संपादकीय
7 सितंबर 2013
राजस्थान के एक गांव की एक जाति पंचायत का फैसला सामने आया है जिसमें छह बरस की बच्ची से बलात्कार करने वाले अधेड़ को हुक्म दिया गया कि वह अपने आठ बरस के बेटे से उस बच्ची की शादी करवा दे। अभी जो खबर आई है उसके मुताबिक बच्ची के मां-बाप ने ही यह अपील की थी। दूसरी तरफ खबर में यह भी है कि उस चालीस बरस के अधेड़ बलात्कारी ने यह सब चलते हुए पड़ोस की इस बच्ची से दुबारा बलात्कार किया, और यह प्रस्ताव रखा कि वह इस लड़की से शादी करने को तैयार है।
हम बलात्कार और सेक्स अपराधों को लेकर जितनी बार यहां लिखना नहीं चाहते हैं, उतनी बार लिखना पड़ता है। हिन्दुस्तान बलात्कार की इतनी किस्मों की इतनी वारदातों से लबालब है, कि अखबार को लोग घर पर कहां छुपाएं, यह सोचना पड़ता है, और बच्चों की मौजूदगी में टीवी की खबरों को शुरू किया जाए या नहीं, यह भी सोचना पड़ता है। यहां पर इस हिंसक जुर्म से एक दूसरा पहलू और जुड़ा हुआ है जिसके बारे में हम बात करना चाहते हैं। एक तो यह कि बलात्कार से परे भी हिन्दुस्तानी लड़की की हालत परिवार और समाज के भीतर इतनी खराब है, कि उसके साथ बलात्कार होने पर बलात्कारी के बेटे से उसकी शादी करवाकर मां-बाप आगे आने वाली सामाजिक दिक्कत से बचने की कोशिश करते हैं। न बलात्कार पर सजा, और न ही छह बरस की बेटी के बाल विवाह पर फिक्र। फिर तीसरा पहलू इस जुर्म का यह है कि हिन्दुस्तानी गांवों में आज भी जगह-जगह जाति पंचायतों का ऐसा हिंसक बोलबाला है कि उसके चलते बहुत से लोगों को कोई इंसाफ मिल ही नहीं सकता। और समाज व्यवस्था, जाति व्यवस्था इतनी हावी है कि आम लोग उससे बाहर निकलने की न सोच पाते, न उसका हौसला जुटा पाते।
बहुत से लोगों की नजरों में गांव शहरों से अच्छे हैं। लेकिन हिन्दुस्तान के बारे में हकीकत यह है कि शहरों में जाति व्यवस्था कुछ हद तक टूटी है, देश के कानून की मौजूदगी है। गांवों में आज भी जाति व्यवस्था का शिकंजा बहुत मजबूत है, और वहां लोकतंत्र, समानता, कानून के राज की जगह ठीक से नहीं बन पाई है। हरियाणा की खाप पंचायतें जाति व्यवस्था की हिंसा की सबसे बड़ी मिसाल बनकर देश में मौजूद है, जिसके चलते जगह-जगह लोग एक झूठी शान को जिंदा रखने के लिए अपने ही बच्चों को मार डालते हैं क्योंकि वे अपनी मर्जी से शादी कर बैठते हैं।
राजस्थान उन राज्यों में से है जहां पर इंदिरा-सोनिया की पार्टी का राज लंबे समय तक रहा, और भाजपा की वसुंधरा राजे सिंधिया, एक महिला मुख्यमंत्री भी वहां रही। लेकिन राजस्थान अपने पुराने रिवाजों से उबर नहीं पाया है। अभी कुछ दशक पहले तक वहां पर महिलाओं को सती बनाकर जिंदा जला देना जारी था, और हद तो तब हो गई थी जब हाईकोर्ट के एक राजस्थानी जज ने सतीप्रथा का समर्थन किया था। आज भी बाल विवाह के खिलाफ राजनीतिक दल और नेता कुछ बोलने से बचते हैं। यही नतीजा है कि देश भर में धर्म और जाति के नाम पर अंधाधुंध हिंसा जारी है। धर्म की हिंसा अब कानून के कड़े होते जाने से कम हुई है, तो दकियानूसी लोगों के मन में कायम हिंसा ने अपने धर्म के भीतर दूसरी जातियों के लोगों को एक निशाने की शक्ल में छांट लिया है। हिंसा अगर है तो वह जाती नहीं, वह दूसरे धर्म से हटती है, तो दूसरी जाति पर आ टिकती है, दूसरी जाति से हटेगी तो वह दूसरे पड़ोसी परिवार पर आ टिकेगी। इसलिए लोगों के मन की हिंसा को समाज सुधार और कानून के बेहतर अमल से काबू में करने और फिर खत्म करने की जरूरत है।
केन्द्र और राज्य सरकारों की बहुत सी योजनाएं कागजों में बंद पड़ी है। दिल्ली के बहुत चर्चित निर्भया बलात्कार कांड के बाद बनाया गया एक राष्ट्रीय कोष, अपने शायद डेढ़ हजार करोड़ रूपयों के साथ अब तक नियम-कायदे बनने का इंतजार कर रहा है। बाल विवाह के खिलाफ सरकार की योजनाएं हैं, जाति व्यवस्था तोड़कर शादी करने वालों के लिए बढ़ावा देने की नगद रकम की योजनाएं हैं, लेकिन बेवकूफ सरकारों की बेवकूफ पुलिस लड़के-लड़कियों को शहरों तक में खुली रौशनी में, बाग-बगीचों में मिलने से रोकती है। जब पुलिस ही मिलने से रोकेगी, तो जाति व्यवस्था कहां से टूटेगी? कैसे कोई प्रेम विवाह कर सकेगा? इसलिए आज भारत में समाज सुधार के रास्ते में सरकार और पुलिस सबसे बड़ा रोड़ा इसलिए हैं, क्योंकि सत्ता के पास संगठित गिरोहबंदी वाले जाति और सामाजिक संगठनों को कानून सिखाने का हौसला नहीं है।
ऐसे में छोटी बच्ची के साथ बलात्कार के बाद उसे ही उसी के मां-बाप यह सजा सुनाते हैं कि वह बलात्कारी के छोटे से बेटे के साथ शादी कर ले। ऐसी अपील लेकर मां-बाप जाति पंचायत में जाते हैं, और जाति पंचायत ऐसा हुक्म भी दे देती है। इसके चलते उस बच्ची से वही बलात्कारी दुबारा बलात्कार करता है। और हिन्दुस्तान इक्कीसवीं सदी में भारत निर्माण के गौरव का नारा लगाते हुए बलात्कार पर मुआवजे का रेट घोषित करता है।

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