नालायक सरकार और मुजरिम विपक्ष की वजह से जलता उत्तरप्रदेश...

संपादकीय
9 सितंबर 2013
उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर में साम्प्रदायिक हिंसा में दो दर्जन से अधिक लोग मारे गए हैं, और फौज बुलाकर तैनात की गई है। कुछ दिन पहले यह तनाव तब शुरू हुआ जब हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच लड़की से छेडख़ानी को लेकर तनाव हुआ और एक समुदाय के लोगों ने दूसरे समुदाय के, लड़की के परिवार के दो युवकों को मार दिया। इसके बाद दूसरे समुदाय ने एक बड़ी जाति पंचायत रखी, और उससे लौटते हुए लोगों के साथ दूसरे समुदाय के लोगों का फिर टकराव हुआ, और आसपास के इलाकों में साम्प्रदायिक हिंसा दूर-दूर तक फैल गई। इसको भड़काने में, और हवा देने में वहां पर भाजपा के एक विधायक को गिरफ्तार किया गया है, जिसने अपने फेसबुक पेज पर एक फर्जी वीडियो लगाया और कहा कि देखो मुजफ्फरनगर में क्या हो रहा है। इस वीडियो का शीर्षक था- 'अपनी बहन की इज्जत बचाने की कोशिश कर रहे हिन्दू नौजवान किस तरह मुस्लिम भीड़ द्वारा मार डाले गए।Ó पुलिस का मानना है कि इस वीडियो से भी हिंसा भड़की क्योंकि लोगों ने इसे डाउनलोड करके मोबाइल फोन पर एक-दूसरे को भेजना शुरू कर दिया। और जांच में हकीकत यह निकली कि भाजपा विधायक द्वारा डाला गया यह वीडियो तीन बरस पहले का पाकिस्तान का था जिसमें वहां भीड़ ने दो भाइयों को डकैत समझकर पीट-पीटकर मार डाला था। 
लेकिन उत्तरप्रदेश के इस ताजा साम्प्रदायिक  दंगे को हम साम्प्रदायिक कम मानते हैं, सरकार की लापरवाही, और निकम्मेपन का नतीजा अधिक मानते हैं। उत्तरप्रदेश उन राज्यों में से है जहां पर एक कुनबे का राज अब दूसरी पीढ़ी में दाखिल हो चुका है, और एक ही परिवार के जाने कितने लोग देश की संसद से लेकर राज्य की विधानसभा तक हैं, सरकार में हैं, किसी दूसरी सरकार का सहारा बने हुए हैं, और इसी नाते किसी कड़ी कार्रवाई से सीबीआई से लेकर अदालत तक बचे हुए हैं। मुलायम सिंह यादव ने अपने अनुभवहीन बेटे अखिलेश यादव को जब सीधे मुख्यमंत्री बना दिया, तो यह संसदीय बहुमत के अहंकार का सुबूत था, न कि कोई सोचा-समझा अच्छा फैसला। और पहले दिन से लेकर अब तक जो कुछ बातें अखिलेश सरकार के बारे में साबित हुई हैं, उनमें से एक उनका निकम्मापन है, नाकाबिलीयत है, और गंभीरता की कमी है। मुलायम के कुनबे के लोग, सरकार के मंत्री, सरकार के अफसर, गंदी, अश्लील और फूहड़ बातें कैमरों के सामने करते हैं, खुलकर साम्प्रदायिकता की बातें करते हैं, और सरकार की कोई पकड़ उन पर नहीं है, न ही मुलायम की पकड़ अपने कुनबे और अपनी पार्टी पर है। जरूरत से अधिक बहुमत किस तरह किसी को तबाह कर सकता है यह देखना हो, तो मुलायम राज देखा जा सकता है। इसके अलावा जो सबसे बड़ी पहचान अखिलेश सरकार की बनी है, वह है तरह-तरह के मुजरिमों और माफिया-कारोबारियों को बचाने के लिए अच्छे अफसरों को कुर्बान कर देने की। नतीजा यह है कि उत्तरप्रदेश में अच्छे अफसरों का हौसला पस्त है, और जो खुशामदी या गलत काम करने को तैयार अफसर हैं, उनका बोलबाला है। ऐसे राज्य में जब कहीं पर साम्प्रदायिक तनाव होता है, तो इस सरकार के मुस्लिम परस्त रूख को देखते हुए कोई अफसर मुस्लिम मुजरिमों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने से हिचकते हैं, नौकरी के बीच निलंबित होकर कहां जाएं। लोगों को पिछले कुछ हफ्तों की याद है जब सार्वजनिक जमीन पर एक मस्जिद की अवैध दीवार को लेकर एक अच्छी अफसर दुर्गा नागपाल को निलंबित किया गया। और लोगों को यह भी याद है कि किस तरह अखिलेश की मंत्रियों ने दुर्गा नागपाल के खिलाफ सार्वजनिक माईक पर कैमरों के सामने गालियां बकीं, उसके कुनबे के चरित्र पर गंदी बातें उछालीं। अभी कुछ दिन पहले का लोगों को याद होगा कि देश के सबसे बड़े आतंकवादियों में से एक भटकल की गिरफ्तारी के बाद किस तरह समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव यह सवाल पूछते मिला कि उसे इसलिए गिरफ्तार किया गया है कि वह मुजरिम है, या इसलिए गिरफ्तार किया गया है कि वह मुस्लिम है। इसके बाद मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी को इस मुस्लिम महासचिव को पद से हटाना पड़ा। 
आज उत्तरप्रदेश की यह साम्प्रदायिक हिंसा हिन्दू और मुस्लिम समाज के बीच की हिंसा नहीं है। एक तरफ मुस्लिमों को खुश करने के लिए बदनाम समाजवादी पार्टी की बेकार सरकार है, तो दूसरी तरफ मोदी के भेजे हुए अमित शाह की अगुवाई में आज अगर उत्तरप्रदेश का भाजपा का एक विधायक ऐसे जलते हुए मौके पर एक फर्जी वीडियो को डालकर लोगों को भड़काने का जुर्म कर रहा है, तो उसे हम एक छोटा-मोटा जुर्म नहीं मानते। हमारा मानना है कि यह सोची-समझी साजिश के तहत पोस्ट किया गया एक फर्जी वीडियो है, और इतनी मौतों में इसका हाथ जरूर है, और इन मौतों से परे भी साम्प्रदायिक नफरत फैलाने का काम इसने किया है। तो एक तरफ एक ही कुनबे की नालायक सरकार, और दूसरी तरफ बहुत काबिल और गुजरात के खूनी इतिहास वाले विपक्षी अमित शाह की सक्रियता, इन दोनों ने मिलाकर राज्य में एक ऐसी नौबत ला दी है, जिसे काबू में करने की इच्छाशक्ति आज उत्तरप्रदेश में कम ही अफसरों में होगी। उत्तरप्रदेश बाकी देश में भी आने वाले महीनों में एक साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का खतरा बताता है। पाठकों को याद होगा कि कुछ ही दिन पहले केन्द्र सरकार ने राज्यों को बुलाकर दिल्ली में इस खतरे की तरफ से आगाह किया था कि साम्प्रदायिक ताकतें धार्मिक ध्रुवीकरण में लगी दिखती हैं, और इससे सावधान रहने की जरूरत है। 

छत्तीसगढ़ के चुनाव, और मुद्दे देश के!

8 सितंबर 2013
संपादकीय

कल छत्तीसगढ़ में एक तरफ भाजपा के लगभग तय प्रधानमंत्री-प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी बनाए गए लालकिले से देश को संबोधित करने के अंदाज में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए सरकार पर हमले कर रहे थे, और दूसरी तरफ कांगे्रस के अधिकृत  अनधिकृत-प्रवक्ता दिग्विजय सिंह भी नरेन्द्र मोदी पर इसी प्रदेश में मंच से हमले कर रहे थे। माहौल कुछ ऐसा था कि लोकसभा के चुनाव का प्रचार राष्ट्रीय मुद्दों के आधार पर हो रहा हो। लेकिन लोकसभा चुनाव खासे दूर हैं, और उनसे पहले अभी छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में राज्य के मुद्दों से हटकर जब बात केंद्र के मुद्दों पर आ जाती है, तो यह नौबत राज्य के विपक्ष के लिए बहुत अच्छी नहीं रहती। 
इस प्रदेश में भाजपा की सरकार के दस बरस पूरे होने जा रहे हैं। इन दस बरसों में किसी भी सरकार की इतनी गलतियां, और इतने गलत काम विपक्ष के हाथ होने चाहिए कि वे चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी की नाक में दम कर दे। लेकिन केंद्र में यूपीए सरकार की मुखिया कांगे्रस पार्टी के नाम दिल्ली में इतने धब्बे लगे हैं कि जब भी कांगे्रस और भाजपा के बीच छत्तीसगढ़ में बहस छिड़ती है, तो वह दिल्ली के मुद्दों पर जा टिकती है। एक तरफ तो छत्तीसगढ़ में दस बरस की सरकार के खिलाफ लोगों में नाराजगी, असंतोष, और बेचैनी होनी चाहिए थी, और यह बातें राज्य की कांगे्रस पार्टी के हाथ हथियार की तरह रहनी भी चाहिए थी। लेकिन आज माहौल ऐसा दिख नहीं रहा है। इससे भाजपा तो खुश हो सकती है, लेकिन जब विपक्ष मजबूत नहीं होता, जब दस बरस में भी वह परेशान करने वाले दस बड़े मुद्दे नहीं निकाल सकता, तो यह विपक्ष की कमजोरी अधिक लगती है, सरकार की खूबी कम लगती है। सरकार तो कहीं की भी हो, उसकी खामियां निकालना बहुत मुश्किल नहीं होना चाहिए, लेकिन आज छत्तीसगढ़ में कांगे्रस पार्टी के पास एक बैंक घोटाले को लेकर जो सबसे बड़ा मुद्दा है, उस बैंक घोटाले में शामिल एक-एक महिला कांगे्रस पार्टी से जुड़ी हुई है, और ऐसे में कांगे्रस उसे खुलकर इस्तेमाल तो कर रही है, लेकिन सत्तारूढ़ लोगों को रिश्वत देने का बयान इस घोटाले के पीछे कांग्रेसियों के नाम के साथ जुड़कर ही आ पाता है। ऐसे में खबरों के लायक तो यह आरोप है, लेकिन बैंक के शिकार हजारों खातेदारों को यह मालूम है कि बैंक का पूरा घोटाला सिर्फ कांगे्रसी परिवारों का किया हुआ है। 
ऐसे में छत्तीसगढ़ में कांगे्रस के एक प्रमुख राष्ट्रीय नेता दिग्विजय सिंह जब आते हैं, तो वे भी मोदी पर ही हमला कर पाते हैं। राज्य के अधिक मुद्दे उनको भी कांगे्रस नहीं सुझा पाती। और छत्तीसगढ़ में कांगे्रस की एक बड़ी विचित्र स्थिति यह है कि यहां आज भी कांगे्रस संगठन को दिग्विजय सिंह का सहारा है, और राज्य के कांगे्रस के नेता अजीत जोगी से सबसे बड़ा खतरा है। यह नौबत इस राज्य में विपक्ष के लिए अच्छी नहीं है, और इस नाते यह राज्य के लोकतंत्र के लिए भी अच्छी नहीं है। विधानसभा के चुनाव में मुकाबला तो अभी दूर है, अभी तो कांगे्रस के भीतर जिस तरह पंजा-कुश्ती चल रही है, उसकी खबरों से अखबारों के पन्नों को खबरों का बड़ा सहारा रहता है। कांगे्रस के अलग-अलग खेमे और नेता, अपनी-अपनी पहुंच के मुताबिक दिल्ली से लेकर रायपुर तक की खबरों को गढऩे में मदद करते हैं, लेकिन ऐसी तमाम खबरें सिर्फ पंजा-कुश्ती बताती हैं। आज जब कांगे्रस के पंजे की पूरी ताकत कमल को मसलने में लगनी थी, तो आज तक वह सिर्फ पार्टी के भीतर इस्तेमाल हो रही है। और मतदाता यही कुश्ती देख-देखकर थक चुके हैं, और उनको लग रहा है कि कांगे्रस पहले अपने-आपसे जीत ले, उसके बाद फिर भाजपा से जीतने की तैयारी करे।
आज जब राज्य के कुछ हफ्तों बाद के विधानसभा चुनाव में आर-पार का मुकाबला होना है, तब कांगे्रस के भीतर अगर शतरंज की बिसात पर उसके ही बड़े नेता ऊंट की तरह तिरछे, और घोड़े की तरह ढाई घर चलने में लगे हैं, तो यह नौबत उस कांगे्रस पार्टी के लिए बहुत खराब है जिसमें इस राज्य में सत्ता में आने की पूरी-पूरी संभावना थी, और जिसे इसने खुद होकर गंवा दिया है।
एक बार फिर इस चुनाव के पहले के महीनों में यह माहौल बड़ा अजीब है कि राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी अपने कार्यक्रमों और उपलब्धियों का प्रचार कर रही है, और यहां का विपक्ष उसके खिलाफ अधिक कुछ नहीं कर पा रहा है। दूसरी तरफ यूपीए के जितने तरह के स्कैंडल पिछले दस बरस में सामने आए हैं, उनका हिसाब छत्तीसगढ़ में कांगे्रस को कुछ इस तरह देना पड़ रहा है, देना पड़ेगा, जैसे कांगे्रस ही छत्तीसगढ़ में भी सत्तारूढ़ रही हो। सरकार विरोधी लहर छत्तीसगढ़ में राज्य की सरकार के खिलाफ न दिखकर केंद्र की यूपीए सरकार के खिलाफ अधिक दिख रही है। देखना है कि दिग्विजय की टीम छत्तीसगढ़ में कैसे भाजपा से पार पा सकेगी, अगर वह अजीत जोगी से पार पा लेगी, तो।

