लालबत्ती तले खास, और सड़कों पर कुचलकर आम से गुठली बनते लोग

3 मार्च 2015
संपादकीय
हरियाणा के भाजपा-मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के काफिले की एक गाड़ी से कुचलकर एक नौजवान मारा गया और एक पुलिस वाला जख्मी हो गया। उनको छोड़कर काफिला अपने रास्ते चले गया। कल जब यह खबर खड़ी हो रही थी, तब मुंबई के अखबारों की सुबह की वह खबर बासी हो रही थी कि किस तरह महाराष्ट्र के भाजपा-मुख्यमंत्री ने इस बात के लिए माफी मांगी कि उनके काफिले और उनके कार्यक्रम के लिए ट्रैफिक को घंटों रोका गया, और पुलिस ने लोगों से बदसलूकी की। तीसरी खबर दो दिन पहले की है कि किस तरह हैदराबाद में तेलंगाना के नए मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने अपने एक कैम्प ऑफिस के पीछे कई एकड़ के ऑफिसर्स क्लब को खत्म करने का फैसला लिया है क्योंकि वास्तुशास्त्र के मुताबिक सीएम के दफ्तर के पीछे स्वीमिंग पूल का रहना ठीक नहीं माना जा रहा है। और इसके एवज में राज्य सरकार अफसरों के क्लब के लिए हैदराबाद जैसे महंगे शहर में कई एकड़ जमीन दे रही है, और करोड़ों रुपये भी दे रही है।
अब हम फिर से हरियाणा से बात आगे बढ़ाएं, तो खट्टर उस आरएसएस से आए हुए व्यक्ति हैं जो कि सादगी का दावा करता है। अब वहां से आया हुआ आदमी भी चीखते हुए सायरनों वाले काफिलों का मोह इतनी जल्दी विकसित कर लेता है, तो फिर और नेताओं को कहा ही क्या जा सकता है। दूसरी तरफ जब देवेन्द्र फडणवीस महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने, तो उनकी स्कूटर चलाती तस्वीर चारों तरफ आई, और महाराष्ट्र का मीडिया इन विशेषणों से लबालब था कि किस तरह वे सादगी की मिसाल हैं। अब महाराष्ट्र में उनके लिए इस तरह मुंबई की ट्रैफिक को घंटों रोका गया, और लोगों से बदसलूकी की गई। दूसरी तरफ कल ही एक टीवी चैनल पर कर्नाटक के कांगे्रस-मुख्यमंत्री को दिखाया जा रहा था कि किस तरह उनके लिए ट्रैफिक को रोकने का जब सवाल उठाया गया, तो उन्होंने टीवी रिपोर्टर का मखौल उड़ाया, उनके साथ के लोग जोर-जोर से हंसने लगे, और मुख्यमंत्री ने कहा कि उनके काफिले ऐसे ही चलते रहेंगे, लोगों को आदत डाल लेनी चाहिए।
छत्तीसगढ़ में भी हम यही बात देखते हैं कि किस तरह तमाम बड़े सत्तारूढ़ लोगों के काफिले ट्रैफिक को रोककर, लालबत्ती को पार करके, लोगों को लाठियों से किनारे धकेलकर आम जनता के बुनियादी हकों को कुचलते हुए आगे बढ़ते हैं। जो लोग जिन शहरों में पैदा हुए, सड़कों पर खेले, आज वे ही लोग अपने ही लोगों को लाठियों से धकेलकर इस अंदाज में आगे बढ़ते हैं, मानो यह सत्ता हमेशा की हो। छत्तीसगढ़ में भी मंत्रियों के काफिलों से हादसे हो चुके हैं, और जिंदगियां जा चुकी हैं।
एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कल संसद की कैंटीन में जाकर वहां सबके बीच बैठकर थाली का खाना खाते हैं, तो उनकी सादगी पर देश का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया टूट पड़ता है। दूसरी तरफ जनता की जिंदगी को कुचलते हुए जब ऐसे सत्तारूढ़ लोगों के काफिले आगे बढ़ते हैं, तो इंसानियत और लोकतंत्र दोनों फुटपाथ के किनारे नालियों में जा गिरते हैं। चुनाव के पहले जो नेता आम आदमी शब्द की रट लगाते थकते नहीं, वे चुनाव निपटते ही खास आदमी बन जाते हैं, और सत्ता से परे की बाकी सारी जनता आम से भी नीचे की महज गुठली बनकर रह जाती है जिसे वीआईपी या वीवीआईपी कहे जाने वाले लोगों के काफिले कुचलकर आगे बढ़ सकते हैं, सड़कों पर अपने लिए ट्रैफिक रोककर अस्पताल जाते मरीजों को दम तोडऩे के लिए बेबस कर सकते हैं।

