21 अगस्त 11
आंध्र में कांगे्रस से बगावत करके अलग राजनीति करने वाले जगन मोहन रेड्डी के साम्राज्य का अदालत के आदेश के बाद सीबीआई के छापे पड़े जबकि बगावत के बाद भी कांगे्रस अगुवाई के तहत काम करने वाली सीबीआई ऐसा कर सकती थी। लेकिन राजनीतिक दबाव में काम करने के तमाम आरोपों के बीच भी सीबीआई ने ऐसा किया नहीं। बाद में अदालत ने नाराजगी के साथ सीबीआई को जांच के लिए कहा और उसके तहत ही अभी के ये छापे पड़े। लेकिन इन छापों में जो बात सामने आई उनमें एक यह भी है कि अपने कांगे्रसी मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी के वक्त का जो महलनुमा मकान जगन रेड्डी को विरासत में मिला है वह साढ़े तीन सौ करोड़ कीमत का पाया गया है।
वाईएसआर रेड्डी एक हेलीकॉप्टर हादसे में मारे जाने के ठीक पहले तक कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी के वफादार, करीबी और भरोसेमंद लोगों में से एक थे। उनकी मौत के बाद अब यह दिखाई पड़ रहा है कि किस तरह वे हजारों करोड़ की दौलत छोड़कर गए हैं। आज कांगे्रस के लिए यह एक फिक्र की बात हो सकती है कि इतनी बड़ी संपत्ति वाला कोई भूतपूर्व कांगे्रसी और वर्तमान प्रतिद्वंद्वी अगले चुनावों में कांगे्रस को टक्कर देने के लिए न सिर्फ आंध्र में बल्कि कुछ दूसरे प्रदेशों में भी तैयारी शुरू कर चुका है। आखिर इतनी दौलत कोई बिना किसी सार्वजनिक चर्चा के तो जुटा नहीं सकता। क्या कांगे्रस हाईकमान को अपने अलग-अलग मुख्यमंत्रियों और जैसा कि हाल में साबित हुआ है यूपीए के मंत्रियों और कांगे्रस के कलमाडिय़ों की काली कमाई उस वक्त नहीं दिखती जिस वक्त वे लूटपाट में लगे रहते हैं? यह आरोप रेड्डी पर तब से लगते रहते हैं जब उनके मुख्यमंत्री रहते हुए उनका बेटा अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए सत्ता की ताकत का इस्तेमाल कर रहा था। कमोबेेश इसी किस्म की अनदेखी कर्नाटक में भाजपा हाईकमान अपने मुख्यमंत्री येद्दी की कर रही थी। इस तरह कांगे्रस के रेड्डी और भाजपा के येद्दी, ये इतनी ताकत जुटा चुके थे कि आंध्र में कांगे्रसी मुख्यमंत्री का बेटा सीधे सोनिया को ललकार रहा है और आंध्र में भाजपा का मुख्यमंत्री अपने भ्रष्टाचार के पकड़ाए जाने के बाद भी अगला मुख्यमंत्री तय कर रहा है। यह कुछ उसी किस्म का हुआ कि चोर तय करे कि अगला थानेदार कौन होगा?
हमारा यह भी मानना है कि राजनीति और सत्ता की काली कमाई का एक बहुत थोड़ा हिस्सा ही कोई भी जांच एजेंसी पकड़ पाती है और अधिकतर दौलत बेनामी और गुमनामी ही बनी रह जाती है। ऐसे में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावनाओं की जो लहर आज देश में चल रही है उसके तहत क्या सिर्फ एक लोकपाल के मुद्दे को लेकर या सिर्फ यूपीए सरकार को लेकर ही लड़ाई लड़ी जाए या फिर जगह-जगह लोग अपने स्तर पर भी यह मुद्दा उठाएं कि सत्ता के वटवृक्ष के नीचे बैठकर सत्ता के कारोबारी इतना धन कैसे कमा रहे हैं? लोगों को अपने-अपने शहर में यह काम करना होगा और तभी जाकर एक सार्वजनिक दबाव सरकारों पर या राजनीतिक दलों पर पड़ेगा। आज जरा देर के लिए जिस तरह से लोग अन्ना हजारे के अभियान का साथ देते हुए सड़कों पर निकले हैं, उसे देखते हुए भी कुछ लोग हंस रहे हैं कि हर किस्म के टैक्स चोर, रिश्वत देने वाले और भ्रष्ट लोग झंडे-बैनर लेकर चल रहे हैं। अगर यही लोग तय कर लें कि वे रिश्वत नहीं देंगे तो भी भ्रष्टाचार कुछ कम हो जाएगा। ऐसे तमाम जुलूस दूर दिल्ली के भ्रष्टाचार पर हमले को आसान पाते हैं। जब अपने आसपास के भ्रष्टाचार पर हमले की बात आती है तो सारे झंडे-डंडे और बैनर दुबक जाते हैं। अगर समय रहते हैदराबाद और बेंगलुरू में इन मुख्यमंत्रियों के भ्रष्टाचार का विरोध होता, इनकी पार्टियों के दिल्ली में बैठे नेता इनके भ्रष्टाचार पर लगाम लगाते तो आज अपनी-अपनी पार्टी के भीतर ये एक-एक राक्षस का सामना नहीं करते होते और ये दोनों राज्य लुटने से बच गए होते।