इक्कीसवीं सदी के भारत निर्माण में बलात्कार की शिकार बच्ची के हक

संपादकीय
7 सितंबर 2013
राजस्थान के एक गांव की एक जाति पंचायत का फैसला सामने आया है जिसमें छह बरस की बच्ची से बलात्कार करने वाले अधेड़ को हुक्म दिया गया कि वह अपने आठ बरस के बेटे से उस बच्ची की शादी करवा दे। अभी जो खबर आई है उसके मुताबिक बच्ची के मां-बाप ने ही यह अपील की थी। दूसरी तरफ खबर में यह भी है कि उस चालीस बरस के अधेड़ बलात्कारी ने यह सब चलते हुए पड़ोस की इस बच्ची से दुबारा बलात्कार किया, और यह प्रस्ताव रखा कि वह इस लड़की से शादी करने को तैयार है। 
हम बलात्कार और सेक्स अपराधों को लेकर जितनी बार यहां लिखना नहीं चाहते हैं, उतनी बार लिखना पड़ता है। हिन्दुस्तान बलात्कार की इतनी किस्मों की इतनी वारदातों से लबालब है, कि अखबार को लोग घर पर कहां छुपाएं, यह सोचना पड़ता है, और बच्चों की मौजूदगी में टीवी की खबरों को शुरू किया जाए या नहीं, यह भी सोचना पड़ता है। यहां पर इस हिंसक जुर्म से एक दूसरा पहलू और जुड़ा हुआ है जिसके बारे में हम बात करना चाहते हैं। एक तो यह कि बलात्कार से परे भी हिन्दुस्तानी लड़की की हालत परिवार और समाज के भीतर इतनी खराब है, कि उसके साथ बलात्कार होने पर बलात्कारी के बेटे से उसकी शादी करवाकर मां-बाप आगे आने वाली सामाजिक दिक्कत से बचने की कोशिश करते हैं। न बलात्कार पर सजा, और न ही छह बरस की बेटी के बाल विवाह पर फिक्र। फिर तीसरा पहलू इस जुर्म का यह है कि हिन्दुस्तानी गांवों में आज भी जगह-जगह जाति पंचायतों का ऐसा हिंसक बोलबाला है कि उसके चलते बहुत से लोगों को कोई इंसाफ मिल ही नहीं सकता। और समाज व्यवस्था, जाति व्यवस्था इतनी हावी है कि आम लोग उससे बाहर निकलने की न सोच पाते, न उसका हौसला जुटा पाते। 
बहुत से लोगों की नजरों में गांव शहरों से अच्छे हैं। लेकिन हिन्दुस्तान के बारे में हकीकत यह है कि शहरों में जाति व्यवस्था कुछ हद तक टूटी है, देश के कानून की मौजूदगी है। गांवों में आज भी जाति व्यवस्था का शिकंजा बहुत मजबूत है, और वहां लोकतंत्र, समानता, कानून के राज की जगह ठीक से नहीं बन पाई है। हरियाणा की खाप पंचायतें जाति व्यवस्था की हिंसा की सबसे बड़ी मिसाल बनकर देश में मौजूद है, जिसके चलते जगह-जगह लोग एक झूठी शान को जिंदा रखने के लिए अपने ही बच्चों को मार डालते हैं क्योंकि वे अपनी मर्जी से शादी कर बैठते हैं। 
राजस्थान उन राज्यों में से है जहां पर इंदिरा-सोनिया की पार्टी का राज लंबे समय तक रहा, और भाजपा की वसुंधरा राजे सिंधिया, एक महिला मुख्यमंत्री भी वहां रही। लेकिन राजस्थान अपने पुराने रिवाजों से उबर नहीं पाया है। अभी कुछ दशक पहले तक वहां पर महिलाओं को सती बनाकर जिंदा जला देना जारी था, और हद तो तब हो गई थी जब हाईकोर्ट के एक राजस्थानी जज ने सतीप्रथा का समर्थन किया था। आज भी बाल विवाह के खिलाफ राजनीतिक दल और नेता कुछ बोलने से बचते हैं। यही नतीजा है कि देश भर में धर्म और जाति के नाम पर अंधाधुंध हिंसा जारी है। धर्म की हिंसा अब कानून के कड़े होते जाने से कम हुई है, तो दकियानूसी लोगों के मन में कायम हिंसा ने अपने धर्म के भीतर दूसरी जातियों के लोगों को एक निशाने की शक्ल में छांट लिया है। हिंसा अगर है तो वह जाती नहीं, वह दूसरे धर्म से हटती है, तो दूसरी जाति पर आ टिकती है, दूसरी जाति से हटेगी तो वह दूसरे पड़ोसी परिवार पर आ टिकेगी। इसलिए लोगों के मन की हिंसा को समाज सुधार और कानून के बेहतर अमल से काबू में करने और फिर खत्म करने की जरूरत है।
केन्द्र और राज्य सरकारों की बहुत सी योजनाएं कागजों में बंद पड़ी है। दिल्ली के बहुत चर्चित निर्भया बलात्कार कांड के बाद बनाया गया एक राष्ट्रीय कोष, अपने शायद डेढ़ हजार करोड़ रूपयों के साथ अब तक नियम-कायदे बनने का इंतजार कर रहा है। बाल विवाह के खिलाफ सरकार की योजनाएं हैं, जाति व्यवस्था तोड़कर शादी करने वालों के लिए बढ़ावा देने की नगद रकम की योजनाएं हैं, लेकिन बेवकूफ सरकारों की बेवकूफ पुलिस लड़के-लड़कियों को शहरों तक में खुली रौशनी में, बाग-बगीचों में मिलने से रोकती है। जब पुलिस ही मिलने से रोकेगी, तो जाति व्यवस्था कहां से टूटेगी? कैसे कोई प्रेम विवाह कर सकेगा? इसलिए आज भारत में समाज सुधार के रास्ते में सरकार और पुलिस सबसे बड़ा रोड़ा इसलिए हैं, क्योंकि सत्ता के पास संगठित गिरोहबंदी वाले जाति और सामाजिक संगठनों को कानून सिखाने का हौसला नहीं है। 
ऐसे में छोटी बच्ची के साथ बलात्कार के बाद उसे ही उसी के मां-बाप यह सजा सुनाते हैं कि वह बलात्कारी के छोटे से बेटे के साथ शादी कर ले। ऐसी अपील लेकर मां-बाप जाति पंचायत में जाते हैं, और जाति पंचायत ऐसा हुक्म भी दे देती है।  इसके चलते उस बच्ची से वही बलात्कारी दुबारा बलात्कार करता है। और हिन्दुस्तान इक्कीसवीं सदी में भारत निर्माण के गौरव का नारा लगाते हुए बलात्कार पर मुआवजे का रेट घोषित करता है। 

Bat ke bat, बात की बात

7 sept 2013

Bat ke bat, बात की बात

6 sept 2013

सुबूत चूर-चूर कर धूल में मिला देने का वक्त देने वाली पुलिस

संपादकीय
6 सितंबर 2013
हिन्दुस्तान की पुलिस भी बहुत मजेदार है। पहले हिन्दी फिल्मों में पुलिस को मखौल का सामान बताया जाता था, पांडु हवलदार को रिश्वत लेते हुए देख-देखकर जब दर्शक थक गए थे, तब फिर वह सिलसिला फिल्म-लेखकों ने खत्म किया। इसके बाद पुलिस के भारी-भरकम पेट को फिल्मों में दिखाया जाता रहा। एक वक्त ऐसा आया जब अर्धसत्य से लेकर अब तक छप्पन तक पुलिस को मुठभेड़ हत्या के लिए दिखाया गया, और वह तस्वीर आज भी गुजरात के वंजारों की शक्ल में हकीकत भी है। लेकिन इन सबके बीच मजे की बात यह है कि जोधपुर में आसाराम नाम के एक स्वघोषित संत के बलात्कार-मामले में जांच कर रही पुलिस ने आसाराम के अहमदाबाद आश्रम जाकर आज छापा मारा है, और वह उम्मीद कर रही है कि आसाराम के कुकर्मो की रिकॉर्डिंग वाली कोई सीडी वहां उसे मिलेगी। आज बलात्कार की शिकार लड़की की रिपोर्ट को तीन हफ्ते हो रहे हैं। इन तीन हफ्तों में बलात्कार के सुबूत अगर कांक्रीट की पांच मंजिला इमारत भी होते तो उनको चूर-चूर करके धूल में मिलाया जा सकता था। और यहां पर पुलिस लिखने से हमारा मतलब सिर्फ किसी राज्य की पुलिस नहीं है, सीबीआई भी किसी के खिलाफ जांच शुरू होने के हफ्तों और महीनों बाद जाकर छापे मारती है। 
हम हड़बड़ी में किसी के खिलाफ किसी कार्रवाई की बात नहीं करते। लेकिन अगर गवाह और सुबूत जुटाने हैं, खरे और मजबूत जुटाने हैं, तो फिर समय रहते ही कार्रवाई भी करनी होगी, और कानूनी बारीकियों को ध्यान में रखते हुए ऐसी कार्रवाई करनी होगी जो कि अदालत में खड़ी भी रह सके। आज पूरे देश में किसी भी किस्म के मामले में सजा इतने कम लोगों को हो पाती है, कि लोगों का भरोसा हिन्दुस्तानी अदालतों पर से पूरी तरह उठ चुका है और लोगों का यह अनुभव है कि शिकायत करने वाले लोग, पुलिस और अदालत तक जाने वाले लोग अदालत में सबसे अधिक तकलीफ पाते हैं। पुलिस और अदालतों में काम का तरीका मुजरिमों के लिए दोस्ताना होता है, और जुर्म के शिकार लोगों के लिए दिक्कत और तकलीफ से भरा हुआ। अनगिनत मामले ऐसे हैं जिनमें बलात्कार की शिकार महिला जब थाने पहुंचती है, तो वहां पर पुलिस हवालात में उसके साथ बलात्कार में जुट जाती है। इन्हीं सब मामलों को लेकर पिछले कुछ महीनों में दिल्ली के अलावा बाकी देश में भी जगह-जगह ऐसे बेचैन और उग्र प्रदर्शन हुए हैं जो कि पुलिस पर भरोसा खत्म होने का सुबूत थे। 
आसाराम जैसा ताकतवर और पहुंच वाला आरोपी अगर इतना वक्त पाता है, तो उसे सारे सुबूतों को खत्म करने के लिए और क्या चाहिए? जब एक नाबालिग लड़की बलात्कार का आरोप लगाती है, तो पुलिस ने कई दिनों तक, जिस कमरे का यह जुर्म बताया गया, उस कमरे में झांका भी नहीं था। दूसरी तरफ ये खबरें भी लगातार आ रही थीं कि बलात्कार की शिकार लड़की के परिवार पर आसाराम की तरफ से उनके हिमायती किस तरह शिकायत वापिस लेने के लिए दबाव डाल रहे थे, तब भी राजस्थान की पुलिस ने समय रहते छापे मारकर सुबूत जुटाने का काम नहीं किया। अगर आसाराम की जगह कोई गरीब या कमजोर होता तो उसके घर को बिना रिपोर्ट दर्ज हुए भी पुलिस रौंद डालती। इसीलिए भारतीय लोकतंत्र में लोगों का यह मानना है कि यहां पर कमजोर लोगों को अहिंसा के साथ कोई इंसाफ नहीं मिल सकता। हम पहले भी कई बार यह बात लिख चुके हैं कि इस देश के बहुत से पढ़े-लिखे प्रमुख लोग खुद अहिंसक रहते हुए भी यह मानते हैं कि सबसे कमजोर को इंसाफ दिलाने के लिए हिंसा जरूरी है। 
आसाराम के साथ जो खास बर्ताव हुआ है, वैसी रियायत सुबूतों को अदालत तक पहुंचाने की गुंजाइश खत्म ही कर देता है। और देश के किसी भी किस्म के ताकतवर तबके के साथ आज जांच एजेंसियों का, सरकारों का ऐसा ही बर्ताव है। ऐसे और मामले देखने हों, तो बड़े नेताओं के मामले देख लें, अम्बानी और सहारा के मामले देख लें। और यह कल्पना करें कि उनकी जगह कोई गरीब फंसा होता, तो लोकतंत्र के सारे पाये उस गरीब पर अपना पांव रखकर उसे कब का कुचल चुके होते। 

