हैकिंग अपने आपमें जानलेवा थी, अब वह एआई पर सवार भी है, दुनिया बारूद के ढेर पर

13 अक्टूबर 2026  

 

फ्रांस से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है जो कि एक किस्म से यह भी बताता है कि आने वाले वक्त में दुनिया में आतंकी, या फौजी हमले किस किस्म के हो सकते हैं। हैकरों ने फ्रांस के सैकड़ों सुपर मार्केट के रेफ्रिजरेशन सिस्टम पर हमला किया, और फ्रिज, फ्रीजर का तापमान बढ़ा दिया। यह एक साथ सैकड़ों जगहों पर रात में हुआ, और इससे ठंडी रखी जाने वाली चीजें खराब हो गईं। सुपर मार्केटों के ये सिस्टम कम्प्यूटर पर ऑनलाईन कंट्रोल होते थे, और इनके लिए एक सॉफ्टवेयर बना हुआ था। इसी डिजिटल कंट्रोल सिस्टम में घुसपैठ करके हैकरों ने तापमान में यह फेरबदल कर दिया। 

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से यह बात लिखते आ रहे हैं कि आने वाला वक्त सरहदों पर लड़ी जाने वाली जंग का नहीं होगा, बल्कि वह ऑनलाईन नुकसान पहुंचाने का वक्त रहेगा। बीते बरसों में दुनिया के हैकरों ने बहुत से देशों में जनसुविधा के कामकाज में भी हैकिंग की। कई जगह उन्होंने सारी जानकारी अपने कब्जे में कर ली, और उसे वापिस करने के लिए उन्होंने मोटी फिरौती मांगी। इनमें ब्रिटेन जैसे देश में नेशनल हेल्थ सर्विस पर हमला भी शामिल था। ऐसी भी चर्चा रही कि दुनिया भर में हैकरों ने कई निजी कंपनियों से फिरौती पाने के बाद ही उनके रिकॉर्ड की तालाबंदी खत्म की। हम लगातार इस खतरे से आगाह करते रहे हैं कि सरहदों पर हथियारों से लड़ाई पुराने जमाने की बात हो चुकी है, और आज हथियार कारखानेदार, और सरकारी खरीददार मिलकर इसकी अहमियत को बरकरार रखे हुए हैं, जबकि अब असली खतरा इंटरनेट के मार्फत होने वाली हैकिंग का रहेगा। फिर भी अभी एक-दो बरस पहले तक हमने इसके साथ-साथ आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के खतरे को जोडक़र नहीं देखा था, क्योंकि एआई की बढ़ती हुई ताकत का अहसास नहीं था। 

अब जब हैकरों की ताकत में एआई भी जुड़ गया है, तो फिर दुनिया में हथियारों की जंग और भी अप्रासंगिक हो गई है। यह तो ठीक है कि रूस और यूक्रेन के बीच हथियारों की लड़ाई कुछ और बरस जारी रह सकती है, लेकिन वह भविष्य नहीं है। भविष्य तो बिना खूनखराबे के किसी देश के पूरे इंतजाम को चौपट करके किया जाएगा। हम अपनी बहुत ही मामूली समझ, और उससे कुछ अधिक दर्जे की कल्पनाशीलता से ऐसी नौबत का अंदाज लगाते आ रहे हैं जब कोई एक देश, उसके सरकारी हैकर, या किसी आतंकी संगठन के हैकर, या वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध किसी संगठन के लोग किसी देश के इंतजाम को चौपट कर दें। आज दुनिया में जनसुविधा की अधिकतर चीजें कम्प्यूटर नियंत्रित हैं, और जहां कम्प्यूटर हैं, वहां वे ऑनलाईन भी हैं। हैकरों को इससे अधिक कुछ नहीं लगता। कोई कम्प्यूटर तभी तक सुरक्षित रह सकता है, जब तक वह इंटरनेट से जुड़ा हुआ न रहे, उससे कोई और उपकरण न जोड़ा जाए। एक बार जब कारखानों को, पानी साफ करने की मशीनों को, बैंकों के एटीएम को, प्लेन और ट्रेन के रिजर्वेशन को, रेलवे के सिग्नलों को, और सडक़ ट्रैफिक की लालबत्तियों को ऑनलाईन नियंत्रण से जोड़ दिया जाता है, तो उसका यह मतलब रहता है कि उसे किसी हैकर के नियंत्रण में दे देने का खतरा भी उठा लिया गया है। 

