ऐसे घमंडी और हमलावर तेवर भाजपा को हमेशा विपक्ष में रखेंगे

12 अगस्त
फिल्म उद्योग से जुड़े हुए लेकिन वामपंथी विचारधारा के गीतकार और लेखक जावेद अख्तर ने अनौपचारिक रूप से वामपंथी सांसदों से यह अपील की है कि वे यूपीए-कांग्रेस सरकार का विरोध करते हुए भाजपा का साथ न दे बैठें। कल ही इसके बाद वामपंथी दलों की ओर से लोकसभा में विपक्ष और भाजपा की नेता सुषमा स्वराज के एक बयान पर वामपंथी उबल पड़े। सुषमा स्वराज ने यह बयान दिया कि भाजपा रोजाना यह तय करेगी कि उस दिन संसद को चलने दिया जाए या नहीं।
इस बयान को न सिर्फ अहंकारी बल्कि संसद के महत्व को खत्म करने वाला करार देते हुए वामपंथी दलों ने कहा- कि हम वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष विपक्षी दल इस बयान पर कड़ी आपत्ति करते हैं। वामपंथियों ने कहा कि घमंड से भरा यह बयान ऐसा लगता है कि मानो विपक्ष की पूरी जगह सिर्फ भाजपा के लिए तय है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता गुरुदास दास गुप्ता ने कहा कि एनडीए की पार्टियां भी इसके लिए तैयार नहीं हैं और एनडीए के मुखिया शरद यादव ने इस बयान से अपने आपको अलग कर लिया है।
सुषमा स्वराज का यह बयान और उस पर बाकी लोगों की यह प्रतिक्रिया उसी सिलसिले की एक कड़ी की तरह है जो कि हम पिछले दस दिनों में दो बार इसी जगह लिखकर संसद के बहिष्कार का विरोध कर चुके हैं। हमें यह देखकर भी हैरानी हुई कि एक तरफ तो भाजपा के सांसद संसद के भीतर से बाहर भागने की फिराक में रहे और दूसरी तरफ भाजपा के नौजवान संसद के बाहर प्रदर्शन करते हुए संसद के भीतर घुसने की कोशिश करते रहे। यह एक अजीब सी बात है कि संसद सड़क सा बर्ताव करे और इसी देश में इन्हीं दिनों सड़क पर आंदोलन कर रहे अन्ना हजारे और उनके साथी सड़क को संसद की तरह कानून बनाने की जगह मान लें। यह नौबत बिल्कुल ही ठीक नहीं है और हम इसे वामपंथी दलों की ओर से जिम्मेदारी का एक बर्ताव मानते हैं कि उन्होंने यूपीए सरकार का विरोध जारी रखते हुए भी ऐसा अंधा विरोध नहीं किया कि वे भाजपा के घमंड में साथी हो जाएं। पिछले कई महीनों में सुषमा स्वराज ने भाजपा के लिए दिक्कतें खड़ी करने वाली बातें की हैं और काम किए हैं। राजघाट पर अनशन के दौरान देर रात चाहे किसी राष्ट्रीय गाने पर ही सुषमा स्वराज नाची हों, उनके हाव-भाव और उनकी हंसी-ठिठोली टेलीविजन के पर्दे पर दिखने के बाद आम जनता हक्का-बक्का ही रह गई कि बापू की समाधि का ऐसा इस्तेमाल भी कोई कर सकता है? इसलिए आज जब देश के एक प्रमुख समाचार चैनल और एक प्रमुख सामाजिक अध्ययन संस्था का करवाया हुआ सर्वे सामने आया तो हमें यह देखकर हैरानी नहीं हुई कि मतदाताओं में अडवानी-युग के बाद के प्रधानमंत्री पद के भाजपा दावेदार के लिए नरेन्द्र मोदी को सुषमा स्वराज से ऊपर पाया, और भाजपा के भीतर के मतदाताओं ने सुषमा स्वराज के मुकाबले मोदी को करीब दोगुने वोट दिए।
लेकिन मोदी और सुषमा के बीच तुलना आज का मकसद नहीं है, हम आज यहां पर संसद के बचे हुए सत्र के लिए भाजपा को यह सुझाना चाहते हैं कि वह इस विशाल लोकतंत्र का संसदीय समय खराब करना तुरंत बंद करे और देश के बाकी राज्यों में विधानसभाओं के विपक्ष के सामने एक बहुत खराब मिसाल रखना भी बंद करे। हम यहां पर पिछले दिनों लिखी हुई अपनी एक बात को दुहराना चाहेंगे कि ब्रिटिश संसद किस तरह पल-पल का बेहतर इस्तेमाल करते हुए देश की जनता के सामने पार्टियों और सांसदों के तर्क रखती है और वह एक किस्म से देश की जनता का राजनीतिक शिक्षण भी होता है। हिन्दुस्तान में तो संसद को लेकर और देश की जनता के बीच फूहड़ लतीफे चलने लगे हैं कि किस तरह सांसद रियायती खाने के लिए वहां चले जाते हैं, मोटी तनख्वाह और मोटा भत्ता पाते हैं, ऐश करते हैं और संसद की अपनी जिम्मेदारी से दूर भागते हैं क्योंकि उनके पास वहां तर्कपूर्ण बातों के लिए तैयारी नहीं होती। संसद के भीतर की नारेबाजी, वहां का काम छोड़कर बाहर निकल आना हम बहुत बड़ी गैरजिम्मेदारी मानते हैं और एनडीए के गैर भाजपा सांसदों को भी भाजपा के इस निहायत गैरजरूरी हमलावर तेवर पर काबू करने की सलाह देते हैं। आज देश की जनता में यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार से लेकर महाराष्ट्र और दिल्ली की कांग्रेस सरकारों, कर्नाटक की भाजपा सरकार तक के खिलाफ एक नफरत फैली हुई है। लोग यह मानकर चल रहे हैं कि सत्ता पर बैठे हुए अधिकतर लोग लूटपाट में लगे हैं। ऐसे में अगर संसद के भीतर जिम्मेदारी से देश के मुद्दों को उठाने और उन पर सत्ता को घेरने के बजाय अगर सिर्फ बहिष्कार और बहिर्गमन चलता रहेगा, तो जनता को इस बात का पूरा अहसास है कि उसके चुने हुए सांसद और उनकी पार्टियां उसके साथ साफ-साफ धोखाधड़ी कर रही हैं। इस विशाल भारतीय लोकतंत्र को लोग चाहे कितना गौरवशाली कहकर खुश होते हों, आज यह बात साफ है कि ऐसा संसदीय बर्ताव न तो इस संसद की गरिमा को बढ़ा रहा है और न ही देश के लोकतंत्र की गरिमा को। भाजपा को भी अपनी इस नेता के बयान के बारे में सोचना चाहिए कि क्या पूरी पार्टी सत्ता के विरोध के लिए इस कदर अहंकारी होकर जनता के बीच जा सकेगी? एक तरफ तो मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी अपनी सरकार और अपनी पार्टी पर लगी हुई कालिख के बावजूद अपनी विनम्रता के लिए अब भी जनता में लोकप्रिय हैं, दूसरी तरफ बरसों से बिना सरकारी जिम्मेदारी सिर्फ विपक्ष चलाते हुए भी सुषमा स्वराज लोकप्रिय क्यों नहीं हैं इस पर उन्हें और उनकी पार्टी को सोचना चाहिए।
चलते-चलते हम यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि आज सीएसडीएस का देश के हाल पर जो सर्वे आया है उसमें सबसे ऊपर ऐसे दो मुख्यमंत्री हैं जो गैरजरूरी बात कहे बिना, बिना किसी घमंड के अच्छी तरह अपना काम कर रहे हैं और बिहार और छत्तीसगढ़ को देश में सबसे ऊपर ला रहे हैं। पिछले चुनावों में विनम्र लोगों की जीत को देखते हुए भी अगर भाजपा के बाकी नेता कुछ नहीं समझ रहे हैं तो फिर उनके हमलावर तेवर उन्हें स्थायी रूप से विपक्ष का हकदार तो बना ही रहे हैं।

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