मोदी की वजह से राजनीतिक फेरबदल

2 मार्च 2015
संपादकीय
भारत की राजनीति में चारों तरफ फैले हुए फेरबदल कुछ अधिक रफ्तार से हो रहे हैं, और इनके पीछे जो दो बातें दिखती हैं, उनमें से एक है कांगे्रस का पैदा किया हुआ एक विशाल शून्य, जिसमें आंधी की तरह मोदी का आना और समाना हुआ। और इस आंधी की वजह से बाकी पार्टियों और कई प्रदेशों में ऐसे फेरबदल हुए, जिनमें से कई उम्मीदें लोगों ने की नहीं थीं। 
अब जैसे बिहार में लालू और नीतीश का साथ आना, यह एक असंभव सी लगती बात संभव इसलिए हुई क्योंकि मोदी के सामने इन दोनों की हैसियत जमीन पर बिछे हुए साए जितनी रह गई थी, और इन दोनों का गठबंधन दो सायों के हाथ मिलाने सरीखा रहा। इसके साथ-साथ उत्तरप्रदेश और बिहार में दो परस्पर साथी और असहमत भी, लालू और मुलायम समधी बनकर जिस तरह उत्तरभारत की पिछड़े वर्ग की राजनीति में एक मिली-जुली ताकत बनने की कोशिश कर रहे हैं, उसने भी तस्वीर एकदम बदल दी है। अब अगर कांगे्रस को देखें, तो उसके तकरीबन खंडहर सरीखे रह गए घर के भीतर आज यह भी समझ नहीं पड़ रहा है कि कल इस पार्टी का मुखिया किसे रहना है, यह तो दूर की बात है कि किसके मुखिया रहने पर क्या होगा। इस पार्टी को न अपनी ऐतिहासिक चूक समझने की समझ दिख रही, न इसको आज क्या करना है यह सूझ रहा, और न ही कल किसकी अगुवाई में क्या भला या बुरा होगा, यह समझ पड़ रहा। ऐसे राजनीतिक शून्य के चलते मोदी की जगह अभी भी बनी हुई है, दिल्ली के चुनाव में भाजपा के मटियामेट हो जाने के बाद भी।
अब पल भर को खुद भाजपा की बात अगर सोचें, तो लोकसभा चुनाव में आसमान के तारों को हासिल कर लेने के एवज में पार्टी ने अपने-आपको मोदी के हवाले कर दिया, और नतीजा यह हुआ कि भाजपा के भीतर तमाम शक्तिकेंद्र खत्म होकर पार्टी पूरी तरह से एकधु्रवीय बन गई, और आज मोदी-अमित शाह से परे इस पार्टी में कुछ नहीं है। और ऐसे ही खालिस एकाधिकार के चलते इस जोड़ी ने ऐसे फैसले लिए कि जिनकी वजह से दिल्ली में यह पार्टी अभी बुलडोजर के नीचे दबे हुए बर्तन की तरह चित्त पड़ी हुई है। लेकिन फिर भी भाजपा के भीतर किसी एक व्यक्ति का इस तरह का कब्जा पहले किसी ने देखा-सुना नहीं था, और यह मोदी ही हैं जिनकी वजह से भारतीय राजनीति के भीतर, भाजपा के भीतर ऐसे दिन आए हैं। 
अब भाजपा के बाहर निकलें तो देखें कि कश्मीर में भाजपा ने वहां की क्षेत्रीय पार्टी पीडीपी के साथ मिलकर जिस तरह की गठबंधन सरकार बनाई है, उसकी नींव में श्यामाप्रसाद मुखर्जी से लेकर आज तक के जनसंघ-भाजपा के तमाम मुद्दों को फिलहाल दफन कर दिया गया है, और यह भाजपा-संघ परिवार के लिए एक बिल्कुल ही अलग किस्म की नौबत है। लेकिन इस बारे में कल ही हम इस जगह काफी लंबी-चौड़ी बातें लिख चुके हैं।
अब एक आखिरी बात, भाजपा और मोदी से जुड़े हुए संघ परिवार कहे जाने वाले एक तबके के बड़े-बड़े बड़बोले नेता लगातार देश में जिस तरह का तनाव फैलाने वाले बातें कर रहे हैं, उनको मोदी की मंजूरी है, या मोदी के बेकाबू हैं लोग, यह अभी साफ नहीं है। लेकिन इतने साम्प्रदायिक तनाव की बातें तो मोदी के विपक्ष में रहते हुए भी सामने नहीं आई थीं। अब एकाएक ऐसा तनाव बड़ा अजीब है, और देश के लिए बहुत ही बुरी नौबत ला चुका है, और भी बुरी लाने वाला है। यह नौबत मोदी के सत्ता में आने के बाद आई है, इसलिए हम इसे यहां गिना रहे हैं, और इससे खुद मोदी का चुनावी भला होगा, या चुनावी बुरा होगा यह तो हमें नहीं मालूम, लेकिन देश का बुरा शर्तिया हो रहा है। 
कुछ कतरा-कतरा बातें मोदी की वजह से भारतीय राजनीति में आज अलग-अलग जगहों पर एक साथ हो रहे फेरबदल की हैं, और जमीन के नीचे इन बातों का एक-दूसरे से जुडऩा पता नहीं भारतीय राजनीति को किस तरफ ले जाएगा।

कश्मीर सरकार को लेकर मोदी और भाजपा पर ताने कसने की जरूरत नहीं

संपादकीय
1 मार्च 2015
जम्मू-कश्मीर में अभी-अभी वहां की एक क्षेत्रीय पार्टी पीडीपी, और देश की आज की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा की गठबंधन सरकार बनी है। पीडीपी के मुख्यमंत्री और भाजपा के उपमुख्यमंत्री ने शपथ ली है। और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस मौके पर वहां पहुंचे, और उनकी तस्वीर दो ऐसे झंडों के सामने बैठे हुए आई, जो कि भारत और जम्मू-कश्मीर के थे। लोगों ने इसे देखकर याद किया कि भाजपा की पिछली पार्टी जनसंघ के संस्थापक में से एक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर के अलग संविधान और अलग निशान के खिलाफ आंदोलन चलाते हुए वहीं पर सरकारी इलाज के दौरान अपनी जान दी थी। कुछ लोगों को यह भी लग रहा है कि यह गठबंधन सरकार जनसंघ-भाजपा के तमाम नीति-सिद्धांतों के खिलाफ बनी है, और कई लोगों को मोदी का वह चुनावी भाषण याद आ रहा है जिसमें उन्होंने कश्मीर में बारी-बारी से चले आ रहे दो कुनबों के राज को खारिज करने की बात बार-बार कही थी। कश्मीर की दूसरी बड़ी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस के भूतपूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कल ही इस मुद्दे पर ट्वीट किया है कि अब जम्मू-कश्मीर की सरकार नागपुर (संघ मुख्यालय) से चलेगी। 
यह बात सही है कि नरेन्द्र मोदी से लेकर भाजपा तक, और आरएसएस से लेकर दूसरे हिन्दूवादियों तक के अब तक के कहे हुए के खिलाफ यह सरकार बन रही है। लेकिन लोकतंत्र में कई ऐसे मौके आते हैं जब कोई सम्पूर्ण-विकल्प मौजूद नहीं रहता, मुमकिन भी नहीं रहता। हमने पिछले ही बरस दिल्ली में एक बरस तक बिना किसी सरकार के एक त्रिशंकु विधानसभा देखी और उसके आखिर में दुबारा चुनाव करवाने पड़े। ऐसी नौबत देश में और भी कुछ जगहों पर आई, और कश्मीर में भी आज तकरीबन पूरा जम्मू भाजपा के साथ गया है, और पूरा मुस्लिम बहुल कश्मीर का हिस्सा पीडीपी के साथ गया है। भाजपा को वहां दर्जनों सीटें हासिल हुई हैं, और पीडीपी सबसे बड़ी पार्टी है। ऐसे में नेशनल कांफ्रेंस को तस्वीर में जोड़ें तो एक ऐसा त्रिकोण बनता है, जिसके दो कोने मिलकर या तो सरकार बनाएं, या फिर राज्य दुबारा चुनाव की तरफ जाए, और उसके बाद भी यह त्रिकोण खत्म हो ऐसी कोई गारंटी तो है नहीं। 
इसलिए हमारा यह मानना है कि लोकतंत्र में लोकतंत्र किसी भी एक या कई विचारधाराओं के ऊपर होता है। भारत की संसदीय व्यवस्था में बहुत से ऐसे मौके आए हैं जब वामपंथी दल भी आपातकाल के खिलाफ जनसंघ के साथ मिलकर आंदोलन में शामिल हुए, जब यूपीए-1 में वामपंथियों ने बाहर से साथ दिया, और यूपीए-2 में विरोध किया। उत्तरप्रदेश की राजनीति में अलग-अलग कई पार्टियां मायावती के साथ आईं और गईं। आज उमर अब्दुल्ला इसे एक अनैतिक गठबंधन बता रहे हैं। लेकिन लोगों को याद होगा कि अपने पिता के साथ वे एनडीए गठबंधन में भागीदार थे, लेकिन बाद में बाप-बेटे यूपीए का हिस्सा भी बने। रामविलास पासवान के बारे में कहा जाता है कि वे हर बार जीतने वाली पार्टी के साथ चले जाते हैं। 
भाजपा आज जिन मुद्दों पर अपनी आक्रामकता को किनारे रखकर एक अलग विचारधारा की पार्टी के साथ मिलकर कश्मीर सरकार में शामिल हुई है, उसमें भी हमें बहुत विरोधाभास नहीं दिखता। दोनों पार्टियों ने मिलकर एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाया है जो कि अब सामने आ जाएगा, और असहमति के मुद्दों को अलग रखकर जनहित में, लोकतंत्र के हित में एक साझा सरकार चलाना कोई बुरी बात नहीं है। और अगर ऐसा होते हुए एक तरफ पीडीपी अपनी क्षेत्रीय आक्रामकता की धार को कुछ कम करती है, और दूसरी तरफ भाजपा कश्मीर की एक ऐतिहासिक स्वायत्तता के खिलाफ अपनी मांग किनारे रखती है, तो यह देश की राजनीति में एक सकारात्मक बदलाव भी होगा। यह तो सबके सामने है ही कि अयोध्या में मंदिर बनाने के खिलाफ रहते आए नीतीश कुमार जैसे लोग एनडीए का हिस्सा एक दशक से अधिक तक बने रहे, क्योंकि एनडीए ने भाजपा का एक खालिस मुद्दा अलग रखा था, और साझा कार्यक्रम पर बाकी पार्टियों के साथ भाजपा भी उसके भीतर चलती रही। आज कश्मीर में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जरूरतों को देखते हुए एक निर्वाचित लोकतांत्रिक और स्थिर सरकार जरूरी है। इस सरकार का नाकामयाब हो जाना कोई बड़ी बात नहीं रहेगी, क्योंकि चुनाव के नतीजे अपने आपमें किसी कामयाब गठबंधन की संभावना लेकर नहीं आए थे। लेकिन अगर यह सरकार कामयाब होती है, तो परस्पर विरोधी विचारधारा के लोगों का भी जनमत के मुताबिक मिलकर काम करना कामयाब होगा, और यह मिसाल देश भर में जगह-जगह काम भी आ सकती है। इसमें भाजपा के नीति-सिद्धांतों में किसी विरोधाभास को देखने की जरूरत नहीं है, क्योंकि भाजपा की आंतरिक जरूरत के मुकाबले देश के लोकतंत्र की जरूरत अधिक अहमियत रखती है। इसलिए हम इसे कोई अनैतिक सरकार नहीं मानते, और हम जनमत का सम्मान करने के लिए, दुबारा चुनाव से बचने के लिए इसे एक सही भागीदारी मानते हैं। इन दोनों के साथ रहने से, साथ उठने-बैठने से, और परस्पर तालमेल बढऩे से देश में बाकी जगहों पर भी भाजपा और मुस्लिम-पार्टियों के बीच फासला कम हो सकता है।

अरूण जेटली का बजट दो-तीन छोटी-छोटी बातें

संपादकीय
28 फरवरी 2015

केन्द्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली के बजट में आज की बातों पर जानकार लोग अधिक विश्लेषण करेंगे, लेकिन हम इसके छोटे से हिस्से पर अभी बात करना चाहते हैं, जिससे कि लोगों को न सिर्फ बड़ी तकलीफ होगी, बल्कि बड़ी चोरी भी बढ़ेगी। हर किस्म की सेवा पर लगने वाले 12.36 फीसदी सर्विस टैक्स को बढ़ाकर 14 फीसदी कर दिया गया है, और देश में छोटे-छोटे से काम पर भी यह टैक्स लगता है। आज भी भारत में जितने लोगों पर यह लागू होना चाहिए, उसमें से दस फीसदी लोग ही इसे चुकाते हैं, और बाकी लोग इसे चुरा लेते हैं। अब जो लोग ईमानदार नीयत से सर्विस टैक्स देना चाहते हैं, उनके और सर्विस टैक्स-चोरों के बीच कमाई का फर्क करीब 15 फीसदी हो जाएगा। यह नौबत लोगों को सर्विस टैक्स चोरी के लिए उकसाएगी, और लोग अपने कागजात छुपाकर इसके दायरे से बाहर रहना चाहेंगे। 
कुछ टैक्स ऐसे रहते हैं जिनमें कमाई को, काम को, कारोबार और हिसाब-किताब को छुपाने की गुंजाइश खासी रहती है। सर्विस टैक्स वैसा ही है। छोटे-छोटे से कारोबार भी इसके दायरे में आ जाते हैं, और वहां पर व्यापार को छुपाना आसान रहता है। इसलिए ईमानदारी और बेईमानी के बीच 15 फीसदी का फासला कारोबार के हिसाब से बड़ा घातक है, और उससे टैक्स चोरों को बढ़ावा मिलेगा। टैक्स पर अमल की हमारी मामूली जानकारी और मामूली समझ के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि सर्विस टैक्स की लंबी लिस्ट में जितने तरह की सेवाएं लिखी गई हैं उन सब तक पहुंच पाना सरकार के बस का वैसे भी नहीं है। इसलिए अधिक अच्छा यह होता कि सर्विस टैक्स को घटाकर लोगों को इसकी चोरी की तरफ से दूर हटाया जाता, और टैक्स देने वालों का दायरा बढ़ाया जाता। कम लोगों से अधिक वसूली की पुरानी सोच को पता नहीं अरूण जेटली ने इस बजट में क्यों लागू किया है। 
लेकिन एक दूसरी बात अमरीकी टैक्स कानून की तरह की भारत में लागू करने की बात उन्होंने की है। आयकर चोरी करने वाले, काला धन जमा करने वाले लोगों को कैद देने का एक कानून बनाने की बात बजट भाषण में की गई है, और यह एक असरदार बात हो सकती है। आयकर चोरी बहुत ही आम बात है, और देश में इसकी वजह से एक ऐसी समानांतर अर्थव्यवस्था विकसित हो चुकी है जिसके तहत और लोग भी काला धन कमाने और उसी पर अपने कारोबार को टिकाने को फायदे का पाते हैं। आज हालत यह है कि भारत में किसी जमीन या मकान-दुकान को कोई बेचना चाहे, तो एक नंबर के पैसों वाले खरीददार मिलते नहीं, या कोई एक नंबर में खरीदना चाहे तो बेचने वाले उतनी रकम एक नंबर में लेना नहीं चाहते। काले धन की अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत हो चुकी है कि कई किस्म के कारोबार इसके बिना आज चल नहीं सकते, और काले धन को सफेद करना अपने आपमें देश का एक बड़ा कारोबार बन चुका है। ऐसे में आयकर चोरी या काले धन के कारोबार पर अब दस साल तक की कैद का इंतजाम किया जा रहा है, और अमरीका में यह कामयाब भी रहा है। हम इसे ठीक मानते हैं। आज भी भारत में सर्विस टैक्स वसूलने वाले केन्द्रीय आबकारी विभाग के आबकारी शुल्क की चोरी पर कैद का इंतजाम है ही, और इसका विस्तार आयकर चोरी तक होना ठीक है। 
भारत के बहुत बड़े मध्यम और उच्च-मध्यम वर्ग को इस बजट से निराशा होगी कि आयकर छूट की सीमा नहीं बढ़ाई गई है। हम इसे बहुत अधिक जरूरी तो नहीं मानते, और टैक्स के लायक कमाई वाले लोगों को इतना टैक्स देना भी चाहिए, लेकिन यहां पर एक दिक्कत आती है। सरकारी या गैरसरकारी क्षेत्र के जो आयकरदाता अपनी तनख्वाह पर आयकर देते हैं, उनके पास छुपाने, बचाने, या चोरी करने की कोई गुंजाइश नहीं होती। जबकि यह आम बात है कि उनसे कई गुना अधिक कमाई करने वाले कारोबारी अपनी कमाई का अधिकांश हिस्सा छुपाने का रास्ता निकाल लेते हैं। इस जमीनी हकीकत को देखते हुए अरूण जेटली को वेतन पर कटने वाले आयकर पर एक छूट देनी थी, इसके बिना बराबर कमाई बताने वाले वेतनभोगी और कारोबारी के बीच टैक्स का बोझ बहुत अलग-अलग स्तर का हो जाता है। बजट की बाकी बातों पर आने वाले दिनों में इसी पन्ने पर कई और बातें।

