12 अक्टूबर 2026
अभी झारखंड की दिल छू लेने वाली एक तस्वीर सामने आई है जिसमें साड़ी पहनी हुई एक महिला बिना चप्पल-जूते के, नंगे पैर दौड़ रही है, और होमगार्ड भर्ती के इस शारीरिक परीक्षण में वह पास भी हो गई। परिवार की जरूरतें ऐसी हैं कि यह नौकरी उसके लिए बहुत मायने रखती थी। कुछ ही हफ्ते पहले महाराष्ट्र से एक और खबर आई थी कि एक महिला ने बेटी की फीस जुटाने के लिए तीन हजार रूपए ईनाम वाली एक मैराथन में हिस्सा लिया, वह भी नंगे पैर, साड़ी पहने दौड़ते हुए जीती, और बेटी की फीस का इंतजाम हुआ। कुछ ही दिन पहले हमने इसी जगह पर एशियाई खेलों में मैडल लेकर आने वाली भारतीय लड़कियों की गरीब और कमजोर पारिवारिक स्थिति के बारे में खुलासे से लिखा था कि किस तरह वंचित परिवारों से आकर भी वे आगे बढ़ीं, और एशियाई खेलों से देश के लिए सोना-चांदी लेकर आईं।
अभी शारीरिक परीक्षण वाली ये दो ऐसी दौड़ रहीं, जिनमें से एक भर्ती के लिए थी, और एक मैराथन मुकाबला नगद ईनाम के लिए था, और इन दोनों महिलाओं को उसकी बहुत जरूरत थी। इससे परे आज दिल्ली को देखें, तो वहां मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों में एक वामपंथी छात्र संगठन की मुखिया, नेहा बोरा लगातार खबरों में है, और देश के बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषक उसमें भविष्य की एक बहुत बड़ी नौजवान नेता देख रहे हैं। वह एक वामपंथ-विरोधी परिवार से आई हुई लडक़ी है, और इन दिनों जेएनयू में पीएचडी कर रही है। पिछले कई हफ्तों से वह दिल्ली, और दूसरे शहरों में जनआंदोलनों का चेहरा बनी हुई है। फिर एक नाम और सामने आता है, नवी पिल्लई का। यह भारतवंशी महिला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आज सबसे चर्चित महिला है क्योंकि उसे नोबल शांति पुरस्कार दिया गया है। वह भारत से दक्षिण अफ्रीका जाकर बसने वाले एक ट्रक-बस ड्राइवर पिता की बेटी है, और रंगभेद के दिनों में वह अफ्रीका में गरीबी के बीच बड़ी हुई, और संयुक्त राष्ट्र की तरफ से फिलीस्तीन के गाजा पर इजराइली हमलों की तबाही पर उन्होंने एक चर्चित रिपोर्ट भी बनाई है। उनका कॅरियर अंतरराष्ट्रीय अदालत से गुजरा हुआ है, लेकिन अकेले उनके बारे में लिखना यहां मकसद नहीं है। बस इतना ही जिक्र हम करना चाहते हैं कि वे किस तरह एक वंचित परिवार से उठकर नोबल पुरस्कार तक पहुंची हैं, या यह कहना अधिक सही और बेहतर होगा कि वे इस ऊंचाई पर पहुंची हैं कि नोबल शांति पुरस्कार चलकर उन तक आया है।
दुनिया में ऐसे बहुत से देश हैं जहां पर अमीर और गरीब, वंचित और संचित, सभी तरह के लोगों के लिए आगे बढऩे के मौके बराबरी के रहते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान ऐसी समानता से कोसों दूर है। न सिर्फ पढ़ाई-लिखाई, बल्कि अग्निवीर जैसी छोटी सी चार बरस की नौकरी के लिए भी कुछ बेरोजगार ऐसे रहते हैं जो फिजिकल फिटनेस की तैयारी करवाने वाले प्रशिक्षण केन्द्रों को फीस देकर अपनी संभावना बढ़ा पाते हैं, और बहुत से लोगों के पास ऐसी ट्रेनिंग, कोचिंग, या ट्यूशन के लिए गुंजाइश नहीं रहती है। जब तैयारी में ही समानता नहीं है, तो कामयाबी की संभावना भला कैसे बराबर हो सकती है? इसलिए जब देश की सबसे बड़ी नौकरी-इम्तिहान, यूपीएससी होती है, तब भी उसमें कुछ ऐसे लोग कामयाब होते हैं जिन्होंने बरसों तक देश के महानगरों में