भूख और चर्बी के बीच का फासला

3 अगस्त 2011
अफ्रीकी देश सोमालिया बहुत बुरे दौर से गुजर रहा है। सरकार तकरीबन नामौजूद है, वहां के हथियारबंद बागी तबाही फैला चुके हैं, सरकार के खिलाफ लडऩे के साथ-साथ वे सोमाली औरतों से बलात्कार कर रहे हैं। लेकिन मानो इतना काफी नहीं है, इसलिए कुदरत ने भी इसी सोमालिया पर बुरी मार लगाई है। सूखे और पानी की कमी से वहां करीब 40 लाख लोगों की जिंदगी खतरे में पड़ गई है। संयुक्त राष्ट्र का अंदाज है कि दसियों हजार लोग अब तक भूख से मारे जा चुके हैं और ये नौबत पड़ोस के अफ्रीकी देशों तक भी फैल सकती है।
ये सब उस वक्त हो रहा है जब अमेरिका में सरकार को स्कूलों में बच्चों के खाने में फेर-बदल करना पड़ रहा है क्योंकि वहां बच्चे अधिक वजन की वजह से बीमारियों की तरफ बढ़ रहे हैं। अमेरिका की बहुत बड़ी आबादी, मोटापा की शिकार है, और अब तो भारत जैसे देश में भी आबादी के एक हिस्से में डाइबिटीज की बीमारी तेजी से बढ़ रही है, जिसके पीछे अधिक खाना एक बड़ी वजह है।
दुनिया के बहुत से देशों में अधिक खाने से लोग मर रहे हैं और अफ्रीका में भूख से। लेकिन सोमालिया की भयानक नौबत को अलग रखकर अगर देखें, तो ऐसे हालात दुनिया के बहुत से देशों में है। इतनी अधिक भयानक नहीं है, इसलिए वह नजर में नहीं आती, लेकिन है तो सही। हिन्दुस्तान में ही देखें तो आबादी का एक बड़ा हिस्सा किसी तरह कुछ खा पाता है। सरकारी रियायती अनाज न मिले तो वह भूखा मारा जाए। लेकिन दूसरी तरफ देश के सांसद संसद में रियायती खाना इतना रियायती पाते हैं, कि उसे खा-खाकर वे संसद में मुफ्त अस्पताल से ढेरों दवाईयों के लायक तैयार हो जाते हैं। हम अमीरी और गरीबी के बीच के फासला के अलावा भी लोगों की सेहत के लिए सोचते हैं कि खाने की बर्बादी चर्बी चढ़े बदनों पर पार होकर भूखों पर हो तो बेहतर होगा।
कुछ वक्त पहले हमने इसी जगह पर पाकिस्तान की एक मिसाल दी थी जहां एक प्रांत में मेहमानों की गिनती या दावत में खाने के सामानों पर सरकारी रोक है। हिन्दुस्तान में भी बहुत पहले ऐसा एक कानून था लेकिन फिर जब अनाज अधिक होने लगा और नेताओं की दावतों में लाख-पचास हजार लोगों को बुलाया जाने लगा तो फिर वे सारी रोक खत्म हो गईं। हम आज यहां पर इन तमाम बातों को मिलाकर यह कहना चाहते हैं, कि अमरीका हो या हिन्दुस्तान, भूखे मरते सोमाली हों, या कुपोषण के शिकार हिन्दुस्तानी, एक ताकतवर तबके की चर्बी और दूसरी कमजोर तबके की भूख के बीच का फासला खत्म नहीं किया जाएगा तो दुनिया में कभी चैन नहीं रह पाएगा। अभी आए दिन दुनिया में यह खबरें तैरने लगती है कि सोमाली समुद्री डकैतों ने किस तरह किस देश के जहाज पर कब्जा करके लोगों को बंधक बना लिया है। लेकिन इन खबरों के बीच हमने इसी जगह यह भी बताया था कि किस तरह दूसरे देशों के लोगों ने सोमालिया के समुद्री किनारे पर आकर मछली मारने पर कब्जा कर लिया है, और अपना धंधा छिन जाने से वहां के लोग डकैत भी बन गए हैं।
इस तरह सोमालिया की बहुत सी दिक्कतों को लेकर आज दुनिया की अलग-अलग ताकतों को यह सोचने की जरूरत है कि वे इस देश के लिए, यहां के लोगों के लिए, क्या कर सकते हैं, और अपने देश के भीतर इस तरह की नौबत को रोकने के लिए क्या कर सकते हैं। भूख और चर्बी के बीच की खाई कम नहीं होगी तो ना सिर्फ भूखे मरते अफ्रीका में, बल्कि हिन्दुस्तान जैसे देश के भीतर भी बगावत होगी ही। हमेें एक बात और लगती है।  अमरीका के आज के राष्ट्रपति बराक ओबामा अफ्रीकी मूल के हैं। उनके कुछ पुरखे अब भी अफ्रीका में रहते हैं। आज दुनिया पर कब्जा करते चलने की अमरीकी रणनीति के बीच क्या उन्हें कभी यह नहीं लगता कि आज अगर वे अफ्रीका के ही सोमालिया जैसे देश में रहते तो एक बच्चे की उम्र से ही बंदूक थामकर लड़ते होते, जैसे कि आज वहां के बाल-सैनिक लड़ रहे हैं। उनका कुनबा भूख से उसी तरह मरता होता जैसे कि आज लाखों लोग मरने जा रहे हैं। हम इस बारे में बात करते हुए उन अनगिनत बलात्कारों की चर्चा करना नहीं चाहते जो कि बंदूकधारी रोजाना ही सोमाली लड़कियों से औरतों से कर रहे हैं।
और आखिर में। अभी दुनिया के मुसलमानों में रमजान का महीना चल रहा है जब बहुत से मुस्लिम दिन भर रोजा रखते हैं। सोमालिया के मुस्लिम इस कदर भूख से मर रहे हैं, कि वे रोजा भी नहीं रख सकते, कि आखिर में शाम को रोजा तोड़ते हुए वे खाएंगे क्या? और दिन में राहत शिविर में जब जो खाने मिल जाए उसे छोड़ें कैसे? आज ही एक खबर आई है कि अमरीका में हर साल मोटापे के कारण 1 लाख से अधिक मौतें होती हैं। दूसरी तरफ खाड़ी के मुस्लिम देशों के अनगिनत चकाचौंध तस्वीरें रोजाना आती हैं कि किस शेख के पास कितनी दौलत है। ब्रुनेई के सुल्तान के खुद के गैरेज में 7 हजार कारें हैं। इस तरह एक तरफ तो लोग ज्यादा खाने से मर रहे हैं तो दूसरी तरफ खाना न मिल पाने से। जो मुस्लिम ये मानते हैं कि अल्लाह के बनाए तमाम इंसान एक हैं, वे मुस्लिम भी सोमालिया के भूखों मरते मुस्लिमों से भाईचारा (मुस्लिम दुनिया में भाईचारा जैसा कोई शब्द नहीं है) नहीं निभाते? कहां काम आया मजहब? धर्म तो लोगों को इतनी इंसानियत भी नहीं सिखा पा रहा कि अपनी दावत कम करके वे कुछ लोगों को जिंदा रख सकें। तो रमजान के महीने में भी इस्लाम मानने वालों को कुछ सोचना चाहिए।

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