छत्तीसगढ़ का नक्शा बताता है बड़े दिलचस्प रूझान...

संपादकीय
16 नवम्बर 2018


कई बार अपने इलाके या अपने मुद्दों को देखने के लिए बाहर के लोगों का नजरिया भी बड़े काम का होता है। छत्तीसगढ़ के चुनावी नजारे को देखने के लिए आए देश के एक सबसे बड़े टीवी पत्रकार, एनडीटीवी के प्रणब रॉय ने इस राज्य के नक्शे के साथ जो तस्वीर सामने रखी है, वह बड़ी दिलचस्प है और राज्य की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को समझने में बड़ी मदद करती है। इसके हिसाब से प्रदेश का दक्षिणी आदिवासी इलाका करीब 60 फीसदी आदिवासी आबादी वाला बस्तर है, और उसके बाद नक्शे के बीच में एक ऐसा मध्य हिंदू बेल्ट है, जिसमें 11 फीसदी आदिवासी हैं। इसके बाद का एक हिस्सा अनुसूचित जाति का जिसमें 12 फीसदी आदिवासी हैं। और सबसे उत्तर-पूर्व का हिस्सा सरगुजा है, जिसमें 47 फीसदी आदिवासी हैं। इसी नक्शे में बस्तर को देखें तो उसमें दलित वोटर कुल 4 फीसदी हैं, बीच के हिन्दू बेल्ट में वे 16 फीसदी हैं, सरगुजा के पहले के दलित सीटों वाले एक हिस्से में 22 फीसदी हैं, और सरगुजा के आदिवासी इलाके में वे 8 फीसदी हैं। इस तरह यह नक्शा बतलाता है कि किस तरह राज्य के उत्तर और दक्षिण सिरों पर आदिवासी आबादी घनी है, और इनके बीच एक हिस्सा घनी हिन्दू आबादी का है, और उसके बाद का एक हिस्सा घनी दलित आबादी का है। 
कहने के लिए छत्तीसगढ़ एक छोटा राज्य बना और बड़े राज्य मध्यप्रदेश से उसे अलग किया गया था। लेकिन आज इस छोटे से राज्य के भीतर आबादी को जातियों के आधार पर देखें तो इसमें बड़े साफ-साफ चार हिस्से दिखाईं पड़ते हैं, और इनके बीच का फर्क चुनावों में भी साफ-साफ दिखाई पड़ता है। दक्षिण के आदिवासी और उत्तर के आदिवासी लोगों का जातियां अलग हैं, उनके इलाकों के मुद्दे भी अलग हैं, लेकिन फिर भी आदिवासियों के बीच कोई ऐसी लहर रहती है, जो कि इन दोनों इलाकों में मतदाताओं का फैसला एक सरीखा रखती है। इसी तरह दलित सीटों पर फैसला एक सरीखा रहता है और वह बताता है कि जाति के आधार पर बनी हुई समाज व्यवस्था में सामाजिक और आर्थिक हालात भी उन जातियों के आधार पर ढल जाते हैं। छत्तीसगढ़ जातीय विविधता का एक खूबसूरत नमूना है और चुनाव के वक्त जब इसे राजनीतिक दलों के साथ पसंद या नापसंद के नतीजों के मिलाकर देखा जाए, तो यह एक दिलचस्प सामाजिक अध्ययन का सामान भी रहता है। 
लेकिन राजनीतिक दलों को यह तमाम हकीकत मालूम रहते हुए भी वे किसी इलाके को एकमुश्त किस तरह पा या खो सकते हैं, वह देखना हक्का-बक्का करता है। खासकर छत्तीसगढ़ के उत्तर और दक्षिण के आदिवासी इलाकों में जिस तरह वोटरों का रूझान एक सा दिखता है, जिस तरह पिछले चुनाव में तमाम दलितों सीटों का रूझान एक सरीखा दिखा, वह देखने लायक था। और ऐसा भी लगता है कि कोई समझदार राजनीतिक दल अगर पांच बरस लगातार जातियों के आधार पर, क्षेत्र के आधार पर मेहनत करे तो  उसके नतीजे उसे खुद को भी चौंका सकते हैं। यह नौबत बताती है कि छत्तीसगढ़ के मौजूदा राजनीतिक दल चुनाव के अपने परंपरागत पैमानों से परे किसी गंभीर अध्ययन में अपनी मेहनत नहीं लगाते, वरना वे वोटरों की नब्ज बेहतर समझ पाते। 
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM

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