पत्नियां तो पत्नियां हैं या नहीं, बच्चे जरूर बाप के वारिस....

15 अक्टूबर 2026  

 

भारतीय समाज में सामाजिक परंपराओं में तो बहुत तरह के पाखंड भरे हुए हैं, लेकिन कानून और अदालत कई बार ऐसा पाखंडों को चूर करते दिखते हैं। मुस्लिम समाज में बाल विवाह आज भी जारी है क्योंकि मुस्लिमों की शादी का कानून अलग है। गैर-मुस्लिमों में बाल विवाह दशकों पहले बंद हो चुका है, इनमें शामिल होने वाले लोगों को भी जेल भेजने का कानून है, लेकिन मुस्लिमों में बच्चियों की शादी धड़ल्ले से चलती है, यह एक अलग बात है कि अब कुछ प्रदेशों ने इसके खिलाफ कानून बनाया है, और कुछ अदालतों ने इसके खिलाफ फैसले भी दिए हैं। हैरानी की बात यह है कि योरप के कुछ सबसे विकसित देशों में भी सैकड़ों की संख्या में मुस्लिम बच्चियों के बाल विवाह हो रहे हैं, और अभी पिछले हफ्ते ही एक बड़े देश के ऐसे खूब सारे आंकड़े सामने आए हैं। लेकिन भारत में अब अदालतें मुस्लिम मर्दों की इस पाखंड को रोक रही हैं। एक दूसरा कानून तीन तलाक के खिलाफ आया, और उस पर मुस्लिम महिलाएं रिपोर्ट लिखवाने भी सामने आ रही हैं। इसी तरह हिजाब और बुर्के को स्कूल-कॉलेज की यूनिफॉर्म से हटाने का नियम और अदालती फैसले आए, और धीरे-धीरे उन पर भी अमल हो रहा है। लोगों को शायद यह भूल गया होगा कि एक वक्त भारत के कुछ प्रदेशों में पति खो चुकी महिला को पति की चिता पर ही धकेलकर सती बनाने और उसका महिमामंडन करने का भी सामाजिक रिवाज था, जो कि बड़ी मुश्किल से खत्म हुआ। अब ऐसे में भारत में अभी एक अच्छी चीज यह हो रही है कि विवाह से परे भी जो संतानें होती हैं, उन्हें भी पिता की जायदाद में हिस्सेदार ठहराया गया है। बहुत सी अदालतों के ऐसे फैसले आ चुके हैं। इससे भी बढक़र एक और प्रगतिशील और साहसी फैसला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट सहित कुछ दूसरी अदालतों का भी आया है जिनमें यह कहा गया है कि अगर शादीशुदा महिला की कोई संतान उसके पति की नहीं है, किसी और से है, तो भी पति का नाम ही पिता के रूप में रहेगा, और उसी पर बच्चे की जिम्मेदारी भी रहेगी। समाज में महिलाओं को लेकर जो सोच है उसके बीच में ऐसा फैसला बड़े हौसले का है।

अभी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक गुजर चुके सरकारी कर्मचारी की विरासत को लेकर मुकदमा पहुंचा। इसमें अलग-अलग समय पर उसकी दो पत्नियों, और दोनों से कुल मिलाकर तीन बच्चों का उसके सरकारी बकाए पर, और संपत्ति पर दावा था। हाईकोर्ट ने बड़ा शानदार फैसला दिया है, उसने कहा कि दोनों ही पत्नियों से उसकी शादी की बात पूरी तरह से निर्विवाद रूप से स्थापित नहीं हो पा रही है, इसलिए उन्हें तो वारिस नहीं माना जाएगा, लेकिन इन दोनों पत्नियों से इस आदमी के तीन बच्चों को लेकर कोई विवाद नहीं है, सभी ने मान लिया है कि तीनों बच्चे उसी के हैं, इसलिए ये तीनों उसके वारिस रहेंगे। मतलब यह कि पत्नियां होने का दावा करने वाली महिलाएं किनारे कर दी गईं, लेकिन उनके बच्चों को बाप की जायदाद का वारिस माना गया।

अभी कुछ ही दिन पहले जब यूनिफाइड सिविल कोड बनाने के लिए छत्तीसगढ़ में बैठक हुई, तो कुछ महिला संगठनों और महिलाओं ने यह मांग रखी कि लिव-इन रिलेशनशिप का भी रजिस्ट्रेशन किया जाए, और ऐसे रिश्तों से होने वाले बच्चों को बाप की जायदाद में हक मिले। इस बैठक में यह प्रस्ताव रखने वालों की कोई और राजनीतिक प्राथमिकता हो तो वह एक अलग बात है, हम तो इस सीमित हिस्से को अच्छा देख रहे हैं कि लिव-इन रिलेशनशिप में भी लडक़ी, या महिला को ऐसे रजिस्ट्रेशन से एक कानूनी दर्जा मिलेगा। और ऐसे रिश्तों में होने वाले बच्चों को बाप की जायदाद में हक मिलेगा। अब इस प्रस्ताव को अगर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के ऊपर लिखे गए फैसले के साथ जोडक़र देखें, तो मतलब बहुत साफ है कि लिव-इन रिलेशनशिप में पैदा होने वाले बच्चों का वारिस की हैसियत से हक शादीशुदा रिश्ते में पैदा होने वाले बच्चों जितना ही रहेगा। इन दोनों मामलों को जब एक बराबर देखा जाए, तो उससे यह समझ पड़ता है कि बिना शादी किसी के साथ रिश्ता बनाने वाली महिला को इससे कम से कम अपने बच्चों के लिए तो एक हक मिल रहा है। और जाहिर है कि अगर लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन जरूरी हो जाएगा, तो फिर उस महिला का भी किसी तरह का कोई हक बन सकेगा। 

भारतीय समाज में जहां महिला अपने किसी भी तरह के जायज हक से दूर रखी जाती है वहां पर अगर धीरे-धीरे स्थितियां उसके अनुकूल होती जा रही हैं, तो हम इसे छोटा सुधार नहीं मानते। सतीप्रथा बंद होना, विधवा विवाह शुरू होना, बाल विवाह बंद होना, अब बाल विवाह बंद होने का विस्तार उन धर्मों तक होना जहां पर वह आज कानूनी रूप से जायज है, तीन तलाक के खिलाफ महिला को एक हक मिलना, मुस्लिम लडक़ी, या महिला पर लादे गए हिजाब, या बुर्के का हटना शुरू होना, मंदिरों में प्रतिबंधित आयुवर्ग की महिलाओं के दाखिले के लिए आंदोलन होना, ऐसी बहुत सारी चीजें हैं जो कि भारतीय महिलाओं के अधिक अधिकारों की तरफ ले जा रही हैं। पिछले कुछ महीनों में सोशल मीडिया पर महिलाओं ने देश में जगह-जगह लड़कियों और महिलाओं के साथ हुए बलात्कार के खिलाफ आक्रामक आंदोलन चलाए हैं। मामूली तुकबंदी पर गढ़े गए नारों को सोशल मीडिया पर सैलाब की तरह फैला दिया गया है। इन सबसे भी लड़कियों के बीच एक नई जागरूकता आ रही है, और वे सडक़ों पर आंदोलनों में अधिक हद तक शरीक हो रही हैं। ये सारी बातें महिलाओं के एक तबके के रूप में अधिक मजबूत होकर उबरने के स्पष्ट संकेत हैं। आज भारत में पुरूषों के भी कई तबके ऐसे हैं जो कि महिलाओं के हक की वकालत करते हैं। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले जब मुल्लाओं के ईरान में महिलाओं ने हिजाब के खिलाफ आंदोलन छेड़ा, और स्कार्फ उतार फेंका, तो ईरान के सामाजिक इतिहास में शायद पहली बार सभी उम्र के मर्दों ने बड़े पैमाने पर सडक़ों पर आकर महिलाओं का साथ दिया, और मुल्ला देखते रह गए। आज भारत में भी जब कुछ धर्मों से जुड़े हुए लोग महिलाओं के खिलाफ अनर्गल बातें करते हैं, तो उनके खिलाफ बोलने के लिए सिर्फ महिलाओं की जरूरत नहीं रहती, बहुत से पुरूष भी खुलकर ओछी बातों के खिलाफ आते हैं। सोशल मीडिया की मेहरबानी से अब मुखर मर्द दिखने लगे हैं, वे अधिक बोलने लगे हैं, और महिलाओं की तरफदारी करने में हिचक खत्म हो गई है।

राजा राममोहन राय के वक्त से आज तक कभी भी सिर्फ कानून से समाज में बदलाव नहीं आया है। इसके लिए सामाजिक सोच बदलने की जरूरत भी पड़ी है। कदम-कदम पर मर्दाना सोच को चुनौती देनी पड़ती है, तब जाकर अदालतों पर भी बदलती सामाजिक सोच का असर पड़ता है। कानून के शब्द तो स्थिर रहते हैं, लेकिन कानून की भावना वक्त की सोच के साथ प्रभावित होती है। इसी बात को जारी रखने के लिए देश में आज महिलाओं के हक की लड़ाई को आगे बढ़ाते रहना जरूरी है। एक वक्त समलैंगिक संबंध भारत में सजा के हकदार थे, उसके खिलाफ कानून बना हुआ था। लेकिन संसद का यह हौसला नहीं हुआ था कि इस कानून को खत्म किया जाए। नेता सामाजिक पाखंड को ढोने और जारी रखने के हिमायती रहते हैं क्योंकि समाज के कट्टरपंथी और मुखर तबके वैसा ही चाहते हैं। ऐसे में जजों को एक नई राह दिखानी पड़ी, समलैंगिक संबंधों को जुर्म के दायरे से बाहर निकालना पड़ा, और चूंकि यह अलोकप्रिय काम अदालत ने किया था, संसद ने चुप रहकर उसे मान लिया, वह खुद होकर ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटाने वाली थी। इसलिए कभी संसद, कभी अदालत, और हमेशा ही समाज, इन सबको मिलकर खुद सुधार करना होगा, या इन तीनों में से कोई एक सुधार कर रहे हों तो दूसरों को उसका विरोध करने का लालच छोडऩा होगा।

आज विवाहेतर संबंधों से पैदा बच्चों के विरासत-हक की बात जितनी उन बच्चों के हक में है, उतनी की उतनी उन बच्चों की मां के हक में भी है क्योंकि ऐसे बच्चों की जिम्मेदारी मोटे तौर पर मां पर ही तो आती है। इसलिए जैविकीय पिता की संपत्ति में इन बच्चों का हिस्सा उनकी मां की जीत है। समाज के भीतर ऐसे फैसलों को लेकर चर्चा होनी चाहिए, इन चर्चाओं में निंदा करने वाले भी कई लोग रहेंगे, शायद इनका समर्थन करने वाले लोग गिनती में कम रहेंगे, फिर धीरे-धीरे लोगों को यह अहसास होगा कि अब यह तो अदालत का फैसला है, चाहे यह कितना ही खराब क्यों न हो उसे मानना मजबूरी है। समाज की सोच में बदलाव का ऐसा ही एक सिलसिला रहता है, इस राह में बहुत से गड्ढे रहते हैं, उतार-चढ़ाव रहता है, कई घुमाव रहते हैं, और उन्हीं से होते हुए समाज एक बेहतर मंजिल तक पहुंचता है।

(Daily Chhattisgarh)    

सरकार के बाहर के विशेषज्ञ ही सोच सकते थे प्रश्न-बैंक जैसी मौलिक बात, अमल हो

14 अक्टूबर 2026  

 

भारत में परीक्षा सुधारों के लिए बनाई गई हाई पॉवर टास्कफोर्स के मुखिया नंदन नीलेकेणि ने मौजूदा परीक्षा प्रणाली में बदलाव के दो तरीके सुझाए हैं। केन्द्र सरकार ने नीट इम्तिहानों में हुई गड़बड़ी के बाद शर्मिंदगी के बीच भारत में आधार कार्ड के जनक नंदन नीलेकेणि को परीक्षा सुधार का जिम्मा भी दिया था। कुछ महीने इस मुद्दे पर काम करने के बाद अब उन्होंने एक कार्यक्रम में परीक्षा सुधार के बारे में यह मौलिक सोच सामने रखी है। उनका मानना है कि पहले से प्रश्न पत्र तैयार होने से लोगों में उसे बेचकर कमाई करने का लालच होता है। उनका सोचना है कि बहुत सारे सवालों का एक सवाल-बैंक बनाना चाहिए, और इम्तिहान के ठीक पहले एआई के इस्तेमाल से इनमें से प्रश्न पत्र बना लेना चाहिए। जब न पहले से प्रश्न पत्र होगा, न उसकी बिक्री की आशंका रहेगी, तो पेपर आउट होने जैसे विवाद खड़े नहीं होंगे। उन्होंने एक दूसरी बात यह सुझाई है कि परीक्षाओं को कम्प्यूटर पर लिया जाए, और इसके लिए परीक्षा केन्द्रों का नेटवर्क बढ़ाया जाए। उनके हिसाब से अभी भारत में डेढ़ लाख ऐसी जगहें हैं जहां पर छात्र-छात्राएं कम्प्यूटरों पर परीक्षा दे सकते हैं, ऐसे नेटवर्क को बढ़ाने की जरूरत है। टेक्नॉलॉजी कंपनियों के मुखिया रहे नंदन नीलेकेणि के अलावा इस कमेटी में इसरो के एक पूर्व प्रमुख, आईबी के एक पूर्व डायरेक्टर, केन्द्र की एक पूर्व शिक्षा सचिव, आईआईटी मद्रास के डायरेक्टर जैसे विशेषज्ञ भी हैं। यह रिपोर्ट अगले पखवाड़े तक केन्द्र सरकार को दाखिल कर देने की उम्मीद है। 

जब कभी सरकार अपने ढांचे के बाहर के विशेषज्ञों को किसी काम का जिम्मा देती है, तब कुछ नई सोच भी सामने आती है। सरकारों में काम करने वाले लोगों के दिल-दिमाग में सबसे पहले यह उठने लगता है कि कौन सा काम कैसे-कैसे नहीं हो सकेगा। लेकिन बाहर के लोग, कामयाब कारोबार, या विशेषज्ञता के लोग यह सोचना शुरू करते हैं कि कौन सा काम कैसे-कैसे हो सकता है। सोचने का यही फर्क सरकार के बाहर से राय लेने, या योजना बनवाने में महत्वपूर्ण होता है। आज अगर किसी इम्तिहान के पूरे पाठ्यक्रम से हजार सवाल तैयार किए जाएं, और फिर परीक्षा के कुछ घंटे पहले किसी एक जगह बैठकर एआई की मदद से उनमें से 20 सवालों का पर्चा तैयार किया जाए, उन्हें इंसानी नजरों से गुजार दिया जाए, और फिर उन्हें इंटरनेट या मोबाइल फोन से निर्धारित समय पर सभी केन्द्रों को भेज दिया जाए। वहां पर उसके प्रिंट निकालकर परीक्षार्थियों को दे दिए जाएं, या किसी स्क्रीन पर उन्हें डिस्प्ले कर दिया जाए। यह एक आसान तरकीब है जिसे देश भर में बदनाम पर्चों की बिक्री थम सकती है। परीक्षा शुरू होने के समय जब सब परीक्षार्थी भीतर आकर बैठ चुके हों, गेट बंद हो चुका हो, तब किसी भी फोटोकॉपियर और प्रिंटर से ऐसे प्रिंट निकालकर बांटे जा सकते हैं, जो कि परीक्षार्थियों से दो-चार मिनट पहले ही उस परीक्षा केन्द्र के अधिकारी-कर्मचारी देख पाएँगे। यह समाधान बड़ा आसान है, लेकिन पहली नजर में ही यह सुहाता है क्योंकि यह आधार कार्ड जैसा आसान काम है। लोगों को याद होगा कि नंदन नीलेकेणि ने ही यूपीए सरकार की दी हुई आधार कार्ड की चुनौती को मंजूर किया था, और अपने कारोबार को छोडक़र पूरा समय इस आधार कार्ड प्रणाली को विकसित करने में लगाया था। एक वक्त नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए आधार कार्ड के बड़े आलोचक थे, लेकिन बाद में प्रधानमंत्री बनने के बाद जब उन्होंने आधार कार्ड की भूमिकी देखी, तो उन्होंने सरकार के बाकी दायरों में भी इसके इस्तेमाल को बढ़ाया, और आज आधार कार्ड पूरी दुनिया में सबसे बड़ा पहचान पत्र है, जिसका सबसे अधिक कामकाज में इस्तेमाल भी होता है।

नंदन नीलेकेणि की कम्प्यूटरों पर इम्तिहान लेने की सोच पर हमें थोड़ा सा शक होता है क्योंकि आज इस देश में एक पटवारी सर्वर डाऊन होने की बात कहते हुए लोगों को हफ्तों चक्कर लगवा देता है। राज्यों में जमीन-जायदाद की खरीदी-बिक्री की रजिस्ट्री सरकार को मोटी कमाई देती है, लेकिन इन दफ्तरों में भी बूढ़े-बूढ़े लोग जाकर रजिस्ट्री के लिए बैठे रहते हैं, और सर्वर डाऊन होने की बात कहते हुए रजिस्ट्री रूकी रहती है। ऐसे में कम्प्यूटर, इंटरनेट कनेक्टिीविटी के साथ तकनीकी समस्याएं जुड़ी ही रहती हैं, और किसी केन्द्र पर एक साथ हजारों कम्प्यूटर काम करें, तो इसके अलग खतरे रहेंगे। इसके साथ-साथ जहां कोई उपकरण बीच में आएगा, तो लोगों को यह भी शक होने लगेगा कि क्या उस कम्प्यूटर पर सवालों के जवाब पहले से डले हुए थे? भारत तो आज बिना इंटरनेट से जुड़ी ईवीएम वोटिंग मशीनों को भी संदेह से देखता है। आज भारत में फिर से छपे हुए मतपत्रों से वोट करवाने की मांग उठ रही है। इसलिए कम्प्यूटरों पर इम्तिहान लेने की नौबत भारत में आज नहीं दिखती है। सरकार को ऐसी किसी सिफारिश को नहीं मानना चाहिए क्योंकि आज जब चारों तरफ हैकिंग से बड़े-बड़े करिश्मे करके दिखाए जा रहे हैं, इम्तिहान के कम्प्यूटरों का क्या होगा, यह अंदाज लगाया जा सकता है। मशीनों पर भी एक सीमा से अधिक अंधविश्वास करना ठीक नहीं है क्योंकि आज दुनिया भर में एआई की मेहरबानी से कम्प्यूटरों में हैकिंग हो रही है। 

लेकिन यह बात जरूर है कि भारत में बड़े इम्तिहानों, और बड़ी नौकरियों के लिए होने वाले इंटरव्यू में पारदर्शिता देश में लोकतंत्र बचाने के लिए जरूरी है। जब किसी महत्वपूर्ण कोर्स में दाखिले, या किसी नौकरी को पाने के लिए भी एक संदेह का वातावरण रहे, तो लोगों के मन से लोकतंत्र के प्रति विश्वास खत्म होने लगता है। एक तरफ तो देश में संचित और वंचित तबके के बीच पढ़ाई और कोचिंग की असमानता वैसे भी इतनी अधिक है कि कमजोर तबके के लोगों को मौके कम ही मिलते हैं, उन मौकों में कामयाबी और भी कम मिलती है। इसलिए कम से कम सरकारी इंतजाम तो पारदर्शी रहे। केन्द्र सरकार नीट इम्तिहानों को लेकर इस बुरी तरह शर्मिंदगी में घिरी हुई थी कि उसे अपने केन्द्रीय शिक्षामंत्री धर्मेन्द्र प्रधान से इस्तीफा लेना पड़ा था क्योंकि उससे कम किसी बात का असर हो नहीं रहा था। यह उम्मीद की जा सकती है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी ही बनाई गई इस उच्च स्तरीय कमेटी की सिफारिशों को मानेंगे, और प्रश्न-बैंक बनाकर आखिरी पलों में पर्चे तैयार करने से देश में पेपर बेचने का धंधा भी खत्म होगा, और गरीब बच्चों में व्यवस्था के प्रति विश्वास थोड़ा सा बढ़ सकेगा।

(Daily Chhattisgarh)    

दीवारों पर लिक्खा है, 14 अक्टूबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

हैकिंग अपने आपमें जानलेवा थी, अब वह एआई पर सवार भी है, दुनिया बारूद के ढेर पर

13 अक्टूबर 2026  

 

फ्रांस से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है जो कि एक किस्म से यह भी बताता है कि आने वाले वक्त में दुनिया में आतंकी, या फौजी हमले किस किस्म के हो सकते हैं। हैकरों ने फ्रांस के सैकड़ों सुपर मार्केट के रेफ्रिजरेशन सिस्टम पर हमला किया, और फ्रिज, फ्रीजर का तापमान बढ़ा दिया। यह एक साथ सैकड़ों जगहों पर रात में हुआ, और इससे ठंडी रखी जाने वाली चीजें खराब हो गईं। सुपर मार्केटों के ये सिस्टम कम्प्यूटर पर ऑनलाईन कंट्रोल होते थे, और इनके लिए एक सॉफ्टवेयर बना हुआ था। इसी डिजिटल कंट्रोल सिस्टम में घुसपैठ करके हैकरों ने तापमान में यह फेरबदल कर दिया। 

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से यह बात लिखते आ रहे हैं कि आने वाला वक्त सरहदों पर लड़ी जाने वाली जंग का नहीं होगा, बल्कि वह ऑनलाईन नुकसान पहुंचाने का वक्त रहेगा। बीते बरसों में दुनिया के हैकरों ने बहुत से देशों में जनसुविधा के कामकाज में भी हैकिंग की। कई जगह उन्होंने सारी जानकारी अपने कब्जे में कर ली, और उसे वापिस करने के लिए उन्होंने मोटी फिरौती मांगी। इनमें ब्रिटेन जैसे देश में नेशनल हेल्थ सर्विस पर हमला भी शामिल था। ऐसी भी चर्चा रही कि दुनिया भर में हैकरों ने कई निजी कंपनियों से फिरौती पाने के बाद ही उनके रिकॉर्ड की तालाबंदी खत्म की। हम लगातार इस खतरे से आगाह करते रहे हैं कि सरहदों पर हथियारों से लड़ाई पुराने जमाने की बात हो चुकी है, और आज हथियार कारखानेदार, और सरकारी खरीददार मिलकर इसकी अहमियत को बरकरार रखे हुए हैं, जबकि अब असली खतरा इंटरनेट के मार्फत होने वाली हैकिंग का रहेगा। फिर भी अभी एक-दो बरस पहले तक हमने इसके साथ-साथ आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के खतरे को जोडक़र नहीं देखा था, क्योंकि एआई की बढ़ती हुई ताकत का अहसास नहीं था। 

