1 अगस्त 11
अभी कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ में एक सामाजिक शोधकर्ता ने अपने काम के सिलसिले में लोगों से यह जानना चाहा कि उनकी जिंदगी में कितनी खुशहाली है। इसके लिए रिसर्च के इस काम में अंगे्रजी के शब्द, सेंस ऑफ वेल बीइंग, का इस्तेमाल किया गया। अभी एक रिपोर्ट आई है कि भारत के लोग दुनिया के सबसे अधिक अवसाद के शिकार (डिप्रेस्ड) लोग हैं, 36 फीसदी। इस मामले में सबसे कम डिपे्रशन चीन के लोगों में पाया गया है, 12 फीसदी। भारत में इतने हताश और निराश होने वाले लोगों की औसत उम्र करीब 32 बरस पाई गई है, और चीन में यह उम्र करीब 19 बरस की है। इन आंकड़ों में बहुत अधिक गए बिना अगर देखें कि भारत के लोग क्यों अवसाद के शिकार होंगे, तो सतह पर तैरते हुए भी इसके इतने सारे कारण दिखते हैं कि जिन्हें दूर करने की कोशिश करके लोगों को अवसाद या निराश-हताशा से कुछ हद तक तो बाहर निकाला ही जा सकता है। हम मनोविज्ञान और चिकित्सा विज्ञान में डिप्रेशन की जो वजह लिखी गई हैं उन पर यहां कोई तकनीकी चर्चा करना नहीं चाहते लेकिन समाज के भीतर लोग यह सोच सकें कि उसके इंसानों और कुल मिलाकर समाज की दिमागी सेहत कैसे बेहतर रहे इसलिए यहां आज यह बात कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ से अगर बात शुरू करें तो यहां पर ब्रिटेन की एक विश्वविद्यालय की शोध छात्रा ने ग्रामीण इलाकों के लोगों के बीच इस पर अध्ययन किया कि लोगों की खुशहाली का क्या हाल है, कौन से मुद्दे उन्हें खुश रख रहे हैं और कौन से मुद्दों पर उनकी खुशहाली बुरी तरह बिगड़ी हुई है। लोगों से बात करने के अलावा इस बारे में उसने एक छोटी बैठक में अलग-अलग लोगों से भी बात की। इन लोगों ने जनता की सोच का अपना अंदाज बताया।
इन सबमें जो बात सामने आई उनमें खास छत्तीसगढ़ के बारे में एक बात यह थी कि जिन इलाकों में हथियारबंद टकराव चल रहा है वहां के लोगों में समा गए खतरे की वजह से उनकी खुशहाली बुरी तरह प्रभावित है। नक्सलियों और पुलिस के बीच के टकराव में फंस गए लोगों के बीच में जिंदगी की कोई गारंटी नहीं रह गई है। दूसरा एक नुकसान एक अच्छे कार्यक्रम के बुरे असर से है जिसके चलते सस्ते राशन के घर-घर तक कामयाबी से पहुंच जाने की वजह से, और रोजगार के मौके बढ़ जाने की वजह से अब लोगों के हाथ में अधिक पैसा है और वे शराब पर अधिक खर्च कर रहे हैं। अनाज से जो पैसा बच रहा है वह भी शराब पर जा रहा है और इसके चलते परिवार के बाकी लोगों की खुशहाली खत्म हो रही है।
कुछ लोगों का यह मानना है कि सरकार की रोजगार योजनाओं में महीनों तक भुगतान नहीं होता और काम करने के बाद जब लोगों को पैसे नहीं मिलते तो उनके बीच एक बड़ी असुरक्षा आ जाती है और दिक्कत भी बहुत होती है जिससे कि उनकी खुशहाली खत्म होती है। सरकार की तमाम रोजगार-योजनाओं में भारी भ्रष्टाचार की वजह से ही ग्रामीण गरीब के मन में तकलीफ और आशंका भरी हुई हैं।
