18 अक्टूबर 2026
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के एक बड़े दुर्गा पूजा पंडाल में भगदड़ होने से कम से कम 19 मौतें हो चुकी हैं। मरने वालों में अधिकतर महिलाएं और बच्चे हैं। बीती शाम अचानक बारिश हुई, और उसके बाद फिसलने से कुछ लोग गिरे, संकरी जगह पर बहुत लोग कतार में थे, पूरी तरह अंधेरा था, वहां हुई भगदड़ में कुचलकर लोग मारे गए। चोर बागान नामक जगह की यह दुर्गा पूजा 90 बरस से पुरानी है, और ऐसा कोई हादसा आज तक नहीं हुआ था। समाचार बताते हैं कि बंगाल में आधा लाख से अधिक जगहों पर दुर्गा पूजा का सार्वजनिक आयोजन होता है, लेकिन कोलकाता के पूजा पंडाल देखने के लिए दूसरे प्रदेशों से भी लोग आते हैं, और दूसरे देशों में बसे हुए बंगाली भी इस मौके पर देश-प्रदेश लौटते हैं। जहां पर इतनी बड़ी भीड़ थी, वहां पर न रौशनी का इंतजाम था, और न ही सुरक्षाकर्मी, या आयोजक कार्यकर्ता थे। यह पूरा हादसा 5-10 मिनट में ही हो गया, और दर्जनों जख्मी लोग अभी इलाज के बीच हैं। कोलकाता के तीन और बड़े प्रसिद्ध पूजा पंडालों में इस हादसे के तुरंत बाद दर्शन बंद कर दिए गए हैं। खबर है कि पुलिस ने हादसे वाले दुर्गोत्सव के आयोजकों सहित दर्जन भर लोगों को गिरफ्तार किया है।
अब इस एक हादसे की हम बहुत अधिक चर्चा करना नहीं चाहते, लेकिन कल ही कुछ दूसरे हादसों की भी खबरें आई हैं। छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में एक दुर्गा पंडाल के पास सडक़ पर बांधी गई रस्सी गले में फंसने से एक मोटरसाइकिल सवार नौजवान मर गया। इसी राज्य में कोरबा जिले में धार्मिक संगीत के लिए पैदल जा रही महिलाओं को एक बेकाबू मोटरसाइकिल ने कुचल दिया, जिसमें दो महिलाओं की मौत हो गई, और मोटरसाइकिल चलाते नौजवान की हालत खराब बताई जा रही है। सोशल मीडिया पर कई दूसरे किस्म के वीडियो छाए हुए हैं जिनमें से एक में रामलीला के बीच में एक विदेशी अर्धनग्न महिला का डाँस चल रहा है, और दर्शकों में से लोग आ-आकर उसके छोटे-छोटे कपड़ों में नोट खोंस रहे हैं। रामलीला के सारे कलाकार, रामकथा के किरदार बने हुए मंच पर बैठे यह सब नजारा देख रहे हैं। अभी पिछले ही हफ्ते छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक बहुत तंग मेनरोड पर हर साल बनने वाले बहुत विशाल पंडाल के बनते-बनते ही पास से निकलती दूसरी दुर्गा प्रतिमा की आतिशबाजी से आग लग गई। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और देश के कुछ दूसरे शहरों में डीजे की भयानक तेज आवाज से बच्चों, जवानों, और बूढ़ों की मौत भी दर्ज हुई है। गुजरात का एक वीडियो सामने आया जिसमें एक आइसक्रीम पार्लर में जाकर किसी पूजा के आयोजक 21 हजार रूपए चंदा मांग रहे हैं, और उतनी रकम न मिलने पर दुकान मालिक और परिवार की महिलाओं को बुरी तरह पीट रहे हैं, और तोडफ़ोड़ कर रहे हैं। इन सबके बीच छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट घर-परिवार के बेअसर सयाने की तरह डीजे को काबू करने, सडक़ों पर स्वागत द्वार न लगाने की चेतावनी मानो बड़बड़ाते रहता है, और घर के बुजुर्गों की बातों की तरह सरकार और समाज इन चेतावनियों को अनसुना करते रहते हैं। भाजपा शासन वाले मध्यप्रदेश के इंदौर में भाजपा का एक मंडल अध्यक्ष एक गरबा से 15 बरस की लडक़ी को धक्के देकर बाहर निकालता है, उस पर पॉक्सो का जुर्म दर्ज हुआ है, और सार्वजनिक रूप से उसके इस बच्ची से गरबा स्थल पर धक्के देने के वीडियो सामने आए हैं।
मिसालों और मामलों की ऐसी फेहरिस्त का कोई अंत नहीं है, और धार्मिक आयोजनों में तरह-तरह की लापरवाही, अराजकता, धर्मान्धता, और साम्प्रदायिकता के साथ-साथ हिंसा के नमूने सामने आ रहे हैं। प्रतिमाओं को ले जाते जुलूस बहुत ऊंचे-ऊंचे बिजली, टेलीफोन, और इंटरनेट के तारों को काटते हुए दिख रहे हैं। पिछले गणेश विसर्जन के बाद की प्रतिमाएं पानी से बाहर झांकती हुई बतला रही हैं कि वे मिट्टी की नहीं थीं, वे प्लास्टर ऑफ पेरिस की थीं, और गलने-घुलने वाली नहीं हैं। उधर महाराष्ट्र के एक बड़े तीर्थस्थान के पास पानी में एक कैंसरजनक प्रदूषण खतरे से हजार गुना अधिक मिला है, और वहां जल्द ही लाखों लोग डुबकी लगाने वाले हैं। कांवड़ यात्रा के बाद का नदी किनारे और घाट का गंदगी का मलबा अभी तक हट नहीं पाया है।