अब जब हैकरों की ताकत में एआई भी जुड़ गया है, तो फिर दुनिया में हथियारों की जंग और भी अप्रासंगिक हो गई है। यह तो ठीक है कि रूस और यूक्रेन के बीच हथियारों की लड़ाई कुछ और बरस जारी रह सकती है, लेकिन वह भविष्य नहीं है। भविष्य तो बिना खूनखराबे के किसी देश के पूरे इंतजाम को चौपट करके किया जाएगा। हम अपनी बहुत ही मामूली समझ, और उससे कुछ अधिक दर्जे की कल्पनाशीलता से ऐसी नौबत का अंदाज लगाते आ रहे हैं जब कोई एक देश, उसके सरकारी हैकर, या किसी आतंकी संगठन के हैकर, या वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध किसी संगठन के लोग किसी देश के इंतजाम को चौपट कर दें। आज दुनिया में जनसुविधा की अधिकतर चीजें कम्प्यूटर नियंत्रित हैं, और जहां कम्प्यूटर हैं, वहां वे ऑनलाईन भी हैं। हैकरों को इससे अधिक कुछ नहीं लगता। कोई कम्प्यूटर तभी तक सुरक्षित रह सकता है, जब तक वह इंटरनेट से जुड़ा हुआ न रहे, उससे कोई और उपकरण न जोड़ा जाए। एक बार जब कारखानों को, पानी साफ करने की मशीनों को, बैंकों के एटीएम को, प्लेन और ट्रेन के रिजर्वेशन को, रेलवे के सिग्नलों को, और सडक़ ट्रैफिक की लालबत्तियों को ऑनलाईन नियंत्रण से जोड़ दिया जाता है, तो उसका यह मतलब रहता है कि उसे किसी हैकर के नियंत्रण में दे देने का खतरा भी उठा लिया गया है। 

आज जिस तरह फ्रांस में हैकरों ने एक मामूली सी हरकत से सैकड़ों सुपर बाजारों में खानपान की चीजों को बर्बाद कर डाला, अब उसी तरह यह कल्पना करें कि कोई और दूसरा हैकर समूह दुनिया भर के दवा कारखानों में रखी गई वैक्सीन के कमरों के फ्रिज खराब कर दे, और दुनिया में उन टीकों की कमी कर दे। ऐसा करने वाले किसी दवा कारखाने के प्रतिद्वंद्वी भी हो सकते हैं, और ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो कि किसी देश में जैविक हथियारों से हमला करके संक्रामक रोग फैलाना चाहते हों। अभी रूस में साइबेरिया की एक सुनसान प्रयोगशाला में एक कर्मचारी से गलती से टेस्ट ट्यूब टूट गई, और प्लेग के जीवाणु बिखर गए। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले जब दुनिया भर में कोरोना फैला, तो उस वक्त भी चीन की एक प्रयोगशाला पर इसी किस्म की तोहमत लगी थी कि कोरोना के वायरस वहीं से निकले थे, और फिर दुनिया भर में फैलकर महीनों तक बेकाबू रहे थे। आज दुनिया में ऐसी सैकड़ों प्रयोगशालाएं हैं जहां घोषित या अघोषित रूप से ऐसे तरह-तरह के वायरसों पर प्रयोग चलते रहते हैं, उनसे बचने के लिए टीके बनाने हों, तो भी वायरस का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा अघोषित रूप से इन वायरसों को फैलाने के हथियारों पर भी काम जरूर ही चल रहा होगा, क्योंकि दुनिया की बहुत से देशों की सरकारों से किसी शराफत की उम्मीद नहीं की जाती है। 

हमारा ऐसी अपराधकथा की कल्पना पर पूरा भरोसा है जिसमें दुनिया के बहुत से देशों से लोग किसी एक जगह पर पहुंचे हुए हों, और उन पर कोई ऐसा वायरस हमला हो जिसके लक्षण एक-दो हफ्तों के बाद ही सामने आएं। इसका यह मतलब है कि वहां से लाखों लोग अपने-अपने देशों में ऐसे संक्रमण को लेकर लौट चुके होंगे, और वहां जब वे इसे फैलाना शुरू कर चुके होंगे, तब तक सरकारें चौकन्नी भी नहीं हुई होंगी। इसके अलावा भी भीड़भरी जगहों पर अगर किसी तरह से वायरस को सीधे भी फैलाना हो, तो किसी धार्मिक, सामाजिक, या राजनीतिक कार्यक्रम में पहुंचे हुए लाखों लोगों के बीच ऐसी एक टेस्ट ट्यूब कोई फोड़ दे, तो तबाही बेहिसाब होगी। 

अब हम बिना किसी की जान लिए की जाने वाली साजिशों के बारे में सोचें। किसी भी देश की धडक़न आज इंटरनेट और मोबाइल फोन से जुड़ी हुई है। किसी सामान का भुगतान करना हो, कोई टिकट बुक करनी हो, शिनाख्त बतानी हो, या किसी सरकारी काम के लिए ओटीपी देना हो, इन सबके लिए मोबाइल-इंटरनेट जरूरी है। आज दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश हो, जिसने अपने सारे जरूरी कामों के लिए बिना मोबाइल-इंटरनेट के काम करने की कोई वैकल्पिक व्यवस्था बनाई हो। हमने तो सबसे विकसित देशों के बारे में भी ऐसा नहीं सुना है। आज लोगों की जिंदगी, और हर तरह का कामकाज मोबाइल फोन का इस हद तक मोहताज हो गया है कि अपने दफ्तर से घर लौटने के किस रास्ते पर ट्रैफिक कम है, इसे देखे बिना लोग रास्ता तय नहीं कर सकते, और बिना मोबाइल नक्शे पर यह दिखता नहीं है। लोग जेब में नगद नहीं रखते, अगर क्रेडिट कार्ड, और डेबिट कार्ड वाली कंपनियों के रिकॉर्ड हैक कर लिए जाएं, बैंकिंग कम्प्यूटरों पर कब्जा कर लिया जाए, लोगों के पासवर्ड बदल दिए जाएं, उनके अकाऊंट की रकम खाली कर दी जाए, उनके यूपीआई भुगतान की ताकत खत्म हो जाए, तो पल भर में किसी देश में गृहयुद्ध की नौबत आ सकती है। इसी तरह आज अधिकतर विकसित देशों में अस्पतालों में लोगों के सेहत के रिकॉर्ड कम्प्यूटरों पर रहते हैं, और मरीजों का इतिहास देखने के लिए कागजों की फाइल कम देखी जाती है। आज अधिकतर जटिल जांच कम्प्यूटरों पर होती है, और कम्प्यूटरों के नेटवर्क पर ही उसके नतीजे भेजे जाते हैं। कम्प्यूटरों से जुड़े उपकरण मरीज की हालत नापते रहते हैं, दवा का डोज देना भी कम्प्यूटरों के मार्फत बताया जाता है। अगर कोई देश, या कोई संगठन किसी देश को अपना दुश्मन माने, और इस तरह का कोई हमला करे, तो क्या होगा? 

इसी तरह यह कल्पना करें कि तमाम रेलवे स्टेशनों, और एयरपोर्ट पर रिजर्वेशन के चार्ट के कम्प्यूटर बंद हो जाएं, विमानों का उडऩा थम जाए, ट्रेनों के सिग्नल मनमाने तरीके से लाल-हरे होने लगें, तो क्या होगा? इसी तरह सडक़ों पर ट्रैफिक सिग्नलों को एक साथ हरा कर दिया जाए, और चारों तरफ की गाडिय़ां आकर चौराहों पर जाम हो जाएं, और फिर सिग्नल ठप्प हो जाएं, तो जिंदगी किस तरह थम जाएगी? बिजलीघरों में सारी चीजें कम्प्यूटरों से तय होती हैं, और बिजली वितरण के लिए बनी हुई ग्रिड पर कब किस इलाके में अधिकतम कितनी बिजली भेजी जाए, यह भी कम्प्यूटरों से नियंत्रित रहता है। अब अगर बारी-बारी से किसी एक इलाके की ग्रिड पर ही पूरी की पूरी बिजली भेज दी जाए, तो वह पूरी ग्रिड ध्वस्त हो जाएगी, और कई दिनों तक ठीक नहीं हो पाएगी। जब तकनीकी रूप से जानकार लोग इस तरह का नुकसान पहुंचाना चाहेंगे, उनके पास हैकिंग की क्षमता होगी, और अब एआई की नई ताकत भी होगी, तो वे पूरी दुनिया को तबाह करने की हालत में होंगे। कल की ही खबर है कि एंथ्रॉपिक नाम की कंपनी ने यह कहा है कि उसके एआई चैटबॉट, क्लॉड का इस्तेमाल यमन के हूथियों ने मिसाइल और गाइडेड रॉकेट के लिए सॉफ्टवेयर बनाने में किया। हालांकि एंथ्रॉपिक ने हूथियों का नाम नहीं लिया, लेकिन यमन के उस इलाके पर हूथियों का ही कब्जा है। अब अगर विकसित देशों के पैमाने से बहुत दूर, बहुत पीछे, हूथी जैसे कट्टर हथियारबंद संगठन एआई का इस तरह का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो कल के दिन किसी विकसित देश में कोई इजराइल विरोधी, ट्रम्प विरोधी संगठन भी कई तरह से एआई को हथियार बनाकर तरह-तरह के हमले कर सकते हैं। 

आज दुनिया जिस हद तक डिजिटल और ऑनलाईन हो चुकी है, वहां से वापिसी का कोई रास्ता नहीं है। यह वन-वे ट्रैफिक वाली रोड है, और यहां पर अंधाधुंध रफ्तार से ताकत बढ़ाने वाला एआई कितना जानलेवा साबित होगा, इसे ट्रम्प जैसे मूढ़ समझ भी नहीं सकते, और एआई में दुनिया भर की दौलत झोंक चुकी कंपनियां इसे समझना भी नहीं चाहतीं। कुल मिलाकर दुनिया एक डिजिटल बारूद के ढेर पर बैठी हुई है, और एआई सिगरेट पीते हुए चारों तरफ चक्कर लगा रहा है।

(Daily Chhattisgarh)    

लिक्खा है, 13 अक्टूबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 12 अक्टूबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

साड़ी पहने, नंगे पैर दौडऩे वाली महिलाओं से देश को सीखने की जरूरत...

12 अक्टूबर 2026  

 

अभी झारखंड की दिल छू लेने वाली एक तस्वीर सामने आई है जिसमें साड़ी पहनी हुई एक महिला बिना चप्पल-जूते के, नंगे पैर दौड़ रही है, और होमगार्ड भर्ती के इस शारीरिक परीक्षण में वह पास भी हो गई। परिवार की जरूरतें ऐसी हैं कि यह नौकरी उसके लिए बहुत मायने रखती थी। कुछ ही हफ्ते पहले महाराष्ट्र से एक और खबर आई थी कि एक महिला ने बेटी की फीस जुटाने के लिए तीन हजार रूपए ईनाम वाली एक मैराथन में हिस्सा लिया, वह भी नंगे पैर, साड़ी पहने दौड़ते हुए जीती, और बेटी की फीस का इंतजाम हुआ। कुछ ही दिन पहले हमने इसी जगह पर एशियाई खेलों में मैडल लेकर आने वाली भारतीय लड़कियों की गरीब और कमजोर पारिवारिक स्थिति के बारे में खुलासे से लिखा था कि किस तरह वंचित परिवारों से आकर भी वे आगे बढ़ीं, और एशियाई खेलों से देश के लिए सोना-चांदी लेकर आईं। 

अभी शारीरिक परीक्षण वाली ये दो ऐसी दौड़ रहीं, जिनमें से एक भर्ती के लिए थी, और एक मैराथन मुकाबला नगद ईनाम के लिए था, और इन दोनों महिलाओं को उसकी बहुत जरूरत थी। इससे परे आज दिल्ली को देखें, तो वहां मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों में एक वामपंथी छात्र संगठन की मुखिया, नेहा बोरा लगातार खबरों में है, और देश के बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषक उसमें भविष्य की एक बहुत बड़ी नौजवान नेता देख रहे हैं। वह एक वामपंथ-विरोधी परिवार से आई हुई लडक़ी है, और इन दिनों जेएनयू में पीएचडी कर रही है। पिछले कई हफ्तों से वह दिल्ली, और दूसरे शहरों में जनआंदोलनों का चेहरा बनी हुई है। फिर एक नाम और सामने आता है, नवी पिल्लई का। यह भारतवंशी महिला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आज सबसे चर्चित महिला है क्योंकि उसे नोबल शांति पुरस्कार दिया गया है। वह भारत से दक्षिण अफ्रीका जाकर बसने वाले एक ट्रक-बस ड्राइवर पिता की बेटी है, और रंगभेद के दिनों में वह अफ्रीका में गरीबी के बीच बड़ी हुई, और संयुक्त राष्ट्र की तरफ से फिलीस्तीन के गाजा पर इजराइली हमलों की तबाही पर उन्होंने एक चर्चित रिपोर्ट भी बनाई है। उनका कॅरियर अंतरराष्ट्रीय अदालत से गुजरा हुआ है, लेकिन अकेले उनके बारे में लिखना यहां मकसद नहीं है। बस इतना ही जिक्र हम करना चाहते हैं कि वे किस तरह एक वंचित परिवार से उठकर नोबल पुरस्कार तक पहुंची हैं, या यह कहना अधिक सही और बेहतर होगा कि वे इस ऊंचाई पर पहुंची हैं कि नोबल शांति पुरस्कार चलकर उन तक आया है। 

दुनिया में ऐसे बहुत से देश हैं जहां पर अमीर और गरीब, वंचित और संचित, सभी तरह के लोगों के लिए आगे बढऩे के मौके बराबरी के रहते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान ऐसी समानता से कोसों दूर है। न सिर्फ पढ़ाई-लिखाई, बल्कि अग्निवीर जैसी छोटी सी चार बरस की नौकरी के लिए भी कुछ बेरोजगार ऐसे रहते हैं जो फिजिकल फिटनेस की तैयारी करवाने वाले प्रशिक्षण केन्द्रों को फीस देकर अपनी संभावना बढ़ा पाते हैं, और बहुत से लोगों के पास ऐसी ट्रेनिंग, कोचिंग, या ट्यूशन के लिए गुंजाइश नहीं रहती है। जब तैयारी में ही समानता नहीं है, तो कामयाबी की संभावना भला कैसे बराबर हो सकती है? इसलिए जब देश की सबसे बड़ी नौकरी-इम्तिहान, यूपीएससी होती है, तब भी उसमें कुछ ऐसे लोग कामयाब होते हैं जिन्होंने बरसों तक देश के महानगरों में कोचिंग ली हुई है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी कामयाब होते हैं जिन्होंने अपने बहुत ही गरीब और अभावग्रस्त परिवार में रहते हुए बिना किसी कोचिंग के सफलता पाई। इनमें से कोई किसी ऑटो चलाने वाले के बच्चे होते हैं, तो कोई किसी और बहुत छोटे कर्मचारी के, खेतिहर मजदूर के, या छोटे से फेरीवाले के। ऐसे बच्चे दुर्लभ प्रतिभा से संपन्न रहते हैं, और इसलिए वे संभावनाओं का कोई भी फायदा पाए बिना सफल हो जाते हैं। लेकिन उसका यह मतलब नहीं रहता कि उनकी तरह के और अभावग्रस्त लोग भी सफलता की बराबरी की संभावना रखते हैं।

