सुबूत चूर-चूर कर धूल में मिला देने का वक्त देने वाली पुलिस

संपादकीय
6 सितंबर 2013
हिन्दुस्तान की पुलिस भी बहुत मजेदार है। पहले हिन्दी फिल्मों में पुलिस को मखौल का सामान बताया जाता था, पांडु हवलदार को रिश्वत लेते हुए देख-देखकर जब दर्शक थक गए थे, तब फिर वह सिलसिला फिल्म-लेखकों ने खत्म किया। इसके बाद पुलिस के भारी-भरकम पेट को फिल्मों में दिखाया जाता रहा। एक वक्त ऐसा आया जब अर्धसत्य से लेकर अब तक छप्पन तक पुलिस को मुठभेड़ हत्या के लिए दिखाया गया, और वह तस्वीर आज भी गुजरात के वंजारों की शक्ल में हकीकत भी है। लेकिन इन सबके बीच मजे की बात यह है कि जोधपुर में आसाराम नाम के एक स्वघोषित संत के बलात्कार-मामले में जांच कर रही पुलिस ने आसाराम के अहमदाबाद आश्रम जाकर आज छापा मारा है, और वह उम्मीद कर रही है कि आसाराम के कुकर्मो की रिकॉर्डिंग वाली कोई सीडी वहां उसे मिलेगी। आज बलात्कार की शिकार लड़की की रिपोर्ट को तीन हफ्ते हो रहे हैं। इन तीन हफ्तों में बलात्कार के सुबूत अगर कांक्रीट की पांच मंजिला इमारत भी होते तो उनको चूर-चूर करके धूल में मिलाया जा सकता था। और यहां पर पुलिस लिखने से हमारा मतलब सिर्फ किसी राज्य की पुलिस नहीं है, सीबीआई भी किसी के खिलाफ जांच शुरू होने के हफ्तों और महीनों बाद जाकर छापे मारती है। 
हम हड़बड़ी में किसी के खिलाफ किसी कार्रवाई की बात नहीं करते। लेकिन अगर गवाह और सुबूत जुटाने हैं, खरे और मजबूत जुटाने हैं, तो फिर समय रहते ही कार्रवाई भी करनी होगी, और कानूनी बारीकियों को ध्यान में रखते हुए ऐसी कार्रवाई करनी होगी जो कि अदालत में खड़ी भी रह सके। आज पूरे देश में किसी भी किस्म के मामले में सजा इतने कम लोगों को हो पाती है, कि लोगों का भरोसा हिन्दुस्तानी अदालतों पर से पूरी तरह उठ चुका है और लोगों का यह अनुभव है कि शिकायत करने वाले लोग, पुलिस और अदालत तक जाने वाले लोग अदालत में सबसे अधिक तकलीफ पाते हैं। पुलिस और अदालतों में काम का तरीका मुजरिमों के लिए दोस्ताना होता है, और जुर्म के शिकार लोगों के लिए दिक्कत और तकलीफ से भरा हुआ। अनगिनत मामले ऐसे हैं जिनमें बलात्कार की शिकार महिला जब थाने पहुंचती है, तो वहां पर पुलिस हवालात में उसके साथ बलात्कार में जुट जाती है। इन्हीं सब मामलों को लेकर पिछले कुछ महीनों में दिल्ली के अलावा बाकी देश में भी जगह-जगह ऐसे बेचैन और उग्र प्रदर्शन हुए हैं जो कि पुलिस पर भरोसा खत्म होने का सुबूत थे। 
आसाराम जैसा ताकतवर और पहुंच वाला आरोपी अगर इतना वक्त पाता है, तो उसे सारे सुबूतों को खत्म करने के लिए और क्या चाहिए? जब एक नाबालिग लड़की बलात्कार का आरोप लगाती है, तो पुलिस ने कई दिनों तक, जिस कमरे का यह जुर्म बताया गया, उस कमरे में झांका भी नहीं था। दूसरी तरफ ये खबरें भी लगातार आ रही थीं कि बलात्कार की शिकार लड़की के परिवार पर आसाराम की तरफ से उनके हिमायती किस तरह शिकायत वापिस लेने के लिए दबाव डाल रहे थे, तब भी राजस्थान की पुलिस ने समय रहते छापे मारकर सुबूत जुटाने का काम नहीं किया। अगर आसाराम की जगह कोई गरीब या कमजोर होता तो उसके घर को बिना रिपोर्ट दर्ज हुए भी पुलिस रौंद डालती। इसीलिए भारतीय लोकतंत्र में लोगों का यह मानना है कि यहां पर कमजोर लोगों को अहिंसा के साथ कोई इंसाफ नहीं मिल सकता। हम पहले भी कई बार यह बात लिख चुके हैं कि इस देश के बहुत से पढ़े-लिखे प्रमुख लोग खुद अहिंसक रहते हुए भी यह मानते हैं कि सबसे कमजोर को इंसाफ दिलाने के लिए हिंसा जरूरी है। 
आसाराम के साथ जो खास बर्ताव हुआ है, वैसी रियायत सुबूतों को अदालत तक पहुंचाने की गुंजाइश खत्म ही कर देता है। और देश के किसी भी किस्म के ताकतवर तबके के साथ आज जांच एजेंसियों का, सरकारों का ऐसा ही बर्ताव है। ऐसे और मामले देखने हों, तो बड़े नेताओं के मामले देख लें, अम्बानी और सहारा के मामले देख लें। और यह कल्पना करें कि उनकी जगह कोई गरीब फंसा होता, तो लोकतंत्र के सारे पाये उस गरीब पर अपना पांव रखकर उसे कब का कुचल चुके होते। 

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