5 अगस्त 11
यूपीए और कांगे्रस की मुखिया सोनिया गांधी के अमरीका के एक कैंसर अस्पताल में ऑपरेशन होने की खबर है। इसकी कुछ जानकारी अलग-अलग समाचार माध्यमों से आ रही है लेकिन कांगे्रस पार्टी ने एक बयान में सिर्फ इतना कहा है कि चार अगस्त को उनकी सर्जरी हुई है जो कि सफल रही और वे अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ पा रही हैं। कांगे्रस प्रवक्त ने यह भी कहा है कि यह एक निजी मामला है जो कि उनकी सेहत और इलाज से जुड़ा हुआ है और उनके परिवार ने इस बारे में लोगों से अधिक दखल न देने की अपील की है।
हमें ऐसे कई मौकों पर बहुत हैरानी होती है जब किसी अस्पताल का कोई प्रवक्ता या किसी मशहूर मरीज का इलाज कर रहा डॉक्टर रोजाना एक या अधिक बार सेहत के बारे में बुलेटिन जारी करता है। किसी के इलाज के बहुत बारीक खुलासे से हमारा यह मानना है कि लोगों का निजी जिंदगी का हक छिनता है और इससे हर किसी को बचना चाहिए। कुछ लोग यह जरूर मान सकते हैं कि देश के बड़े नेताओं की सेहत का हाल जानने जनता का हक रहता है और कुछ लोग यह भी मान सकते हैं कि किसी कंपनी के मुखिया का हाल जानना उसके शेयर होल्डरों का हक हो सकता है लेकिन हम ऐसे तमाम मामलों में उस वक्त तक सार्वजनिक दखल के खिलाफ हैं जब तक कि सेहत के आधार पर नोट या वोट न जुटाए गए हों। मतलब यह कि न तो किसी की सेहत की कभी गारंटी हो सकती और न ही किसी की जिंदगी की। अगर वोट का पूंजी निवेश करने वाले लोग यह जान भी जाएं कि उसके मुखिया की सेहत ठीक नहीं है तो भी वे अगले चुनाव के पहले इस बारे में क्या कर सकते हैं? इसके उल्टे शेयर बाजार में दिन के कई घंटे पल-पल होने वाले उतार-चढ़ाव की वजह से कोई यह उम्मीद तो कर सकता है कि किसी बड़े कारखानेदार की सेहत ठीक न रहने पर उसमें पैसा लगाने वाले लोग पैसा वहां से निकाल सकते हैं। हम यह नहीं जानते कि शेयर बाजार से पूंजी जुटाने वाली कंपनियों के सामने यह बेबसी या बंदिश रहती है या नहीं कि कंपनी के मुखिया की सेहत की जानकारी वे शेयर होल्डरों को दें या नहीं, लेकिन हमारा मानना है कि कंपनी के मुखिया की सेहत उसकी अपनी निजी जिंदगी की बात होती है और उसे कारोबार से परे रखने का उसका हक होना चाहिए।
लेकिन आज हम पूरी बात इसी पर खत्म करना नहीं चाहते हैं। सोनिया गांधी के इस ऑपरेशन से जुड़ी एक दूसरी बात यह है कि कुछ हफ्ते उनकी गैरमौजूदगी में कांगे्रस पार्टी को चलाने के लिए जिन चार लोगों को जिम्मा दिया गया है उनमें उनके बेटे राहुल भी एक हैं। यूं तो राहुल पिछले कई बरसों से लोकसभा के निर्वाचित सदस्य हैं और वे लगातार उत्तरप्रदेश में जमीनी राजनीति में सक्रिय हैं। लेकिन इस मौके पर बनी चार लोगों की कमेटी में राहुल गांधी का नाम इस मायने में अजीब लगता है कि पार्टी के स्तर पर भी बहुत से दूसरे नेता अनुभव और समझ में उनसे बहुत आगे हैं। और इस मौके पर अगर कांगे्रस सदस्य सोनिया गांधी अपने बेटे को ऐसे चार लोगों में से एक बनाया है तो इससे एक बार फिर कांगे्रसी राजनीति में वंशवाद की परंपरा की याद ताजा होती है। कुछ लोगों को यह खटक सकता है कि किसी के इलाज के दौरान उसके फैसले की हम आलोचना कर रहे हैं, लेकिन जहां हम उनके इलाज की जानकारी को उनका निजी और पारिवारिक मामला मानते हुए उसे टिप्पणी से परे मानते हैं, वहीं कांगे्रस पार्टी के बारे में उनके फैसले को हम चर्चा का सामान भी मानते हैं। लोकतंत्र में देश की एक सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी को अपने सार्वजनिक फैसलों के लिए जवाब देने को हमेशा ही तैयार रहना चाहिए। राहुल गांधी के बारे में किसी को यह शक नहीं है कि कांगे्रस के हाथ सत्ता का काबू रहने पर कुछ बरसों में वे प्रधानमंत्री बनाए जा सकते हैं, लेकिन एक तरफ जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पूरे देश से हमले झेलते हुए कमजोर और गैरजिम्मेदार प्रधानमंत्री साबित हो रहे हैं, जब कांगे्रस के चापलूस नेता राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद तक अभी पहुंचा देना चाह रहे हैं तब कांगे्रस पार्टी को सोनिया के लौटने तक चलाने के लिए बनाई चार लोगों की कमेटी में राहुल का रखा जाना एक अलग किस्म का संदेश देता है। यह कांगे्रस पार्टी के भीतर का फैसला है और इस पार्टी पर एक परिवार का राज कोई नई बात नहीं है, और हम इस राज को किसी बाहुबल से जारी रखा गया राज नहीं मानते बल्कि इतिहास गवाह है कि नरसिंह राव की लीडरशिप में जब कांगे्रस पार्टी डूब रही थी तब इस पार्टी में जाकर घर बैठी हुई सोनिया गांधी के पांव पकड़े और उन्हें लाकर डूबते जहाज की कमान टिकाई। इसलिए हम कांगे्रस पार्टी पर एक वंश के राज की बात को थोड़ा सा अलग मानते हैं जिसमें कि पार्टी ने अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जाकर सोनिया गांधी को जबर्दस्ती राजनीति में खींचा। ऐसे में उनका आज यह हक तो बनता है कि वे कब अपने ही मनोनीत प्रधानमंत्री को एक काफी लंबे कार्यकाल के बाद कुर्सी खाली करने को कहें, या फिर इस पारी के पूरे होने के बाद फिर मनमोहन सिंह को मनोनीत न करना तय करें। लेकिन आज देश के सामने सोनिया गांधी की सेहत की दिक्कत के बीच पार्टी को राहुल गांधी और तीन दूसरे कुनबे के वफादार और भरोसेमंद नेताओं के हवाले करना एक बहुत साफ नीति है। इसमें न तो किसी को बहुत हैरान होने की जरूरत है और न ही किसी को इसकी आलोचना का बहुत हक है। सोनिया और राहुल आज भी कांगे्रस पार्टी पर बोझ न होकर उसके लिए वोट जुटाने की असीमित ताकत वाले दो करिश्माई लोग हैं जिनका कोई विकल्प इस पार्टी में नहीं है। ऐसे में इस पार्टी को अपने युवराज की ताजपोशी का यह पहला कदम खुशी मनाने का एक मौका भी देता है जो कि शायद सोनिया गांधी के ठीक होकर लौट आने के बाद इस्तेमाल किया जाएगा। कांगे्रस पार्टी अब औपचारिक रूप से एक अगले नेता को पा चुकी है और वंशवाद की जितनी बातें सार्वजनिक जीवन में चर्चा के लायक मानी जाती हैं, उतनी चर्चा के लायक कांगे्रस को तैयार भी रहना चाहिए।
यूपीए और कांगे्रस की मुखिया सोनिया गांधी के अमरीका के एक कैंसर अस्पताल में ऑपरेशन होने की खबर है। इसकी कुछ जानकारी अलग-अलग समाचार माध्यमों से आ रही है लेकिन कांगे्रस पार्टी ने एक बयान में सिर्फ इतना कहा है कि चार अगस्त को उनकी सर्जरी हुई है जो कि सफल रही और वे अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ पा रही हैं। कांगे्रस प्रवक्त ने यह भी कहा है कि यह एक निजी मामला है जो कि उनकी सेहत और इलाज से जुड़ा हुआ है और उनके परिवार ने इस बारे में लोगों से अधिक दखल न देने की अपील की है।
हमें ऐसे कई मौकों पर बहुत हैरानी होती है जब किसी अस्पताल का कोई प्रवक्ता या किसी मशहूर मरीज का इलाज कर रहा डॉक्टर रोजाना एक या अधिक बार सेहत के बारे में बुलेटिन जारी करता है। किसी के इलाज के बहुत बारीक खुलासे से हमारा यह मानना है कि लोगों का निजी जिंदगी का हक छिनता है और इससे हर किसी को बचना चाहिए। कुछ लोग यह जरूर मान सकते हैं कि देश के बड़े नेताओं की सेहत का हाल जानने जनता का हक रहता है और कुछ लोग यह भी मान सकते हैं कि किसी कंपनी के मुखिया का हाल जानना उसके शेयर होल्डरों का हक हो सकता है लेकिन हम ऐसे तमाम मामलों में उस वक्त तक सार्वजनिक दखल के खिलाफ हैं जब तक कि सेहत के आधार पर नोट या वोट न जुटाए गए हों। मतलब यह कि न तो किसी की सेहत की कभी गारंटी हो सकती और न ही किसी की जिंदगी की। अगर वोट का पूंजी निवेश करने वाले लोग यह जान भी जाएं कि उसके मुखिया की सेहत ठीक नहीं है तो भी वे अगले चुनाव के पहले इस बारे में क्या कर सकते हैं? इसके उल्टे शेयर बाजार में दिन के कई घंटे पल-पल होने वाले उतार-चढ़ाव की वजह से कोई यह उम्मीद तो कर सकता है कि किसी बड़े कारखानेदार की सेहत ठीक न रहने पर उसमें पैसा लगाने वाले लोग पैसा वहां से निकाल सकते हैं। हम यह नहीं जानते कि शेयर बाजार से पूंजी जुटाने वाली कंपनियों के सामने यह बेबसी या बंदिश रहती है या नहीं कि कंपनी के मुखिया की सेहत की जानकारी वे शेयर होल्डरों को दें या नहीं, लेकिन हमारा मानना है कि कंपनी के मुखिया की सेहत उसकी अपनी निजी जिंदगी की बात होती है और उसे कारोबार से परे रखने का उसका हक होना चाहिए।
लेकिन आज हम पूरी बात इसी पर खत्म करना नहीं चाहते हैं। सोनिया गांधी के इस ऑपरेशन से जुड़ी एक दूसरी बात यह है कि कुछ हफ्ते उनकी गैरमौजूदगी में कांगे्रस पार्टी को चलाने के लिए जिन चार लोगों को जिम्मा दिया गया है उनमें उनके बेटे राहुल भी एक हैं। यूं तो राहुल पिछले कई बरसों से लोकसभा के निर्वाचित सदस्य हैं और वे लगातार उत्तरप्रदेश में जमीनी राजनीति में सक्रिय हैं। लेकिन इस मौके पर बनी चार लोगों की कमेटी में राहुल गांधी का नाम इस मायने में अजीब लगता है कि पार्टी के स्तर पर भी बहुत से दूसरे नेता अनुभव और समझ में उनसे बहुत आगे हैं। और इस मौके पर अगर कांगे्रस सदस्य सोनिया गांधी अपने बेटे को ऐसे चार लोगों में से एक बनाया है तो इससे एक बार फिर कांगे्रसी राजनीति में वंशवाद की परंपरा की याद