का चुनाव प्रचार करते हुए देश में हिन्दुत्व के सबसे आक्रामक नेता, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हनुमान को दलित करार दिया क्योंकि राजस्थान में दलितों की खासी आबादी है, और वे वहां की भाजपा मुख्यमंत्री से नाराज बताए जा रहे हैं। यह बात वैसे तो बेवकूफी की मानकर आई-गई हो सकती थी, लेकिन कांग्रेस और भाजपा के बीच रिश्ते ऐसी दुश्मनी के हैं, कि उनके मुकाबले सांप-नेवले भी गहरे दोस्त दिखाई पड़ते हैं। ऐसे में जाहिर है कि योगी का यह कहना मासूम नहीं था, और कांग्रेस से परे भी कई लोगों को यह गैरमासूम बात खटक गई। योगी ने अपने भाषण में साफ-साफ साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करते हुए कह दिया कि रामभक्त लोग बीजेपी को वोट दें, और रावणभक्त लोग कांग्रेस को। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा ही औरंगजेब जैसे लोगों से हिन्दुओं की रक्षा कर सकती है, राम राज्य लाने के लिए भाजपा उम्मीदवार को जिताएं।
धर्म को एकाएक हिन्दुस्तान की राजनीति में इतना महत्वपूर्ण साबित किया जा रहा है कि लगता है कि देश की जनता का पेट मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारे-चर्च के भंडारे, लंगर, या प्रसाद से ही भरता है, और उन्हें किसी और तरह के खाने की जरूरत नहीं है। कुछ नेताओं और कुछ पार्टियों की नजरों में धर्म की जगह देखने से लगता है कि देश को न लोकतंत्र की जरूरत है, न संविधान की, और न विज्ञान की। ऐसे लोगों को इतिहास और पुराण में पूरी इक्कीसवीं सदी की हर जरूरत पूरी होते दिखती है, और इसके साथ-साथ अब देवी-देवताओं के जातिकरण का जो सिलसिला चालू हुआ है, वह आगे बढ़कर कहां तक पहुंचेगा पता नहीं। लेकिन भाजपा जिस तरह से योगी आदित्यनाथ को अपना एक सबसे बड़ा प्रचारक मानकर चल रही है, उससे यह तो लगता है कि यह सिलसिला काफी आगे तक पहुंचेगा, और किसी ओबीसी बस्ती में हो सकता है कि कोई ओबीसी ईश्वर भी छांट लिया जाए, और पेश कर दिया जाए।
लेकिन राजनीति से परे, राजस्थान ब्राम्हण सभा में हनुमान को जाति में बांटने का आरोप लगाते हुए योगी आदित्यनाथ को कानूनी नोटिस भेजा है। यह तो सबकी जानी-पहचानी बात है कि योगी को ऐसे नोटिसों से कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि उनके खिलाफ तो उत्तरप्रदेश में ही इतने बड़े-बड़े जुर्म के मामले चल रहे हैं कि कोई और होता तो ऐसे मामलों के चलते प्रचार में न बुलाया जाता। लेकिन राजनीति में जुर्म से कोई परहेज तो है नहीं, इसलिए मुकदमे अलग चल रहे हैं, और आमसभाएं अलग चल रही हैं। अब लगे हाथों इस मामले को देखें कि राजस्थान ब्राम्हण सभा ने योगी को नोटिस क्यों भेजा, तो यह लगता है कि सदियों से जो ब्राम्हण हनुमान को पूजनीय मानकर उनकी पूजा करते आए हैं, आज अचानक एक योगी आकर उस हनुमान को दलित बता जाए, तो लोगों का हक्का-बक्का रह जाना जायज है कि क्या इतनी सदियों से वे एक दलित की पूजा करते आ रहे थे? हनुमान को तो योगी की बात से कोई खास फर्क पड़ते दिखता नहीं है, क्योंकि ऐसा होता तो अब तक योगी की पीठ पर दनाक से एक गदा पड़ गई होती। लेकिन ऐसा लग रहा है कि हनुमान की पूजा करने वाले लोगों में से बहुत से लोगों को इस बात से सदमा पहुंचा है कि एक ज्ञानी-योगी का कहना है कि हनुमान दलित थे।
कुल मिलाकर यह एक नया दिलचस्प सिलसिला चालू हुआ है, और आगे चलकर हो सकता है कि शंकरजी की बारात का ब्यौरा जानने वाले लोगों को यह लगे कि वे पर्वत पर बसने वाले, तरह-तरह के जानवरों के बीच रहने वाले आखिर किस जाति के थे? ऐसे में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री खासे काम के साबित होंगे क्योंकि वे जिस तरह लगातार भगवा पहनकर रहते हैं, योगी कहलाते हैं, एक मठ के महंत हैं, तो उनको जरूर ही शंकरजी की जाति का भी पता होगा। ब्राम्हण समाज का नोटिस अपनी जगह ठीक है, लेकिन जातियों के बीच भगवानों का ऐसा बंटवारा हो जाए, तो हर भगवान को कुछ जातियों के भक्त नसीब हो जाएंगे। और फिर कई जातियों को यह भी समझ आने लगेगा कि किस-किस जाति वाले भगवान की पूजा अब तक गलती से हो रही थी, और उसे अब तुरंत बंद कर देना है। (Daily Chhattisgarh)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें