घुटनों से, लेटने की ओर

24 अगस्त 11
बदहाल और बेहाल दिल्ली को अगर देखें तो यूपीए सरकार पर तरस आता है। किसी सिर कटे जानवर की तरह वह चारों तरफ दौड़-भाग रही है और मोबाईल फोन पर आया हुआ एक एसएमएस सही लगता है जिसमें कहा गया है-चार दिन कोई औरत घर से बाहर रहे तो उसके घर का क्या होता है यह देखना हो तो कांगे्रस को देख लो।
हम यह भी नहीं कहते कि सोनिया गांधी के रहते हुए कांगे्रस की ऐसी बदहाली न हुई होती, क्योंकि जिन मुद्दों को लेकर अन्ना हजारे अपनी तानाशाह मांगों के साथ भी सबसे बड़े लोकतांत्रिक और जनकल्याणकारी नेता के रूप में जनता की नजरों में गिने जा रहे हैं, वे तमाम मुद्दे तो सोनिया गांधी के यहां रहते हुए भी सामने आ चुके थे। यूपीए सरकार का ऐसा एक भी भ्रष्टाचार उनके इलाज के दौरान नया सामने नहीं आया है जिसे कि उनकी गैरमौजूदगी के दौरान का हादसा माना जाए। इसलिए यूपीए की मुखिया और कांगे्रस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया का काबू किसी कुशल गृहिणी की तरह का नहीं रहा जिससे कि घर तबाह होने से बच जाता है। हालांकि गठबंधन के पांच-पांच बाहुबली साथियों के बीच घर चलाना कैसा होता है यह भारत की पुरानी कहानियों में दर्ज है। लेकिन आज यह जुबानी मजाक का वक्त नहीं रह गया है और पूरा देश इस बात को देख रहा है कि राजधानी के रामलीला मैदान पर अन्ना की गिरती हुई सेहत अधिक रफ्तार से गिर रही है या घुटनों पर खड़ी सरकार अधिक रफ्तार से लेट रही है। यह लोकतंत्र के लिए एक बहुत ही निराशा का वक्त है जब कोई सरकार अपने अस्तित्व के सातवें बरस में, ईमानदार और सज्जन समझे जाने वाले एक प्रधानमंत्री की सरकार की विश्वसनीयता का यह हाल है कि उसकी पहल पर भी इस देश में किसी का कोई भरोसा नहीं है, और हर कोई इस सरकार का नाम सामने आते ही उसे एक गिरोह की तरह का मान रहा है।
हम अन्ना हजारे की कुछ मांगों और उनके आंदोलन के कुछ तरीकों को घोर अलोकतांत्रिक मानते हुए पूरी तरह उन बातों के खिलाफ हैं। लेकिन अन्ना हजारे के उठाए हुए कई मुद्दे बहुत सही हैं जिनके चलते हुए यह सरकार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर हाथ-पैर हिलाने को तैयार हुई है और अन्ना की जान खतरे में दिखने पर यह सरकार अब तेजी से दौड़-भाग रही है। हम अन्ना की इस सफलता के बावजूद यह मानते हैं कि यह पूरा सिलसिला बिल्कुल भी लोकतांत्रिक नहीं है और इससे देश में एक बहुत खतरनाक मिसाल कायम होने जा रही है कि लोग जान देने की धमकी के साथ क्या कुछ करवा सकते हैं। एक वक्त था कि लोग नाईफ (चाकू) की नोंक पर कुछ करवा लेते थे और आज अन्ना का आंदोलन यह साबित कर रहा है कि लोग लाईफ (जिंदगी) की नोंक पर इस सरकार को घुटनों पर ला चुकी है। यूपीए सरकार अपने कुकर्मों के बोझ से इस कदर लदी हुई है कि उसे घुटनों पर लाना एक आसान काम साबित हुआ। आज देश की जनता संसद, न्यायपालिका, सरकार