ताजा होती है। कुछ लोगों को यह खटक सकता है कि किसी के इलाज के दौरान उसके फैसले की हम आलोचना कर रहे हैं, लेकिन जहां हम उनके इलाज की जानकारी को उनका निजी और पारिवारिक मामला मानते हुए उसे टिप्पणी से परे मानते हैं, वहीं कांगे्रस पार्टी के बारे में उनके फैसले को हम चर्चा का सामान भी मानते हैं। लोकतंत्र में देश की एक सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी को अपने सार्वजनिक फैसलों के लिए जवाब देने को हमेशा ही तैयार रहना चाहिए। राहुल गांधी के बारे में किसी को यह शक नहीं है कि कांगे्रस के हाथ सत्ता का काबू रहने पर कुछ बरसों में वे प्रधानमंत्री बनाए जा सकते हैं, लेकिन एक तरफ जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पूरे देश से हमले झेलते हुए कमजोर और गैरजिम्मेदार प्रधानमंत्री साबित हो रहे हैं, जब कांगे्रस के चापलूस नेता राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद तक अभी पहुंचा देना चाह रहे हैं तब कांगे्रस पार्टी को सोनिया के लौटने तक चलाने के लिए बनाई चार लोगों की कमेटी में राहुल का रखा जाना एक अलग किस्म का संदेश देता है। यह कांगे्रस पार्टी के भीतर का फैसला है और इस पार्टी पर एक परिवार का राज कोई नई बात नहीं है, और हम इस राज को किसी बाहुबल से जारी रखा गया राज नहीं मानते बल्कि इतिहास गवाह है कि नरसिंह राव की लीडरशिप में जब कांगे्रस पार्टी डूब रही थी तब इस पार्टी में जाकर घर बैठी हुई सोनिया गांधी के पांव पकड़े और उन्हें लाकर डूबते जहाज की कमान टिकाई। इसलिए हम कांगे्रस पार्टी पर एक वंश के राज की बात को थोड़ा सा अलग मानते हैं जिसमें कि पार्टी ने अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जाकर सोनिया गांधी को जबर्दस्ती राजनीति में खींचा। ऐसे में उनका आज यह हक तो बनता है कि वे कब अपने ही मनोनीत प्रधानमंत्री को एक काफी लंबे कार्यकाल के बाद कुर्सी खाली करने को कहें, या फिर इस पारी के पूरे होने के बाद फिर मनमोहन सिंह को मनोनीत न करना तय करें। लेकिन आज देश के सामने सोनिया गांधी की सेहत की दिक्कत के बीच पार्टी को राहुल गांधी और तीन दूसरे कुनबे के वफादार और भरोसेमंद नेताओं के हवाले करना एक बहुत साफ नीति है। इसमें न तो किसी को बहुत हैरान होने की जरूरत है और न ही किसी को इसकी आलोचना का बहुत हक है। सोनिया और राहुल आज भी कांगे्रस पार्टी पर बोझ न होकर उसके लिए वोट जुटाने की असीमित ताकत वाले दो करिश्माई लोग हैं जिनका कोई विकल्प इस पार्टी में नहीं है। ऐसे में इस पार्टी को अपने युवराज की ताजपोशी का यह पहला कदम खुशी मनाने का एक मौका भी देता है जो कि शायद सोनिया गांधी के ठीक होकर लौट आने के बाद इस्तेमाल किया जाएगा। कांगे्रस पार्टी अब औपचारिक रूप से एक अगले नेता को पा चुकी है और वंशवाद की जितनी बातें सार्वजनिक जीवन में चर्चा के लायक मानी जाती हैं, उतनी चर्चा के लायक कांगे्रस को तैयार भी रहना चाहिए।
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