17 अक्टूबर 2026
भारत में आज घटते हुए भूजल को लेकर खेती-किसानी, और शहरी निस्तार से परे एक और बात को लेकर फिक्र हो रही है, देश भर में कई प्रदेशों में बन रहे डाटा सेंटर भी बहुत सारी गर्मी उगलेंगे, और बहुत सारा पानी पिएंगे। यह पानी बैंकों में आने वाले डॉलरों के साथ नहीं आएगा, डाटा सेंटर वाले प्रदेशों में ही नदियों का पानी, या भूजल का इस्तेमाल इनको ठंडा करने के लिए होगा। अभी आंध्रप्रदेश की एक तस्वीर आई है कि किस तरह गूगल के एक डाटा सेंटर के लिए एक पूरा जंगल काट दिया गया है, और उसकी पानी की खपत का अंदाज देखते हुए उसका जमकर विरोध चल रहा है। लेकिन आज हम सिर्फ डाटा सेंटरों पर चर्चा नहीं कर रहे, पानी पर चर्चा कर रहे। वह पानी जो कि अधिकतर प्रदेशों में अधिकतर लोगों को मुफ्त में मिलता है। स्थानीय संस्थाओं ने पानी की सप्लाई की जिम्मेदारी अपने बुनियादी काम में शामिल कर रखी है, अलग-अलग जगहों पर जल कर अलग-अलग लगता है, लेकिन शहरी संस्थाएं, पंचायतें भी, पानी पहुंचाने को अपना जिम्मा मानती हैं। केन्द्र सरकार भी एक मिशन के तहत हर घर तक साफ पानी का पाईप पहुंचाना अपना जिम्मा मानकर हर प्रदेश में काम कर रही है। टंकियां, पाईप, फिल्टर प्लांट, नहरें, बांध, और बाकी इंतजाम तो ठीक है, लेकिन इन सबके लिए जरूरी पानी का क्या हाल है?
यह साफ हो चुका है कि लोग धरती का पानी जितना खींच रहे हैं, उससे कम पानी ही जमीन में वापिस जा रहा है। इसकी बाकी वजहों में से एक वजह, और हो सकता है कि यह वजह छोटी हो, पानी का अंधाधुंध इस्तेमाल है। आज जैसे-जैसे सरकारी पाईप लाईन अधिक से अधिक घरों तक पहुंच रही हैं, वैसे-वैसे पानी की खपत बढ़ती चली जानी है। जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ रहा है, और ऊंची इमारतों में पानी की योजनाबद्ध सप्लाई बढ़ रही है, वैसे-वैसे शहरों में पानी की खपत बढ़ती चली जा रही है। आज देश में बहुत सीमित जगहों पर ही पानी के पाईप में मीटर लगे हुए हैं। लोगों को जब आसानी से जो सामान मुफ्त मिलने लगता है, वैसे ही वे उतनी ही बेरहमी से उसका इस्तेमाल करने लगते हैं। भारत के ही कुछ शहरों में जब घरों तक पहुंचने वाले नलों तक मीटर लग गए, तो वहां पानी की कुल खपत गिर गई। और वाटर सप्लाई करने वाली कंपनी ने सीमित घंटों की सप्लाई को चौबीसों घंटे का कर दिया। पानी पूरे समय उपलब्ध है, लेकिन एक सीमित उपयोग के बाद उस पर मामूली सा भुगतान शुरू हो जाता है, इसलिए लोग अपनी खपत को उस सीमा के भीतर रखने की कोशिश करने लगे। बहुत पहले किसी समझदार ने यह लिखा भी था कि माल-ए-मुफ्त, दिल-ए-बेरहम। मतलब यह कि मुफ्त में मिले माल को बेरहमी से खर्च किया जाता है। बिजली जिसे बनाने में बहुत सारा कोयला, और पानी दोनों लगते हैं, वह भी जिस सीमा तक मुफ्त दी जाती है, उस सीमा से कम कोई खर्च करना चाहते ही नहीं। लोगों की फिक्र बिल आना शुरू होने पर शुरू होती है। ऐसा ही हाल पानी की सप्लाई के निजीकरण से होता है कि जो लोग मुफ्त में मिलने वाले पानी की अंधाधुंध खपत करते थे, अब वे चौकन्ने हो गए। बात सिर्फ यह नहीं है कि एक निजी कंपनी इससे कमाई कर रही है, बात यह भी है कि कैसे पानी का बिल मिलने पर लोगों का दिल उसे मुफ्त का माल मानकर चलना बंद कर देता है।