देह संबंधों के बाद शादी से मुकरना बलात्कार कैसे?

संपादकीय
27 फरवरी 2015
दो दिन पहले दिल्ली में एक नेपाली शोध छात्र की गिरफ्तारी हुई जिसके खिलाफ जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका ने बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई थी। उसने पुलिस में दर्ज शिकायत में लिखाया था कि इस छात्र से उसके देह संबंध बन गए थे, और उसने रिसर्च पूरी हो जाने के बाद शादी का वायदा किया था, लेकिन अब वह उससे मिलने से कतरा रहा है, और शादी से इंकार कर रहा है। इस बयान के साथ देश की सबसे प्रतिष्ठित एक यूनिवर्सिटी की प्राध्यापिका ने यह रिपोर्ट लिखाई। 
शिवसेना ने कुछ अरसा पहले लोगों में नाराजगी पैदा की थी उसका कहना था- छेडख़ानी और रेप का आरोप लगाकर सनसनी फैलाना अब फैशन हो गया है। एक मॉडल पुलिस में उत्तम सेवा देने वाले एक आईपीएस अफसर पर सीधे रेप का आरोप लगाती है, और वो पुलिस अधिकारी खलनायक ठहराया जाता है। महिलाएं छेडख़ानी जैसे मामलों को खतरनाक हथियार समझती हैं। इस मामले में पीडि़ता को 6 महीने बाद याद आया कि उसके साथ बलात्कार हुआ है। आखिरकार 6 महीने बाद कैसे किसी लड़की को याद आ सकता है कि उसके साथ बलात्कार हुआ है। चरित्र का हनन, बदनामी राजनीति और सरकार में बड़ा हथियार बन गए हैं। एक-दूसरे को रास्ते से हटाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। कानून महिलाओं के साथ है लेकिन इसका ये मतलब नहीं है इसका गलत इस्तेमाल किया जाए।ÓÓ
शिवसेना के उस बयान से परे भी यह बात बहुत से लोगों के मन में आती है कि महिलाओं की खास हिफाजत के लिए भारतीय हालात में उनको जो खास कानूनी हक दिए गए हैं, उनका बेजा इस्तेमाल होता है। इनमें दहेज प्रताडऩा, कामकाज की जगह पर यौन प्रताडऩा, और सेक्स-अपराध जैसे कुछ जुर्म हैं, जिनसे महिलाओं को बचाने के लिए भारतीय कानून में उनको आदमियों के मुकाबले कुछ अधिक हक दिए गए हैं। समय-समय पर ऐसे बयानों के खिलाफ हम लिखते भी रहे हैं, जिनमें कि नेता और अफसर किसी महिला द्वारा दर्ज की गई शिकायत की जांच के पहले ही उसकी नीयत पर शक खड़ा करना शुरू कर देते हैं। मुंबई का यह मामला वैसा ही था जिसमें एक मॉडल ने एक आईपीएस अफसर के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई थी।
जेएनयू में बलात्कार की शिकायत की जांच अभी शुरू हुई ही है, और इस पर कुछ भी कहना जायज नहीं है, लेकिन हम ऐसे तर्कों के बारे में बात कर रहे हैं जो कि बलात्कार की कुछ शिकायतों के साथ पुलिस में दर्ज किए जाते हैं। बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें महिलाएं कई बरस से उनके साथ किए जा रहे बलात्कार का आरोप लगाते हुए पुलिस रिपोर्ट में यह लिखाती हैं कि शादी का झांसा देकर, शादी का वायदा करके, उससे देहसंबंध बनाए गए, और फिर बाद में उसे पता लगा कि आदमी या तो शादीशुदा था, या बाद में उसकी कहीं और शादी हो रही है, या उसकी शादी की नीयत ही नहीं है।
अब हम एक ऐसी स्थिति की कल्पना करें जिसमें कि एक लड़के और एक लड़की के बीच, या एक आदमी और एक औरत के बीच दोस्ती होती है, पे्रम होता है, या बिना प्रेम के भी देहसंबंध बनते हैं, जारी रहते हैं, और फिर बाद में किसी वजह से शादी नहीं हो पाती, या दोनों में से कोई भी एक पक्ष शादी के अपने वायदे को पूरा करना मुमकिन या ठीक नहीं पाता। ऐसा कई वजहों से हो सकता है, लोगों की दोस्ती, लोगों के पे्रम, या इससे भी आगे बढ़कर लोगों के देहसंबंध बनते हैं, और टूटते हैं। किसी झांसे या धोखे की नीयत के बिना भी संबंध आते-जाते रहते हैं। दो वयस्क लोगों के बीच इनमें से किसी भी किस्म के संबंध बनना और टूटना तब तक जुर्म नहीं है, जब तक कि वह मर्जी के खिलाफ न हो। 
अब यह समझना कुछ मुश्किल पड़ता है कि किस तरह मर्जी के खिलाफ बरसों तक किसी के देहसंबंध बने रह सकते हैं। ऐसा किसी धमकी के तहत, किसी ब्लैकमेलिंग के तहत तो हो सकता है, लेकिन उसके बिना बिना विरोध, मौन सहमति से अगर यह सिलसिला जारी रहता है, तो आगे जाकर उसको जुर्म करार देना पहली नजर में सही नहीं लगता है। और दोस्ती के बाद पे्रम या बिना पे्रम, शादी का वायदा करना, देहसंबंध बनने के बिना, या बनने के बाद, उसे पूरा न करना भी किसी तरह से जुर्म नहीं लगता है। क्योंकि बिना देहसंबंध भी वायदे बनते और टूटते रहते हैं, और उनकी मजबूती की गारंटी के लिए किसी फेविकोल के मजबूत जोड़ की गुंजाइश नहीं रहती। 
अब आज इस पर लिखने का दिल इसलिए कर रहा था कि आज जिस तरह बहुत से मामलों में बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज हो रही है, लोगों को महीनों तक जमानत नहीं मिल रही है, बरसों तक फैसले नहीं हो रहे हैं, और उसके बाद या तो सजा हो रही है, या फिर बिना सजा रिहाई हो रही है, उसे देखते हुए लगता है कि क्या ऐसे कानूनी माहौल के चलते हुए लोगों के आपसी संबंधों की संभावनाओं पर एक मानसिक दबाव ऐसा पड़ेगा कि संबंध ही स्वाभाविक न रह पाएं।
यह लिखने का यह मकसद नहीं है कि बलात्कार की शिकायतों में से बहुत सी झूठी रहती हैं। हमारा तो मानना इससे उल्टा यह है कि बलात्कार की सही शिकायतों में से बहुत ही कम दर्ज हो पाती हैं, और बाकी शिकायतों का दम घुट जाता है। सामाजिक अपमान, पारिवारिक दबाव, और अदालतों का डरावना माहौल मिलाकर लोगों को बलात्कार को सबक के साथ बर्दाश्त कर लेने पर ही अधिक मजबूर करते हैं। लेकिन दूसरी तरफ जितने भी मामलों में शादी के वायदे के बाद बने देहसंबंधों के बाद शादी न होने की स्थिति में दर्ज कराई गई रिपोर्ट को बलात्कार मानना थोड़ा अटपटा लगता है, और उसके लिए कानून में एक बारीक फर्क करने की जरूरत है। 
किसी भी वयस्क लड़की या महिला को किसी वयस्क लड़के या आदमी के किए हुए वायदे पर भरोसा करके उसे अपनी देह दे देने की कोई मजबूरी नहीं रहती। ऐसा करते हुए उसकी एक सहमति रहती है, जो बाद के हालात बदलने पर भुला दी जाती है। ऐसे मामलों की खबरों को देख-सुनकर ऐसा लगता है कि आज लोगों के मन में संबंधों को लेकर एक दहशत खड़ी हुई होगी कि आज की सहमति कल कब, किस वजह से, पुलिस रिपोर्ट में बदल जाए? आज का हमारा पूरा लिखना सिर्फ ऐसे ही मामलों को लेकर है जिनमें पहले की सहमति बरसों बाद जाकर शिकायत बन जाती है। ऐसे मामले लोगों के मन में सच्चा पे्रम भी कुचलने के लिए काफी रहते होंगे, क्योंकि आज के पे्रम के तहत की गई बातें कल जाकर किस तरह कटघरे में खड़ी कर देंगी, जिसका अंदाज आज कोई नहीं लगा सकते। 
ऐसे कानून में बदलाव की जरूरत है जो कि शादी के वायदे के साथ बने देहसंबंधों को आगे शिकायत होने पर बलात्कार मानता हो। बहुत से ऐसे मामले रहते हैं जिनमें देहसंबंधों के बिना भी शादी के वायदे बनते और टूटते रहते हैं, इसी तरह इन वायदों के साथ-साथ, उनके बाद भी ऐसे संबंध बन सकते हैं, और बाद में देह से परे के कई किस्म के मुद्दों को लेकर वायदा पूरा करना पाना नामुमकिन हो सकता है, या लोगों को लग सकता है कि यह रिश्ता ठीक नहीं चलेगा। ऐसी कई नौबतों में लोग अपने वायदे से मुकरने का पूरा हक रखते हैं। एक वादाखिलाफी को बलात्कार मान लेना गड़बड़ लगता है, और इस कानून में बदलाव होना चाहिए।
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पहली बार बिना नाटकीयता वाला रेल बजट, सुधार पर जोर

संपादकीय
26 फरवरी 2015

केन्द्रीय रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने अपने पहले बजट में बिना किसी नाटकीयता के छोटी-छोटी बातें कही हैं, जो कि परंपरागत रेल बजट-घोषणाओं के मुकाबले एक बेहतर बात है। भारत के इतिहास में यह शायद पहला मौका है जब किसी रेलमंत्री ने अपने गृह राज्य के लिए अनुपातहीन अधिक रेलगाडिय़ों की घोषणा नहीं की है। कई रेलमंत्री ऐसे भी रहे जिन्होंने रेल्वे के हजारों करोड़ के संस्थान अपने राज्यों में शुरू करने की घोषणा की थी। इनके मुकाबले आज का यह बजट बिना किसी चटखारे वाला, और एक गंभीर कामकाज वाला बजट दिख रहा है जिसे पेश करते हुए सुरेश प्रभु ने यह साफ किया कि अधिक समीक्षा के बाद नई गाडिय़ों का फैसला किया जाएगा। 
न सिर्फ रेल के मामले में, बल्कि कई मंत्रालयों के काम में, राज्यों के विभागों में, जिलों के छोटे-छोटे से दफ्तरों में मुखिया के ओहदों पर बैठे हुए लोग इस अंदाज में अपनी प्राथमिकताओं की औपचारिक घोषणा करते हैं कि मानो वे एक स्वायत्तशासी आजाद टापू के जमींदार हों। बहुत से नेता और अफसर इस बात की कोशिश करते हैं कि उनके कार्यकाल के दौरान उनके नाम के साथ कोई ऐसी बड़ी बात जुड़ जाए, जो कि इतिहास में लंबे समय तक याद रखी जाए। ऐसी नाटकीयता के फेर में लोगों की अपनी जिम्मेदारियों और कामकाज की बुनियादी बातें किनारे धरी रह जाती हैं, और नारों की जुबान मेें जो बात और काम सामने रखे जा सकते हैं, उन्हीं पर ध्यान अधिक जाता है। 
आज के सुरेश प्रभु के भाषण की एक बड़ी छोटी सी बात है कि साधारण दर्जे की टिकट लोगों को पांच मिनट के भीतर मिल जाए, ऐसा इंतजाम किया जाएगा। आज हालत यह है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी अगर कोई ईमानदार और जिम्मेदार इंसान प्लेटफॉर्म टिकट लेकर प्लेटफॉर्म पर जाना चाहते हैं, तो उनका आधा-पौन घंटा टिकट की कतार में लगता है। जिस देश में इंसानों की जिंदगी का वक्त इतना फिजूल मान लिया जाता है कि उन्हें रोज घंटों कतार में खड़ा किया जाए, वहां पर यह छोटी सी सोच एक बड़ी बात है। एक दूसरी बात यह है कि बहुत सी रेलगाडिय़ों में साधारण दर्जे के डिब्बों को बढ़ाने की बात कही गई है, और ये वही डिब्बे हैं जिनमें देश की सबसे गरीब जनता चलती है। हमारा तो यह मानना है कि बुलेट ट्रेन जैसी शाही खर्च वाली योजनाओं के बजाए देश की तकरीबन पूरी ही गरीब-आबादी को सीट पर बैठकर सफर करने की सहूलियत देना एक अधिक बड़ी बात है। 
रेल का काम इतना फैला हुआ और इतना बड़ा है, कि उसमें छोटे-छोटे सुधार की बड़ी-बड़ी गुंजाइश हमेशा ही रहती है। सफाई से लेकर हिफाजत तक, और सहूलियत से लेकर आराम तक, ऐसी कई बातें हैं जिन्हें बिना किसी घोषणा के सुधारा जाना चाहिए, और हो सकता है कि सुरेश प्रभु की नीयत ऐसी ही हो। कल ही हमने इसी जगह पर लिखा था कि किराए में मामूली बढ़ोत्तरी में कोई बुराई नहीं है, लेकिन हाल के चुनावों में भाजपा की बदहाली देखने के बाद हो सकता है कि मोदी सरकार और भाजपा फिलहाल किसी कड़े फैसले के पक्ष में न हो, लेकिन यह भी हो सकता है कि रेल विभाग के अपने संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल से आज सरकार को रेल भाड़ा बढ़ाने की जरूरत न हो। चूंकि इस बजट में नाटकीय कुछ नहीं है, इसलिए उस पर लिखने को भी अधिक बातें नहीं हैं, और सुरेश प्रभु को चाहिए कि वे उत्कृष्टता के पैमाने पर सुधार लाएं, और अधिक से अधिक जनता की सुविधा, सुरक्षा, और सहूलियत बढ़ाएं। यही रेल मंत्री की पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए कि सबसे गरीब, के सबसे करीब।

रेलभाड़ा बिल्कुल न बढ़ाना बहुत समझदारी नहीं...

25 फरवरी 2015
संपादकीय
कुछ पुरानी खबरों से परे एक नई खबर यह है कि रेल भाड़ा तीन फीसदी बढ़ सकता है। पिछले कई बरसों से लोगों को कोई बढ़ोतरी न होने की आदत पड़ी हुई है, जबकि सरकार और निजी क्षेत्र हर तरफ खर्च बढ़ते गए हैं। ऐसे में रेल टिकट को न बढ़ाने के कई नतीजे भी हो सकते हैं। एक तो यह कि विस्तार की योजनाएं, आधुनिकीकरण की योजनाएं और हिफाजत बढ़ाने की तकनीक, इन सब पर उतना काम नहीं हो पाएगा, जितना कि होना चाहिए। और भारतीय रेल इतनी बड़ी है, और उसमें किसी भी फैसले पर जमीनी अमल में इतने बरस लगते हैं कि आने वाले वक्त की जरूरतों का जिसे अंदाज न हो, वे यह नहीं समझ सकते कि विस्तार कितना और क्यों जरूरी है।
एक वक्त था जब भारत में स्कूटर को स्टार्ट करने के लिए एक तरफ झुकाकर किक मारनी पड़ती थी। वह वक्त ऐसा भी था जब रायपुर से भोपाल की एक टेलीफोन कॉल के लिए पूरे-पूरे दिन लोगों को इंतजार करना पड़ता था, और फिर टेलीफोन ऑपरेटर को रिश्वत देने से ही काम हो पाता था। वह वक्त ऐसा भी था जब एक टेलीफोन कनेक्शन के लिए लोगों को पांच-दस बरस इंतजार करना पड़ता था। ऐसी नौबत को बदलने के लिए देश के सामने यही एक रास्ता बचता था कि सरकार अपने बूते पर, या कि निजी क्षेत्र को जोड़कर उद्योगों का, और टेलीफोन जैसी सेवाओं का विस्तार करे। आज तस्वीर ऐसी बदली हुई है कि ठेला धकेलने वाले मजदूर भी जेब में मोबाइल फोन लेकर चलते हैं। 
ऐसे में भारतीय रेल को बेहतर न बनाना, देश की रेल-जरूरतों को पूरा न करना, और आने वाले दस-बीस बरस की संभावनाओं और जरूरतों को न आंकना, समझदारी नहीं होगी। ऐसे में हम एक मामूली बढ़ोतरी को सालाना बनाने के हिमायती हैं, और यह एक अलग बात है कि सरकारी की ऐसी कमाई का बहुत सावधानी और ईमानदारी से इस्तेमाल होना चाहिए। लोगों की जीवनशैली में जब हर चीज पर अधिक खर्च हो रहा है, तो रेल जैसी एक बड़ी और अपने किस्म की अकेली सुविधा पर भी खर्च बुरी बात नहीं है।
भारतीय रेल दुनिया की शायद सबसे बड़ी रेल है, और इसकी कमियों और दिक्कतों को सब लोग हर सफर में झेलते हैं। आज के रेलमंत्री सुरेश प्रभु एक बेहतर मंत्री माने जाते हैं, और मोदी सरकार एक किस्म से उनको भाजपा में आयात करके लेकर आई, और रेलवे जैसा महत्वपूर्ण विभाग दिया। उनसे देश यह भी उम्मीद करता है कि वे रेलवे की मौजूदा कमाई, और देश भर में बिखरी हुई उसकी जमीनों का एक कल्पनाशील उपयोग करके देश में रेल की तस्वीर बदलकर रख देंगे। आने वाले बजट के बाद भी भारत में इसकी जरूरत रहेगी कि लगातार रेल-ढांचे पर इतना काम हो कि लोग एक तरफ तो विश्व स्तर की सुविधा पा सकें, और दूसरी तरफ गरीबों को भी एक साफ-सुथरा सफर करने मिले। 

कांग्रेस पार्टी को जरूरत राहुल से परे सोचने की

24 फरवरी 2015
संपादकीय
कांग्रेस पार्टी एक अंधड़ से गुजरती हुई लग रही है। जिस नौजवान राहुल गांधी के हाथों में पार्टी ने अपना भविष्य दे रखा है, वे हाथ अभी जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। और उम्र के हिसाब से कहें, तो यह नौजवान अधेड़ हो चुका है, बचपन से इसने घर पर राजनीति और सत्ता देखी है, पिछले बरसों में सत्तारूढ़ पार्टी का हिस्सा रहा है, संसद में रहा है, सरकार के अध्यादेश फाड़कर फेंकते रहा है, लेकिन जब-जब जिम्मेदारी का कोई मौका आया, तब-तब यह मोर्चे से परे रहा है। आज राहुल गांधी के बारे में खबरें हैं कि वे पार्टी से छुट्टी लेकर आत्ममंथन करने कहीं विदेश गए हुए हैं, और संसद से सड़क तक जलते-सुलगते मुद्दे बिखरे हुए हैं। 
हम पिछले बरसों में बार-बार इस बात को लिख चुके हैं कि कांग्रेस पार्टी को अगर देश में विपक्ष भी रहना है तो उसे राहुल गांधी से परे कुछ सोचना-विचारना होगा। जिस तरह किसी खेल में, न खेलने वाले को कप्तान बनाया जाता है, उसी तरह राहुल गांधी जमीनी राजनीति और चुनावों की चुनौतियों से परे रहते हुए, जनता से कटे हुए, पार्टी के लोगों से कटे हुए, हकीकत को समझे बिना नासमझी के भाषण और बयान देते हुए भावनाओं के सैलाब पर आसमान तक पहुंचना चाहते हैं। लेकिन भावनाओं का सैलाब पल भर को ऊंचाई पर ले जाता है, और फिर नीचे लाकर कड़ी जमीन पर छोड़ देता है, जिसके लिए भी राहुल गांधी जरा भी तैयार नहीं हैं। 
कांग्रेस पार्टी को हमने पहले भी यह सुझाया था कि उसे यह तय करना है कि वह मुखिया की कुर्सी पर सोनिया परिवार के किसी को रखने को मंजिल मानती है, या फिर राजनीति में अपने अस्तित्व को बचाए रखने को? अगर यह पार्टी अपनी प्राथमिकता तय करने में आज भी गलती करेगी, तो इतिहास में वह हाशिए पर तो जा ही चुकी है, उसकी वापिसी की गुंजाइश भी कम रहेगी। इसमें हम राहुल गांधी की कोई गलती नहीं देखते। भारतीय राजनीति में वंशवाद के चलते उनको कांग्रेस पार्टी की अगुवाई से बचने की कोई पसंद दी ही नहीं गई थी, और इसमें नाकामयाब होने के बावजूद उन्हें घोड़े से उतरने नहीं दिया जा रहा था। यह सिलसिला कांग्रेस के लिए नुकसानदेह है, राहुल के लिए नुकसानदेह है, और देश के लोकतंत्र में विपक्ष की एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका के लिए भी नुकसानदेह है। 
लोगों को याद होगा कि दिल्ली में निर्भया के साथ बलात्कार के बाद जब पूरे देश में उस घटना को लेकर लोग विचलित थे, तब राहुल गांधी का पहला बयान आने में भी शायद हफ्ते-दस दिन से ज्यादा का समय लगा था। आज जब संसद का बजट सत्र शुरू है, और जब भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ पूरे देश में किसानों और गरीबों के बीच एक दहशत फैली हुई है, तो संसद में एक ऐतिहासिक जरूरत के बीच कांग्रेस पार्टी का यह भविष्य देश के बाहर सैर पर है। अब दिल्ली में चुनाव हारने के बाद से अब तक अगर राहुल गांधी चाहते, तो हफ्ते-दो हफ्ते की छुट्टी मना सकते थे। लेकिन आज संसद और सड़क दोनों के मोर्चों से गायब रहकर वे एक एनआरआई मुखिया की तरह विदेश बैठे हैं, और वहां रहकर मुखिया का कोई काम कर रहे हैं, यह भी पता नहीं है। 
कांग्रेस पार्टी को सोनिया और राहुल से परे एक लीडरशिप की जरूरत है। यह पसंद आसान नहीं होगी, और कांग्रेस के बहुत से दूसरे काबिल नेता शायद इस वजह से भी सोनिया-राहुल को ऊपर बिठाए रखना चाहते हैं, कि कोई दूसरा काबिल नेता मुखिया न बन जाए। कांग्रेस को अपने इस तंग नजरिए से परे सोचना होगा, वरना देश की जनता ने उसके प्रति अपना रूख लोकसभा के चुनाव में दिखाया था, और दिल्ली के चुनाव में जनता ने उस रूख को कुछ और आगे तक ले जाकर साबित किया है। कांग्रेस एक संभावनाओं वाली पार्टी हो सकती है, अगर वह पार्टी की तरह बर्ताव करे। अगर वह चापलूसी में लगी रही, तो आने वाले दिन उसके लिए इससे बुरे और हो भी क्या सकते हैं? 

आसमान छूती प्रतिमाओं पर गर न्यूयॉर्क जैसा हमला हुआ तो?

संपादकीय
23 फरवरी 2015

मुंबई से खबर है कि वहां समंदर में बनाए जा रहे शिवाजी-स्मारक के लिए राज्य सरकार ने जेड डबल प्लस सुरक्षा तय की है। करीब दो हजार करोड़ से बन रही 190 फीट ऊंची इस प्रतिमा को महाराष्ट्र की जनता की भावनाओं से जोड़कर देखा जा रहा है। एक तरफ गुजरात में सरदार पटेल की प्रतिमा के लिए केंद्र सरकार ने 3 हजार करोड़ से अधिक मंजूर किए हैं, दूसरी तरफ मुंबई में यह स्मारक बन रहा है। आज ही सरकार को ऐसी आशंका है कि मुंबई पर हुए आतंकी हमलों की तरह का कोई हमला इस स्मारक पर हो सकता है, और उसके लिए बहुत लंबे-चौड़े सुरक्षा इंतजाम किए जाएंगे, जिनमें रडार लगाना भी शामिल होगा।
हमने न्यूयॉर्क पर हुए आतंकी हमलों को देखा है जिनमें आत्मघाती विमान जाकर विश्व व्यापार केंद्र की इमारतों से टकराए थे, और उन इमारतों को मिट्टी में मिला दिया था। अब आतंकी हमले तो आतंकी हमले होते हैं, वे किसी नियम-कायदे के मुताबिक नहीं होते। अब अगर गुजरात या मुंबई के ऐसे स्मारकों पर ऐसा कोई हवाई हमला होता है, तो कैसी नौबत बनेगी? चौबीसों घंटे तो इमारतों की निगरानी उस तरह से नहीं हो पाएगी जिस तरह किसी परमाणु बिजलीघर की होती है, या दिल्ली में राष्ट्रपति भवन से लेकर संसद तक पर हवाई हमले की आशंका के मुताबिक तैयारी रखी जाती है। स्मारकों पर न तो ऐसा खर्च जायज होगा, और न ही स्मारकों को बनाने में लगने वाले हजारों करोड़ जायज हैं। किसी की स्मृतियों को आगे बढ़ाने की सबसे अच्छी तरकीब उनकी याद में जनता की जरूरत के ऐसे केंद्र विकसित करना हो सकता है जिससे सबसे गरीब और बेबस को इलाज या पढ़ाई मिल सके। प्रतिमाओं से किसी के नाम रौशन नहीं होते, और न ही जनता का पैसा किसी के स्मारक पर खर्च करना चाहिए। फिर यह भी है कि आज जो पार्टी सत्ता में है, वह अपने पसंद के लोगों की आसमान छूती प्रतिमाएं बना रही है, और लोकतंत्र में आती-जाती दूसरी पार्टियां आने वाले कल को अपनी पसंद की प्रतिमाएं बनाने लगेंगी। उत्तरप्रदेश में मायावती ने अपने कार्यकाल में हजारों करोड़ की जमीन पर कोई हजार करोड़ से बाबा साहब अंबेडकर, कांशीराम, बसपा के चुनाव चिन्ह हाथी, और अपनी खुद की ऐसी प्रतिमाएं बनवाईं जिनका सालाना रखरखाव ही करोड़ों का है। अब कल के दिन मोदी को अपनी खुद की ऐसी प्रतिमा बनवाने से कौन सा कानून रोक सकता है? क्या कोई यह सोच सकता है कि ऐसा कोई मौका तमिलनाडु में जयललिता के समर्थक छोड़ देंगे? और मुलायम सिंह यादव के लोग पांच सौ फीट ऊंची साइकिल पर हजार फीट के मुलायम को बिठाकर ताजमहल की टक्कर का स्मारक बनाने की कोशिश नहीं करेंगे? यह मुकाबला जनता के पैसों से चलेगा, और गुजरात और महाराष्ट्र ये दोनों राज्य बहुत बड़े आदिवासी इलाकों में भयानक कुपोषण के सरकारी रिकॉर्ड वाले हैं। ऐसे में अपनी आने वाली पीढ़ी को मरने के लिए छोड़कर गुजर चुके लोगों का सम्मान बढ़ाने के लिए प्रतिमाएं बनवाना, सम्मान बढ़ाना नहीं है।
हमने पहले भी जनता के पैसों से प्रतिमाओं के खिलाफ लिखा था, और आज भी ऐसी आसमान छूती प्रतिमाओं पर आतंकी खतरों को देखते हुए हम यह सोचते हैं कि कल के दिन अगर कोई हमला ऐसी प्रतिमाओं को नुकसान पहुंचाएगा, तो क्या सरकार फिर से उस जगह पर वैसी ही प्रतिमा बनाएगी? ऐसा सिलसिला अगर शुरू हुआ तो भारत के किसी दुश्मन के लिए यह मजे की बात रहेगी कि वह भारत की जनता के पैसों को बार-बार ऐसे ही खर्च करवाए।
 

गोपनीय जानकारी की चोरी कंपनियों के सिर्फ मुलाजिम नहीं, मालिक भी मुजरिम

संपादकीय
22 फरवरी 2015

केन्द्र सरकार के मंत्रालयों में जिस तरह से जासूसी का मामला पकड़ाया है, और बड़ी-बड़ी खरबपति कंपनियों के बड़े-बड़े अफसर उसमें शामिल मिले हैं, और उनकी गिरफ्तारी हुई है, वह बात देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए भयानक है। आंतरिक सुरक्षा सिर्फ नक्सलियों से खतरे में नहीं आती, जब इतने बड़े-बड़े आर्थिक भ्रष्टाचार, और जुर्म की तैयारी की है, और इसमें प्रधानमंत्री की पीठ पर हाथ रखने वाले उद्योगपति भी शामिल होते हैं, तो फिर यह समझ नहीं पड़ता कि सरकार की खुफिया जानकारियां देश का भला करेंगी, या फिर इन कारखानेदारों का? 
अभी जो अंदाज बैठ रहा है, उसके मुताबिक पेट्रोलियम मंत्रालय से जो फाइलें और जानकारी चोरी की गई हैं, और जिसके साथ लोग पकड़ाए हैं, वह देश की पेट्रोलियम नीति, और देश के पेट्रोलियम आयात सौदों से जुड़ी हुई हैं, और इनसे देश के करोड़ों-करोड़ के व्यापारिक सौदे जुड़े हुए हैं। अगर सरकार की ऐसी जानकारी धंधेबाजों को मिल रही है जिससे वे सरकार की आने वाली नीति और फैसलों को मालूम करके उसके हिसाब से अपने कारोबारी फैसलों को कर सकते हैं, तो इससे देश का इतना बड़ा नुकसान होता है कि जनता तक देश का फायदा नहीं पहुंच पाता। 
लेकिन एक बात जो थोड़ी सी हैरान करती है, वह यह है कि सीधे प्रधानमंत्री तक पहुंच रखने वाले कारोबारी इस देश में हमेशा से सरकार की नीतियों और सौदों को प्रभावित करते आए हैं। आज मुकेश अंबानी की कंपनी इसमें फंसी है, और इसी मुकेश अंबानी के पिता धीरूभाई अंबानी के बारे में कहा जाता था कि उन्होंने अपना पूरा साम्राज्य इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, प्रणब मुखर्जी, मुरली देवड़ा जैसे कांग्रेस नेताओं और मंत्रियों के मार्फत अपनी मर्जी के फैसले करवाकर खड़ा किया था। इन बातों की हकीकत तो जानना मुश्किल है, लेकिन यह बात भी जाहिर थी कि एनडीए की पिछली सरकार के, और उस वक्त की भाजपा के एक सबसे ताकतवर मंत्री प्रमोद महाजन के बारे में भी यही कहा जाता था कि वे देश के कारोबारियों के सबसे करीबी भाजपा नेता थे, और खुद उनके भाई ने उनकी निजी दौलत के बारे में कहा था कि वह हजार करोड़ से अधिक थी। अब अगर पल भर के लिए यह मान लें कि भाई की कही यह बात सच थी, तो प्रमोद महाजन या वैसे किसी भी दूसरे नेता को कारोबारी हजार करोड़ तो तभी देंगे, जब उनको लाखों या करोड़ों-करोड़ का मुनाफा होगा। इसके अलावा प्रमोद महाजन ने पार्टी के लिए भी पैसे जुटाए होंगे, और उस वक्त की अटल सरकार के कुछ और लोगों ने भी कारोबारियों पर मेहरबानी करके ऐसा किया होगा। 
यह बात न तो नई है, और न ही कांग्रेस और भाजपा तक सीमित है। देश में वामपंथियों को छोड़कर करीब-करीब हर पार्टी की सरकारों में कारोबारियों का ऐसा ही बोलबाला रहता है। इसलिए हमको थोड़ी सी हैरानी होती है कि आज इन कारोबारियों को मंत्रालय के स्तर पर कागजात चोरी करवाने की क्या जरूरत पड़ी थी? एक मजाक यह भी बनता है कि सरकार और कारोबार दोनों ही अपनी इमेज को सुधारने के लिए छोटे-छोटे सिरों की ऐसी कुर्बानी देकर साबित कर रहे हैं कि उनका एक-दूसरे से बहुत अधिक लेना-देना नहीं है। यह सिलसिला बहुत ही खतरनाक है अगर चोरी करवाए बिना सरकारी नीतियों की जानकारी कारोबारियों को रहती है, या फिर वे नीतियां और फैसले, बजट की जानकारी, सौदों की जानकारी, चोरी करवाने की हैसियत रखते हैं। अब जब यह मामला पकड़ में आ ही गया है, तो सवाल यह उठता है कि इन कंपनियों के बड़े अफसर सरकार से गोपनीय जानकारी की चोरी अपने घर के लिए तो करवा नहीं रहे थे, अपनी कंपनियों के लिए ही करवा रहे थे। और आज सरकार के भीतर ऐसा कानून बनने जा रहा है, या शायद बन चुका है, कि किसी कंपनी के लोग अगर रिश्वत देते पकड़ाते हैं, तो उनको सिर्फ निजी रूप से गुनहगार नहीं माना जाएगा, और कंपनियों के डायरेक्टर भी मुजरिम माने जाएंगे। जो बात रिश्वत देने पर लागू होती है, वही बात इस तरह की खुफिया जानकारी की चोरी पर भी लागू होती है। अब यह देखना है कि सुप्रीम कोर्ट इन दो बातों को जोड़कर देखता है या नहीं, और इसे लेकर कुछ जनसंगठनों को सुप्रीम कोर्ट जाना जरूर चाहिए।