जमीनी काम करने वाले कुछ लोगों का यह अनुभव था कि खदानें बढ़ती चली जाने से लोगों के परंपरागत रोजगार खत्म हो रहे हैं और जमीन छिन जाने से उनका मूल काम खत्म हो रहा है। विकास का नया मॉडल लोगों को उनके प्राकृतिक स्रोतों से अलग कर दे रहा है, खेतों के लिए पानी छिन रहा है, पीने के पानी का बुरा हाल है और इलाज का खर्च बढ़ते चल रहा है।
छत्तीसगढ़ में ही जनता के बीच काम करने वाले कुछ लोगों का यह मानना था कि राशन व्यवस्था, पीडीएस को ठीक चलाने के लिए तो सरकार में बड़ी मजबूत इच्छाशक्ति दिखती है लेकिन नरेगा जैसे रोजगार कार्यक्रम में वैसी कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखती जबकि अपनी मेहनत से काम करके रोजी पाकर लोगों के बीच में एक अलग आत्मसम्मान आएगा। इसकी बजाय सरकार रियायत पर राशन देकर जनता और बाकी तबकों की आलोचना से बचने का एक आसान तरीका इस्तेमाल कर रही है।
खुशहाली पर चर्चा में लोगों का यह भी कहना था कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत चावल, गेहूं और शक्कर ही लोगों को मिलता है और इससे स्थानीय समुदायों की जीवन शैली बदल गई है और जो स्थानीय मोटे अनाज होते थे उनका उगाना और खाना दोनों ही बंद हो चला है और इसकी वजह से लोगों में बीमारियां बढ़ रही हैं। इनका मानना था कि ऐसी योजनाएं केंद्र के स्तर पर बन जाती हैं लेकिन वे स्थानीय जनजीवन की मौलिक जरूरतों का ध्यान नहीं रखतीं।
बहुत से लोगों का यह मानना था कि छत्तीसगढ़ में इलाज के सरकारी इंतजाम में भारी कमी और भारी खामी, दोनों हैं। इसकी वजह से लोगों में अपनी जिंदगी को लेकर असुरक्षा की भावना है।
एक जानकार का कहना था कि छत्तीसगढ़ का एक बड़ा हिस्सा ऐसे आदिवासियों का है जो कि ईसाई हैं। उनके अलावा मुस्लिम भी बड़ी संख्या में इस राज्य में हैं। ऐसे में जब राज्य सरकार, राजिम कुंभ से लेकर अपने दूसरे तमाम सांस्कृतिक कार्यक्रमों में एक खास धर्म को ही बढ़ावा देते दिखती है तो राज्य के दूसरे धर्म के लोगों के बीच एक हीनभावना खड़ी होती है। इसी तरह छत्तीसगढ़ में लोककला से लेकर हस्तशिल्प तक, इन सबको आज के बाजार की मांग के हिसाब से सरकार बहुत तेजी से बदलतेे जा रही है और उससे भी परंपरागत काम करते चले आने वाले लोगों के बीच परंपरा के खत्म हो जाने का खतरा दिख रहा है और इससे भी उनकी भावनाओं में एक असुरक्षा घर कर गई है।
यह तो बात हुई छत्तीसगढ़ की। लेकिन इससे परे जब हम पूरे देश के लोगों के बीच खुशहाली के खात्मे की वजह देखते हैं तो बड़े-बड़े घोटाले सामने आते हैं, अमीर और गरीब के बीच बहुत बड़ी खाई दिखती है, आम जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों, मूल अधिकारों, मानवाधिकारों पर ताकतवर तबकों का रात-दिन चलता हमला दिखता है। टेलीविजन और अखबारों की खबरों को अगर देखें तो सुबह से रात तक सिर्फ यही दिखता है कि जनता क्यों और अधिक निराश अब तक नहीं हुई है, और उसे पर्याप्त निराश होने में और कितना वक्त लगेगा? अभी इसी हफ्ते हमने यह लिखा है कि किस तरह इस देश की जनता को रात-दिन अलग-अलग कतारों में खड़ा रखकर सरकार उनके वक्त को बर्बाद करती है और उनके आत्मविश्वास, आत्मसम्मान को खत्म भी करती है। सरकार हर छोटे-बड़े काम के लिए लाईनों का ऐसा इंतजाम करके चलती है कि मानो उनमें लगने वाले लोगों की जिंदगी का और कोई बेहतर उपयोग है ही नहीं।
