15 अक्टूबर 2026
भारतीय समाज में सामाजिक परंपराओं में तो बहुत तरह के पाखंड भरे हुए हैं, लेकिन कानून और अदालत कई बार ऐसा पाखंडों को चूर करते दिखते हैं। मुस्लिम समाज में बाल विवाह आज भी जारी है क्योंकि मुस्लिमों की शादी का कानून अलग है। गैर-मुस्लिमों में बाल विवाह दशकों पहले बंद हो चुका है, इनमें शामिल होने वाले लोगों को भी जेल भेजने का कानून है, लेकिन मुस्लिमों में बच्चियों की शादी धड़ल्ले से चलती है, यह एक अलग बात है कि अब कुछ प्रदेशों ने इसके खिलाफ कानून बनाया है, और कुछ अदालतों ने इसके खिलाफ फैसले भी दिए हैं। हैरानी की बात यह है कि योरप के कुछ सबसे विकसित देशों में भी सैकड़ों की संख्या में मुस्लिम बच्चियों के बाल विवाह हो रहे हैं, और अभी पिछले हफ्ते ही एक बड़े देश के ऐसे खूब सारे आंकड़े सामने आए हैं। लेकिन भारत में अब अदालतें मुस्लिम मर्दों की इस पाखंड को रोक रही हैं। एक दूसरा कानून तीन तलाक के खिलाफ आया, और उस पर मुस्लिम महिलाएं रिपोर्ट लिखवाने भी सामने आ रही हैं। इसी तरह हिजाब और बुर्के को स्कूल-कॉलेज की यूनिफॉर्म से हटाने का नियम और अदालती फैसले आए, और धीरे-धीरे उन पर भी अमल हो रहा है। लोगों को शायद यह भूल गया होगा कि एक वक्त भारत के कुछ प्रदेशों में पति खो चुकी महिला को पति की चिता पर ही धकेलकर सती बनाने और उसका महिमामंडन करने का भी सामाजिक रिवाज था, जो कि बड़ी मुश्किल से खत्म हुआ। अब ऐसे में भारत में अभी एक अच्छी चीज यह हो रही है कि विवाह से परे भी जो संतानें होती हैं, उन्हें भी पिता की जायदाद में हिस्सेदार ठहराया गया है। बहुत सी अदालतों के ऐसे फैसले आ चुके हैं। इससे भी बढक़र एक और प्रगतिशील और साहसी फैसला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट सहित कुछ दूसरी अदालतों का भी आया है जिनमें यह कहा गया है कि अगर शादीशुदा महिला की कोई संतान उसके पति की नहीं है, किसी और से है, तो भी पति का नाम ही पिता के रूप में रहेगा, और उसी पर बच्चे की जिम्मेदारी भी रहेगी। समाज में महिलाओं को लेकर जो सोच है उसके बीच में ऐसा फैसला बड़े हौसले का है।
अभी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक गुजर चुके सरकारी कर्मचारी की विरासत को लेकर मुकदमा पहुंचा। इसमें अलग-अलग समय पर उसकी दो पत्नियों, और दोनों से कुल मिलाकर तीन बच्चों का उसके सरकारी बकाए पर, और संपत्ति पर दावा था। हाईकोर्ट ने बड़ा शानदार फैसला दिया है, उसने कहा कि दोनों ही पत्नियों से उसकी शादी की बात पूरी तरह से निर्विवाद रूप से स्थापित नहीं हो पा रही है, इसलिए उन्हें तो वारिस नहीं माना जाएगा, लेकिन इन दोनों पत्नियों से इस आदमी के तीन बच्चों को लेकर कोई विवाद नहीं है, सभी ने मान लिया है कि तीनों बच्चे उसी के हैं, इसलिए ये तीनों उसके वारिस रहेंगे। मतलब यह कि पत्नियां होने का दावा करने वाली महिलाएं किनारे कर दी गईं, लेकिन उनके बच्चों को बाप की जायदाद का वारिस माना गया।
अभी कुछ ही दिन पहले जब यूनिफाइड सिविल कोड बनाने के लिए छत्तीसगढ़ में बैठक हुई, तो कुछ महिला संगठनों और महिलाओं ने यह मांग रखी कि लिव-इन रिलेशनशिप का भी रजिस्ट्रेशन किया जाए, और ऐसे रिश्तों से होने वाले बच्चों को बाप की जायदाद में हक मिले। इस बैठक में यह प्रस्ताव रखने वालों की कोई और राजनीतिक प्राथमिकता हो तो वह एक अलग बात है, हम तो इस सीमित हिस्से को अच्छा देख रहे हैं कि लिव-इन रिलेशनशिप में भी लडक़ी, या महिला को ऐसे रजिस्ट्रेशन से एक कानूनी दर्जा मिलेगा। और ऐसे रिश्तों में होने वाले बच्चों को बाप की जायदाद में हक मिलेगा। अब इस प्रस्ताव को अगर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के ऊपर लिखे गए फैसले के साथ जोडक़र देखें, तो मतलब बहुत साफ है कि लिव-इन रिलेशनशिप में पैदा होने वाले बच्चों का वारिस की हैसियत से हक शादीशुदा रिश्ते में पैदा होने वाले बच्चों जितना ही रहेगा। इन दोनों मामलों को जब एक बराबर देखा जाए, तो उससे यह समझ पड़ता है कि बिना शादी किसी के साथ रिश्ता बनाने वाली महिला को इससे कम से कम अपने बच्चों के लिए तो एक हक मिल रहा है। और जाहिर है कि अगर लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन जरूरी हो जाएगा, तो फिर उस महिला का भी किसी तरह का कोई हक बन सकेगा।