कोचिंग ली हुई है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी कामयाब होते हैं जिन्होंने अपने बहुत ही गरीब और अभावग्रस्त परिवार में रहते हुए बिना किसी कोचिंग के सफलता पाई। इनमें से कोई किसी ऑटो चलाने वाले के बच्चे होते हैं, तो कोई किसी और बहुत छोटे कर्मचारी के, खेतिहर मजदूर के, या छोटे से फेरीवाले के। ऐसे बच्चे दुर्लभ प्रतिभा से संपन्न रहते हैं, और इसलिए वे संभावनाओं का कोई भी फायदा पाए बिना सफल हो जाते हैं। लेकिन उसका यह मतलब नहीं रहता कि उनकी तरह के और अभावग्रस्त लोग भी सफलता की बराबरी की संभावना रखते हैं।
सरकारी स्कूल-कॉलेज में जहां पर दाखिलों का मुकाबला होता है, वहां पर संपन्न और विपन्न का फर्क बड़ा मायने रखता है। इसी तरह जब नौकरी का मुकाबला होता है, तो अगर मुकाबला ईमानदार भी है, तो भी उसमें संपन्न की तैयारी उसे बहुत ताकत दे देती है, और विपन्न नुकसान में रहते हैं। फिर अभी हम बहस को सरकारी नौकरियों, और दाखिलों में हो रहे बड़े भ्रष्टाचार की तरफ नहीं ले जाना चाहते, जो कि चारों तरफ धड़ल्ले से फैला हुआ है। एक-एक बड़ी नौकरी के लिए आधा-एक करोड़ रूपए की रिश्वत जहां चलती हो, वहां पर गरीबों के बच्चों की कितनी संभावना रह सकती है? और देश में एक-एक करके कितने ही प्रदेशों में ऐसा भ्रष्टाचार सामने आ चुका है। नौजवान इस कदर निराश हैं कि वे सडक़ों पर होने वाले आंदोलनों में जोर-शोर से हिस्सा लेने लगे हैं। आज सबसे चर्चित कॉकरोच जनता पार्टी का तो जन्म ही नीट इम्तिहान के भ्रष्टाचार के खिलाफ हुआ था, और वैसे भ्रष्टाचार से त्रस्त छात्र और नौजवान आज देश में जगह-जगह किसी भी ईमानदार दिखते आंदोलन में शामिल होने के लिए एक पैर पर खड़े हैं।
अब पल भर के लिए यह सोचें कि महाराष्ट्र की जिस महिला ने साड़ी पहने, नंगे पैर मैराथन इसलिए जीता कि उसे बेटी के लिए तीन हजार रूपए की फीस जुटानी थी, या अभी झारखंड में होमगार्ड बनने के लिए उसी तरह साड़ी पहने, नंगे पैर एक महिला ने दौड़ पास की, अब अगर ऐसी मेहनत के बाद भी बेईमानी हुई रहती, तो इनका दिल ही न टूट गया रहता? और दूसरी बात यह भी कि ऐसे लोकतंत्र पर उनका क्या भरोसा रह जाता? इसलिए हर किस्म के इम्तिहानों में, मुकाबलों में पारदर्शिता और ईमानदारी की जरूरत बेहतर लोगों को छांटने के लिए ही जरूरी नहीं है, लोगों की लोकतंत्र में आस्था बनाए रखने के लिए भी यह ईमानदारी जरूरी है। भारत में गैरबराबरी इतनी अधिक हो गई है कि किसी भी किस्म की संभावनाओं में कमजोर तबकों की गुंजाइश बहुत ही कम है। अब सरकारों को यह सोचना होगा कि वे पढ़ाई के दौरान, बाद के इम्तिहानों, और मुकाबलों में किस तरह इस गैरबराबरी को कम कर सकते हैं? दुनिया में वही देश आगे बढ़ते हैं जिनमें हर किसी को समान अवसर हासिल रहते हैं। समान अवसर मिलने के बाद अपनी पूरी क्षमता से आगे बढऩा यह लोगों के अपने हाथ में रहता है। लेकिन इसके पहले तक तो सरकार को ही मुकाबलों के लिए एक बराबरी का मैदान मुहैया कराना होगा। इसी से देश की सबसे अच्छी संभावनाएं सामने आ सकेंगी। आज बहुत औसत दर्जे के लोग जब भ्रष्टाचार से सबसे बड़ी पढ़ाई में, सबसे बड़ी नौकरी में पहुंच जाते हैं, तो उनकी पूरी जिंदगी रहने तक वे काम घटिया होने की गारंटी कर देते हैं। यह सिलसिला खत्म करना चाहिए।
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