आज जिस तरह फ्रांस में हैकरों ने एक मामूली सी हरकत से सैकड़ों सुपर बाजारों में खानपान की चीजों को बर्बाद कर डाला, अब उसी तरह यह कल्पना करें कि कोई और दूसरा हैकर समूह दुनिया भर के दवा कारखानों में रखी गई वैक्सीन के कमरों के फ्रिज खराब कर दे, और दुनिया में उन टीकों की कमी कर दे। ऐसा करने वाले किसी दवा कारखाने के प्रतिद्वंद्वी भी हो सकते हैं, और ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो कि किसी देश में जैविक हथियारों से हमला करके संक्रामक रोग फैलाना चाहते हों। अभी रूस में साइबेरिया की एक सुनसान प्रयोगशाला में एक कर्मचारी से गलती से टेस्ट ट्यूब टूट गई, और प्लेग के जीवाणु बिखर गए। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले जब दुनिया भर में कोरोना फैला, तो उस वक्त भी चीन की एक प्रयोगशाला पर इसी किस्म की तोहमत लगी थी कि कोरोना के वायरस वहीं से निकले थे, और फिर दुनिया भर में फैलकर महीनों तक बेकाबू रहे थे। आज दुनिया में ऐसी सैकड़ों प्रयोगशालाएं हैं जहां घोषित या अघोषित रूप से ऐसे तरह-तरह के वायरसों पर प्रयोग चलते रहते हैं, उनसे बचने के लिए टीके बनाने हों, तो भी वायरस का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा अघोषित रूप से इन वायरसों को फैलाने के हथियारों पर भी काम जरूर ही चल रहा होगा, क्योंकि दुनिया की बहुत से देशों की सरकारों से किसी शराफत की उम्मीद नहीं की जाती है। 

हमारा ऐसी अपराधकथा की कल्पना पर पूरा भरोसा है जिसमें दुनिया के बहुत से देशों से लोग किसी एक जगह पर पहुंचे हुए हों, और उन पर कोई ऐसा वायरस हमला हो जिसके लक्षण एक-दो हफ्तों के बाद ही सामने आएं। इसका यह मतलब है कि वहां से लाखों लोग अपने-अपने देशों में ऐसे संक्रमण को लेकर लौट चुके होंगे, और वहां जब वे इसे फैलाना शुरू कर चुके होंगे, तब तक सरकारें चौकन्नी भी नहीं हुई होंगी। इसके अलावा भी भीड़भरी जगहों पर अगर किसी तरह से वायरस को सीधे भी फैलाना हो, तो किसी धार्मिक, सामाजिक, या राजनीतिक कार्यक्रम में पहुंचे हुए लाखों लोगों के बीच ऐसी एक टेस्ट ट्यूब कोई फोड़ दे, तो तबाही बेहिसाब होगी। 

अब हम बिना किसी की जान लिए की जाने वाली साजिशों के बारे में सोचें। किसी भी देश की धडक़न आज इंटरनेट और मोबाइल फोन से जुड़ी हुई है। किसी सामान का भुगतान करना हो, कोई टिकट बुक करनी हो, शिनाख्त बतानी हो, या किसी सरकारी काम के लिए ओटीपी देना हो, इन सबके लिए मोबाइल-इंटरनेट जरूरी है। आज दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश हो, जिसने अपने सारे जरूरी कामों के लिए बिना मोबाइल-इंटरनेट के काम करने की कोई वैकल्पिक व्यवस्था बनाई हो। हमने तो सबसे विकसित देशों के बारे में भी ऐसा नहीं सुना है। आज लोगों की जिंदगी, और हर तरह का कामकाज मोबाइल फोन का इस हद तक मोहताज हो गया है कि अपने दफ्तर से घर लौटने के किस रास्ते पर ट्रैफिक कम है, इसे देखे बिना लोग रास्ता तय नहीं कर सकते, और बिना मोबाइल नक्शे पर यह दिखता नहीं है। लोग जेब में नगद नहीं रखते, अगर क्रेडिट कार्ड, और डेबिट कार्ड वाली कंपनियों के रिकॉर्ड हैक कर लिए जाएं, बैंकिंग कम्प्यूटरों पर कब्जा कर लिया जाए, लोगों के पासवर्ड बदल दिए जाएं, उनके अकाऊंट की रकम खाली कर दी जाए, उनके यूपीआई भुगतान की ताकत खत्म हो जाए, तो पल भर में किसी देश में गृहयुद्ध की नौबत आ सकती है। इसी तरह आज अधिकतर विकसित देशों में अस्पतालों में लोगों के सेहत के रिकॉर्ड कम्प्यूटरों पर रहते हैं, और मरीजों का इतिहास देखने के लिए कागजों की फाइल कम देखी जाती है। आज अधिकतर जटिल जांच कम्प्यूटरों पर होती है, और कम्प्यूटरों के नेटवर्क पर ही उसके नतीजे भेजे जाते हैं। कम्प्यूटरों से जुड़े उपकरण मरीज की हालत नापते रहते हैं, दवा का डोज देना भी कम्प्यूटरों के मार्फत बताया जाता है। अगर कोई देश, या कोई संगठन किसी देश को अपना दुश्मन माने, और इस तरह का कोई हमला करे, तो क्या होगा? 

इसी तरह यह कल्पना करें कि तमाम रेलवे स्टेशनों, और एयरपोर्ट पर रिजर्वेशन के चार्ट के कम्प्यूटर बंद हो जाएं, विमानों का उडऩा थम जाए, ट्रेनों के सिग्नल मनमाने तरीके से लाल-हरे होने लगें, तो क्या होगा? इसी तरह सडक़ों पर ट्रैफिक सिग्नलों को एक साथ हरा कर दिया जाए, और चारों तरफ की गाडिय़ां आकर चौराहों पर जाम हो जाएं, और फिर सिग्नल ठप्प हो जाएं, तो जिंदगी किस तरह थम जाएगी? बिजलीघरों में सारी चीजें कम्प्यूटरों से तय होती हैं, और बिजली वितरण के लिए बनी हुई ग्रिड पर कब किस इलाके में अधिकतम कितनी बिजली भेजी जाए, यह भी कम्प्यूटरों से नियंत्रित रहता है। अब अगर बारी-बारी से किसी एक इलाके की ग्रिड पर ही पूरी की पूरी बिजली भेज दी जाए, तो वह पूरी ग्रिड ध्वस्त हो जाएगी, और कई दिनों तक ठीक नहीं हो पाएगी। जब तकनीकी रूप से जानकार लोग इस तरह का नुकसान पहुंचाना चाहेंगे, उनके पास हैकिंग की क्षमता होगी, और अब एआई की नई ताकत भी होगी, तो वे पूरी दुनिया को तबाह करने की हालत में होंगे। कल की ही खबर है कि एंथ्रॉपिक नाम की कंपनी ने यह कहा है कि उसके एआई चैटबॉट, क्लॉड का इस्तेमाल यमन के हूथियों ने मिसाइल और गाइडेड रॉकेट के लिए सॉफ्टवेयर बनाने में किया। हालांकि एंथ्रॉपिक ने हूथियों का नाम नहीं लिया, लेकिन यमन के उस इलाके पर हूथियों का ही कब्जा है। अब अगर विकसित देशों के पैमाने से बहुत दूर, बहुत पीछे, हूथी जैसे कट्टर हथियारबंद संगठन एआई का इस तरह का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो कल के दिन किसी विकसित देश में कोई इजराइल विरोधी, ट्रम्प विरोधी संगठन भी कई तरह से एआई को हथियार बनाकर तरह-तरह के हमले कर सकते हैं। 

आज दुनिया जिस हद तक डिजिटल और ऑनलाईन हो चुकी है, वहां से वापिसी का कोई रास्ता नहीं है। यह वन-वे ट्रैफिक वाली रोड है, और यहां पर अंधाधुंध रफ्तार से ताकत बढ़ाने वाला एआई कितना जानलेवा साबित होगा, इसे ट्रम्प जैसे मूढ़ समझ भी नहीं सकते, और एआई में दुनिया भर की दौलत झोंक चुकी कंपनियां इसे समझना भी नहीं चाहतीं। कुल मिलाकर दुनिया एक डिजिटल बारूद के ढेर पर बैठी हुई है, और एआई सिगरेट पीते हुए चारों तरफ चक्कर लगा रहा है।

(Daily Chhattisgarh)    

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