13 अगस्त
हर बरस राखी के दिन हमारे अखबार के दफ्तर में फोटोग्राफर जेल के बाहर ली गई सैकड़ों तस्वीरें लेकर आते हैं जिनमें कैदियों को राखी बांधने उनके परिवार के लोग बच्चों सहित पहुंचते हैं। कुछ नासमझ बच्चे इस मौके पर भी मिठाई, राखी और तिलक के साथ-साथ वहां बंद अपने परिवार के किसी को देखकर मुस्कुराते हुए भी कैमरों में कैद हो जाते हैं। लेकिन इस मौके पर इतनी आंखें भीगी हुई दिखती हैं, बरसते हुए दिखती हैं, जेल का अहाता गीला सा लगने लगता है। जेलों में बंद कैदियों के घर और काम-धंधे से परे रहने की वजह से उनका परिवार बैठे-बैठे कुचल जाता है। कैसे उनका काम चलता होगा यह सोच पाना भी मुश्किल है।
लेकिन आज यह बात इस जगह लिखने की जरूरत इसलिए लगी कि कल भारत की एक अदालत ने देश के सबसे बड़े इंकम टैक्स चोर और कालेधन की अफरा-तफरी करने वाले हसन अली को जमानत दे दी है। दूसरी तरफ देश भर की जेलों में जो साधारण कैदी बंद हैं वे अपनी सुनवाई भी शुरू होने के पहले या अदालती फैसला आने के पहले बिना जमानत जेल में इतनी कैद काट चुके रहते हैं कि सजा सुनाई जाने पर वे तुरंत छूट जाते हैं। आज जो तस्वीरें हम देख रहे हैं उनमें जाहिर तौर पर बहुत ही छोटे-छोटे घरों के बहुत गरीब या मामूली लोग ही हैं, लोगों के त्यौहार के दिन कपड़े भी उनकी माली हालत बता देते हैं। जिस हसन अली ने 800000000 (80 हजार करोड़) की टैक्स चोरी और काले धन का हवाला कारोबार किया वह कुल 5 लाख की जमानत पर जेल के बाहर है। भारत के लोकतंत्र में जिस न्यायपालिका को आजाद माना जाता है वह ताकतवर और दौलतमंद तबके की बंधुआ मजदूर की तरह है। जिसके पास थाने से लेकर जांच अफसर और वकील तक, अदालत के बाबू से लेकर जजों तक, गवाहों से लेकर सुबूतों तक में से बिकने वाले लोगों को खरीदने की ताकत हो, उनके मामले तो उनके पसंदीदा किनारे तक पहुंच जाते हैं। जहां ताकतवर की दिलचस्पी फैसले में नहीं होती वहां पर मामले अदालत की मंझधार में लंगर डाली हुई नाव की तरह पड़े रहते हैं। छोटे-छोटे से मामलों में लोग जेलों में बिना जमानत पड़े रहते हैं क्योंकि उनके पास न वकील है न जमानतदार। ऐसे में कोई हैरानी नहीं कि बहुत से लोग अपने इलाके के किसी माफिया या मवाली के दरबार में जाकर इंसाफ की दुहाई देने लगते हैं, और ऐसे बहुत से मामलों में मवाली किसी किस्म का फैसला देकर उस पर आनन-फानन अमल भी करवा देते हैं।
राखी का यह वक्त चूंकि देश की आजादी की सालगिरह के साथ ही आया है इसलिए हम जेल के बाहर के दिल को हिला देने वाले नजारे के साथ-साथ इस आजादी के मायने को भी जोड़कर देख रहे हैं। हम अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की जुबान के बिना भी अपनी तरफ से यह सवाल रख रहे हैं कि यह आजादी मिली किसको है? सिर्फ उसे जो कि इस आजादी के तहत अपने को मिले हुए तमाम हक को सौ गुना अधिक इस्तेमाल कर सके और दूसरों के हक को अपने जूतों तले रौंद सके? क्या यही आजादी है? नेता, अफसर और हिन्दुस्तान के बाकी तमाम ताकतवर तबके इस आजादी को एक सीधी गाय की तरह इतना दुह रहे हैं कि दूध के बाद उसका लहू भी निकल आ रहा है और बछड़े की बारी तब भी नहीं आ रही है। यह एक भयानक हालत है कि समाज के सबसे गरीब, सबसे कमजोर लोग भारत की न्याय व्यवस्था का शिकार होकर अपने घरों को भूखा मरते छोड़कर जेलों में हैं, और जिन्हें जेलों में होना चाहिए वे संसद और विधानसभाओं में हैं, वे सरकारें चला रहे हैं, वे सलामी ले रहे हैं और अपनी गाडिय़ों पर देश का झंडा लगाकर एक अपराध से दूसरे अपराध की तरफ बढ़ रहे हैं। यह सिलसिला इतना भयानक है कि आजादी की सालगिरह पर सिर्फ इसी बात पर सोचने की जरूरत हमें लगती है कि आम इंसान किस कदर गुठली हो गया है और आम का सारा गूदा खास मुजरिम तबका ताकत की जगहों पर बैठा हुआ खा रहा है।
इस देश की संसद बीते बरसों में धीरे-धीरे करोड़पतियों और अरबपतियों से भर गई है। विधानसभाएं तो संसद को देख-देखकर चलती हैं और उन्होंने भी धीरे-धीरे गरीबों को बाहर करना तेज कर दिया है। गरीब संसदीय संस्थाओं से बाहर और जेलों के भीतर हो गए हैं जहां वे अपनी जमानत को खरीद नहीं पाते। ऐसी संसद और ऐसी विधानसभाएं गरीब के हक के लिए कोई कानून बनाने या बने हुए कानून को लागू करवाने का काम नहीं कर सकतीं, और यही वजह है कि फूलन से लेकर नक्सलियों तक, कई किस्म के इंसाफ बाजार में आते रहते हैं। पिछले दिनों हमने ब्रिटेन में अचानक हुई भयानक लूटपाट पर लिखते हुए यह चर्चा की थी कि भारत के लोगों को ब्रिटेन की बढ़ती हुई आर्थिक असमानता और घटते हुए जनकल्याण कार्यक्रमों के नतीजे से सबक लेना चाहिए। लेकिन भारत की सभी ताकतवर संवैधानिक और सरकारी संस्थाएं आज धनपशुओं की मालिश करके उन्हें रेस के लायक तैयार करने में लगी हुई हैं। इसी का नतीजा है कि छोटी गलतियां करने वाले गरीबों को उनके अदालती मामलों का फैसला होने के पहले बरसों तक उनकी बहनें राखी बांधने जेल जाती हैं, और ताकतवर हत्यारों के खिलाफ अदालती आदेश पर भी पुलिस रिपोर्ट तक दर्ज नहीं करती है। राखी से शुरू हुई हमारी यह बात स्वतंत्रता दिवस की छुट्टी के दिन लोगों के बीच आगे बढ़े, इसलिए हम आज इन दो बातों को मिलाकर यहां लिख रहे हैं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें