राम के नाम पर दे दे बाबा कहते हुए अगला चुनाव?

संपादकीय
25 नवम्बर 2018


केन्द्र की मोदी सरकार के सामने अयोध्या में आज जुटी रामभक्त भीड़ के दबाव के अलावा कुछ और किस्म के दबाव भी काम कर रहे हैं। इनमें से एक आरएसएस का है जिसके मुखिया मोहन भागवत ने एक से अधिक बार यह कहा है कि मोदी सरकार कानून बनाकर मंदिर बनाए। भाजपा की एक सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी, शिवसेना के मुखिया उद्धव ठाकरे अपने आज तक के सबसे आक्रामक तेवरों के साथ उत्तर भारत में पहली बार एक आंदोलन कर रहे हैं, और वे मोदी सरकार को मंदिर न बनाने के लिए तरह-तरह से कुसूरवार ठहरा रहे हैं। यह दबाव संसद के भीतर मंदिर बनाने को लेकर एक कानून बनाने में पता नहीं कितना कामयाब होगा, लेकिन केन्द्र के सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन की मुखिया भाजपा के लिए यह संसदीय बाहुबल के साथ मुमकिन हो पाएगा या नहीं, एक तो इसका भी ठिकाना नहीं है, दूसरी बात यह कि ऐसा कोई कानून सुप्रीम कोर्ट में एक अग्नि परीक्षा झेल पाएगा या नहीं यह भी नहीं पता। फिर ऐसे किसी कानून के लिए अगर संविधान में कोई ऐसा संशोधन करना पड़ा जिसके लिए राज्यों की विधानसभाओं से मंजूरी लेनी पड़े, तो वह भी हो पाएगी या नहीं, यह हिसाब भी अभी आसान नहीं है। एनडीए के जो दूसरे घटक दल हैं, उनमें से नीतीश कुमार के जेडीयू जैसे कुछ दल अपने खुद के अस्तित्व को बचाने के लिए ऐसे किसी कानून का विरोध कर सकते हैं, और 2019 का चुनाव मतदाताओं के बीच राम के नाम पर, मंदिर के नाम पर जनमत संग्रह जैसा चाहे हो जाए, लेकिन हो सकता है कि ऐसी नौबत आने पर एनडीए की अपनी शक्ल बदल जाए। 
यह लोकतंत्र 15 अगस्त 1947 का दिन शुरू होने के पल से, संसद में आधी रात से शुरू हुआ था, और आज वह अयोध्या में जा पहुंचा है जहां उसे जलसमाधि देने की पूरी तैयारी कर ली गई है। देश के टीवी चैनलों पर पिछले कुछ दिनों से अखंड रामधुन सप्ताह जैसा माहौल बना हुआ है, और ढोल-मंजीरा, हारमोनियम लेकर दाढ़ी वाले जो लोग भगवे कपड़ों में अयोध्या में गाए-बजाए जा रहे हैं, वे टीवी चैनलों के पसंदीदा किरदार हो गए हैं। यह बात पूरी तरह कचरे की टोकरी में डाल दी गई है कि अयोध्या का जमीन का विवाद, एक मालिकाना हक का कानूनी झगड़ा है, और वह सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के बाद ही किसी किनारे पर पहुंचने वाला है। लेकिन ऐसे मामले को एक अंधश्रद्धा, धर्मान्धता, साम्प्रदायिकता, और हिंसक-अराजकता से जोड़कर देश में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि मानो यह लोकतंत्र न होकर बहुसंख्यक तबके का एक धर्मराज है, और इसमें दूसरे धर्मों के लोग दूसरे दर्जे के नागरिक हैं। 
अयोध्या के आज जलते-सुलगते मुद्दे से अगले आम चुनाव में चाहे जिसको जो नफा-नुकसान हो, आज तो देश के मीडिया में, समझदार-बहसों में भाजपा और मोदी को लेकर यही हैरानी जाहिर की जा रही है कि चार बरस के कामकाज के बाद इस सरकार के पास गिनाने के लिए अपने काम न होकर नेहरू से लेकर सोनिया और राहुल तक की सरकार की नाकामयाबियां रह गई हैं, और एक बार फिर राम के नाम पर दे दे बाबा कहते हुए भाजपा देश की गली-गली घूम रही है। इस पूरे माहौल से मोदी सरकार की साख बहुत बुरी तरह चौपट हुई है, और यह कहा जा रहा है, माना जा रहा है कि अगर इसी मुद्दे को लेकर अगला चुनाव लड़ा जाना है, अगर कांग्रेस के 60 बरस के राज को ही कोसते हुए अगला चुनाव लड़ा जाना है, अगर नेहरू-गांधी परिवार को कोसते हुए ही अगला चुनाव लड़ा जाना है, तो फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने इन चार बरसों में खुद क्या किया है? क्या उसके पास अपने खुद के किए हुए गिनाने को कुछ नहीं है जो वे हर जगह पिछली कांग्रेस सरकारों और नेहरू-गांधी परिवार की नाकामयाबी को गिनाने तक सीमित रह गए हैं? अयोध्या का यह पूरा सिलसिला ऐसा बताता है कि इन बरसों में मोदी सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया है जिसे गिनाते हुए वे अगले आम चुनाव में जनता से दुबारा वोट मांग सकें। यह बात सच है या नहीं इसे तो खुद मोदी ही बेहतर बता सकते हैं, लेकिन यह बात सच है कि आज आम जनधारणा कुछ इसी किस्म की बन रही है। देश को धर्मान्धता में झोंककर आज जो ताकतें संविधान को खारिज कर रही हैं, वे भी इतिहास में दर्ज हो रही हैं, और उनको देखते हुए जो चुप हैं, वे भी इतिहास में दर्ज हो रहे हैं।  

(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें