16 अक्टूबर 2026
जम्मू-कश्मीर की एक सरकारी वीडियो कांफ्रेंस का एक वीडियो सामने आया है जिसमें राज्य का एक आईएएस अफसर राज्य प्रशासनिक सेवा की एक महिला अधिकारी के बारे में आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते हुए उसे लगातार धमका रहा है। वीडियो का जो हिस्सा ट्विटर पर घूम रहा है उसके मुताबिक 14 तारीख को राज्य सचिवालय में मिशन युवा की समीक्षा बैठक हुई, जिसमें एक डिप्टी कलेक्टर पैर फैक्चर होने की वजह से अवकाश से ही वीडियो से जुड़ी थीं। इस बैठक में इन दोनों अफसरों के बीच किसी मुद्दे पर बहस होने की चर्चा है, और सामने आया वीडियो हिस्सा बताता है कि यह आईएएस अफसर इस महिला पर चीख रहा है, और यह महिला बोलने के इस तरीके पर आपत्ति कर रही है कि उससे इस तरह से बात नहीं की जा सकती। इस पर कैमरे में देखते हुए इस महिला पर चीखते हुए कुमार राजीव रंजन नाम का यह अफसर कहता है- यू आर ब्लडी शिट (तुम एक घटिया पखाने जितनी हो) इस पर वह महिला अफसर, बीनिश वानी आपत्ति करती है कि उससे ऐसी भाषा में बात नहीं की जा सकती, उसे गू (पखाना) नहीं कहा जा सकता, तो इस पर यह अफसर जोर देकर कह सकता है कि वह जब चाहे तब, हमेशा ही उसे शिट कहकर ऐसे ही बात कर सकता है। इसके बाद यह अफसर बैठक में शामिल किसी दूसरी महिला अधिकारी को कहता है कि तुरंत ही इस अफसर को निलंबित करने का आदेश निकालें। पूरे वक्त यह आईएएस अफसर चीखते हुए दिखता है, और फिर कैमरे पर ही इस महिला अधिकारी को गेट आऊट कहकर बैठक से निकल जाने को कहता है। इस वीडियो को देखना भी भयानक है कि सचिव स्तर का कोई आईएएस अधिकारी किसी मातहत महिला अफसर से बहुत से दूसरे लोगों की मौजूदगी में इस जुबान में बात कर सकता है। इस मामले की और जानकारी निकालने पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मुख्य सचिव से कहा है कि इस महिला अधिकारी के खिलाफ बदले की किसी तरह की कार्रवाई न हो। राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों के संगठन ने इस घटना पर कड़ी आपत्ति जताई है और जांच की मांग की है।
जब एक औपचारिक बैठक में और अधिकारियों की मौजूदगी में एक सीनियर आईएएस अफसर एक महिला प्रशासनिक अधिकारी से इस घटिया जुबान में बात करता है, तो सवाल यह उठता है कि जब कैमरे न रहें, जब बैठक की रिकॉर्डिंग न हो रही हो, तब यह क्या नहीं कर रहा होगा? अभी दो दिन पहले ही दक्षिण भारत से एक वीडियो आया था कि किस तरह आंध्रप्रदेश के एक आईएएस अफसर सेे बेंगलुरू में एक विवाद के बीच वहां पहुंची पुलिस ने पूछताछ शुरू की, तो उसने बहुत बुरी तरह चीख-पुकार करते हुए, धमकाते हुए मोबाइल कैमरों के सामने ही माँ की गाली बकीं, और पुलिसवाले का कॉलर पकड़ लिया। इस गाली सहित यह वीडियो देश के बहुत से बड़े मीडिया संस्थानों की वेबसाइट पर पोस्ट हुआ है। यह नौकरी भारत और उसके प्रदेशों में सबसे बड़ी नौकरी मानी जाती है। देश के अनपढ़ लोगों के बीच भी अपनी आल-औलाद के लिए यही एक सपना रहता है कि वे बड़े होकर कलेक्टर बनें, कलेक्टर का मतलब आईएएस अधिकारी। इन अफसरों को सरकार की तरफ से जिंदगी भर नौकरी की एक गारंटी रहती है, बंगला, गाड़ी, अर्दली, दूसरे नौकर-चाकर, और सरकारी खर्च पर बहुत कुछ करने का लचीलापन भी रहता है। रिटायर होने के बाद सरकारों की इतनी सारी और कुर्सियां मौजूद रहती हैं कि उनमें से किसी पर भी जाने की एक बड़ी संभावना भी रहती है। जो लोग भ्रष्टाचार के मामलों में जेल नहीं पहुंच चुके रहते, जो अडिय़ल होने की हद तक ईमानदारी के लिए बदनाम नहीं रहते, ऐसे सब लोगों के लिए रिटायर होने के बाद भी कुछ या कई बरस और सहूलियतों की कोई न कोई कुर्सी रहती है। ऐसे में इतनी सुरक्षा, और इतनी सुविधा के साथ घोषित और अघोषित अधिकारों का टोकरा इतना बड़ा और भरा रहता है कि सीधे-सादे लोग भी इन कुर्सियों पर पहुंचकर बददिमाग होने के खतरे में आ जाते हैं।
हमारा ख्याल है कि जैसा बर्ताव जम्मू-कश्मीर के इस आईएएस ने मातहत महिला अफसर से किया है, उसके बाद उसकी नौकरी खत्म कर देनी चाहिए। जिसके मन में मातहत के लिए, महिला के लिए इतनी हिकारत भरी हुई हो, उस पर चौबीसों घंटे हर जगह तो कैमरे तैनात हो नहीं सकती, और आज का वक्त तो ऐसा है कि जिस बात की वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं है, वह घटना मानो हुई ही नहीं है। इसलिए सरकारी नौकरी की शर्तों में जो एक शर्त यह कहती है कि अधिकारी के लायक आचरण नहीं किया, इसलिए नौकरी से हटा दिया गया, उसका इस्तेमाल करते हुए सरकार को ऐसे अफसर को नौकरी से हटा देना चाहिए। लेकिन ऐसा होता नहीं है। अफसरों की अपनी एकता ढाल बनकर खड़ी हो जाती है। कहने के लिए आईएएस अफसरों, या आईपीएस अफसरों के अपने संगठन हैं जो कि ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर उस वक्त सक्रिय रहते हैं जब उनके किसी सदस्य के खिलाफ कोई बदसलूकी होती है, या बेइंसाफी होती है। लेकिन जैसा कि किसी भी दूसरे संगठन का मिजाज हो जाता है, ये संगठन भी अपने सबसे खराब सदस्यों को बचाने के लिए सक्रिय हो जाते हैं। हमारा तो यह साफ मानना है कि किसी संगठन की पहली जिम्मेदारी तो अपने सदस्यों को ठीक रखने की होनी चाहिए, क्योंकि उनसे ही संगठन की इज्जत होती है, या बेइज्जती। लेकिन कोई संगठन अपने सदस्यों के गलत काम पर मुंह भी नहीं खोलते, और ऐसे में सदस्यों के साथ बदसलूकी होने पर तो वे अतिसक्रिय हो जाते हैं, लेकिन बाकी उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
देश में 1947 से आजादी आ चुकी है, और 1950 से एक संविधान लागू है जिसमें तमाम नागरिकों को बराबरी का दर्जा दिया गया है। अंग्रेजों के वक्त उनके तैनात किए गए प्रशासनिक अफसरों का जनता के साथ बर्ताव गुलामों के साथ शासक का बर्ताव रहता था। वे दिन लद गए हैं। अब किसी को यह हक नहीं है कि एक-दूसरे से बदसलूकी करें। न नेताओं को अफसरों से बदसलूकी करना चाहिए, न अफसरों को नेताओं से। फिर अफसरों को अपने सीनियर या जूनियर से भी बुरा बर्ताव नहीं करना चाहिए। इस बुनियादी सभ्यता को जो लोग नहीं समझते हैं, उन लोगों को सरकारी नौकरी या कामकाज में रहने का कोई हक नहीं रहना चाहिए। इसी तरह की नौबत न्यायपालिका में बहुत से जजों के साथ रहती है जो कि अपनी बददिमागी में अदालत को अपनी जागीर समझते हैं, और यह मानकर चलते हैं कि जो लोग वहां आते हैं, वे संविधान प्रदत्त गरिमा से जीने के अधिकार को अदालती अहाते के बाहर रखकर आते हैं। इन दिनों अदालतों में जो वीडियो रिकॉर्डिंग होती है, और प्रसारित होती है, उसमें भी ऐसे कुछ वीडियो बीच-बीच में देखने मिलते हैं जिनमें कुछ वकील जजों को यह बताते रहते हैं कि वे ऐसा बर्ताव नहीं कर सकते, वे अपना व्यवहार सुधारें।
लोकतंत्र में लोकव्यवहार में शिष्टाचार और संवेदनशीलता दोनों जरूरी होते हैं। किसी दूसरे की बदसलूकी बर्दाश्त करना किसी की भी मजबूरी नहीं होनी चाहिए। हमारा यह साफ मानना है कि लोगों को ऐसी किसी भी बैठक, मुलाकात, या बातचीत की वीडियो रिकॉर्डिंग करने का हक रहना चाहिए, ताकि बाद में कोई विवाद होने पर वे यह साबित कर सकें कि उनके साथ कैसा बुरा बर्ताव किया गया था। आज दिन ऐसा आ गया है कि अगर किसी बात की वीडियो मौजूद नहीं है, तो यह मान लिया जाएगा कि वह घटना ही नहीं हुई है।
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