सरकार के बाहर के विशेषज्ञ ही सोच सकते थे प्रश्न-बैंक जैसी मौलिक बात, अमल हो

14 अक्टूबर 2026  

 

भारत में परीक्षा सुधारों के लिए बनाई गई हाई पॉवर टास्कफोर्स के मुखिया नंदन नीलेकेणि ने मौजूदा परीक्षा प्रणाली में बदलाव के दो तरीके सुझाए हैं। केन्द्र सरकार ने नीट इम्तिहानों में हुई गड़बड़ी के बाद शर्मिंदगी के बीच भारत में आधार कार्ड के जनक नंदन नीलेकेणि को परीक्षा सुधार का जिम्मा भी दिया था। कुछ महीने इस मुद्दे पर काम करने के बाद अब उन्होंने एक कार्यक्रम में परीक्षा सुधार के बारे में यह मौलिक सोच सामने रखी है। उनका मानना है कि पहले से प्रश्न पत्र तैयार होने से लोगों में उसे बेचकर कमाई करने का लालच होता है। उनका सोचना है कि बहुत सारे सवालों का एक सवाल-बैंक बनाना चाहिए, और इम्तिहान के ठीक पहले एआई के इस्तेमाल से इनमें से प्रश्न पत्र बना लेना चाहिए। जब न पहले से प्रश्न पत्र होगा, न उसकी बिक्री की आशंका रहेगी, तो पेपर आउट होने जैसे विवाद खड़े नहीं होंगे। उन्होंने एक दूसरी बात यह सुझाई है कि परीक्षाओं को कम्प्यूटर पर लिया जाए, और इसके लिए परीक्षा केन्द्रों का नेटवर्क बढ़ाया जाए। उनके हिसाब से अभी भारत में डेढ़ लाख ऐसी जगहें हैं जहां पर छात्र-छात्राएं कम्प्यूटरों पर परीक्षा दे सकते हैं, ऐसे नेटवर्क को बढ़ाने की जरूरत है। टेक्नॉलॉजी कंपनियों के मुखिया रहे नंदन नीलेकेणि के अलावा इस कमेटी में इसरो के एक पूर्व प्रमुख, आईबी के एक पूर्व डायरेक्टर, केन्द्र की एक पूर्व शिक्षा सचिव, आईआईटी मद्रास के डायरेक्टर जैसे विशेषज्ञ भी हैं। यह रिपोर्ट अगले पखवाड़े तक केन्द्र सरकार को दाखिल कर देने की उम्मीद है। 

जब कभी सरकार अपने ढांचे के बाहर के विशेषज्ञों को किसी काम का जिम्मा देती है, तब कुछ नई सोच भी सामने आती है। सरकारों में काम करने वाले लोगों के दिल-दिमाग में सबसे पहले यह उठने लगता है कि कौन सा काम कैसे-कैसे नहीं हो सकेगा। लेकिन बाहर के लोग, कामयाब कारोबार, या विशेषज्ञता के लोग यह सोचना शुरू करते हैं कि कौन सा काम कैसे-कैसे हो सकता है। सोचने का यही फर्क सरकार के बाहर से राय लेने, या योजना बनवाने में महत्वपूर्ण होता है। आज अगर किसी इम्तिहान के पूरे पाठ्यक्रम से हजार सवाल तैयार किए जाएं, और फिर परीक्षा के कुछ घंटे पहले किसी एक जगह बैठकर एआई की मदद से उनमें से 20 सवालों का पर्चा तैयार किया जाए, उन्हें इंसानी नजरों से गुजार दिया जाए, और फिर उन्हें इंटरनेट या मोबाइल फोन से निर्धारित समय पर सभी केन्द्रों को भेज दिया जाए। वहां पर उसके प्रिंट निकालकर परीक्षार्थियों को दे दिए जाएं, या किसी स्क्रीन पर उन्हें डिस्प्ले कर दिया जाए। यह एक आसान तरकीब है जिसे देश भर में बदनाम पर्चों की बिक्री थम सकती है। परीक्षा शुरू होने के समय जब सब परीक्षार्थी भीतर आकर बैठ चुके हों, गेट बंद हो चुका हो, तब किसी भी फोटोकॉपियर और प्रिंटर से ऐसे प्रिंट निकालकर बांटे जा सकते हैं, जो कि परीक्षार्थियों से दो-चार मिनट पहले ही उस परीक्षा केन्द्र के अधिकारी-कर्मचारी देख पाएँगे। यह समाधान बड़ा आसान है, लेकिन पहली नजर में ही यह सुहाता है क्योंकि यह आधार कार्ड जैसा आसान काम है। लोगों को याद होगा कि नंदन नीलेकेणि ने ही यूपीए सरकार की दी हुई आधार कार्ड की चुनौती को मंजूर किया था, और अपने कारोबार को छोडक़र पूरा समय इस आधार कार्ड प्रणाली को विकसित करने में लगाया था। एक वक्त नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए आधार कार्ड के बड़े आलोचक थे, लेकिन बाद में प्रधानमंत्री बनने के बाद जब उन्होंने आधार कार्ड की भूमिकी देखी, तो उन्होंने सरकार के बाकी दायरों में भी इसके इस्तेमाल को बढ़ाया, और आज आधार कार्ड पूरी दुनिया में सबसे बड़ा पहचान पत्र है, जिसका सबसे अधिक कामकाज में इस्तेमाल भी होता है।