जनता के बीच खुशहाली की सोच को खत्म करने की वजह सरकार से लेकर समाज के ताकतवर तबकों के हाथ में भी है और हर परिवार के भीतर उस परिवार के अपने रहन-सहन में भी है। इसी हफ्ते हमने हिंदू समाज के खराब रीति-रिवाजों को लेकर उसी समाज तक सीमित एक लंबी-चौड़ी बात लिखी है और ऐसे तमाम समाज और उनके भीतर के परिवार जो कि आज की आधुनिक जरूरतों और सोच को कुचलते हुए अपने बच्चों की हत्या, पैदा होने के पहले से लेकर उनके पे्रम और शादी तक कर रहे हैं, वे अपने लोगों के बीच अवसाद भी भर रहे हैं और हताशा-निराशा भी। तो हम देश के लोगों के बीच अवसाद के लिए सिर्फ सरकार या सिर्फ ताकतवर तबके को जिम्मेदार नहीं मान रहे, इसके लिए हम परिवार और व्यक्ति को भी जिम्मेदार मान रहे हैं कि भारत का लोकतंत्र अपनी जनता को जितना निराश कर रहा है उसमें परिवार कुछ जोड़ ही रहे हैं, उसे घटाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं।
भारत में आज बड़ी-बड़ी सनसनी वाली इतनी अधिक बातें हो रही हैं कि लोग जिंदगी के महीन पहलुओं के बारे में न सोचते हैं न उन्हें ऐसा सोचने की कोई जरूरत ही समझ आती। यह सिलसिला बदलना चाहिए और जिन लोगों में इन बातों के लिए संवेदनशीलता है उन्हें इस बारे में लिखना और बोलना तो शुरू करना ही चाहिए क्योंकि अवसाद में डूबा हुआ कोई समाज अपनी संभावनाओं तक नहीं पहुंच सकता।
अभी कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ में एक सामाजिक शोधकर्ता ने अपने काम के सिलसिले में लोगों से यह जानना चाहा कि उनकी जिंदगी में कितनी खुशहाली है। इसके लिए रिसर्च के इस काम में अंगे्रजी के शब्द, सेंस ऑफ वेल बीइंग, का इस्तेमाल किया गया। अभी एक रिपोर्ट आई है कि भारत के लोग दुनिया के सबसे अधिक अवसाद के शिकार (डिप्रेस्ड) लोग हैं, 36 फीसदी। इस मामले में सबसे कम डिपे्रशन चीन के लोगों में पाया गया है, 12 फीसदी। भारत में इतने हताश और निराश होने वाले लोगों की औसत उम्र करीब 32 बरस पाई गई है, और चीन में यह उम्र करीब 19 बरस की है। इन आंकड़ों में बहुत अधिक गए बिना अगर देखें कि भारत के लोग क्यों अवसाद के शिकार होंगे, तो सतह पर तैरते हुए भी इसके इतने सारे कारण दिखते हैं कि जिन्हें दूर करने की कोशिश करके लोगों को अवसाद या निराश-हताशा से कुछ हद तक तो बाहर निकाला ही जा सकता है। हम मनोविज्ञान और चिकित्सा विज्ञान में डिप्रेशन की जो वजह लिखी गई हैं उन पर यहां कोई तकनीकी चर्चा करना नहीं चाहते लेकिन समाज के भीतर लोग यह सोच सकें कि उसके इंसानों और कुल मिलाकर समाज की दिमागी सेहत कैसे बेहतर रहे इसलिए यहां आज यह बात कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ से अगर बात शुरू करें तो यहां पर ब्रिटेन की एक विश्वविद्यालय की शोध छात्रा ने ग्रामीण इलाकों के लोगों के बीच इस पर अध्ययन किया कि लोगों की खुशहाली का क्या हाल है, कौन से मुद्दे उन्हें खुश रख रहे हैं और कौन से मुद्दों पर उनकी खुशहाली बुरी तरह बिगड़ी हुई है। लोगों से बात करने के अलावा इस बारे में उसने एक छोटी बैठक में अलग-अलग लोगों से भी बात की। इन लोगों ने जनता की सोच का अपना अंदाज बताया।