संसद में मुजरिमों का स्वागत, जनता पर खौलता हुआ तेल

5 सितंबर 2013
संपादकीय
आज दो मुद्दे सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक खड़े हैं, और भारतीय लोकतंत्र के ये दो स्तंभ इन मुद्दों पर दो पहलवानों की तरह आपस में उलझे दिख रहे हैं। यहां पर यह भी लगता है कि भारतीय संविधान ने संसद को अदालत से ऊपर कर दर्जा दिया है कि संसद देश की आखिरी अदालती फैसले को पलटकर एक नया कानून बना सकती है। अदालत को यह सहूलियत नहीं है, लेकिन जनता को यह सहूलियत है कि वह संसद के काम को लेकर अपनी राय कायम कर सके। आज राजनीतिक दल और नेता संसद के भीतर कानून को बदलकर दो लोकतांत्रिक बातों को कुचलने के लिए गिरोहबंदी कर चुके हैं। इन दोनों ही तबकों को यह बात नहीं सुहा रही कि सुप्रीम कोर्ट संसद और विधानसभाओं के भीतर मुजरिमों का बैठना रोके। इसी तरह इन दोनों ही तबकों को यह बात भी नहीं सुहा रही कि जनता सूचना का अधिकार लेकर राजनीतिक दलों की खाता-बही का हिसाब पूछे। तो मुजरिमों को भीतर लाने पर पार्टियां और नेता आमादा हैं, और दूसरी तरफ सूचना के हक को पार्टियों की दहलीज के बाहर रखने पर भी ये दोनों तबके उतने ही आमादा हैं।
यह नौबत संसदीय गिरोहबंदी का एक ऐसा सुबूत है जो भारतीय लोकतंत्र की इज्जत घटाना साबित कर रहा है। दिक्कत यह है कि इस सुबूत पर कोई कार्रवाई करने का हक अदालत को दिया नहीं गया है। लोगों को याद होगा कि जब सुप्रीम कोर्ट ने एक बूढ़ी मुस्लिम औरत शाहबानो के हक में फैसला दिया था तो राजीव गांधी की अगुवाई वाली कांगे्रस सरकार ने अपने ऐतिहासिक भारी-भरकम संसदीय बाहुबल से शाहबानो को पटक-पटककर मारा था, और सुप्रीम कोर्ट से उसे दिए गए हक को छीनकर उन हकों को दकियानूसी मुस्लिम मर्दों के हाथ थमा दिया था। गांधी और नेहरू के वक्त वैसा नहीं हुआ होता। लेकिन कांगे्रस ने गांधी और नेहरू के बाद उनकी राह से परे चलने में अधिक वक्त नहीं गंवाया था। आज फिर कांगे्रस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ही इस बात को मुमकिन कर रही है कि मुजरिमों को संसद के भीतर लाया जाए, और सूचना के हक को राजनीतिक दलों के हिसाब-किताब से बाहर रखा जाए। 
देश की जनता को हर पार्टी की रीति-नीति और उसके फैसलों के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। आज हिंदुस्तान में बहुत पढ़े-लिखे लोगों में से एक बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों का है जो कि राजनीतिक को एक गंदी चीज मानकर उससे दूर रहते हैं, और इस कदर दूर रहते हैं कि वोट डालने भी नहीं जाते। भले लोगों के राजनीति से और मतदान केंद्रों से दूर रहने का ही नतीजा होता है कि बुरे लोग चुनकर आते हैं, और भले लोगों का नसीब लिखते हैं। इसलिए हिंदुस्तान में लोगों को मुद्दों को समझने की जरूरत है, उन मुद्दों के पीछे की नेताओं और पार्टियों की नीयत को समझने की जरूरत है, और समझने के बाद उस पर सोचने और अपनी अहिंसक प्रतिक्रिया देने की जरूरत है। हम आज फिर इस बात को दुहराना चाहेंगे कि एक मतदाता की जिम्मेदारी से जो लोग मुंह चुराते हैं, वैसे करीब चालीस फीसदी लोगों के घर बैठे रहने से तीस फीसदी वोट पाकर भी मुजरिम संसद और विधानसभाओं तक पहुंच जाते हैं। आज अकेला सुप्रीम कोर्ट संसद से नहीं लड़ सकता, लेकिन जनता लड़ सकती है। जनता के वोट डालने के हक को राजनीतिक दलों की कितनी ही बड़ी गिरोहबंदी नहीं रोक सकती। इसलिए अपने घर बैठे जो लोग पहले तो मुजरिमों को संसद और सरकार पर काबिज होने देते हैं, और फिर अदालतों को रामबाण दवा मानकर हर इलाज के लिए जिम्मेदार मान लेते हैं, उनको अपने तन और मन पर छाई चर्बी को कुछ तकलीफ देनी होगी। उनको कुछ मुद्दों को लेकर तय करना होगा कि चुनाव में वे किन मुद्दों पर किन लोगों को, किन पार्टियों को जीतने नहीं देंगे। यहां पर अधिकतर राजनीतिक दल अपने मवालियों को बचाने में एक इरादे के हो गए हैं, और संविधान को बदलकर वे मुजरिमों का स्वागत कर रहे हैं, और अपना संवैधानिक हक मांगने आई जनता पर खौलता तेल फेंक रहे हैं। इस पर अगर जनता अपना रूख नहीं बताएगी, तो फिर यह संसदीय-मुजरिमों की तानाशाही को रास्ता देने जैसा होगा।

Bat ke bat, बात की बात,

4 sept 2013

हर सरकारी अफसर-कर्मचारी को वंजारा की चि_ी पढऩी चाहिए...

4 सितंबर 2013
संपादकीय
गुजरात दंगों के समय से मोदी के करीबी साथी माने जाने वाले कुछ बड़े पुलिस अफसरों में से एक डीजी वंजारा ने नौकरी से इस्तीफा देते हुए मोदी के तौर-तरीकों पर खतरनाक सवाल खड़े किए हैं। वे खुद सात बरस से एक फर्जी मुठभेड़ केस में जेल में बंद हैं, और खासी सजा पाने का खतरा झेल रहे हैं। ऐसे में बरसों बाद उनको यह समझ आया कि जिस मोदी को वे भगवान मानकर चलते थे, और जिस सरकार की नीतियों के तहत उन्होंने अपने पुलिस विभाग के हाथों सारी कार्रवाई की थी, वह मोदी भगवान नहीं निकला। उनकी लिखी तमाम बातों को यहां पर लिखने की जरूरत नहीं है क्योंकि आज के ही अखबार में उनकी दस पेज की चि_ी के कुछ खास हिस्से छप रहे हैं। लेकिन नेताओं और उनके अफसरों के बीच के संबंधों पर एक चर्चा की आज जरूरत है।
यह बात सिर्फ गुजरात दंगों और मुठभेड़ हत्याओं को लेकर नहीं है, और न ही सिर्फ पुलिस को लेकर है। पुलिस तो सरकार का ऐसा एक चेहरा है जो कि सबसे पहले सामने दिखता है और इस वजह से उसकी हिंसा सिर चढ़कर बोलती है। यह बात छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाकों में भी दिखती है जहां पर पुलिस पर बहुत किस्म के मानवाधिकार-हनन के आरोप लगते हैं, और बहुत से पुलिस वाले अदालती कटघरों तक भी पहुंच जाते हैं। लोगों को याद होगा कि पंजाब के आतंक के दिनों में बहुत बड़ी संख्या में लोग पुलिस के हाथों मारे गए थे, और उसके बाद से अब तक वो मामले जगह-जगह चल रहे हैं। मुंबई या दिल्ली जैसी जगहों पर भी पुलिस ने कुछ मुठभेड़-विशेषज्ञ बन जाते हैं, और फिर उनके नाम के साथ उनके हाथों मारे गए संदिग्ध अपराधियों के आंकड़े जुड़ जाते हैं, अब तक छप्पन।
लोकतंत्र में सत्ता पर कोई लगातार नहीं रहते। न पार्टी, न नेता। ये तो आते-जाते रहते हैं, लेकिन अफसर अधिक स्थाई रहते हैं, और वे अपनी नौकरी पूरी होने तक आधा दर्जन या अधिक सरकारों को तो देख ही लेते हैं। ऐसे में एक सरकार की नीतियां अपनी पिछली सरकार से अलग भी हो सकती हैं, और यह जरूरी नहीं रहता कि निर्वाचित नेताओं के लिए गलत काम या ज्यादती करने वाले अफसर अगली सरकार में भी बचे ही रहें। इसलिए जिसके काम की जिंदगी जितनी अधिक है, उसे उतना ही अधिक चौकन्ना अपने खुद के लिए भी रहना चाहिए, और देश-प्रदेश के कानून का सम्मान करने के लिए भी सावधान रहना चाहिए। जो लोग ईमानदारी से नौकरी करना चाहते हैं, वे गलत काम से बच सकते हैं, गलत दबावों पर मना कर सकते हैं, और पूरी जिंदगी सुरक्षित भी रह सकते हैं। लेकिन जो लोग किसी खास किस्म की कमाई चाहते हैं, किसी खास किस्म की ताकत चाहते हैं, वे लोग अपने पर राज करने वाले निर्वाचित नेताओं या अपने से बड़े अफसरों के कहे हुए, या उनको खुश करने के लिए गलत कामों में खुद ही उलझ जाते हैं। 
देश में जगह-जगह बहुत से अफसर खबरों में आए, उनका सम्मान हुआ, क्योंकि उन्होंने राजनीतिक या बाकी किस्म के दबावों के तहत गलत काम नहीं किया, और सही काम के लिए अड़े रहे। हो सकता है कि ऐसे अफसर या ऐसे कर्मचारी सरकार के भीतर खाली कमरे की टूटी कुर्सी पर बैठने पर बेबस किए जाएं, लेकिन हमारा यह मानना है कि ऐसी कुर्सी पर जिंदगी जेल के सातवें बरस के वंजारा के मुकाबले तो बेहतर ही होगी। लोगों को सरकारी नौकरी की सीमा समझना चाहिए। सरकारी कर्मचारी-अधिकारी नेताओं के मुकाबले, मंत्रियों के मुकाबले कानून के प्रति अधिक जवाबदेह रहते हैं। सरकार के अधिकतर छोटे-बड़े काम अधिकारियों के दस्तखत से ही होते हैं, न कि मंत्रियों के दस्तखत से। और छत्तीसगढ़ जैसा राज्य इस बात की मिसाल है कि जो ईमानदार अफसर हैं, वे भी अच्छी तरह काम करते हैं, उनके साथ कोई ज्यादती नहीं होती। 
एक बार फिर गुजरात पुलिस की बात पर लौटें, तो देश का ऐसा अंदाज है, और अदालती निगरानी में हुई जांच का ऐसा नतीजा है कि गुजरात पुलिस के बहुत से लोगों ने वहां की मोदी सरकार के साथ मिलकर एक हत्यारे गिरोह की तरह काम किया। और यही नतीजा है कि आज दर्जनों पुलिस वाले जेल में हैं, और लंबी सजा के खतरे तले अपनी जिंदगी खत्म कर चुके हैं। ऐसा हाल दूसरी जगहों पर न हो, इसके लिए हर सरकारी कर्मचारी को वंजारा की चि_ी पढऩी चाहिए।

