संसद में काम तो करें

8 अगस्त 11
लोकसभा और राज्यसभा दोनों की कार्रवाई आज फिर स्थगित हो गई। पिछले कुछ दिनों से लगातार यही सिलसिला चल रहा है और देश इस तमाशे को देखकर थक गया है। हमने अभी कुछ दिन पहले ही इस बारे में लिखा था कि एक तरफ अन्ना और बाबा संसद के कानून बनाने के हक का इस्तेमाल सड़क पर करने पर उतारू हैं और दूसरी तरफ विपक्ष है कि संसद के अपने हक का संसदीय इस्तेमाल छोड़कर सड़कछाप शोर-शराबे को ही अपनी संसदीय जिम्मेदारी मान रहा है। फिर यह भी है कि देश की संसद राज्यों की विधानसभाओं या विधान परिषद के लिए एक मिसाल की तरह रहती है और राज्यों की राजधानी में भी सदन ऐसे ही बर्ताव के गवाह बनते हैं।
ऐसा कौन सा वक्त होगा जब संसद के सत्र के पहले के महीनों में केंद्र सरकार के कई मामले विपक्ष को नापसंद नहीं होंगे? इसलिए ऐसे मामलों को लेकर स्थगन तो हमेशा ही हो सकता है, सदन छोड़कर विपक्ष जब चाहे तब जा सकता है, सदन के भीतर नारेबाजी में भी वक्त गंवाया जा सकता है, लेकिन हम अपने राज्य के विधानसभा के विपक्ष के लिए भी हमेशा से यही बात लिखते आए हैं कि सदन का समय संसदीय चर्चा में इस्तेमाल होना चाहिए और हम नारेबाजी को संसदीय चर्चा नहीं मानते। आज न सिर्फ लोकपाल बिल बल्कि बहुत से दूसरे विधेयक संसद की कतार में लगे हुए हैं। ऐसे बहुत से मामलों को छोड़कर किसी एक इस्तीफे के लिए या किसी और मुद्दे पर सदन को रोक देना बहुत ही नाजायज है। भारत की संसदीय कार्रवाई में हमने देश और प्रदेश की राजधानियों में यह देखा है कि विपक्ष संसदीय चर्चा के बजाय अपने मतदाताओं तक यह असर भेजने की कोशिश करता है कि कुछ या कई मुद्दों पर उसने सदन को रोककर रख दिया। ऐसा लगता है कि विपक्ष का हाथ जनता की नब्ज पर से पूरी तरह हट चुका है और उसे लगता है कि जनता हो-हल्ले को पसंद करती है। जहां पर जो पार्टी विपक्ष हो उससे हमारा यही कहना है कि उसके लोगों को जनता में चुनकर इसलिए भेजा है कि वे लोग अपनी संसदीय जिम्मेदारी पूरी करें, नारेबाजी और हल्ला-गुल्ला करने का काम तो चुनाव न लडऩे वाली जनता भी सड़कों पर खुद कर सकती है, कर लेती है। सदन में चर्चा न करने के लिए एक-एक सांसद पर करोड़ों रुपए साल का खर्च न्यायोचित नहीं दिखता। यहां कई बातें हम कुछ ही दिन पहले लिख चुके हैं कि किस तरह भारतीय संसद के काम के दिन वैसे भी उस ब्रिटिश संसद से बहुत कम हैं जिसके नक्शेकदम पर यह बनी है।
छत्तीसगढ़ में विधानसभा का सत्र आने वाला है। उसके दिन वैसे भी बहुत कम दिख रहे हैं। ऐसे में विपक्ष को पहले तो दिन बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए और फिर उन दिनों में काम के घंटे अधिक करने की कोशिश करना चाहिए, और इसके बाद सदन की कार्रवाई का एक-एक मिनट बिना शोर-शराबे गंभीर मुद्दों को गंभीरता से उठाकर सरकार को उसकी गलतियों के लिए घेरने में इस्तेमाल करना चाहिए। लेकिन चाहे जो पार्टी विपक्ष में रही हों, मध्यप्रदेश के दिनों से लेकर अब तक भोपाल और रायपुर में हमने विधानसभा के वक्त का अच्छा विपक्षी उपयोग नहीं देखा है। हम किसी तरह की कटुता नहीं सुझा रहे, लेकिन भारत जैसे देश में हर प्रदेश में बहुत सारे ऐसे मुद्दे हमेशा ही रहेंगे, सरकार की बहुत सारी गलतियां हमेशा ही रहेंगी जिन पर गंभीर चर्चा जनहित में जरूरी होगी।
पांच बरस के लिए सांसद या विधायक बनने वाले लोग अगर हिसाब करें कि कुल जमा कितना समय वे सदन की कार्रवाई में लगाते हैं तो यह वक्त कॉलेज में पढऩे वाले बच्चों के पढ़ाई के घंटों से भी कम निकलेगा जिनके बारे में अब यह सच स्थापित हो चुका है कि पढ़ाई झंडे से झंडे तक होती है, यानी पन्द्रह अगस्त से छब्बीस जनवरी तक। लेकिन यह एक पूरे वक्त काम करने वाले जनप्रतिनिधि के लिए कोई बड़ी उत्पादक बात नहीं है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि पूरे वक्त पढ़ाई करने वाले बच्चों के लिए साल भर में पांच महीनों में कुछ घंटे रोज की पढ़ाई काफी नहीं है। ऐसा भी नहीं कि सांसद या विधायक अपने चुनाव क्षेत्र या अपने मनोनयन के प्रदेश में बहुत अधिक मेहनत करते हों। जब राष्ट्रपति कुछ हफ्ते पहले छत्तीसगढ़ में आई थीं तो उनके भाषण की कुछ लाईनों को लेकर हमने इसी जगह संपादकीय लिखा था। उन्होंने विधानसभा के भीतर विधायकों से कहा था-विधानसभा सत्रों के बीच का वक्त अपने क्षेत्र की जनता की आकांक्षाओं को जानने में लगाना चाहिए और बाद में उन्हें पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए।
अब अगर हम सोचें कि आज संसद में हल्ला कर रहे सांसदों में से, और सत्ता पक्ष में बैठे हमले का निशाना सांसदों में से कितने ऐसे हैं जो कि अपनी जनता की आकांक्षाओं को जानने की कोशिश पिछले संसद सत्र के बाद से अब तक कर पाए हैं, तो हमें किसी बहुत अच्छे नतीजे की उम्मीद नहीं बंधती। आज हम यहां पर संसद और विधानसभाओं से यह अपील करना चाहते हैं कि वे संसद को सड़क न बनाएं, क्योंकि देश की जनता की भावनाओं को उकसाकर कुछ लोग सड़क को संसद बनाने में तो लगे ही हुए हैं।

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