हम अभी लोकपाल या ऐसे किसी विधेयक की बात नहीं कर रहे, हम बरसों से यह बात लिखते आ रहे हैं कि देश को एक ऐसी खुफिया एजेंसी की जरूरत है जो कि आर्थिक अपराध और सरकारी भ्रष्टाचार पर नजर रख सके और समय रहते लूट, डकैती को रोका जा सके। जब पूरा खेत ऐसे नेता चर जाते हैं तो फिर उस खेत में लगे हुए दानों को गिनने से क्या हासिल होता है? भ्रष्टाचार के पहले ही उसे रोकने का इंतजाम होना चाहिए और पिछले दो-चार दिनों में देश के कुछ समझदार लोगों ने रामलीला मैदान के नारों से परे यह कहा है कि देश का सरकारी ढांचा ऐसा बदलना होगा कि उसमें भ्रष्टाचार की गुंजाइश न निकले। पूरा का पूरा लोकपाल भ्रष्टाचार के बाद के हिसाब से है जो कि जांच और कार्रवाई का काम करेगा। इस देश को एक निगरानी एजेंसी की जरूरत है जो कि साढ़े तीन सौ करोड़ के महल बनने के पहले, जमीन और नींव के स्तर पर ही देख ले कि यह पैसा आ कहां से रहा है। भ्रष्टाचार और काली कमाई के इस्तेमाल के मामले में यह देश बहुत ही बेशर्म हो चुका है और इस हाल को बदलने की जरूरत है।
आंध्र में कांगे्रस से बगावत करके अलग राजनीति करने वाले जगन मोहन रेड्डी के साम्राज्य का अदालत के आदेश के बाद सीबीआई के छापे पड़े जबकि बगावत के बाद भी कांगे्रस अगुवाई के तहत काम करने वाली सीबीआई ऐसा कर सकती थी। लेकिन राजनीतिक दबाव में काम करने के तमाम आरोपों के बीच भी सीबीआई ने ऐसा किया नहीं। बाद में अदालत ने नाराजगी के साथ सीबीआई को जांच के लिए कहा और उसके तहत ही अभी के ये छापे पड़े। लेकिन इन छापों में जो बात सामने आई उनमें एक यह भी है कि अपने कांगे्रसी मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी के वक्त का जो महलनुमा मकान जगन रेड्डी को विरासत में मिला है वह साढ़े तीन सौ करोड़ कीमत का पाया गया है।
वाईएसआर रेड्डी एक हेलीकॉप्टर हादसे में मारे जाने के ठीक पहले तक कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी के वफादार, करीबी और भरोसेमंद लोगों में से एक थे। उनकी मौत के बाद अब यह दिखाई पड़ रहा है कि किस तरह वे हजारों करोड़ की दौलत छोड़कर गए हैं। आज कांगे्रस के लिए यह एक फिक्र की बात हो सकती है कि इतनी बड़ी संपत्ति वाला कोई भूतपूर्व कांगे्रसी और वर्तमान प्रतिद्वंद्वी अगले चुनावों में कांगे्रस को टक्कर देने के लिए न सिर्फ आंध्र में बल्कि कुछ दूसरे प्रदेशों में भी तैयारी शुरू कर चुका है। आखिर इतनी दौलत कोई बिना किसी सार्वजनिक चर्चा के तो जुटा नहीं सकता। क्या कांगे्रस हाईकमान को अपने अलग-अलग मुख्यमंत्रियों और जैसा कि हाल में साबित हुआ है यूपीए के मंत्रियों और कांगे्रस के कलमाडिय़ों की काली कमाई उस वक्त नहीं दिखती जिस वक्त वे लूटपाट में लगे रहते हैं? यह आरोप रेड्डी पर तब से लगते रहते हैं जब उनके मुख्यमंत्री रहते हुए उनका बेटा अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए सत्ता की ताकत का इस्तेमाल कर रहा था। कमोबेेश इसी किस्म की अनदेखी कर्नाटक में भाजपा हाईकमान अपने मुख्यमंत्री येद्दी की कर रही थी। इस तरह कांगे्रस के रेड्डी और भाजपा के येद्दी, ये इतनी ताकत जुटा चुके थे कि आंध्र में कांगे्रसी मुख्यमंत्री का बेटा सीधे सोनिया को ललकार रहा है और आंध्र में भाजपा का मुख्यमंत्री अपने भ्रष्टाचार के पकड़ाए जाने के बाद भी अगला मुख्यमंत्री तय कर रहा है। यह कुछ उसी किस्म का हुआ कि चोर तय करे कि अगला थानेदार कौन होगा?