गुजरात-दंगों से लेकर मुठभेड़ तक के सच और झूठ का सच

संपादकीय
3 सितंबर 2013
गुजरात की मुठभेड़-हत्याओं में फंसे हुए, जमानत पर रिहा, और अब भाजपा में बहुत ऊपर ले जाकर स्थापित किए गए मोदी के करीबी अमित शाह को बचाने को लेकर भाजपा के नेताओं की बातचीत कही जाने वाली एक और सीडी दिल्ली में सामने आई है, और सुप्रीम कोर्ट ने एक पत्रकार इसे लेकर एक जनहित याचिका के साथ पहुंचा है। गुजरात के दंगों से लेकर गुजरात की मुठभेड़ हत्याओं तक का पूरा सिलसिला देखें, तो वहां की मोदी सरकार, और उनके आसपास के लोग जिस तरह से फंसते दिखते हैं, फंसे हुए दिखते हैं, और बचाए जाते दिखते हैं, उनको लेकर अदालती कार्रवाई में तो वक्त लग सकता है, लेकिन सामान्य समझबूझ वाली जनता भी यह समझ सकती है कि किस तरह से हत्यारों को, दंगाइयों को बचाने में सरकार की भारी हिस्सेदारी पहली नजर में सामने आती है। और यही वजह रही कि देश की सबसे बड़ी अदालत बरसों से इन बातों से जूझ रही है, और बार-बार निचली अदालत तक के स्तर पर जाकर सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ रहा है, जांच की टीम बनानी पड़ रही है, अपनी निगरानी में जांच करवानी पड़ रही है, मोदी की एक मंत्री को दंगों में जाने कितनी ही हत्याओं के मामले में उम्रकैद हो चुकी है। 
और यह सब एक ऐसी पार्टी की सरकार के बारे में कहना पड़ रहा है जो हिन्दुस्तान की राजनीति में शुचिता की बात कहते हुए थकती नहीं। अगर कोई गूगल पर देवनागरी में शुचिता शब्द टाईप करके खोजे, तो उसे सिर्फ भाजपा के बयान ही मिलेंगे। एक समय लालकृष्ण अडवानी का कोई भाषण इस शब्द के बिना पूरा नहीं होता था। आज हालत यह है कि मोदी सरकार दंगों और मुठभेड़ हत्याओं को लेकर अदालतों में, अदालती कटघरों के भीतर उसी अंदाज में लुकाछिपी कर रही है जिस अंदाज में कोई पेशेवर मुजरिम अपनी पूरी धूर्तता के साथ कानून के छेदों से सरकने का काम करता है। यह नौबत उस मुख्यमंत्री, उसके साथी, उसकी सरकार, और उसके मंत्रियों की है जो कि इस विशाल भारत का प्रधानमंत्री बनने के लिए ओवरटाइम कर रहा है। क्या भारत का प्रधानमंत्री किसी ऐसे को बनना चाहिए जो कि मुजरिमो को बचाने वाले पेशेवर दिग्गज वकीलों को नई-नई तरकीबें सीखने का मौका दे रहा है, और देश की आबादी के बहुत बड़े हिस्से में एक भारी अविश्वास का हकदार बना हुआ है। 
आज हिन्दुस्तान में मोदी को लेकर जो लोग समर्थन की एक मुहिम चला रहे हैं, वे इस कदर सक्रिय और बड़बोले हैं, कि उनका अभियान असल कदकाठी से कई गुना बड़ा दिखता है। यही वजह है कि मोदी के नाम का डंका चारों तरफ बज रहा है, जबकि हिन्दुस्तान की लगभग पूरी जनता बेहद अमन-पसंद है। ऐसे में आज जब अमित शाह को बचाने की साजिश करते हुए अदालतों की आंखों में मिर्च झोंकने वाली एक सीडी सामने आई है, तो अदालत तो उसकी जांच-पड़ताल करवाएगी ही, देश की जनता के मन में भरोसा बुरी तरह टूट रहा है। लोगों को लग रहा है कि अगर कोई ऐसी नौबत आती है कि मोदी को ही प्रधानमंत्री बनना है, तो उस दिन इस देश का क्या होगा? वैसी भारत सरकार पूरे देश में क्या उसी तरह काम और साजिश करेगी जैसी कि पिछले दस बरस में गुजरात में सामने आई है? आज खुद भाजपा के भीतर बहुत से लोगों के मन में यह सवाल खड़ा हुआ है कि मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाकर पेश करने से कितना नफा होगा, और कितना नुकसान? इस बीच लोकतंत्र में जनता को अदालत के बाहर भी यह जानने का हक है कि बरसों से ऐसी साजिशें क्यों बार-बार सामने आती हैं, क्यों बार-बार अदालतों तक मामले पहुंचते हैं, और आज तक मोदी की एक मंत्री को उम्रकैद होने के अलावा, मोदी की पूरी सरकार, उनके सारे करीबी किस तरह अब तक बचे हुए हैं, और प्रधानमंत्री बनने की राह पर चल पड़े हैं !