5 सितंबर 2013
संपादकीय
आज दो मुद्दे सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक खड़े हैं, और भारतीय लोकतंत्र के ये दो स्तंभ इन मुद्दों पर दो पहलवानों की तरह आपस में उलझे दिख रहे हैं। यहां पर यह भी लगता है कि भारतीय संविधान ने संसद को अदालत से ऊपर कर दर्जा दिया है कि संसद देश की आखिरी अदालती फैसले को पलटकर एक नया कानून बना सकती है। अदालत को यह सहूलियत नहीं है, लेकिन जनता को यह सहूलियत है कि वह संसद के काम को लेकर अपनी राय कायम कर सके। आज राजनीतिक दल और नेता संसद के भीतर कानून को बदलकर दो लोकतांत्रिक बातों को कुचलने के लिए गिरोहबंदी कर चुके हैं। इन दोनों ही तबकों को यह बात नहीं सुहा रही कि सुप्रीम कोर्ट संसद और विधानसभाओं के भीतर मुजरिमों का बैठना रोके। इसी तरह इन दोनों ही तबकों को यह बात भी नहीं सुहा रही कि जनता सूचना का अधिकार लेकर राजनीतिक दलों की खाता-बही का हिसाब पूछे। तो मुजरिमों को भीतर लाने पर पार्टियां और नेता आमादा हैं, और दूसरी तरफ सूचना के हक को पार्टियों की दहलीज के बाहर रखने पर भी ये दोनों तबके उतने ही आमादा हैं।
यह नौबत संसदीय गिरोहबंदी का एक ऐसा सुबूत है जो भारतीय लोकतंत्र की इज्जत घटाना साबित कर रहा है। दिक्कत यह है कि इस सुबूत पर कोई कार्रवाई करने का हक अदालत को दिया नहीं गया है। लोगों को याद होगा कि जब सुप्रीम कोर्ट ने एक बूढ़ी मुस्लिम औरत शाहबानो के हक में फैसला दिया था तो राजीव गांधी की अगुवाई वाली कांगे्रस सरकार ने अपने ऐतिहासिक भारी-भरकम संसदीय बाहुबल से शाहबानो को पटक-पटककर मारा था, और सुप्रीम कोर्ट से उसे दिए गए हक को छीनकर उन हकों को दकियानूसी मुस्लिम मर्दों के हाथ थमा दिया था। गांधी और नेहरू के वक्त वैसा नहीं हुआ होता। लेकिन कांगे्रस ने गांधी और नेहरू के बाद उनकी राह से परे चलने में अधिक वक्त नहीं गंवाया था। आज फिर कांगे्रस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ही इस बात को मुमकिन कर रही है कि मुजरिमों को संसद के भीतर लाया जाए, और सूचना के हक को राजनीतिक दलों के हिसाब-किताब से बाहर रखा जाए।
देश की जनता को हर पार्टी की रीति-नीति और उसके फैसलों के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। आज हिंदुस्तान में बहुत पढ़े-लिखे लोगों में से एक बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों का है जो कि राजनीतिक को एक गंदी चीज मानकर उससे दूर रहते हैं, और इस कदर दूर रहते हैं कि वोट डालने भी नहीं जाते। भले लोगों के राजनीति से और मतदान केंद्रों से दूर रहने का ही नतीजा होता है कि बुरे लोग चुनकर आते हैं, और भले लोगों का नसीब लिखते हैं। इसलिए हिंदुस्तान में लोगों को मुद्दों को समझने की जरूरत है, उन मुद्दों के पीछे की नेताओं और पार्टियों की नीयत को समझने की जरूरत है, और समझने के बाद उस पर सोचने और अपनी अहिंसक प्रतिक्रिया देने की जरूरत है। हम आज फिर इस बात को दुहराना चाहेंगे कि एक मतदाता की जिम्मेदारी से जो लोग मुंह चुराते हैं, वैसे करीब चालीस फीसदी लोगों के घर बैठे रहने से तीस फीसदी वोट पाकर भी मुजरिम संसद और विधानसभाओं तक पहुंच जाते हैं। आज अकेला सुप्रीम कोर्ट संसद से नहीं लड़ सकता, लेकिन जनता लड़ सकती है। जनता के वोट डालने के हक को राजनीतिक दलों की कितनी ही बड़ी गिरोहबंदी नहीं रोक सकती। इसलिए अपने घर बैठे जो लोग पहले तो मुजरिमों को संसद और सरकार पर काबिज होने देते हैं, और फिर अदालतों को रामबाण दवा मानकर हर इलाज के लिए जिम्मेदार मान लेते हैं, उनको अपने तन और मन पर छाई चर्बी को कुछ तकलीफ देनी होगी। उनको कुछ मुद्दों को लेकर तय करना होगा कि चुनाव में वे किन मुद्दों पर किन लोगों को, किन पार्टियों को जीतने नहीं देंगे। यहां पर अधिकतर राजनीतिक दल अपने मवालियों को बचाने में एक इरादे के हो गए हैं, और संविधान को बदलकर वे मुजरिमों का स्वागत कर रहे हैं, और अपना संवैधानिक हक मांगने आई जनता पर खौलता तेल फेंक रहे हैं। इस पर अगर जनता अपना रूख नहीं बताएगी, तो फिर यह संसदीय-मुजरिमों की तानाशाही को रास्ता देने जैसा होगा।

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