छत्तीसगढ़ के चुनाव, और मुद्दे देश के!

8 सितंबर 2013
संपादकीय

कल छत्तीसगढ़ में एक तरफ भाजपा के लगभग तय प्रधानमंत्री-प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी बनाए गए लालकिले से देश को संबोधित करने के अंदाज में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए सरकार पर हमले कर रहे थे, और दूसरी तरफ कांगे्रस के अधिकृत  अनधिकृत-प्रवक्ता दिग्विजय सिंह भी नरेन्द्र मोदी पर इसी प्रदेश में मंच से हमले कर रहे थे। माहौल कुछ ऐसा था कि लोकसभा के चुनाव का प्रचार राष्ट्रीय मुद्दों के आधार पर हो रहा हो। लेकिन लोकसभा चुनाव खासे दूर हैं, और उनसे पहले अभी छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में राज्य के मुद्दों से हटकर जब बात केंद्र के मुद्दों पर आ जाती है, तो यह नौबत राज्य के विपक्ष के लिए बहुत अच्छी नहीं रहती। 
इस प्रदेश में भाजपा की सरकार के दस बरस पूरे होने जा रहे हैं। इन दस बरसों में किसी भी सरकार की इतनी गलतियां, और इतने गलत काम विपक्ष के हाथ होने चाहिए कि वे चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी की नाक में दम कर दे। लेकिन केंद्र में यूपीए सरकार की मुखिया कांगे्रस पार्टी के नाम दिल्ली में इतने धब्बे लगे हैं कि जब भी कांगे्रस और भाजपा के बीच छत्तीसगढ़ में बहस छिड़ती है, तो वह दिल्ली के मुद्दों पर जा टिकती है। एक तरफ तो छत्तीसगढ़ में दस बरस की सरकार के खिलाफ लोगों में नाराजगी, असंतोष, और बेचैनी होनी चाहिए थी, और यह बातें राज्य की कांगे्रस पार्टी के हाथ हथियार की तरह रहनी भी चाहिए थी। लेकिन आज माहौल ऐसा दिख नहीं रहा है। इससे भाजपा तो खुश हो सकती है, लेकिन जब विपक्ष मजबूत नहीं होता, जब दस बरस में भी वह परेशान करने वाले दस बड़े मुद्दे नहीं निकाल सकता, तो यह विपक्ष की कमजोरी अधिक लगती है, सरकार की खूबी कम लगती है। सरकार तो कहीं की भी हो, उसकी खामियां निकालना बहुत मुश्किल नहीं होना चाहिए, लेकिन आज छत्तीसगढ़ में कांगे्रस पार्टी के पास एक बैंक घोटाले को लेकर जो सबसे बड़ा मुद्दा है, उस बैंक घोटाले में शामिल एक-एक महिला कांगे्रस पार्टी से जुड़ी हुई है, और ऐसे में कांगे्रस उसे खुलकर इस्तेमाल तो कर रही है, लेकिन सत्तारूढ़ लोगों को रिश्वत देने का बयान इस घोटाले के पीछे कांग्रेसियों के नाम के साथ जुड़कर ही आ पाता है। ऐसे में खबरों के लायक तो यह आरोप है, लेकिन बैंक के शिकार हजारों खातेदारों को यह मालूम है कि बैंक का पूरा घोटाला सिर्फ कांगे्रसी परिवारों का किया हुआ है। 
ऐसे में छत्तीसगढ़ में कांगे्रस के एक प्रमुख राष्ट्रीय नेता दिग्विजय सिंह जब आते हैं, तो वे भी मोदी पर ही हमला कर पाते हैं। राज्य के अधिक मुद्दे उनको भी कांगे्रस नहीं सुझा पाती। और छत्तीसगढ़ में कांगे्रस की एक बड़ी विचित्र स्थिति यह है कि यहां आज भी कांगे्रस संगठन को दिग्विजय सिंह का सहारा है, और राज्य के कांगे्रस के नेता अजीत जोगी से सबसे बड़ा खतरा है। यह नौबत इस राज्य में विपक्ष के लिए अच्छी नहीं है, और इस नाते यह राज्य के लोकतंत्र के लिए भी अच्छी नहीं है। विधानसभा के चुनाव में मुकाबला तो अभी दूर है, अभी तो कांगे्रस के भीतर जिस तरह पंजा-कुश्ती चल रही है, उसकी खबरों से अखबारों के पन्नों को खबरों का बड़ा सहारा रहता है। कांगे्रस के अलग-अलग खेमे और नेता, अपनी-अपनी पहुंच के मुताबिक दिल्ली से लेकर रायपुर तक की खबरों को गढऩे में मदद करते हैं, लेकिन ऐसी तमाम खबरें सिर्फ पंजा-कुश्ती बताती हैं। आज जब कांगे्रस के पंजे की पूरी ताकत कमल को मसलने में लगनी थी, तो आज तक वह सिर्फ पार्टी के भीतर इस्तेमाल हो रही है। और मतदाता यही कुश्ती देख-देखकर थक चुके हैं, और उनको लग रहा है कि कांगे्रस पहले अपने-आपसे जीत ले, उसके बाद फिर भाजपा से जीतने की तैयारी करे।
आज जब राज्य के कुछ हफ्तों बाद के विधानसभा चुनाव में आर-पार का मुकाबला होना है, तब कांगे्रस के भीतर अगर शतरंज की बिसात पर उसके ही बड़े नेता ऊंट की तरह तिरछे, और घोड़े की तरह ढाई घर चलने में लगे हैं, तो यह नौबत उस कांगे्रस पार्टी के लिए बहुत खराब है जिसमें इस राज्य में सत्ता में आने की पूरी-पूरी संभावना थी, और जिसे इसने खुद होकर गंवा दिया है।
एक बार फिर इस चुनाव के पहले के महीनों में यह माहौल बड़ा अजीब है कि राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी अपने कार्यक्रमों और उपलब्धियों का प्रचार कर रही है, और यहां का विपक्ष उसके खिलाफ अधिक कुछ नहीं कर पा रहा है। दूसरी तरफ यूपीए के जितने तरह के स्कैंडल पिछले दस बरस में सामने आए हैं, उनका हिसाब छत्तीसगढ़ में कांगे्रस को कुछ इस तरह देना पड़ रहा है, देना पड़ेगा, जैसे कांगे्रस ही छत्तीसगढ़ में भी सत्तारूढ़ रही हो। सरकार विरोधी लहर छत्तीसगढ़ में राज्य की सरकार के खिलाफ न दिखकर केंद्र की यूपीए सरकार के खिलाफ अधिक दिख रही है। देखना है कि दिग्विजय की टीम छत्तीसगढ़ में कैसे भाजपा से पार पा सकेगी, अगर वह अजीत जोगी से पार पा लेगी, तो।

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