और प्रस्तावित लोकपाल, इन सबमें कोई फर्क किए बिना एक रामबाण दवा की तरह जनलोकपाल की बात सीधे-सीधे मान ले रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल को एक तानाशाह की तरह की ताकत दे देने में भी जनता को कोई हर्ज नहीं लग रहा है। आज देश में संवैधानिक संस्थाओं के बीच के मौजूदा संतुलन के नफे और नुकसान को भी जनता समझना नहीं चाह रही है। आज भारत के तमाम अन्ना समर्थक मौजूदा लोकतांत्रिक-संवैधानिक संस्थाओं के प्रति घोर अनास्था और अन्ना हजारे के प्रति घोर आस्था के बीच पूरी तरह तर्कहीन तरीके से जुटे हुए हैं। न इस आंदोलन को लेकर न्यायसंगत तर्क हैं और न ही भारत की एक विस्तृत लोकतांत्रिक-संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती देने के कोई न्यायसंगत तर्क हैं। आज पूरी तरह से कालिख पुती हुई व्यवस्था की प्रतिमा को चबूतरे से उखाड़कर फेंक देने पर आमादा है। दरअसल जब लोकतंत्र पूरी तरह नाकामयाब और भ्रष्ट दिखने लगता है तो फिर किसे रोका जा सकता है कि वह गांधीवादी कही जा रही तानाशाही पर भरोसा न करें। नतीजा यह है कि आज सरकार तमाम किस्म की समझ को परे रखकर एक ऐसे संकटनिवारण में लग गई है जिसमें कि आमतौर पर कोई दमकल लगती है या फिर किसी अस्पताल में आईसीयू जैसी जगह लगे दिखती है। यह नौबत किसी भी इज्जतदार सरकार के लिए बहुत शर्मनाक हो सकती है कि महीनों से उसके जो मंत्री अन्ना हजारे से बात कर रहे थे आज उनमें से कोई भी इस बातचीत में मुंह भी दिखाने के लायक नहीं समझा जा रहा है। कांगे्रस का जो बड़बोड़ा प्रवक्ता तकरीबन पूरे वक्त पार्टी की तरफ से हिन्दी और अंगे्रजी दोनों में टीवी पर छाया रहता था, वह भी अन्ना हजारे का नाम लेकर गाली-गलौच करने के बाद अब पार्टी की तरफ से शायद फिलहाल गुमनामी पर भेज दिया गया है। ऐसे में सरकार नए चेहरे अब अन्ना के पुराने चेहरों से जूझ रहे हैं, प्रधानमंत्री बेबस और गुमसुम से बैठे हुए हैं और यूपीए-कांगे्रस का घर चलाने वाली अस्पताल के बिस्तर पर अमरीका में है।
आज का पूरा सिलसिला लोकतंत्र के लिए एक गहरे सबक का मौका है कि जब लोकतंत्र के पाए जनता का भरोसा खो बैठते हैं तो फिर वह लोकतंत्र के नाम पर किसी भी किस्म के तंत्र को सिर-आंखों पर बिठा लेती है। हम आज दिल्ली में चल रही सौदेबाजी या समझौते की बारीकियों पर नहीं जा रहे लेकिन इस बात को लेकर हम फिक्रमंद हैं कि लाईफ-पाइंट पर मांगें पूरी करवाने का अगला सिलसिला कौन लेकर आएगा और किस मुद्दे को लेकर आएगा? और उस दिन यह सरकार या उस दिन की कोई दूसरी सरकार कैसे यह तय करेगी कि वह अगली जिंदगी जो उस दिन दांव पर लगी रहेगी वह अन्ना की जिंदगी से कम कीमती रहेगी या अधिक कीमती रहेगी?
फिलहाल दिल्ली और बाकी देश गली-गली जिस किस्म की शोहरती-शहादत को देख रहे हैं, वह बड़ा दिलचस्प सिलसिला है।

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