दुनिया के कुछ दूसरे कट्टर देशों को देखें, तो वहां धर्म के नाम पर बढ़ती हुई हिंसा किसी वक्त अराजकता में बदली होगी, आज वह वहां की शासन व्यवस्था बन गई है। धार्मिक कट्टरता वाले अलग-अलग समूह धीरे-धीरे धार्मिक हिंसा को इतना नवसामान्य बना देते हैं कि उसके बाद वे सत्ता पर भी पहुंच जाते हैं। कुछ दूसरी जगहों पर सत्ता पर बैठे हुए लोग धर्मान्धता, और धार्मिक हिंसा को नवसामान्य बनाते हैं, और वहां पर वह एक नवसंस्कृति बन जाती है। इन दोनों ही नौबतों में धार्मिक अराजकता इस तरह हावी हो जाती है कि पाकिस्तान में ईशनिंदा के नाम पर जिस पर चाहे उस पर आरोप लगाकर उसे गिरफ्तारी में भी थाने से निकालकर भीड़ उसके चिथड़े उड़ा देती है। इधर भारत के पंजाब में भी बेअदबी के आरोप में कुछ विक्षिप्त लोगों के ऐसे ही चिथड़े उड़ा दिए गए हैं। इधर भारत के बगल के बांग्लादेश में तमाम सांस्कृतिक समानताओं के बावजूद दुर्गा पूजा पंडालों पर हमले हो रहे हैं, और भारत के उत्तरप्रदेश में सडक़ों पर कुछ मिनट की नमाज के लिए झुके हुए लोगों के पिछवाड़े पर पुलिस के बूट लात बरसा रहे हैं।
धर्म जगह-जगह अवैध कब्जे कर रहा है, अवैध निर्माण कर रहा है, बिजली चोरी कर रहा है, नियमों को तोड़ रहा है, ट्रस्ट और मठ की दौलत को बेच खा रहा है, धार्मिक स्थानों पर तरह-तरह के कुकर्म हो रहे हैं, धर्म के चोगे में घूमने वाले लोग टीवी कैमरों के सामने माँ-बहन की गालियां बक रहे हैं, और इन सबके बावजूद हिन्दुस्तान जैसे देश में धर्म लोगों का सबसे बड़ा कर्म हो गया है। धार्मिक कर्मकांड और पाखंड ने लोगों की सोचने-समझने की ताकत खत्म कर दी है, और वे एक धुन, एक ताल पर मानो सम पर सिर हिला रहे हैं, और सिर भीतर से पूरी तरह खाली भी है, भीतर कुछ भी हिलते नहीं दिख रहा है। अगर लोग अपने आपमें मगन रहते, तब भी ठीक रहता, लेकिन लोग अपने धर्म की जिद पर अड़े हुए, अपने ही धर्म के एकाधिकार के लिए हथियार लिए खड़े हुए खतरनाक हो चुके हैं। सिर बहुत से हैं भीड़ में, लेकिन दिमाग किसी में नहीं है। वे सब मानो किसी एक सामूहिक सम्मोहन का शिकार होकर अपनी धार्मिक मान्यताओं को अंतिम और अकेला सत्य मानकर असहमत सुकरातों का सिर तोडऩे पर आमादा हैं, जहर के प्याले भला उन पर क्यों बर्बाद किए जाएं?
यह अराजकता बढ़ती चल रही है। धर्म के हिंसक तेवरों के सामने अहिंसक धार्मिक लोगों को भी चैन से जीने का हक अब हासिल नहीं है। जिन घरों के पास धर्मस्थलों के लाउडस्पीकर बजते हैं, जिन राहों से धार्मिक जुलूसों का आतंक गुजरता है, उन सबकी नियति गम खाकर धीमा दम तोडऩे की रह गई है। समाज और सरकारों ने धर्मान्धता को पहले अनदेखा किया, फिर फायदे का जानकर बढ़ावा दिया, और अब धर्मान्धता का जिन्न बोतल से निकल चुका है, और सरकारें अपनी सारी पुलिस झोंककर भी एक फीसदी भी डीजे की हिंसा एक फीसदी भी कम नहीं करवा सकतीं, किसी भी सडक़ से एक अवैध पंडाल भी नहीं हटा सकतीं, जान का खतरा खड़ा हो जाए, तो भी भीड़ को नहीं रोक सकतीं। अराजकता को अनदेखा करना भी खतरनाक होता है, उसे बर्दाश्त करना तो और अधिक, फिर उसे बढ़ावा देने का मतलब तो सूखे जंगल में आग सुलगाना होता है, और फिर उसके हिंसक तेवरों के सामने सरकारों के समर्पण के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता। एक वक्त इंसानों ने धर्म गढ़ा था, ईश्वर की धारणा गढ़ी थी, आज इन दोनों का जानलेवा कातिल इस्तेमाल हो रहा है, और इंसानों की चुनी गई सरकारें कुछ नहीं कर पा रही हैं, क्योंकि उन्होंने ही एक वक्त हाड़-मांस जोडक़र इस शेर की काया खड़ी की थी, और फिर उसमें प्राण भी फूंका था।
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