इन सबमें जो बात सामने आई उनमें खास छत्तीसगढ़ के बारे में एक बात यह थी कि जिन इलाकों में हथियारबंद टकराव चल रहा है वहां के लोगों में समा गए खतरे की वजह से उनकी खुशहाली बुरी तरह प्रभावित है। नक्सलियों और पुलिस के बीच के टकराव में फंस गए लोगों के बीच में जिंदगी की कोई गारंटी नहीं रह गई है। दूसरा एक नुकसान एक अच्छे कार्यक्रम के बुरे असर से है जिसके चलते सस्ते राशन के घर-घर तक कामयाबी से पहुंच जाने की वजह से, और रोजगार के मौके बढ़ जाने की वजह से अब लोगों के हाथ में अधिक पैसा है और वे शराब पर अधिक खर्च कर रहे हैं। अनाज से जो पैसा बच रहा है वह भी शराब पर जा रहा है और इसके चलते परिवार के बाकी लोगों की खुशहाली खत्म हो रही है।
कुछ लोगों का यह मानना है कि सरकार की रोजगार योजनाओं में महीनों तक भुगतान नहीं होता और काम करने के बाद जब लोगों को पैसे नहीं मिलते तो उनके बीच एक बड़ी असुरक्षा आ जाती है और दिक्कत भी बहुत होती है जिससे कि उनकी खुशहाली खत्म होती है। सरकार की तमाम रोजगार-योजनाओं में भारी भ्रष्टाचार की वजह से ही ग्रामीण गरीब के मन में तकलीफ और आशंका भरी हुई हैं।
जमीनी काम करने वाले कुछ लोगों का यह अनुभव था कि खदानें बढ़ती चली जाने से लोगों के परंपरागत रोजगार खत्म हो रहे हैं और जमीन छिन जाने से उनका मूल काम खत्म हो रहा है। विकास का नया मॉडल लोगों को उनके प्राकृतिक स्रोतों से अलग कर दे रहा है, खेतों के लिए पानी छिन रहा है, पीने के पानी का बुरा हाल है और इलाज का खर्च बढ़ते चल रहा है।
छत्तीसगढ़ में ही जनता के बीच काम करने वाले कुछ लोगों का यह मानना था कि राशन व्यवस्था, पीडीएस को ठीक चलाने के लिए तो सरकार में बड़ी मजबूत इच्छाशक्ति दिखती है लेकिन नरेगा जैसे रोजगार कार्यक्रम में वैसी कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखती जबकि अपनी मेहनत से काम करके रोजी पाकर लोगों के बीच में एक अलग आत्मसम्मान आएगा। इसकी बजाय सरकार रियायत पर राशन देकर जनता और बाकी तबकों की आलोचना से बचने का एक आसान तरीका इस्तेमाल कर रही है।
खुशहाली पर चर्चा में लोगों का यह भी कहना था कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत चावल, गेहूं और शक्कर ही लोगों को मिलता है और इससे स्थानीय समुदायों की जीवन शैली बदल गई है और जो स्थानीय मोटे अनाज होते थे उनका उगाना और खाना दोनों ही बंद हो चला है और इसकी वजह से लोगों में बीमारियां बढ़ रही हैं। इनका मानना था कि ऐसी योजनाएं केंद्र के स्तर पर बन जाती हैं लेकिन वे स्थानीय जनजीवन की मौलिक जरूरतों का ध्यान नहीं रखतीं।
बहुत से लोगों का यह मानना था कि छत्तीसगढ़ में इलाज के सरकारी इंतजाम में भारी कमी और भारी खामी, दोनों हैं। इसकी वजह से लोगों में अपनी जिंदगी को लेकर असुरक्षा की भावना है।
एक जानकार का कहना था कि छत्तीसगढ़ का एक बड़ा हिस्सा ऐसे आदिवासियों का है जो कि ईसाई हैं। उनके अलावा मुस्लिम भी बड़ी संख्या में इस राज्य में हैं। ऐसे में जब राज्य सरकार, राजिम कुंभ से लेकर अपने दूसरे तमाम सांस्कृतिक कार्यक्रमों में एक खास धर्म को ही बढ़ावा देते दिखती है तो राज्य के दूसरे धर्म के लोगों के बीच एक हीनभावना खड़ी होती है। इसी तरह छत्तीसगढ़ में लोककला से लेकर हस्तशिल्प तक, इन सबको आज के बाजार की मांग के हिसाब से सरकार बहुत तेजी से बदलतेे जा रही है और उससे भी परंपरागत काम करते चले आने वाले लोगों के बीच परंपरा के खत्म हो जाने का खतरा दिख रहा है और इससे भी उनकी भावनाओं में एक असुरक्षा घर कर गई है।
यह तो बात हुई छत्तीसगढ़ की। लेकिन इससे परे जब हम पूरे देश के लोगों के बीच खुशहाली के खात्मे की वजह देखते हैं तो बड़े-बड़े घोटाले सामने आते हैं, अमीर और गरीब के बीच बहुत बड़ी खाई दिखती है, आम जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों, मूल अधिकारों, मानवाधिकारों पर ताकतवर तबकों का रात-दिन चलता हमला दिखता है। टेलीविजन और अखबारों की खबरों को अगर देखें तो सुबह से रात तक सिर्फ यही दिखता है कि जनता क्यों और अधिक निराश अब तक नहीं हुई है, और उसे पर्याप्त निराश होने में और कितना वक्त लगेगा? अभी इसी हफ्ते हमने यह लिखा है कि किस तरह इस देश की जनता को रात-दिन अलग-अलग कतारों में खड़ा रखकर सरकार उनके वक्त को बर्बाद करती है और उनके आत्मविश्वास, आत्मसम्मान को खत्म भी करती है। सरकार हर छोटे-बड़े काम के लिए लाईनों का ऐसा इंतजाम करके चलती है कि मानो उनमें लगने वाले लोगों की जिंदगी का और कोई बेहतर उपयोग है ही नहीं।
जनता के बीच खुशहाली की सोच को खत्म करने की वजह सरकार से लेकर समाज के ताकतवर तबकों के हाथ में भी है और हर परिवार के भीतर उस परिवार के अपने रहन-सहन में भी है। इसी हफ्ते हमने हिंदू समाज के खराब रीति-रिवाजों को लेकर उसी समाज तक सीमित एक लंबी-चौड़ी बात लिखी है और ऐसे तमाम समाज और उनके भीतर के परिवार जो कि आज की आधुनिक जरूरतों और सोच को कुचलते हुए अपने बच्चों की हत्या, पैदा होने के पहले से लेकर उनके पे्रम और शादी तक कर रहे हैं, वे अपने लोगों के बीच अवसाद भी भर रहे हैं और हताशा-निराशा भी। तो हम देश के लोगों के बीच अवसाद के लिए सिर्फ सरकार या सिर्फ ताकतवर तबके को जिम्मेदार नहीं मान रहे, इसके लिए हम परिवार और व्यक्ति को भी जिम्मेदार मान रहे हैं कि भारत का लोकतंत्र अपनी जनता को जितना निराश कर रहा है उसमें परिवार कुछ जोड़ ही रहे हैं, उसे घटाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं।
भारत में आज बड़ी-बड़ी सनसनी वाली इतनी अधिक बातें हो रही हैं कि लोग जिंदगी के महीन पहलुओं के बारे में न सोचते हैं न उन्हें ऐसा सोचने की कोई जरूरत ही समझ आती। यह सिलसिला बदलना चाहिए और जिन लोगों में इन बातों के लिए संवेदनशीलता है उन्हें इस बारे में लिखना और बोलना तो शुरू करना ही चाहिए क्योंकि अवसाद में डूबा हुआ कोई समाज अपनी संभावनाओं तक नहीं पहुंच सकता।
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