नंदन नीलेकेणि की कम्प्यूटरों पर इम्तिहान लेने की सोच पर हमें थोड़ा सा शक होता है क्योंकि आज इस देश में एक पटवारी सर्वर डाऊन होने की बात कहते हुए लोगों को हफ्तों चक्कर लगवा देता है। राज्यों में जमीन-जायदाद की खरीदी-बिक्री की रजिस्ट्री सरकार को मोटी कमाई देती है, लेकिन इन दफ्तरों में भी बूढ़े-बूढ़े लोग जाकर रजिस्ट्री के लिए बैठे रहते हैं, और सर्वर डाऊन होने की बात कहते हुए रजिस्ट्री रूकी रहती है। ऐसे में कम्प्यूटर, इंटरनेट कनेक्टिीविटी के साथ तकनीकी समस्याएं जुड़ी ही रहती हैं, और किसी केन्द्र पर एक साथ हजारों कम्प्यूटर काम करें, तो इसके अलग खतरे रहेंगे। इसके साथ-साथ जहां कोई उपकरण बीच में आएगा, तो लोगों को यह भी शक होने लगेगा कि क्या उस कम्प्यूटर पर सवालों के जवाब पहले से डले हुए थे? भारत तो आज बिना इंटरनेट से जुड़ी ईवीएम वोटिंग मशीनों को भी संदेह से देखता है। आज भारत में फिर से छपे हुए मतपत्रों से वोट करवाने की मांग उठ रही है। इसलिए कम्प्यूटरों पर इम्तिहान लेने की नौबत भारत में आज नहीं दिखती है। सरकार को ऐसी किसी सिफारिश को नहीं मानना चाहिए क्योंकि आज जब चारों तरफ हैकिंग से बड़े-बड़े करिश्मे करके दिखाए जा रहे हैं, इम्तिहान के कम्प्यूटरों का क्या होगा, यह अंदाज लगाया जा सकता है। मशीनों पर भी एक सीमा से अधिक अंधविश्वास करना ठीक नहीं है क्योंकि आज दुनिया भर में एआई की मेहरबानी से कम्प्यूटरों में हैकिंग हो रही है। 

लेकिन यह बात जरूर है कि भारत में बड़े इम्तिहानों, और बड़ी नौकरियों के लिए होने वाले इंटरव्यू में पारदर्शिता देश में लोकतंत्र बचाने के लिए जरूरी है। जब किसी महत्वपूर्ण कोर्स में दाखिले, या किसी नौकरी को पाने के लिए भी एक संदेह का वातावरण रहे, तो लोगों के मन से लोकतंत्र के प्रति विश्वास खत्म होने लगता है। एक तरफ तो देश में संचित और वंचित तबके के बीच पढ़ाई और कोचिंग की असमानता वैसे भी इतनी अधिक है कि कमजोर तबके के लोगों को मौके कम ही मिलते हैं, उन मौकों में कामयाबी और भी कम मिलती है। इसलिए कम से कम सरकारी इंतजाम तो पारदर्शी रहे। केन्द्र सरकार नीट इम्तिहानों को लेकर इस बुरी तरह शर्मिंदगी में घिरी हुई थी कि उसे अपने केन्द्रीय शिक्षामंत्री धर्मेन्द्र प्रधान से इस्तीफा लेना पड़ा था क्योंकि उससे कम किसी बात का असर हो नहीं रहा था। यह उम्मीद की जा सकती है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी ही बनाई गई इस उच्च स्तरीय कमेटी की सिफारिशों को मानेंगे, और प्रश्न-बैंक बनाकर आखिरी पलों में पर्चे तैयार करने से देश में पेपर बेचने का धंधा भी खत्म होगा, और गरीब बच्चों में व्यवस्था के प्रति विश्वास थोड़ा सा बढ़ सकेगा।

(Daily Chhattisgarh)    

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