सबको मालूम है दोजख की हकीकत लेकिन, नजऱों से छुपाने को यह पर्दा अच्छा है...

11 अक्टूबर 2026  

 

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में केंद्रीय रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव के आने का कार्यक्रम था और उसकी तैयारी में रेलवे के इलाकों से लगी हुई सडक़ों पर भी इतना रंग-पेंट हो रहा था कि हफ्तेभर से वहां ट्रैफिक जाम चल रहा था। यह हालत तो रेलवे के इलाके के बाहर की शहर की सडक़ों की थी, खुद रेलवे के इलाके में तो जाने क्या-क्या हो रहा था। रंगाई-पुताई ऐसे चल रही थी कि अंग्रेजों के जमाने की धूल को भी धोकर निकाल दिया गया था, नई लिफ्ट लग रही थी, एस्केलेटर शुरू हो रहा था, और तो और पटरियों के नीचे बिछी हुई गिट्टी को भी रंग दिया गया था। आज जब अखबारों में रेलमंत्री का दौरा रद्द होने की खबर छपी तो उसके साथ ही तस्वीरें छपी हैं कि जिस आम सडक़ से रेलमंत्री गुजरने वाले थे, एक-डेढ़ किलोमीटर की उस सडक़ के दोनों तरफ छोटे मकान-दुकान छुपाने के लिए पर्दे तान दिए गए थे। इस तैयारी को देखकर याद पड़ता है कि किस तरह ट्रंप के आने पर अहमदाबाद में सडक़ किनारे की झुग्गियों को छिपाने के लिए दीवार ही तान दी गई थी। या पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार के रहते हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री के आने पर कोलकाता शहर को साफ-सुथरा किया गया था और फुटपाथ पर जीते बेघरों, बीमारों, विक्षिप्तों और भिखारियों को उठाकर शहर के बाहर कर दिया गया था। ऐसा ही बहुत से प्रदेशों में विधानसभा सत्र के ठीक पहले होता है कि विधानसभा जाने वाली सडक़ों पर डामर की एक और तह, सिल्क कोट चढ़ा दी जाती है ताकि माननीयों को सदन पहुंचते जरा भी धक्का न लगे, और धक्कों से सदन में आहें सवालों की शक्ल में न निकलें। किसी भी प्रदेश या शहर में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के आने पर जहां-जहां तक उनकी गाडिय़ों के चक्के पड़ सकते हैं, या जहां-जहां तक उनकी नजरें पड़ सकती हैं, उन सभी जगहों को पॉलिश कर दिया जाता है, रंग दिया जाता है। जिस वक्त रायपुर में सडक़ किनारे की स्थायी हकीकत से रेलमंत्री की आंखों को बचाने के लिए कनात लगाई गई थी, उसी वक्त उससे दो-चार किलोमीटर दूर प्रदेश के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल में तस्वीरें खिंच रही थीं कि बिस्तरों की कमी से एक-एक छोटे से पलंग पर दो जच्चा और दो बच्चे रखे गए हैं। आखिर देश तो एक ही है, चाहे केंद्र सरकार के रेलवे के पैसों से एक सामंती दिखावा किया जा रहा हो, चाहे राज्य के अस्पताल में दो जच्चा अपने नवजात बच्चों संग एक पलंग पर हों। एक ही देश के भीतर लोगों के हक के पैमानों में फर्क इतना है कि एक बारगी तो अंग्रेज बहादुर भी शर्मा जाए।

भारत में यह नौबत इतनी भयानक है कि आजादी की पौन सदी तो गुजर गई, लेकिन लोगों के मिजाज से सामंतशाही नहीं गुजरी। अच्छी-भली साफ-सुथरी कुर्सियों पर अगर लॉन्ड्री से ड्राई-क्लीन करके बुलवाया गया सफेद टॉवेल नहीं बांधा गया तो मानो उस कुर्सी पर बैठने वाले की कोई हस्ती ही नहीं है। लोगों को महत्वपूर्ण होने का अहसास कराने के लिए देश की गरीब जनता को खासा खर्च करना पड़ता है। राज्यपाल जिस कार्यक्रम में जाते हैं, उसके शुरू होने के पहले और खत्म होने के बाद राष्ट्रधुन बजाने के लिए पुलिस का बैंड चलता है, उसके लिए दर्जनभर से अधिक पुलिसवाले, और एक बस, पूरी जिंदगी के लिए समर्पित रहते हैं। कुछ राज्यों में मंत्रियों और दूसरे तथाकथित वीवीआईपी लोगों को सर्किट हाउस या दूसरी जगहों पर सलामी देने के लिए एक सलामी गारद तैनात रहती थी, और ये सलामी देने के लिए जनता के पैसों पर तनख्वाह पाने वाले दर्जनभर या दर्जनों सिपाही इंतजार करते बैठे रहते थे। आज भी इस देश में शाही-सामंती दिखावों के इंतजाम जनता का पेट काटकर होता है। जिस देश में जनता को हर महीने 5 किलो सरकारी राशन मिलने से उसका भूखे सोना बंद होता है, उस देश में राष्ट्रपति के अंगरक्षकों के नाम पर भाले लिए हुए घुड़सवारों की फौज चलती है। इतने बड़े-बड़े घोड़े और खास यूनिफॉर्म पहने हुए ऊंचे-ऊंचे अंगरक्षक क्या आज परमाणु हथियार संपन्न इस देश की राष्ट्रपति की रक्षा के लिए जरूरी हैं? अंग्रेज चले गए, लेकिन फिजूलखर्ची और ढकोसला छोड़ गए।