सरकारी स्कूल-कॉलेज में जहां पर दाखिलों का मुकाबला होता है, वहां पर संपन्न और विपन्न का फर्क बड़ा मायने रखता है। इसी तरह जब नौकरी का मुकाबला होता है, तो अगर मुकाबला ईमानदार भी है, तो भी उसमें संपन्न की तैयारी उसे बहुत ताकत दे देती है, और विपन्न नुकसान में रहते हैं। फिर अभी हम बहस को सरकारी नौकरियों, और दाखिलों में हो रहे बड़े भ्रष्टाचार की तरफ नहीं ले जाना चाहते, जो कि चारों तरफ धड़ल्ले से फैला हुआ है। एक-एक बड़ी नौकरी के लिए आधा-एक करोड़ रूपए की रिश्वत जहां चलती हो, वहां पर गरीबों के बच्चों की कितनी संभावना रह सकती है? और देश में एक-एक करके कितने ही प्रदेशों में ऐसा भ्रष्टाचार सामने आ चुका है। नौजवान इस कदर निराश हैं कि वे सडक़ों पर होने वाले आंदोलनों में जोर-शोर से हिस्सा लेने लगे हैं। आज सबसे चर्चित कॉकरोच जनता पार्टी का तो जन्म ही नीट इम्तिहान के भ्रष्टाचार के खिलाफ हुआ था, और वैसे भ्रष्टाचार से त्रस्त छात्र और नौजवान आज देश में जगह-जगह किसी भी ईमानदार दिखते आंदोलन में शामिल होने के लिए एक पैर पर खड़े हैं। 

अब पल भर के लिए यह सोचें कि महाराष्ट्र की जिस महिला ने साड़ी पहने, नंगे पैर मैराथन इसलिए जीता कि उसे बेटी के लिए तीन हजार रूपए की फीस जुटानी थी, या अभी झारखंड में होमगार्ड बनने के लिए उसी तरह साड़ी पहने, नंगे पैर एक महिला ने दौड़ पास की, अब अगर ऐसी मेहनत के बाद भी बेईमानी हुई रहती, तो इनका दिल ही न टूट गया रहता? और दूसरी बात यह भी कि ऐसे लोकतंत्र पर उनका क्या भरोसा रह जाता? इसलिए हर किस्म के इम्तिहानों में, मुकाबलों में पारदर्शिता और ईमानदारी की जरूरत बेहतर लोगों को छांटने के लिए ही जरूरी नहीं है, लोगों की लोकतंत्र में आस्था बनाए रखने के लिए भी यह ईमानदारी जरूरी है। भारत में गैरबराबरी इतनी अधिक हो गई है कि किसी भी किस्म की संभावनाओं में कमजोर तबकों की गुंजाइश बहुत ही कम है। अब सरकारों को यह सोचना होगा कि वे पढ़ाई के दौरान, बाद के इम्तिहानों, और मुकाबलों में किस तरह इस गैरबराबरी को कम कर सकते हैं? दुनिया में वही देश आगे बढ़ते हैं जिनमें हर किसी को समान अवसर हासिल रहते हैं। समान अवसर मिलने के बाद अपनी पूरी क्षमता से आगे बढऩा यह लोगों के अपने हाथ में रहता है। लेकिन इसके पहले तक तो सरकार को ही मुकाबलों के लिए एक बराबरी का मैदान मुहैया कराना होगा। इसी से देश की सबसे अच्छी संभावनाएं सामने आ सकेंगी। आज बहुत औसत दर्जे के लोग जब भ्रष्टाचार से सबसे बड़ी पढ़ाई में, सबसे बड़ी नौकरी में पहुंच जाते हैं, तो उनकी पूरी जिंदगी रहने तक वे काम घटिया होने की गारंटी कर देते हैं। यह सिलसिला खत्म करना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

सबको मालूम है दोजख की हकीकत लेकिन, नजऱों से छुपाने को यह पर्दा अच्छा है...

11 अक्टूबर 2026  

 

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में केंद्रीय रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव के आने का कार्यक्रम था और उसकी तैयारी में रेलवे के इलाकों से लगी हुई सडक़ों पर भी इतना रंग-पेंट हो रहा था कि हफ्तेभर से वहां ट्रैफिक जाम चल रहा था। यह हालत तो रेलवे के इलाके के बाहर की शहर की सडक़ों की थी, खुद रेलवे के इलाके में तो जाने क्या-क्या हो रहा था। रंगाई-पुताई ऐसे चल रही थी कि अंग्रेजों के जमाने की धूल को भी धोकर निकाल दिया गया था, नई लिफ्ट लग रही थी, एस्केलेटर शुरू हो रहा था, और तो और पटरियों के नीचे बिछी हुई गिट्टी को भी रंग दिया गया था। आज जब अखबारों में रेलमंत्री का दौरा रद्द होने की खबर छपी तो उसके साथ ही तस्वीरें छपी हैं कि जिस आम सडक़ से रेलमंत्री गुजरने वाले थे, एक-डेढ़ किलोमीटर की उस सडक़ के दोनों तरफ छोटे मकान-दुकान छुपाने के लिए पर्दे तान दिए गए थे। इस तैयारी को देखकर याद पड़ता है कि किस तरह ट्रंप के आने पर अहमदाबाद में सडक़ किनारे की झुग्गियों को छिपाने के लिए दीवार ही तान दी गई थी। या पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार के रहते हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री के आने पर कोलकाता शहर को साफ-सुथरा किया गया था और फुटपाथ पर जीते बेघरों, बीमारों, विक्षिप्तों और भिखारियों को उठाकर शहर के बाहर कर दिया गया था। ऐसा ही बहुत से प्रदेशों में विधानसभा सत्र के ठीक पहले होता है कि विधानसभा जाने वाली सडक़ों पर डामर की एक और तह, सिल्क कोट चढ़ा दी जाती है ताकि माननीयों को सदन पहुंचते जरा भी धक्का न लगे, और धक्कों से सदन में आहें सवालों की शक्ल में न निकलें। किसी भी प्रदेश या शहर में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के आने पर जहां-जहां तक उनकी गाडिय़ों के चक्के पड़ सकते हैं, या जहां-जहां तक उनकी नजरें पड़ सकती हैं, उन सभी जगहों को पॉलिश कर दिया जाता है, रंग दिया जाता है। जिस वक्त रायपुर में सडक़ किनारे की स्थायी हकीकत से रेलमंत्री की आंखों को बचाने के लिए कनात लगाई गई थी, उसी वक्त उससे दो-चार किलोमीटर दूर प्रदेश के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल में तस्वीरें खिंच रही थीं कि बिस्तरों की कमी से एक-एक छोटे से पलंग पर दो जच्चा और दो बच्चे रखे गए हैं। आखिर देश तो एक ही है, चाहे केंद्र सरकार के रेलवे के पैसों से एक सामंती दिखावा किया जा रहा हो, चाहे राज्य के अस्पताल में दो जच्चा अपने नवजात बच्चों संग एक पलंग पर हों। एक ही देश के भीतर लोगों के हक के पैमानों में फर्क इतना है कि एक बारगी तो अंग्रेज बहादुर भी शर्मा जाए।

भारत में यह नौबत इतनी भयानक है कि आजादी की पौन सदी तो गुजर गई, लेकिन लोगों के मिजाज से सामंतशाही नहीं गुजरी। अच्छी-भली साफ-सुथरी कुर्सियों पर अगर लॉन्ड्री से ड्राई-क्लीन करके बुलवाया गया सफेद टॉवेल नहीं बांधा गया तो मानो उस कुर्सी पर बैठने वाले की कोई हस्ती ही नहीं है। लोगों को महत्वपूर्ण होने का अहसास कराने के लिए देश की गरीब जनता को खासा खर्च करना पड़ता है। राज्यपाल जिस कार्यक्रम में जाते हैं, उसके शुरू होने के पहले और खत्म होने के बाद राष्ट्रधुन बजाने के लिए पुलिस का बैंड चलता है, उसके लिए दर्जनभर से अधिक पुलिसवाले, और एक बस, पूरी जिंदगी के लिए समर्पित रहते हैं। कुछ राज्यों में मंत्रियों और दूसरे तथाकथित वीवीआईपी लोगों को सर्किट हाउस या दूसरी जगहों पर सलामी देने के लिए एक सलामी गारद तैनात रहती थी, और ये सलामी देने के लिए जनता के पैसों पर तनख्वाह पाने वाले दर्जनभर या दर्जनों सिपाही इंतजार करते बैठे रहते थे। आज भी इस देश में शाही-सामंती दिखावों के इंतजाम जनता का पेट काटकर होता है। जिस देश में जनता को हर महीने 5 किलो सरकारी राशन मिलने से उसका भूखे सोना बंद होता है, उस देश में राष्ट्रपति के अंगरक्षकों के नाम पर भाले लिए हुए घुड़सवारों की फौज चलती है। इतने बड़े-बड़े घोड़े और खास यूनिफॉर्म पहने हुए ऊंचे-ऊंचे अंगरक्षक क्या आज परमाणु हथियार संपन्न इस देश की राष्ट्रपति की रक्षा के लिए जरूरी हैं? अंग्रेज चले गए, लेकिन फिजूलखर्ची और ढकोसला छोड़ गए।

आज ऐसे ऐश-ओ-आराम पाने वाले जितने लोग हैं, वे ऐसी कुर्सियों पर पहुंचने के पहले से ऐसा दिखावा और पाखंड देखते ही आए हैं, इसलिए उन्हें सब मालूम है कि कुर्सी के सम्मान में कैसी फिजूलखर्ची होती है। कोई राजनीतिक दल चापलूसी में संगठन के पैसों से फिजूलखर्ची करे, तो वह उनका घरेलू मुद्दा हो सकता है। प्रियंका गांधी के रायपुर आने पर भूपेश सरकार के वक्त कांग्रेस के कार्यक्रम में सडक़ों पर गुलाब की पंखुडिय़ां बिछा दी गई थीं, वह उनके संगठन का मामला हो सकता है, लेकिन जब जनता के खजाने से किसी नेता की राह पर गुलाब बिखेरे जाएं तो उसका मतलब जनता की राह पर कांटे बिखेरना भी होता है।

अभी 2 अक्टूबर को देश में सादगी से जिंदगी गुजारने वाले दो लोगों का जन्मदिन था। गांधी और शास्त्री, दोनों सादगी की मिसाल थे। लेकिन इनके जन्मदिन के जलसों को देखें तो वे फिजूलखर्ची के आडंबर से भरे हुए रहते हैं। गांधी को राष्ट्रपिता बनाकर प्रतिमा में कैद करके बिठा दिया गया, लेकिन उनकी किफायत की किसी सोच को छुआ भी नहीं जाता। आज छोटे-छोटे से नेता इतनी बड़ी-बड़ी गाडिय़ों पर चलते हैं कि जीप पर सवार इल्लियां लिखने वाले व्यंग्यकार आज जिंदा होते तो वे जीप नहीं लिख पाते, वे 50 लाख से 1 करोड़ तक की गाड़ी का नाम लिखने को मजबूर होते। यह देश एक ऐसे ऊंचे दर्जे के पाखंड में जीता है कि जिसका अंदाज दुनिया के सभ्य देशों में नहीं लगाया जा सकता। कुदरत के बीच सादगी से जीने वाले भूटान को देखें, या सबसे विकसित अर्थव्यवस्था वाले योरप के कई देशों को देखें, तो प्रधानमंत्री साइकिलों पर चलते हैं, वहां संपन्नता का पैमाना बड़ी-बड़ी गाड़ी नहीं होता, वहां संपन्नता का पैमाना सार्वजनिक बस-ट्राम में चलना होता है, या पैदल-पैदल चलना होता है। भारत में, खासकर जब जनता के पैसों पर फिजूलखर्ची हासिल हो, लोगों की ऐश-ओ-आराम की चाह देखने लायक रहती है। फिर ऐसी चाह को भांपकर चापलूस अफसर स्वागत के ऐसे इंतजाम में भिड़ जाते हैं कि सत्तारूढ़ लोगों को लगने लगता है कि उनके पांव तो बादलों पर ही चलने के लिए बने हैं। जिस हिंदुस्तानी रेल में एक-एक डिब्बे में लोग बांधे गमछों पर टंगे हुए दो-दो दिन का सफर तय करते हैं, जहां पखानों के भीतर लोग बैठे रहते हैं और दूसरे लोगों को पखाना जाना नसीब नहीं होता, ऐसे देश में रेलमंत्री तो रेलमंत्री, बड़े रेल अफसरों के चलने के लिए भी अंग्रेजों के समय के विशेष डिब्बे ट्रेन में जोड़े जाते हैं और वे शाही सहूलियत के बीच सफर करते हैं। चूंकि देश की बड़ी अदालतों के बड़े जज भी अपनी आवाजाही के लिए, अपने घर-दफ्तर से परे एयरपोर्ट पर भी जो खास इंतजाम भोगते हैं, उससे यह बात साफ हो जाती है कि वे भी गरीबों के इस देश को किफायत की नसीहत नहीं दे सकते, किस मुंह से देंगे?

फिर भी हमें लगता है कि जनसरोकारों को लेकर लडऩे वाले लोगों में से किसी को अदालत तक जाना चाहिए और यह मांग करनी चाहिए कि किसी एक व्यक्ति के आने पर सडक़ों पर, ठहरने के भवनों पर, फर्नीचर और पर्दों पर, गाडिय़ों और राह के मकानों पर यह फिजूलखर्ची बंद हो। हो सकता है कि जज इसमें दखल न दें, लेकिन ऐसे में जनता को इंसाफ चाहे न मिले, जजों की सोच की शिनाख्त तो मिलेगी ही। किसी न किसी को यह पहल करनी चाहिए कि गरीबों का हक मुगलों और अंग्रेजों के अंदाज में इस झूठी शान-शौकत पर क्यों लुटाया जाए। पिछले कई दिनों से रायपुर के अखबार रेलवे की इन्हीं तैयारियों को लेकर राह चलती जनता की जिंदगी में आई मुश्किलों से भरे हुए थे। क्या सरकारों को ऐसी खबरों पर गौर नहीं करना चाहिए?

(Daily Chhattisgarh)    

दीवारों पर लिक्खा है, 10 अक्टूबर 2026


(Daily Chhattisgarh)

दिल्ली में आंदोलन के पहले ही सरकार की ऐसी असाधारण और अभूतपूर्व तैयारी का राज क्या है?

10 अक्टूबर 2026  

 

चुनाव आयोग के मतदाता पुनरीक्षण अभियान में देश में जो तबाही हुई है उसके खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी ने आज दिल्ली में एक बड़े प्रदर्शन की घोषणा की थी, लेकिन उसके पहले से जिस तरह दिल्ली पहुंचने वाली दर्जनों ट्रेनों को रद्द कर दिया गया, 50 से अधिक मेट्रो स्टेशनों को बंद कर दिया गया, दसियों हजार सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया, इंटरनेट और मोबाइल फोन को बंद किया गया, और दिल्ली से दूर-दूर तक राज्यों में ट्रेनों से उतारकर नौजवानों को गिरफ्तार किया गया, वह सब कुछ एकदम ही अभूतपूर्व और असाधारण है। कल जब ये सारी तैयारियां सामने आ रही थीं, तो कुछ बड़े सीनियर वकील सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, और मुख्य न्यायाधीश ने सरकार की इतनी कड़ी कार्रवाई पर यह भी कहा कि मक्खी मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल किया जाता दिख रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी के नौजवानों को जिस तरह दूसरे शहरों में, या दिल्ली पहुंचते विमानों से गिरफ्तार किया गया, नजरबंद किया गया, या हिरासत में लिया गया, वह भी पहली बार होती कार्रवाई दिख रही थी। 

अब कुछ लोग ऐसे रहते हैं जिन्हें अपराध कथाओं पर भरोसा रहता है। ऐसे लोग कॉकरोच जनता पार्टी के पहले दिन से ही यह कहते आ रहे हैं कि इन तिलचट्टों का केन्द्र सरकार के साथ कुछ घालमेल है। दरअसल देश में जब यूपीए सरकार थी, और 2014 के आम चुनाव के पहले तो सामाजिक आंदोलनकारी के रूप में अन्ना हजारे को सामने रखकर केजरीवाल ने एक बड़ा मोर्चा खोला था, और बाद में दिल्ली विधानसभा के चुनाव के समय इंडिया अंगेस्ट करप्शन नाम के आंदोलन को आम आदमी पार्टी नाम के राजनीतिक दल में बदल दिया गया था, तब भी कई लोगों को यह लगा था कि यूपीए सरकार के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन खड़ा करवाकर, चुनाव में उसे कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल किया गया था। उस वक्त केजरीवाल के आंदोलन और पार्टी को सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ इस्तेमाल किया गया था, लेकिन आज कॉकरोच जनता पार्टी को लेकर कुछ लोगों का शक इसका उल्टा है। अपराध और साजिश की थ्योरी पर भरोसा करने वाले लोग यह मानते हैं कि कॉकरोच जनता पार्टी चाहे सार्वजनिक रूप से मोदी सरकार, और उसके चुनाव आयोग के खिलाफ अभियान चला रही है, लेकिन वह कुल मिलाकर कांग्रेस को कमजोर कर रही है, इंडिया-गठबंधन को कमजोर कर रही है। मोदी और चुनाव आयोग के खिलाफ ही तो राहुल गांधी की अगुवाई में देश का विपक्ष आंदोलन चला रहा है। इसके समानांतर अगर तिलचट्टों का एक आंदोलन चल रहा है, तो विपक्ष के हिस्से आने वाली किसी भी किस्म की शोहरत या वाहवाही तो दोनों खेमों में बंट जाएगी। इसलिए कुछ लोगों का यह भी मानना है कि पिछली बार कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के बाद शिक्षामंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को जो इस्तीफा देना पड़ा था, वैसा बलिदान तो हर सरकार को किसी न किसी नाराजगी को शांत करने के लिए देना ही पड़ता है। अभी भी हो सकता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे से ही नौबत शांत हो सके, लेकिन ऐसे में कांग्रेस और बाकी विपक्ष को वाहवाही न मिले, इसलिए कामयाबी का ताज पहनाने को कॉकरोच का सिर सामने पेश कर दिया गया है। 

हम ऐसी दोनों नौबतों में से किसी के साथ नहीं हैं, हो सकता है कि यह केन्द्र सरकार के साथ कॉकरोच पार्टी की एक मिलीजुली कुश्ती हो, और यह भी हो सकता है कि कॉकरोच पार्टी ईमानदारी से मोदी सरकार के खिलाफ हो। राजनीति में हमेशा दो और दो चार नहीं होता, दो और दो तीन या पांच भी हो सकते हैं। इससे परे मुद्दे की बात यह है कि केन्द्र सरकार के मातहत चलने वाली दिल्ली की पुलिस के आज के इंतजाम की कोई पुरानी मिसाल नहीं है। अब किसी आंदोलन की विशालता या विकरालता को देखे बिना ही उसे रोकने और कुचलने के लिए अगर इतनी बड़ी तैयारी की गई है, तो उससे यह भी हो सकता है कि आंदोलन शुरू होने के पहले ही कामयाब दिखने लगे, और यह समझ पडऩे लगे कि राहुल गांधी की अगुवाई वाला विपक्षी आंदोलन इसके मुकाबले कहीं नहीं था। आज दिल्ली में जितने बड़े पैमाने पर जितनी घेराबंदी हुई है, पड़ोसी राज्यों में जगह-जगह कार्रवाई हुई है, हजारों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है, या हिरासत में रखा गया है, किसी आंदोलन में इतनी बड़ी कार्रवाई इसके पहले याद नहीं पड़ती है। 

जनता में जागरूकता चाहे विपक्षियों के किसी संगठन से आए, या बिल्कुल ही नए नौजवानों के आंदोलन से आए, जागरूकता जरूरी है। विपक्ष और कॉकरोच, इन दोनों की ताजा मांगें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ है, और मतदाता सूची पुनरीक्षण में देश के करोड़ों लोगों के नाम काट देने के खिलाफ है। इस तरह इन दोनों का एजेंडा एक साथ न होकर भी एक है। देश के कुछ प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता, कुछ बड़े वकील, और बहुत से वर्तमान और भूतपूर्व जज चुनाव आयोग के तौर-तरीकों के खिलाफ हैं, दूसरी तरफ जैसा कि किसी भी लोकतंत्र में होता है, बहुत से भूतपूर्व लोग चुनाव आयोग की आलोचना के खिलाफ भी खड़े हैं। अच्छी बात यही है कि चुनाव आयोग बहस के केन्द्र में है, और उसके सारे तौर-तरीके अब इतनी अधिक बारीकी से देखे जा रहे हैं कि कुछ महीने पहले इसी आयोग द्वारा किए गए दुनिया के सबसे बड़े मतदातासंहार को भी सुप्रीम कोर्ट हल्का-फुल्का मान रहा था, अब शायद इन दोनों आंदोलनों के चलते हुए सुप्रीम कोर्ट को अपने चश्मे का नंबर बदलना पड़ा है, और अब उसे समझ आ रहा है कि चुनाव आयोग तो उसके नाम का बेजा इस्तेमाल करके वोटरों को गाजर-मूली की तरह काटने के लिए तलवारबाजी कर रहा था। अब सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के तौर-तरीकों और फैसलों से हाथ धो रहा है, लेकिन यह सिलसिला इतना लेट हो चुका है कि कई राज्यों में लोकतंत्र लेट चुका है। 

चाहे न्यायपालिका अपने फैसले अलग से लेती हो, लेकिन यह बात तो साफ समझ आती है कि देश के भीतर अगर जनभावनाओं की कोई लहर चल रही है, तो उसे भी गौर से देखना सुप्रीम कोर्ट की मजबूरी रहती है। न देखने का दिखावा करते हुए भी सुप्रीम कोर्ट को आज चुनाव आयोग उतना मासूम नहीं दिख रहा है, जितना वह बंगाल चुनाव के पहले दिख रहा था। एक अखबार इंडियन एक्सप्रेस की खोजी रिपोर्ट से देश में माहौल बदल गया है, मुद्दों का रूख बदल गया है, सुप्रीम कोर्ट के तेवर बदल गए हैं, और केन्द्र सरकार-चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्षियों और तिलचट्टों को देश की जनता एक बार फिर गौर से देख रही है। अब विपक्षियों के हाथ में ईवीएम मशीन से अधिक एक बड़ा मुद्दा है, और एक-एक करके कई राज्यों के चुनाव आयोग से जुड़े हुए अफसरों के असहमति के तेवर भी दिख रहे हैं।  इसलिए फिलहाल हम संदेह का लाभ देने की अपनी नीति के तहत कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को एक ईमानदार जनआंदोलन मानकर चल रहे हैं, और कुछ लोगों के इस संदेह को अभी नहीं छू रहे हैं कि यह भाजपा का ही एक विपक्षी-प्रकोष्ठ तो नहीं है? लोकतंत्र में ऐसी नौबतें आती रहती हैं। कई बड़े कारखानेदार अपने ही कारखाने के खिलाफ अपने ही किसी बेनाम एनजीओ से एक फर्जी किस्म की बड़ी कमजोर सी जनहित याचिका लगवा देते हैं, जिसे अदालत खारिज कर देती है, और बाद में किसी गंभीर जनहित याचिका में उसी मुद्दे को उठाने पर अदालत उसे मंजूर नहीं करती है। लोकतंत्र में जनता को भी सारे संदेहों को भी देखना चाहिए, और संदेह का लाभ देने के प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को भी मानना चाहिए। आगे-आगे देखें, होता है क्या।

(Daily Chhattisgarh)