..और कितने कीट-पतंगों के पुतले रावण के बगल खड़े किए जाएंगे?

 18 अक्टूबर 2026

 

भारत में सुबह-सुबह सोशल मीडिया देखें, तो पश्चिमी देशों के समाचार अधिक दिखते हैं। वहां दोपहर, शाम, या रात चलती रहती है, और उस वक्त खबरें अधिक आती हैं। आज फ्रांस में बेहतर स्कूलों, बेहतर सुविधाओं को लेकर चल रहा आंदोलन एक बार फिर भभकते दिख रहा है। जगह-जगह आग लगी हुई है, और शहरी बाजारों के बड़े-बड़े शोरूम तोडक़र, उनमें घुसकर लोग सामान लूट रहे हैं। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक बीते कल वहां साढ़े पांच लाख लोग सडक़ों पर थे, दूसरी तरफ मजदूर संगठन ने यह संख्या आठ लाख बताई है। ये आंदोलन रोजाना के बढ़ते खर्चों, पेट्रोलियम महंगाई, स्कूलों में शिक्षकों की कमी, कक्षाओं में क्षमता से अधिक बच्चे, स्कूलों की खराब बुनियादी सुविधाएं, सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशन की अधूरी मांगें, और सार्वजनिक सुविधाओं पर घटते खर्च को लेकर चल रहे हैं। 

एक तरफ भारत जैसे देश में कई जगहों पर बच्चे स्कूली दिक्कतों को लेकर 50 किलोमीटर दूर कलेक्टर दफ्तर तक पैदल निकल रहे हैं, तो दूसरी तरफ योरप का एक विकसित देश फ्रांस भी स्कूलों की अपूरित मांगों को झेल रहा है, कैसी गजब की समानता है! छात्र संगठनों के आंदोलनों का साथ देने के लिए उनके माँ-बाप भी उतर आए, और ट्रेड यूनियनें भी सडक़ों पर आ गईं। बहुत से स्कूल जला दिए गए, शहरों में जगह-जगह आगजनी हो रही है, और खुलेआम दुकानों को लूटकर लोग भाग रहे हैं। दुनिया की चर्चित जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग भी अभी इसी हफ्ते फ्रांस के छात्र आंदोलन में शरीक होने पहुंची थी। 

बेल्जियम में सीमित आबादी के बावजूद राजधानी ब्रसेल्स में 30 हजार से अधिक लोग सडक़ों पर प्रदर्शन कर रहे थे, वे सरकार की प्रस्तावित बजट कटौती के खिलाफ थे, पेंशन और बेरोजगारी भत्तों को घटाने के खिलाफ थे, वैट (टैक्स) बढ़ाने के खिलाफ थे, सार्वजनिक सेवाओं पर अधिक खर्च की मांग कर रहे थे, और कर्मचारियों की सेवा स्थितियां सुधारने की मांग भी कर रहे थे। ब्रसेल्स में छात्रों का आंदोलन चल रहा है, विश्वविद्यालयों की बढ़ती हुई फीस, शिक्षा तक सीमित होती पहुंच के खिलाफ वे आंदोलन कर रहे हैं, और पुलिस ने उन पर आंसू गैस और पानी की बौछार का इस्तेमाल भी किया। कुल मिलाकर जनता के बहुत से तबके सरकार के खिलाफ हैं। 

अलग-अलग देशों की स्थितियां अलग-अलग हैं। पुर्तगाल में चल रहे बड़े प्रदर्शनों में घरों और किराए के बढ़ते रेट, घटते वेतन, महंगे ईंधन, और घटती पेंशन-सार्वजनिक सेवा के खिलाफ आंदोलन चल रहे हैं। एक और बड़े प्रमुख देश इटली में रोजमर्रा की महंगाई के खिलाफ बड़े प्रदर्शन हुए, वेतन, पेंशन, ईंधन, और आवास के मुद्दों को लेकर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें भी हुईं। न योरप के देशों में आंदोलन एक किस्म के मुद्दों पर चल रहे हैं, न उनके पीछे कोई एक किस्म की विचारधारा है, हर जगह अलग-अलग बातें हैं, लेकिन बेचैनी सब जगह एक सरीखी है। 

अब योरप के एक सबसे सस्ते माने जाने वाले देश स्पेन को देखें तो वहां 50 से अधिक शहरों में बढ़ते किराए के खिलाफ प्रदर्शन चल रहे हैं। 87 साल की एक महिला को जब किराए के घर से बेदखल कर दिया गया, तो उसका मामला एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया। उसकी मौत के बाद देश भर में प्रदर्शन हुए, और आवास संकट के बीच प्रधानमंत्री को अभी पिछले पखवाड़े समय पूर्व चुनाव की घोषणा करनी पड़ी। एक और देश ग्रीस में विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलन कर रहे हैं कि बढ़ते किराए का बोझ वे नहीं उठा पा रहे, और छात्रावासों की कमी है, उन्होंने संसद के सामने रात बिताकर अपने मुद्दे को उठाया। एक और देश अल्बानिया में छात्रों की लीडरशिप वाला सरकार विरोधी प्रदर्शन हफ्ते भर से चल रहा है, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शिक्षा की खराब हालत जैसे मुद्दे हैं, और प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांग रहे हैं। इसके अलावा ट्रम्प के दामाद की कंपनी को समुद्र तट पर एक प्रोजेक्ट के लिए संरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र में इजाजत देने के खिलाफ भी आंदोलन चल रहे हैं। अल्बानिया यूरोपीय संघ का सदस्य नहीं है, लेकिन वह योरप के राजनीतिक मुद्दों से जुड़ा रहता है। पिछले कुछ हफ्तों में जर्मनी में छात्रों, शिक्षकों, पालकों, और यूनियनों में शिक्षा में निवेश बढ़ाने, अधिक शिक्षक नियुक्त करने, और शिक्षा व्यवस्था में समानता की मांग को लेकर आंदोलन हुए हैं। ऑस्ट्रेलिया में छात्रों ने प्रदर्शन की चेतावनी दी है क्योंकि विश्वविद्यालय की बजट कटौती की आशंका है। 

इनमें से सारे देश भारत और उसके पड़ोसी देशों के मुकाबले बहुत बेहतर आर्थिक स्थिति वाले हैं। फिर भी वहां पर बेचैनी से उपजे जनआंदोलन अलग-अलग स्तर की अशांति, हिंसा, और खतरे खड़े कर रहे हैं। भारत में बैठे यह सूझ भी नहीं सकता था कि फ्रांस में स्कूलों की हालत बेहतर बनाने के लिए देश भर की सडक़ों पर आगजनी होगी, और बड़े-बड़े ब्रांड के शोरूम चारों तरफ लूट लेने जैसी सामाजिक-अराजकता आएगी। हर देश को दूसरे देशों की स्थितियों से कुछ सीखना चाहिए। कहने के लिए तो लोग यह भी कहते हैं कि इतिहास से भी सीखना चाहिए, लेकिन हम इतिहास जितनी गहराई में नहीं जाते, हम तो अड़ोस-पड़ोस के देशों, और धरती के गोले के दूसरी तरफ के देशों की आज की घटनाओं को देखकर सबक लेने की बात पर रूक जाते हैं। सरकारें आज अगर इतना भी कर लें, तो काफी होगा। वरना तिलचट्टों के  बाद, मक्खियों के बाद, अब चीफ जस्टिस के गिनाए हुए बाकी और कितने कीट-पतंगों के पुतले रावण के बगल में खड़े किए जाएंगे?

(Daily Chhattisgarh)  

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