31 अगस्त
ईद और गणेश चतुर्थी के एक साथ आने से इनकी मिलीजुली खुशी चारों तरफ बिखर रही है। पाकिस्तान में जिन लोगों के हिन्दुस्तानी दोस्त इंटरनेट पर हैं वे तमाम लोग भी दोनों जलसों की खुशियों के पैगाम एक-दूसरे को भेज रहे हैं। इन दोनों धर्मों के नाम पर राजनीति करने वाले, नेतागिरी करने वाले और ठेकेदारी करने वाले लोगों का धंधा जैसे-जैसे पिछले दशकों में उजागर होते चले गया, वैसे-वैसे भारत में साम्प्रदायिक दंगे कम होते चले गए। अधेड़ लोगों को याद होगा कि किस तरह दो-तीन दशक पहले देश के कई शहरों में साल में कई-कई बार दंगे होते थे और कहीं पुलिस गोलियों में लोग मारे जाते थे और कहीं फौज बुलाई जाती थी।
भारत के लिए यह एक गर्व की बात है कि यहां धीरे-धीरे साम्प्रदायिकता का लावा ठंडा पड़ते चले गया क्योंकि एक तरफ तो दंगे करवाने वाली ताकतें उजागर होती चली गईं और दूसरी तरफ देश का एक बड़ा तबका पहले के मुकाबले अधिक संपन्नता पाकर रोजाना के सुख का मजा लेने लगा और वह इतना निठल्ला नहीं रह गया कि बैठे ठाले करने को और कुछ न हो तो कहीं पत्थर चलाने लगे या कहीं चाकू चलाने लगे। यह भी एक गौर करने की बात है कि ठीक दो दशक पहले इस देश में मंदिर और मजिस्द के नाम पर जो जूनून फैलाया गया था, उसकी धार भी पूरी तरह खत्म हो गई और अब कोई यह कल्पना नहीं कर सकता कि एक धार्मिक उन्माद को दुबारा फैलाकर पूरे देश में कोई एक साथ चुनाव जीत सकता है, या किसी गठबंधन की सरकार बना सकता है। सरकार तो दूर, आज तो यह बात भी देश में बहुत साफ हो चुकी है कि धर्मान्धता पर अड़ा हुआ कोई दल कोई गठबंधन भी नहीं बना सकता जो कि देश में सरकार बना सके। इस तरह आज चारों तरफ फैली हुई निराशा के बीच अगर देखें तो यह बात साफ है कि इस देश में धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता के वैसे आक्रामक तेवर अब मुमकिन नहीं हैं जैसे कि एक वक्त हैदराबाद, भिवंडी, नासिक या कानपुर में लाशें ही लाशें बिछा देते थे।
भारत का इतिहास इस बात को दर्ज कर चुका है कि किस तरह गणेश चतुर्थी का त्यौहार लोकमान्य तिलक ने महाराष्ट्र से अंगे्रजी राज के दौरान शुरू किया था ताकि इसके मार्फत देश में राजनीतिक चेतना पैदा की जा सके, बढ़ाई जा सके। वक्त के साथ-साथ गणेश चतुर्थी में अपना वह मकसद पूरी तरह खो दिया था लेकिन पिछले एक-दो दशक में एक बार फिर समकालीन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे गणेश की सजावट पर हावी हो चुके हैं और अब फिर इस बहुत बड़े धार्मिक और सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम का उपयोग देश में सुलगते हुए मुद्दों को सामने रखने के लिए खुलकर होने लगा है। हम किसी भी धर्म के साथ आस्था से जुड़े हुए लोगों के बीच जागरूकता के लिए यह एक अच्छा रास्ता पाते हैं जब आज के मुद्दों को धार्मिक मौकों पर उठाया जाए। लेकिन यह बात सिर्फ किसी एक धर्म तक सीमित रहे, यह भी ठीक नहीं है। बाकी धर्मों को भी यह सोचना चाहिए कि अपने भीड़ के मौकों का इस्तेमाल वे किस तरह अपने समुदाय के लोगों की राजनीतिक-सामाजिक जागरूकता के लिए कर सकते हैं।
इस देश ने धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता के हाथों बहुत कुछ खोया है। यह एक बेहतर वक्त आया हुआ है जब जिंदगी के कुछ अधिक जरूरी मुद्दे चर्चा में आते हैं और अलग-अलग समाज एक-दूसरे के साथ जीना अधिक हद तक सीख चुके हैं। गिनाने को तो कुछ राज्यों में साम्प्रदायिक की घटनाएं गिनाई जा सकती हैं लेकिन वे अभी चौथाई सदी पहले की हर बरस की सैकड़ों हत्याओं के मुकाबले कुछ भी नहीं रह गई हैं। धर्म का महत्व सार्वजनिक जीवन में आस्था तक सीमित रहे और जागरूकता बढ़ाने में हो, वही ठीक है। इससे अधिक जब राजनीतिक ताकतें इसे अपना बाहुबल बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करती हैं तो बहुत तबाही होती है। यह बात आज यहां करना इसलिए भी जरूरी है कि अभी भी बेअसर हो चुका एक तबका नफरत की बातें करना बंद नहीं कर रहा है। हम आज के इस मौके पर यह भी चाहते हैं कि हर धर्म और समाज के ऐसे लोग जो कि जाने-माने हैं, जिनकी कही बातें लोग पढ़ते-सुनते हैं, उन्हें भी अधिक दखल देकर, अधिक कड़ाई से अमन की बातें कहकर, अधिक हिस्सेदारी करके धर्मान्ध लोगों के खिलाफ लोगों को सावधान करना चाहिए। यह देश साम्प्रदायिक सद्भाव और सर्वधर्म समभाव की अनगिनत मिसालों से भरा हुआ है और उन्हीं पर फख्र करते हुए हमें आज से भी बेहतर कल बनाने की जरूरत है। इसलिए ईद और गणेश चतुर्थी के इस मौके पर क्यों न सेंवई के लड्डू बनाए जाएं?
