31 जुलाई 2011
भारत में रिश्वत और सरकारी बेईमानी के मामले थमते ही नहीं दिख रहे हैं। अब एक अंगे्रजी शराब कंपनी को अमरीका में बहुत बड़ा जुर्माना देना पड़ा है क्योंकि वह भारत के अलावा दक्षिण कोरिया और थाईलैंड में सरकारी लोगों को रिश्वत देकर अपने दारू के धंधे को बढ़ाने और टैक्स चोरी करने के मामले में पकड़ा गई है। अभी तक भारत में इसकी चर्चा भी शुरू नहीं हुई है जबकि भारत के सबसे बड़े शराब निर्माता विजय माल्या ने इस खबर के बारे में लिखकर पूछा है कि अमरीकी सरकार ने तो जुर्माना वसूल कर लिया है भारत की सरकार क्या कर रही है?
विजय माल्या की इस खबर में कारोबारी मुकाबले की एक दिलचस्पी हो सकती है लेकिन हम उनसे परे भी इस खबर की अहमियत मानते हुए इसके बारे बात करना चाह रहे हैं। भारत में और बहुत सारे प्रदेशों में भी सरकारें यह दिक्कत झेल रही हैं कि अब ईमानदार अफसर किसी ऐसे काम में हाथ डालने से हिचक रहे हैं जहां पर कि उन्हें भ्रष्टाचार का दोषी मान लिया जाएगा। हमारी जानकारी के बहुत से ऐसे अधिकारी पहले से हैं जो कम काम करने में यकीन रखते हैं और यह मानकर चलते हैं कि उन्हें अपनी नौकरी खत्म होने पर किसी मामले-मुकदमे में नहीं फंसना है। लेकिन अब तो यह बात बहुत बुरी तरह बढ़ गई है क्योंकि आए दिन बेईमान और ईमानदार दोनों के किस्म के अफसरों के सीबीआई या अदालत का सामना करना पड़ रहा है। अदालत से जब तक कोई छूटकर आए और अपने-आपको बेकसूर बताकर जिंदगी में फिर घुसने की कोशिश करे तब तक तो मीडिया उसकी धज्जियां उड़ा चुका होता है। आज अगर इसकी सबसे बुरी मिसाल देखनी हो तो सरकारी कामकाज से परे एक निजी मामले में दिल्ली की एक बच्ची की हत्या के मामले में गिरफ्तार उसके मां-बाप के खिलाफ किसी तरह का कोई सुबूत न मिलने पर भी अब उनकी सामाजिक प्रताडऩा के एक या दो बरस पता नहीं कितने पूरे हो चुके हैं और उन्हें हत्यारों की तरह जेल में डालकर रखा गया है। जाहिर तौर पर उनके खिलाफ कुछ नहीं है लेकिन उन्होंने पहले बेटी खोई, फिर इज्जत और फिर पूरी जिंदगी ही खो चुके हैं। भारत की न्याय-व्यवस्था और यहां के मीडिया में से अधिक बेरहम कौन है इसका अंदाज लगाना मुश्किल है।
लेकिन हम फिर इस बात पर लौटे कि रिश्वत के लगातार बढ़ते मामलों से और उनकी चर्चा से देश का क्या-क्या नुकसान हो रहा है? पाठकों को हमारे लिखे हुए में यह तो लगातार पढऩे मिलता ही है कि इससे बेबस जनता की लोकतंत्र पर से आस्था उठते चले जा रही है और अलोकतांत्रिक ताकतों को इससे एक जगह मिल रही है। लेकिन इससे परे भी सरकार का कामकाज कई दायरों में ठप हो गया है और डरे हुए या चौकन्ने अफसर अब किसी खरीदी या टेंडर के पहले सौ बार सोचने लगे हैं कि इस काम को वे क्यों करें? जिन लोगों को इससे निजी कमाई होनी है वे अफसर तो फिर भी रफ्तार से काम अभी भी कर रहे हैं लेकिन इससे बचने वाले अफसर धीमे पड़ गए हैं। अभी जब मुंबई में धमाके हुए तो वहां के मुख्यमंत्री ने खुलकर यह बात कही कि सुरक्षा के उपकरण इसलिए नहीं खरीदे जा सक रहे हैं कि अफसर या सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से डरी-सहमी है। देश के लिए फौजी सामान खरीदने का काम भी बुरी तरह मंदा हो चुका है क्योंकि लोगों को लगता है कि छयालीस करोड़ के भ्रष्टाचार वाला बोफोर्स जब इतना बड़ा मुद्दा बन गया था तो अब दसियों हजार करोड़ की खरीदी में कब कौन कटघरे में खड़ा कर दिया जाए?
हमको याद पड़ता है कि एक काबिल और ईमानदार अफसर ने अपनी यह तकलीफ बताई थी कि सरकारी नियम-कानून में सैकड़ों करोड़ बचाने वाले के लिए एक चवन्नी का भी ईनाम नहीं है लेकिन अगर चवन्नी की भी गड़बड़ी पकड़ा गई तो उसके लिए किस्म-किस्म की सजा पक्की है। हमको एक डर यह भी है कि डरी-सहमी नौकरशाही के चलते देश में विकास का काम ढीला पड़ सकता है और इससे अर्थव्यवस्था का चक्का घूमना धीमा हो जाएगा। इसके अलावा ऐसा भी हो सकता है कि होनहार नौजवान पीढ़ी सरकारी नौकरी में आने के बजाय निजी नौकरी में जाना चाहेे क्योंकि वहां पर इतने मामले-मुकदमे की नौबत नहीं आती। तो भ्रष्टाचार ने एक तरफ तो भारत में एक लंबा-चौड़ा नुकसान वैसे भी कर दिया है और दूसरी तरफ आने वाले दिन भी इसकी दहशत में एक धीमी रफ्तार के सरकारी कामकाज के दिखते हैं। इसलिए भ्रष्टाचार होने के पहले उस पर रोक लगाना जरूरी है और इसके लिए हम तो लंबे समय से तरह-तरह की खुफिया और जांच एजेंसियां की वकालत करते आए हैं और अब संसद प्रस्तावित लोकपाल विधेयक पर भी चर्चा करने जा रही है। देश में भ्रष्टाचार के कारण सरकार की तस्वीर और लोकतंत्र पर जनता की आस्था का बहुत खराब हाल है और इसे सुधारने के लिए तुरंत हर तरह की कोशिश होनी चाहिए। हम देश के कुछ बड़े अर्थशास्त्रियों और नारायण मूर्ति जैसे प्रतिष्ठित बड़े कारोबारी की इस सलाह पर भी अमल की जरूरत समझते हैं कि रिश्वत देने को अपराध के दर्जे से बाहर किया जाए तभी जाकर रिश्वत देने वाले लोग इसकी शिकायत लेकर सरकार तक पहुंचने की हिम्मत करेंगे। लेकिन लोकपाल विधेयक पर बहस के दौरान भ्रष्टाचार के बहुत से पहलू सामने आएंगे और इस मौके पर यह भी जरूरी है कि जनता अपने-अपने सांसदों से मिलकर, उन्हें चि_ी लिखकर, एसएमएस भेजकर या सार्वजनिक कार्यक्रमों में बुलाकर यह जाहिर करे कि उसे भ्रष्टाचार से कितनी नफरत है।
विजय माल्या की इस खबर में कारोबारी मुकाबले की एक दिलचस्पी हो सकती है लेकिन हम उनसे परे भी इस खबर की अहमियत मानते हुए इसके बारे बात करना चाह रहे हैं। भारत में और बहुत सारे प्रदेशों में भी सरकारें यह दिक्कत झेल रही हैं कि अब ईमानदार अफसर किसी ऐसे काम में हाथ डालने से हिचक रहे हैं जहां पर कि उन्हें भ्रष्टाचार का दोषी मान लिया जाएगा। हमारी जानकारी के बहुत से ऐसे अधिकारी पहले से हैं जो कम काम करने में यकीन रखते हैं और यह मानकर चलते हैं कि उन्हें अपनी नौकरी खत्म होने पर किसी मामले-मुकदमे में नहीं फंसना है। लेकिन अब तो यह बात बहुत बुरी तरह बढ़ गई है क्योंकि आए दिन बेईमान और ईमानदार दोनों के किस्म के अफसरों के सीबीआई या अदालत का सामना करना पड़ रहा है। अदालत से जब तक कोई छूटकर आए और अपने-आपको बेकसूर बताकर जिंदगी में फिर घुसने की कोशिश करे तब तक तो मीडिया उसकी धज्जियां उड़ा चुका होता है। आज अगर इसकी सबसे बुरी मिसाल देखनी हो तो सरकारी कामकाज से परे एक निजी मामले में दिल्ली की एक बच्ची की हत्या के मामले में गिरफ्तार उसके मां-बाप के खिलाफ किसी तरह का कोई सुबूत न मिलने पर भी अब उनकी सामाजिक प्रताडऩा के एक या दो बरस पता नहीं कितने पूरे हो चुके हैं और उन्हें हत्यारों की तरह जेल में डालकर रखा गया है। जाहिर तौर पर उनके खिलाफ कुछ नहीं है लेकिन उन्होंने पहले बेटी खोई, फिर इज्जत और फिर पूरी जिंदगी ही खो चुके हैं। भारत की न्याय-व्यवस्था और यहां के मीडिया में से अधिक बेरहम कौन है इसका अंदाज लगाना मुश्किल है।