हमारा यह भी मानना है कि राजनीति और सत्ता की काली कमाई का एक बहुत थोड़ा हिस्सा ही कोई भी जांच एजेंसी पकड़ पाती है और अधिकतर दौलत बेनामी और गुमनामी ही बनी रह जाती है। ऐसे में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावनाओं की जो लहर आज देश में चल रही है उसके तहत क्या सिर्फ एक लोकपाल के मुद्दे को लेकर या सिर्फ यूपीए सरकार को लेकर ही लड़ाई लड़ी जाए या फिर जगह-जगह लोग अपने स्तर पर भी यह मुद्दा उठाएं कि सत्ता के वटवृक्ष के नीचे बैठकर सत्ता के कारोबारी इतना धन कैसे कमा रहे हैं? लोगों को अपने-अपने शहर में यह काम करना होगा और तभी जाकर एक सार्वजनिक दबाव सरकारों पर या राजनीतिक दलों पर पड़ेगा। आज जरा देर के लिए जिस तरह से लोग अन्ना हजारे के अभियान का साथ देते हुए सड़कों पर निकले हैं, उसे देखते हुए भी कुछ लोग हंस रहे हैं कि हर किस्म के टैक्स चोर, रिश्वत देने वाले और भ्रष्ट लोग झंडे-बैनर लेकर चल रहे हैं। अगर यही लोग तय कर लें कि वे रिश्वत नहीं देंगे तो भी भ्रष्टाचार कुछ कम हो जाएगा। ऐसे तमाम जुलूस दूर दिल्ली के भ्रष्टाचार पर हमले को आसान पाते हैं। जब अपने आसपास के भ्रष्टाचार पर हमले की बात आती है तो सारे झंडे-डंडे और बैनर दुबक जाते हैं। अगर समय रहते हैदराबाद और बेंगलुरू में इन मुख्यमंत्रियों के भ्रष्टाचार का विरोध होता, इनकी पार्टियों के दिल्ली में बैठे नेता इनके भ्रष्टाचार पर लगाम लगाते तो आज अपनी-अपनी पार्टी के भीतर ये एक-एक राक्षस का सामना नहीं करते होते और ये दोनों राज्य लुटने से बच गए होते।
हम अभी लोकपाल या ऐसे किसी विधेयक की बात नहीं कर रहे, हम बरसों से यह बात लिखते आ रहे हैं कि देश को एक ऐसी खुफिया एजेंसी की जरूरत है जो कि आर्थिक अपराध और सरकारी भ्रष्टाचार पर नजर रख सके और समय रहते लूट, डकैती को रोका जा सके। जब पूरा खेत ऐसे नेता चर जाते हैं तो फिर उस खेत में लगे हुए दानों को गिनने से क्या हासिल होता है? भ्रष्टाचार के पहले ही उसे रोकने का इंतजाम होना चाहिए और पिछले दो-चार दिनों में देश के कुछ समझदार लोगों ने रामलीला मैदान के नारों से परे यह कहा है कि देश का सरकारी ढांचा ऐसा बदलना होगा कि उसमें भ्रष्टाचार की गुंजाइश न निकले। पूरा का पूरा लोकपाल भ्रष्टाचार के बाद के हिसाब से है जो कि जांच और कार्रवाई का काम करेगा। इस देश को एक निगरानी एजेंसी की जरूरत है जो कि साढ़े तीन सौ करोड़ के महल बनने के पहले, जमीन और नींव के स्तर पर ही देख ले कि यह पैसा आ कहां से रहा है। भ्रष्टाचार और काली कमाई के इस्तेमाल के मामले में यह देश बहुत ही बेशर्म हो चुका है और इस हाल को बदलने की जरूरत है।
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