देश में किसानों को अधिकतर प्रदेशों में खेतों में सरकार ट्यूबवेल कर देती है, और बिजली भी कई जगह मुफ्त दे देती है, कई जगह सोलर पैनल लगाकर पंपों को पूरे-पूरे दिन मुफ्त में चलाने की सहूलियत भी सरकार ने मुहैया करा रखी है। इसका नतीजा यह है कि पानी की कदर कम हो गई है। बिजली मुफ्त मिलने से उसकी कदर भी कम हो गई है। ये दोनों बातें मिलाकर खेती की असली लागत का पता ही नहीं लगने देतीं। जिन लोगों अपने घरों में ट्यूबवेल करा रखा है, वे अपनी ताकत से ताकतवर पंप लगाकर, घर की छत पर टंकी लगाकर पानी की रात-दिन फिजूलखर्ची करते हैं, उन्हें पानी की कीमत ही नहीं मालूम है। आज सरकार अगर सारे निजी ट्यूबवेल पर मीटर लगाकर मामूली सा पैसा वसूलने लगे, तो लोगों में पहली बार पानी की कीमत समझ आएगी। यह बात भुगतान की शक्ल में भारी लगेगी, लेकिन धरती को सूखा होने से बचाने के लिए यह जरूरी भी है। जिन संपन्न लोगों के घरों में रोज पानी की धार से पूरी कार को धोया जाता है, घरों के बाहर पानी छींटा जाता है, खौलती-तपती छतों पर पौधों का बगीचा लगाकर कुदरत को चुनौती देते हुए उसे सींचा जाता है, वह सारी सोच मामूली सा भुगतान शुरू होने पर खत्म हो जाएगी, या कम से कम बदल तो जाएगी ही।
स्थानीय संस्थाएं चलाने वाले निर्वाचित लोग वोटरों की जरा भी नाराजगी नहीं चाहते, और न ही प्रदेश चलाने वाली राजनीतिक ताकतें अपने स्थानीय प्रतिनिधियों के लुभावने तौर-तरीकों के खिलाफ कुछ करना चाहतीं। नतीजा यह है कि पूरे का पूरा देश-प्रदेश जागरूकता से दूर चले जा रहा है। लोग यह मानकर चल रहे हैं कि जिस तरह उनके पास घर की छत पर अपनी टंकी है, उसी तरह धरती के नीचे की टंकी भी उनकी अपनी है। लोगों को यह समझ भी नहीं पड़ता कि भूजल की धारा कई देश-प्रदेश पार करते हुए जाती है, और एक जगह की अंधाधुंध खपत दूसरी जगहों पर सूखा ला सकती है। धरती का पेट अगर खाली हो रहा है, तो अधिकतर जगहों पर खाली हो सकता है। इस जागरूकता के बिना पानी की फिजूलखर्ची नहीं थम सकती। लोगों को पता नहीं हिन्दुस्तान के भीतर का वह नजारा इतनी आसानी से कैसे भूल गया जिसमें गुजरात ने 80 के दशक में ऐसा भयानक सूखा देखा था कि वहां ट्रेन से पानी पहुंचा था, और सार्वजनिक जगहों पर लोहे के ऐसे ढांचे रख दिए गए थे जिसके ऊपर चढक़र लोग नहाते थे, और नीचे इकट्ठा किए गए पानी में कपड़े धोए जाते थे। ऐसी नौबत अभी भी हिन्दुस्तान में कई जगह आ सकती है। इस नौबत से बचने के लिए धरती के भीतर से अधिक पानी खींचकर लंबा वक्त नहीं गुजारा जा सकता। कुछ दशकों के भीतर ही धरती का पेट खाली हो सकता है, और इंसानों की प्यास बढ़ सकती है।
आज जब पानी को राष्ट्रीय सम्पत्ति नहीं बनाया गया है, निजी ट्यूबवेल पर कोई टैक्स या फीस लागू नहीं किए गए हैं, तो खपत बेहिसाब है। निजीकरण करके, या सरकारी स्तर पर पानी की खपत को सीमित करके ही धरती को कुछ और अधिक हद तक बचाया जा सकता है। आज दुनिया के बहुत से विकसित देशों में एआई डाटा सेंटरों का जमकर विरोध हो रहा है कि वे उस इलाके का पूरा पानी पी जाएंगे, और उनकी गर्मी आसपास के इलाके को और खौला देगी, उस बढ़ी हुई गर्मी से जूझने के लिए लोगों को एसी या कूलर पर अधिक बिजली लगानी पड़ेगी, और उस अधिक बिजली को बनाने के लिए और अधिक कोयला, और पानी खर्च करना पड़ेगा। पानी की खपत, और आसमानी बारिश के पानी का संग्रह, इन दोनों बातों की तरफ गंभीरता से कोशिश करनी पड़ेगी, तभी जाकर धरती बच पाएगी। आज फिजूलखर्ची की आदत रहे, और भूजल भंडार बढ़ाने की फिक्र न रहे, तो यह दोनों सिरों से जलाई गई मोमबत्ती सरीखी नौबत है कि वह बहुत तेजी से खत्म हो जाएगी। आज जिन प्रदेशों में ट्रेन या टैंकरों से पानी किसी तरह पहुंच जा रहा है, वहां भी जागरूकता नहीं दिख रही। धरती को बचाने के लिए, और धरती को क्या बचाना, इंसानों को खुद बचने के लिए पानी को बचाना होगा, चाहे यह कड़वा काम सरकार खुद करे, या फिर पानी सप्लाई का निजीकरण करके खपत को घटाए। मुद्दा किसी निजी कारोबारी की कमाई का नहीं है, मुद्दा धरती पर इंसानों के जिंदा रहने का है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें