तानाशाही के खिलाफ कुछ आवाजें

26 अगस्त 11
अन्ना हजारे के उठाए हुए मुद्दे को जरूरी और सही मानते हुए भी हम उनके पूरे तौर-तरीके को घोर अलोकतांत्रिक और तानाशाह पा रहे हैं और पिछले कुछ हफ्तों में जनता के एक मुखर तबके के अन्ना समर्थन की लहर के खिलाफ जाकर भी हमने लगातार इस बारे में लिखा है। देश की राजनीतिक ताकतें लगातार अपनी चुप्पी बनाए हुए हैं लेकिन आज हमें कुछ खबरों को देखकर यह राहत मिली है कि सर्वदलीय बैठक में भी अल्पसंख्यकों और पिछड़े, कमजोर तबके के लोगों की फिक्र करते हुए कई नेताओं ने अन्ना के तानाशाह अंदाज के सामने सरकार के इस तरह से झुक जाने या इसके बाद और अधिक झुकने के खिलाफ देश को एक चेतावनी दी। हमारा पिछले कई हफ्तों का यही अनुभव रहा है कि अन्ना का तौर-तरीका देश के दीर्घकालीन व्यापक हितों के पूरी तरह खिलाफ जा रहा है और वे भ्रष्टाचार से थकी हुई, लुटी हुई जनता को लुभाते हुए, एक निहायत भ्रष्ट और अनैतिक सरकार को दबाते हुए एक ऐसा मुद्दा उठाकर बैठे हैं जिसमें वे लोकतंत्र के सबसे बड़े मसीहा लग रहे हैं। जबकि उनका सारा आंदोलन लोकतंत्र के ठीक खिलाफ है और एक जनकल्याणकारी तानाशाह की तरह काम कर रहे हैं। अगर भीड़तंत्र से ही कोई फैसला सही हो जाता है तो फिर 1992 में बाबरी मस्जिद गिराना भी सही था और उसके बाद उसी भीड़ की कारसेवा से राम मंदिर बन भी जाना था। फिर इस देश में अल्पसंख्यकों के कोई हक नहीं रहने चाहिए क्योंकि बहुसंख्यक समुदाय की भीड़ अधिक बड़ी हो सकती है। यह खतरा कल की सर्वदलीय बैठक में भी सामने आया। इसके अलावा अन्ना से प्रभावित लोगों को देश के कुछ दलित लोगों के इस एतराज पर भी गौर करना चाहिए कि किस तरह अन्ना का आंदोलन दलित विरोधी है। हम खुद अन्ना के इस सार्वजनिक आंदोलन को उनके खुद के और देश के बहुसंख्यक समुदाय के हिंदू धर्म के रूझान वाला पा रहे हैं और इसे छुपाने की या अपने तौर-तरीकों को सर्वधर्म बनाने की भी अन्ना हजारे की कोई कोशिश नहीं है। हम एक बार फिर यहां दुहराना चाहते हैं कि हम भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आज की यूपीए सरकार के सबसे बुरे आलोचक हैं, हम चाहते हैं कि इस प्रधानमंत्री को कटघरे में खड़ा किया जाए, हमारा मानना है कि उनकी जानकारी में उनके मंत्रियों ने जितने जुर्म किए हैं उन सबमें वे एक मुखिया के तौर पर हिस्सेदार हैं और इन सबकी सजा उनको मिलनी चाहिए। लेकिन देश के विपक्ष और अन्ना हजारे या बाबा रामदेव जैसे लोगों की अब तक की गई सबसे कड़ी मांग से भी अधिक कड़ी यह मांग करते हुए हम यह भी साफ कर देना चाहते हैं कि हम एक बुजुर्ग जिंदगी की नोंक पर चलाए जा रहे इस आंदोलन के सख्त खिलाफ हैं क्योंकि यह एक बंधक की जिंदगी की कीमत पर ब्लैकमेलिंग करते हुए फिरौती मांगने की तरह का आंदोलन है और ऐसा कोई आंदोलन कभी लोकतंत्र का कोई भला नहीं कर सकता, फिर चाहे वह पहली नजर में चाहे कितना ही भला और लोकतांत्रिक क्यों न लगता हो।
यह अखबार लगातार वैचारिक विविधता को बढ़ावा देने में भरोसा रखता है और आज भी हम अपने पहले पन्ने पर ऐसी खबरें दे रहे हैं जो कि देश की जनता के एक आंदोलनकारी तबके को नापसंद हो सकती हैं, होंगी, लेकिन हमारे हिसाब से ऐसा मत-मतांतर ही लोकतंत्र को जिंदा और सेहतमंद रख सकता है। देश की एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय ने भी लोकपाल के लिए अपना एक मसौदा बनाकर सामने रखा है, आंध्र के एक भूतपूर्व नौकरशाह जयप्रकाश नारायण ने भी एक मसौदा सामने रखा है और इन सब पर, संसद की कमेटी द्वारा देश भर के नागरिकों से चार सितंबर तक बुलाए गए सुझावों पर विचार किए बिना किस तरह अन्ना हजारे की जिद पर संसद या सरकार कोई फैसला ले ले? यह पूरा सिलसिला घोर अलोकतांत्रिक, घोर गांधी-विरोधी, घोर हिंसक और घोर तानाशाही से भरा हुआ है। एक सज्जन, ईमानदार, बुजुर्ग, त्यागी और संघर्ष करने वाले इंसान की जिंदगी को उसी तरह दांव पर लगाकर यह आंदोलन चल रहा है जिस तरह भावनाओं का सैलाब बिखेर देने वाला कोई टीवी रियलिटी शो चलता है। यह सिलसिला बहुत खतरनाक है और देश में इससे एक ऐसी परंपरा कायम हो सकती है, एक ऐसा सिलसिला शुरू हो सकता है जिसमें आगे जाकर कोई दूसरी जान दांव पर लगाकर किसी अधिक सीमा तक ब्लैकमेल किया जाए। आज इस देश की संसद और यहां की सरकार को एक रॉकेट छूटने की तरह उल्टी गिनती पर काम करना पड़ रहा है जो कि बहुत ही बेइंसाफी की बात है और यह देश के हित के खिलाफ है। पिछले कुछ दिनों की तरह आज भी हम यहां पर इस अखबार के संपादक के लिखे हुए कुछ ट्वीट दे रहे हैं जिनसे इस अखबार की नीति और साफ होती है। आज जरूरत देश के लोगों के यह समझने की है कि जिस तरह हर चमकदार चीज सोना नहीं होती उसी तरह हर जनकल्याणकारी दिखता हुआ आंदोलन जनता के दीर्घकालीन और व्यापक कल्याण होना जरूरी नहीं होता।

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