आज ऐसे ऐश-ओ-आराम पाने वाले जितने लोग हैं, वे ऐसी कुर्सियों पर पहुंचने के पहले से ऐसा दिखावा और पाखंड देखते ही आए हैं, इसलिए उन्हें सब मालूम है कि कुर्सी के सम्मान में कैसी फिजूलखर्ची होती है। कोई राजनीतिक दल चापलूसी में संगठन के पैसों से फिजूलखर्ची करे, तो वह उनका घरेलू मुद्दा हो सकता है। प्रियंका गांधी के रायपुर आने पर भूपेश सरकार के वक्त कांग्रेस के कार्यक्रम में सडक़ों पर गुलाब की पंखुडिय़ां बिछा दी गई थीं, वह उनके संगठन का मामला हो सकता है, लेकिन जब जनता के खजाने से किसी नेता की राह पर गुलाब बिखेरे जाएं तो उसका मतलब जनता की राह पर कांटे बिखेरना भी होता है।

अभी 2 अक्टूबर को देश में सादगी से जिंदगी गुजारने वाले दो लोगों का जन्मदिन था। गांधी और शास्त्री, दोनों सादगी की मिसाल थे। लेकिन इनके जन्मदिन के जलसों को देखें तो वे फिजूलखर्ची के आडंबर से भरे हुए रहते हैं। गांधी को राष्ट्रपिता बनाकर प्रतिमा में कैद करके बिठा दिया गया, लेकिन उनकी किफायत की किसी सोच को छुआ भी नहीं जाता। आज छोटे-छोटे से नेता इतनी बड़ी-बड़ी गाडिय़ों पर चलते हैं कि जीप पर सवार इल्लियां लिखने वाले व्यंग्यकार आज जिंदा होते तो वे जीप नहीं लिख पाते, वे 50 लाख से 1 करोड़ तक की गाड़ी का नाम लिखने को मजबूर होते। यह देश एक ऐसे ऊंचे दर्जे के पाखंड में जीता है कि जिसका अंदाज दुनिया के सभ्य देशों में नहीं लगाया जा सकता। कुदरत के बीच सादगी से जीने वाले भूटान को देखें, या सबसे विकसित अर्थव्यवस्था वाले योरप के कई देशों को देखें, तो प्रधानमंत्री साइकिलों पर चलते हैं, वहां संपन्नता का पैमाना बड़ी-बड़ी गाड़ी नहीं होता, वहां संपन्नता का पैमाना सार्वजनिक बस-ट्राम में चलना होता है, या पैदल-पैदल चलना होता है। भारत में, खासकर जब जनता के पैसों पर फिजूलखर्ची हासिल हो, लोगों की ऐश-ओ-आराम की चाह देखने लायक रहती है। फिर ऐसी चाह को भांपकर चापलूस अफसर स्वागत के ऐसे इंतजाम में भिड़ जाते हैं कि सत्तारूढ़ लोगों को लगने लगता है कि उनके पांव तो बादलों पर ही चलने के लिए बने हैं। जिस हिंदुस्तानी रेल में एक-एक डिब्बे में लोग बांधे गमछों पर टंगे हुए दो-दो दिन का सफर तय करते हैं, जहां पखानों के भीतर लोग बैठे रहते हैं और दूसरे लोगों को पखाना जाना नसीब नहीं होता, ऐसे देश में रेलमंत्री तो रेलमंत्री, बड़े रेल अफसरों के चलने के लिए भी अंग्रेजों के समय के विशेष डिब्बे ट्रेन में जोड़े जाते हैं और वे शाही सहूलियत के बीच सफर करते हैं। चूंकि देश की बड़ी अदालतों के बड़े जज भी अपनी आवाजाही के लिए, अपने घर-दफ्तर से परे एयरपोर्ट पर भी जो खास इंतजाम भोगते हैं, उससे यह बात साफ हो जाती है कि वे भी गरीबों के इस देश को किफायत की नसीहत नहीं दे सकते, किस मुंह से देंगे?

फिर भी हमें लगता है कि जनसरोकारों को लेकर लडऩे वाले लोगों में से किसी को अदालत तक जाना चाहिए और यह मांग करनी चाहिए कि किसी एक व्यक्ति के आने पर सडक़ों पर, ठहरने के भवनों पर, फर्नीचर और पर्दों पर, गाडिय़ों और राह के मकानों पर यह फिजूलखर्ची बंद हो। हो सकता है कि जज इसमें दखल न दें, लेकिन ऐसे में जनता को इंसाफ चाहे न मिले, जजों की सोच की शिनाख्त तो मिलेगी ही। किसी न किसी को यह पहल करनी चाहिए कि गरीबों का हक मुगलों और अंग्रेजों के अंदाज में इस झूठी शान-शौकत पर क्यों लुटाया जाए। पिछले कई दिनों से रायपुर के अखबार रेलवे की इन्हीं तैयारियों को लेकर राह चलती जनता की जिंदगी में आई मुश्किलों से भरे हुए थे। क्या सरकारों को ऐसी खबरों पर गौर नहीं करना चाहिए?

(Daily Chhattisgarh)    

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें