4 सितंबर 2013
संपादकीय
गुजरात दंगों के समय से मोदी के करीबी साथी माने जाने वाले कुछ बड़े पुलिस अफसरों में से एक डीजी वंजारा ने नौकरी से इस्तीफा देते हुए मोदी के तौर-तरीकों पर खतरनाक सवाल खड़े किए हैं। वे खुद सात बरस से एक फर्जी मुठभेड़ केस में जेल में बंद हैं, और खासी सजा पाने का खतरा झेल रहे हैं। ऐसे में बरसों बाद उनको यह समझ आया कि जिस मोदी को वे भगवान मानकर चलते थे, और जिस सरकार की नीतियों के तहत उन्होंने अपने पुलिस विभाग के हाथों सारी कार्रवाई की थी, वह मोदी भगवान नहीं निकला। उनकी लिखी तमाम बातों को यहां पर लिखने की जरूरत नहीं है क्योंकि आज के ही अखबार में उनकी दस पेज की चि_ी के कुछ खास हिस्से छप रहे हैं। लेकिन नेताओं और उनके अफसरों के बीच के संबंधों पर एक चर्चा की आज जरूरत है।
यह बात सिर्फ गुजरात दंगों और मुठभेड़ हत्याओं को लेकर नहीं है, और न ही सिर्फ पुलिस को लेकर है। पुलिस तो सरकार का ऐसा एक चेहरा है जो कि सबसे पहले सामने दिखता है और इस वजह से उसकी हिंसा सिर चढ़कर बोलती है। यह बात छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाकों में भी दिखती है जहां पर पुलिस पर बहुत किस्म के मानवाधिकार-हनन के आरोप लगते हैं, और बहुत से पुलिस वाले अदालती कटघरों तक भी पहुंच जाते हैं। लोगों को याद होगा कि पंजाब के आतंक के दिनों में बहुत बड़ी संख्या में लोग पुलिस के हाथों मारे गए थे, और उसके बाद से अब तक वो मामले जगह-जगह चल रहे हैं। मुंबई या दिल्ली जैसी जगहों पर भी पुलिस ने कुछ मुठभेड़-विशेषज्ञ बन जाते हैं, और फिर उनके नाम के साथ उनके हाथों मारे गए संदिग्ध अपराधियों के आंकड़े जुड़ जाते हैं, अब तक छप्पन।
लोकतंत्र में सत्ता पर कोई लगातार नहीं रहते। न पार्टी, न नेता। ये तो आते-जाते रहते हैं, लेकिन अफसर अधिक स्थाई रहते हैं, और वे अपनी नौकरी पूरी होने तक आधा दर्जन या अधिक सरकारों को तो देख ही लेते हैं। ऐसे में एक सरकार की नीतियां अपनी पिछली सरकार से अलग भी हो सकती हैं, और यह जरूरी नहीं रहता कि निर्वाचित नेताओं के लिए गलत काम या ज्यादती करने वाले अफसर अगली सरकार में भी बचे ही रहें। इसलिए जिसके काम की जिंदगी जितनी अधिक है, उसे उतना ही अधिक चौकन्ना अपने खुद के लिए भी रहना चाहिए, और देश-प्रदेश के कानून का सम्मान करने के लिए भी सावधान रहना चाहिए। जो लोग ईमानदारी से नौकरी करना चाहते हैं, वे गलत काम से बच सकते हैं, गलत दबावों पर मना कर सकते हैं, और पूरी जिंदगी सुरक्षित भी रह सकते हैं। लेकिन जो लोग किसी खास किस्म की कमाई चाहते हैं, किसी खास किस्म की ताकत चाहते हैं, वे लोग अपने पर राज करने वाले निर्वाचित नेताओं या अपने से बड़े अफसरों के कहे हुए, या उनको खुश करने के लिए गलत कामों में खुद ही उलझ जाते हैं।
देश में जगह-जगह बहुत से अफसर खबरों में आए, उनका सम्मान हुआ, क्योंकि उन्होंने राजनीतिक या बाकी किस्म के दबावों के तहत गलत काम नहीं किया, और सही काम के लिए अड़े रहे। हो सकता है कि ऐसे अफसर या ऐसे कर्मचारी सरकार के भीतर खाली कमरे की टूटी कुर्सी पर बैठने पर बेबस किए जाएं, लेकिन हमारा यह मानना है कि ऐसी कुर्सी पर जिंदगी जेल के सातवें बरस के वंजारा के मुकाबले तो बेहतर ही होगी। लोगों को सरकारी नौकरी की सीमा समझना चाहिए। सरकारी कर्मचारी-अधिकारी नेताओं के मुकाबले, मंत्रियों के मुकाबले कानून के प्रति अधिक जवाबदेह रहते हैं। सरकार के अधिकतर छोटे-बड़े काम अधिकारियों के दस्तखत से ही होते हैं, न कि मंत्रियों के दस्तखत से। और छत्तीसगढ़ जैसा राज्य इस बात की मिसाल है कि जो ईमानदार अफसर हैं, वे भी अच्छी तरह काम करते हैं, उनके साथ कोई ज्यादती नहीं होती।
एक बार फिर गुजरात पुलिस की बात पर लौटें, तो देश का ऐसा अंदाज है, और अदालती निगरानी में हुई जांच का ऐसा नतीजा है कि गुजरात पुलिस के बहुत से लोगों ने वहां की मोदी सरकार के साथ मिलकर एक हत्यारे गिरोह की तरह काम किया। और यही नतीजा है कि आज दर्जनों पुलिस वाले जेल में हैं, और लंबी सजा के खतरे तले अपनी जिंदगी खत्म कर चुके हैं। ऐसा हाल दूसरी जगहों पर न हो, इसके लिए हर सरकारी कर्मचारी को वंजारा की चि_ी पढऩी चाहिए।

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