भारत के लिए यह एक गर्व की बात है कि यहां धीरे-धीरे साम्प्रदायिकता का लावा ठंडा पड़ते चले गया क्योंकि एक तरफ तो दंगे करवाने वाली ताकतें उजागर होती चली गईं और दूसरी तरफ देश का एक बड़ा तबका पहले के मुकाबले अधिक संपन्नता पाकर रोजाना के सुख का मजा लेने लगा और वह इतना निठल्ला नहीं रह गया कि बैठे ठाले करने को और कुछ न हो तो कहीं पत्थर चलाने लगे या कहीं चाकू चलाने लगे। यह भी एक गौर करने की बात है कि ठीक दो दशक पहले इस देश में मंदिर और मजिस्द के नाम पर जो जूनून फैलाया गया था, उसकी धार भी पूरी तरह खत्म हो गई और अब कोई यह कल्पना नहीं कर सकता कि एक धार्मिक उन्माद को दुबारा फैलाकर पूरे देश में कोई एक साथ चुनाव जीत सकता है, या किसी गठबंधन की सरकार बना सकता है। सरकार तो दूर, आज तो यह बात भी देश में बहुत साफ हो चुकी है कि धर्मान्धता पर अड़ा हुआ कोई दल कोई गठबंधन भी नहीं बना सकता जो कि देश में सरकार बना सके। इस तरह आज चारों तरफ फैली हुई निराशा के बीच अगर देखें तो यह बात साफ है कि इस देश में धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता के वैसे आक्रामक तेवर अब मुमकिन नहीं हैं जैसे कि एक वक्त हैदराबाद, भिवंडी, नासिक या कानपुर में लाशें ही लाशें बिछा देते थे।
भारत का इतिहास इस बात को दर्ज कर चुका है कि किस तरह गणेश चतुर्थी का त्यौहार लोकमान्य तिलक ने महाराष्ट्र से अंगे्रजी राज के दौरान शुरू किया था ताकि इसके मार्फत देश में राजनीतिक चेतना पैदा की जा सके, बढ़ाई जा सके। वक्त के साथ-साथ गणेश चतुर्थी में अपना वह मकसद पूरी तरह खो दिया था लेकिन पिछले एक-दो दशक में एक बार फिर समकालीन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे गणेश की सजावट पर हावी हो चुके हैं और अब फिर इस बहुत बड़े धार्मिक और सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम का उपयोग देश में सुलगते हुए मुद्दों को सामने रखने के लिए खुलकर होने लगा है। हम किसी भी धर्म के साथ आस्था से जुड़े हुए लोगों के बीच जागरूकता के लिए यह एक अच्छा रास्ता पाते हैं जब आज के मुद्दों को धार्मिक मौकों पर उठाया जाए। लेकिन यह बात सिर्फ किसी एक धर्म तक सीमित रहे, यह भी ठीक नहीं है। बाकी धर्मों को भी यह सोचना चाहिए कि अपने भीड़ के मौकों का इस्तेमाल वे किस तरह अपने समुदाय के लोगों की राजनीतिक-सामाजिक जागरूकता के लिए कर सकते हैं।
इस देश ने धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता के हाथों बहुत कुछ खोया है। यह एक बेहतर वक्त आया हुआ है जब जिंदगी के कुछ अधिक जरूरी मुद्दे चर्चा में आते हैं और अलग-अलग समाज एक-दूसरे के साथ जीना अधिक हद तक सीख चुके हैं। गिनाने को तो कुछ राज्यों में साम्प्रदायिक की घटनाएं गिनाई जा सकती हैं लेकिन वे अभी चौथाई सदी पहले की हर बरस की सैकड़ों हत्याओं के मुकाबले कुछ भी नहीं रह गई हैं। धर्म का महत्व सार्वजनिक जीवन में आस्था तक सीमित रहे और जागरूकता बढ़ाने में हो, वही ठीक है। इससे अधिक जब राजनीतिक ताकतें इसे अपना बाहुबल बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करती हैं तो बहुत तबाही होती है। यह बात आज यहां करना इसलिए भी जरूरी है कि अभी भी बेअसर हो चुका एक तबका नफरत की बातें करना बंद नहीं कर रहा है। हम आज के इस मौके पर यह भी चाहते हैं कि हर धर्म और समाज के ऐसे लोग जो कि जाने-माने हैं, जिनकी कही बातें लोग पढ़ते-सुनते हैं, उन्हें भी अधिक दखल देकर, अधिक कड़ाई से अमन की बातें कहकर, अधिक हिस्सेदारी करके धर्मान्ध लोगों के खिलाफ लोगों को सावधान करना चाहिए। यह देश साम्प्रदायिक सद्भाव और सर्वधर्म समभाव की अनगिनत मिसालों से भरा हुआ है और उन्हीं पर फख्र करते हुए हमें आज से भी बेहतर कल बनाने की जरूरत है। इसलिए ईद और गणेश चतुर्थी के इस मौके पर क्यों न सेंवई के लड्डू बनाए जाएं?
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