सड़क पर संसद, संसद में सड़क

1 अगस्त 11
कल जब संसद शुरू होने को थी, उसके ठीक पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जाने किसके सिखाए-पढ़ाए या उकसाए, विपक्ष के बारे में एक ऐसी हमलावर बात कही जो कि उनके मिजाज के ठीक खिलाफ लगती है। वे अब लगातार घोटालों के बीच मौन सहमति देने वाले प्रधानमंत्री के रूप में घिरते चले जा रहे हैं लेकिन फिर भी ऐसा नहीं लगता कि वे अपना आपा खोकर ऐसी बात खुद कहते। उन्होंने कहा कि विपक्ष की अलमारी में बहुत से कंकाल भरे हुए हैं। कहावत और मुहावरे की यह जुबान भाजपा को भड़का गई और इसके बाद राज्यसभा और लोकसभा में विपक्ष के नेता अरूण जेटली और सुषमा स्वराज ने मनमोहन सिंह पर जमकर हमले किए। आज नतीजा यह है कि संसद चल नहीं पा रही और लोग एक-दूसरे पर गुर्राते हुए झपट रहे हैं। देश की जनता निराश हो रही है कि इतनी परेशानियों के बीच भी क्या सांसदों को बात करने के बजाय इस तरह लडऩा चाहिए?
हम सत्ता और विपक्ष इन दोनों के अलग-अलग गिले-शिकवे अनदेखा किए बिना  लोकतंत्र के हित में यह कहना चाहते हैं कि संसद का इस्तेमाल गंभीर बातचीत के लिए होना चाहिए जिसके लिए कि लोगों को चुना जाता है, सांसदों को विशेषाधिकार दिए हैं और गरीबों वाले इस देश में अंधाधुंध खर्च सांसदों और संसद पर किया जाता है। अभी पिछले दिनों जब ब्रिटेन में मीडिया के एक बदनाम मालिक रूपर्ट मर्डोक के पत्रकारों द्वारा लोगों के टेलीफोन में सेंध लगाने का भांडाफोड़ हुआ और एक सदी से अधिक पुराना ब्रिटेन का सबसे बड़ा इतवारी अखबार बंद करना पड़ा तब ब्रिटेन की संसद में इस बात पर पूरे दिन यह बहस चली कि इस अखबार से प्रधानमंत्री के क्या रिश्ते हैं? इसका टीवी प्रसारण जिन भारतीयों ने देखा वे यह देखकर हैरान रह गए होंगे कि किस तरह एक-एक पल का इस्तेमाल करते हुए ब्रिटिश संसद सवाल-जवाब कर रही थी। बारी-बारी से अलग-अलग लोग गिने-चुने शब्दों में तीखे और पैने सवाल कर रहे थे और प्रधानमंत्री एक भी पल गंवाए बिना नपे-तुले शब्दों में तर्कसंगत जवाब दे रहे थे। यह पूरा सिलसिला एक गजब की जुगलबंदी सा लग रहा था कि मानो शास्त्रीय संगीत के किसी कार्यक्रम में सितार और तबले की संगत एक भी पल को खोए बिना चल रही है। इसी ब्रिटिश संसद के नक्शेकदम पर भारत की संसद बनाई गई थी लेकिन यहां हालत यह है कि एक-एक पल को कैसे बर्बाद किया जाए इस पर सत्ता की दिलचस्पी तो रहती ही है ताकि काम की कोई बात यहां पर न हो और सरकार न घिरे। लेकिन हैरानी यह रहती है कि विपक्ष भी साल के गिने-चुने दिन चलने वाले संसद सत्र के कीमती वक्त को लापरवाही से गंवा बैठता है।
हमको लगता है कि संसद की कार्रवाई को दिन ढलने के बाद तक रात तक खींचने की कोशिश विपक्ष को करनी चाहिए ताकि अधिक से अधिक सरकारी खामियों का भांडाफोड़ हो सके। लेकिन एक गंभीर बहस की बजाय विपक्ष वहां हल्ला करने, हंगामा करने और वक्त को बर्बाद करने में लग जाता है जिससे कि लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के उपसभापति को कार्रवाई स्थगित करने का एक कारण मिल जाता है। सदन की कार्रवाई पूरी चल जाने के बाद बाहर निकलकर वहां गांधी प्रतिमा के सामने विपक्ष अपना विरोध प्रदर्शित क्यों नहीं करता? आम जनता की प्रतिक्रिया जिस तरह की संसद के हंगामे पर रहती है उससे लगता है कि संसद को कोई विशेषाधिकार नहीं मिलने चाहिए और काम के घंटों के हिसाब से सांसदों को रोजी मिलनी चाहिए। लेकिन इससे भी जनता की नाराजगी भर दूर होगी देश का कोई काम नहीं होगा। आज तो जब विपक्ष के पास हथियार ही हथियार मौजूद हैं, और सत्ता के पास ढाल के नाम पर थाल भी नसीब नहीं है तब हंगामे में वक्त खराब करना बहुत बड़ी नासमझी है और गैरजिम्मेदारी भी है।
भारतीय संसदीय व्यवस्था एक बड़ी विसंगति से गुजर रही है। एक तरफ अन्ना और बाबा जैसे लोगों की टोली है जो कि संसद की जिम्मेदारी और उसके अधिकारों को सड़क पर इस्तेमाल करना चाहती है। दूसरी तरफ संसद में हथियारों से लैस विपक्ष है जो कि वहां सड़क के आंदोलन की तरह हंगामा कर रहा है। संसद और सड़क, इन दोनों जगहों पर लोगों के काम करने के तौर-तरीकों में एक फर्क रहता है और रहना चाहिए। भारतीय राजनीति में सड़क से संसद तक का नारा कई लोगों ने कई मौकों पर लगाया है, लेकिन आज सड़क और संसद के तौर-तरीकों को लोग जिस तरह से मिलाकर एक कर दे रहे हैं वह बहुत ही निराश करने वाली बात है। एक तो ब्रिटिश संसद के मुकाबले भारत की संसद वैसे भी कम दिन काम करती है। और ऐसे गिने-चुने वक्त को इस जरूरतमंद देश में हंगामे और गैरजरूरी बहस में खराब नहीं करना चाहिए।





 

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