लेकिन हम फिर इस बात पर लौटे कि रिश्वत के लगातार बढ़ते मामलों से और उनकी चर्चा से देश का क्या-क्या नुकसान हो रहा है? पाठकों को हमारे लिखे हुए में यह तो लगातार पढऩे मिलता ही है कि इससे बेबस जनता की लोकतंत्र पर से आस्था उठते चले जा रही है और अलोकतांत्रिक ताकतों को इससे एक जगह मिल रही है। लेकिन इससे परे भी सरकार का कामकाज कई दायरों में ठप हो गया है और डरे हुए या चौकन्ने अफसर अब किसी खरीदी या टेंडर के पहले सौ बार सोचने लगे हैं कि इस काम को वे क्यों करें? जिन लोगों को इससे निजी कमाई होनी है वे अफसर तो फिर भी रफ्तार से काम अभी भी कर रहे हैं लेकिन इससे बचने वाले अफसर धीमे पड़ गए हैं। अभी जब मुंबई में धमाके हुए तो वहां के मुख्यमंत्री ने खुलकर यह बात कही कि सुरक्षा के उपकरण इसलिए नहीं खरीदे जा सक रहे हैं कि अफसर या सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से डरी-सहमी है। देश के लिए फौजी सामान खरीदने का काम भी बुरी तरह मंदा हो चुका है क्योंकि लोगों को लगता है कि छयालीस करोड़ के भ्रष्टाचार वाला बोफोर्स जब इतना बड़ा मुद्दा बन गया था तो अब दसियों हजार करोड़ की खरीदी में कब कौन कटघरे में खड़ा कर दिया जाए?
हमको याद पड़ता है कि एक काबिल और ईमानदार अफसर ने अपनी यह तकलीफ बताई थी कि सरकारी नियम-कानून में सैकड़ों करोड़ बचाने वाले के लिए एक चवन्नी का भी ईनाम नहीं है लेकिन अगर चवन्नी की भी गड़बड़ी पकड़ा गई तो उसके लिए किस्म-किस्म की सजा पक्की है। हमको एक डर यह भी है कि डरी-सहमी नौकरशाही के चलते देश में विकास का काम ढीला पड़ सकता है और इससे अर्थव्यवस्था का चक्का घूमना धीमा हो जाएगा। इसके अलावा ऐसा भी हो सकता है कि होनहार नौजवान पीढ़ी सरकारी नौकरी में आने के बजाय निजी नौकरी में जाना चाहेे क्योंकि वहां पर इतने मामले-मुकदमे की नौबत नहीं आती। तो भ्रष्टाचार ने एक तरफ तो भारत में एक लंबा-चौड़ा नुकसान वैसे भी कर दिया है और दूसरी तरफ आने वाले दिन भी इसकी दहशत में एक धीमी रफ्तार के सरकारी कामकाज के दिखते हैं। इसलिए भ्रष्टाचार होने के पहले उस पर रोक लगाना जरूरी है और इसके लिए हम तो लंबे समय से तरह-तरह की खुफिया और जांच एजेंसियां की वकालत करते आए हैं और अब संसद प्रस्तावित लोकपाल विधेयक पर भी चर्चा करने जा रही है। देश में भ्रष्टाचार के कारण सरकार की तस्वीर और लोकतंत्र पर जनता की आस्था का बहुत खराब हाल है और इसे सुधारने के लिए तुरंत हर तरह की कोशिश होनी चाहिए। हम देश के कुछ बड़े अर्थशास्त्रियों और नारायण मूर्ति जैसे प्रतिष्ठित बड़े कारोबारी की इस सलाह पर भी अमल की जरूरत समझते हैं कि रिश्वत देने को अपराध के दर्जे से बाहर किया जाए तभी जाकर रिश्वत देने वाले लोग इसकी शिकायत लेकर सरकार तक पहुंचने की हिम्मत करेंगे। लेकिन लोकपाल विधेयक पर बहस के दौरान भ्रष्टाचार के बहुत से पहलू सामने आएंगे और इस मौके पर यह भी जरूरी है कि जनता अपने-अपने सांसदों से मिलकर, उन्हें चि_ी लिखकर, एसएमएस भेजकर या सार्वजनिक कार्यक्रमों में बुलाकर यह जाहिर करे कि उसे भ्रष्टाचार से कितनी नफरत है।
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