भारतीय समाज में जहां महिला अपने किसी भी तरह के जायज हक से दूर रखी जाती है वहां पर अगर धीरे-धीरे स्थितियां उसके अनुकूल होती जा रही हैं, तो हम इसे छोटा सुधार नहीं मानते। सतीप्रथा बंद होना, विधवा विवाह शुरू होना, बाल विवाह बंद होना, अब बाल विवाह बंद होने का विस्तार उन धर्मों तक होना जहां पर वह आज कानूनी रूप से जायज है, तीन तलाक के खिलाफ महिला को एक हक मिलना, मुस्लिम लडक़ी, या महिला पर लादे गए हिजाब, या बुर्के का हटना शुरू होना, मंदिरों में प्रतिबंधित आयुवर्ग की महिलाओं के दाखिले के लिए आंदोलन होना, ऐसी बहुत सारी चीजें हैं जो कि भारतीय महिलाओं के अधिक अधिकारों की तरफ ले जा रही हैं। पिछले कुछ महीनों में सोशल मीडिया पर महिलाओं ने देश में जगह-जगह लड़कियों और महिलाओं के साथ हुए बलात्कार के खिलाफ आक्रामक आंदोलन चलाए हैं। मामूली तुकबंदी पर गढ़े गए नारों को सोशल मीडिया पर सैलाब की तरह फैला दिया गया है। इन सबसे भी लड़कियों के बीच एक नई जागरूकता आ रही है, और वे सडक़ों पर आंदोलनों में अधिक हद तक शरीक हो रही हैं। ये सारी बातें महिलाओं के एक तबके के रूप में अधिक मजबूत होकर उबरने के स्पष्ट संकेत हैं। आज भारत में पुरूषों के भी कई तबके ऐसे हैं जो कि महिलाओं के हक की वकालत करते हैं। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले जब मुल्लाओं के ईरान में महिलाओं ने हिजाब के खिलाफ आंदोलन छेड़ा, और स्कार्फ उतार फेंका, तो ईरान के सामाजिक इतिहास में शायद पहली बार सभी उम्र के मर्दों ने बड़े पैमाने पर सडक़ों पर आकर महिलाओं का साथ दिया, और मुल्ला देखते रह गए। आज भारत में भी जब कुछ धर्मों से जुड़े हुए लोग महिलाओं के खिलाफ अनर्गल बातें करते हैं, तो उनके खिलाफ बोलने के लिए सिर्फ महिलाओं की जरूरत नहीं रहती, बहुत से पुरूष भी खुलकर ओछी बातों के खिलाफ आते हैं। सोशल मीडिया की मेहरबानी से अब मुखर मर्द दिखने लगे हैं, वे अधिक बोलने लगे हैं, और महिलाओं की तरफदारी करने में हिचक खत्म हो गई है।
राजा राममोहन राय के वक्त से आज तक कभी भी सिर्फ कानून से समाज में बदलाव नहीं आया है। इसके लिए सामाजिक सोच बदलने की जरूरत भी पड़ी है। कदम-कदम पर मर्दाना सोच को चुनौती देनी पड़ती है, तब जाकर अदालतों पर भी बदलती सामाजिक सोच का असर पड़ता है। कानून के शब्द तो स्थिर रहते हैं, लेकिन कानून की भावना वक्त की सोच के साथ प्रभावित होती है। इसी बात को जारी रखने के लिए देश में आज महिलाओं के हक की लड़ाई को आगे बढ़ाते रहना जरूरी है। एक वक्त समलैंगिक संबंध भारत में सजा के हकदार थे, उसके खिलाफ कानून बना हुआ था। लेकिन संसद का यह हौसला नहीं हुआ था कि इस कानून को खत्म किया जाए। नेता सामाजिक पाखंड को ढोने और जारी रखने के हिमायती रहते हैं क्योंकि समाज के कट्टरपंथी और मुखर तबके वैसा ही चाहते हैं। ऐसे में जजों को एक नई राह दिखानी पड़ी, समलैंगिक संबंधों को जुर्म के दायरे से बाहर निकालना पड़ा, और चूंकि यह अलोकप्रिय काम अदालत ने किया था, संसद ने चुप रहकर उसे मान लिया, वह खुद होकर ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटाने वाली थी। इसलिए कभी संसद, कभी अदालत, और हमेशा ही समाज, इन सबको मिलकर खुद सुधार करना होगा, या इन तीनों में से कोई एक सुधार कर रहे हों तो दूसरों को उसका विरोध करने का लालच छोडऩा होगा।
आज विवाहेतर संबंधों से पैदा बच्चों के विरासत-हक की बात जितनी उन बच्चों के हक में है, उतनी की उतनी उन बच्चों की मां के हक में भी है क्योंकि ऐसे बच्चों की जिम्मेदारी मोटे तौर पर मां पर ही तो आती है। इसलिए जैविकीय पिता की संपत्ति में इन बच्चों का हिस्सा उनकी मां की जीत है। समाज के भीतर ऐसे फैसलों को लेकर चर्चा होनी चाहिए, इन चर्चाओं में निंदा करने वाले भी कई लोग रहेंगे, शायद इनका समर्थन करने वाले लोग गिनती में कम रहेंगे, फिर धीरे-धीरे लोगों को यह अहसास होगा कि अब यह तो अदालत का फैसला है, चाहे यह कितना ही खराब क्यों न हो उसे मानना मजबूरी है। समाज की सोच में बदलाव का ऐसा ही एक सिलसिला रहता है, इस राह में बहुत से गड्ढे रहते हैं, उतार-चढ़ाव रहता है, कई घुमाव रहते हैं, और उन्हीं से होते हुए समाज एक बेहतर मंजिल तक पहुंचता है।
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