एक और बातचीत की जरूरत अभी बाकी, और गुंजाइश भी

18 अगस्त 11
दुनिया का रिवाज है कि जब लोग एक-दूसरे का सबसे बुरा बर्ताव देख चुके होते हैं तो उनके बीच संबंध सबसे अच्छे होने की भी एक संभावना रहती है। राजनीति में तो इस संभावना का इस्तेमाल कुछ लोग कर पाते हैं और कुछ लोग नहीं कर पाते हैं। लेकिन चुनावी कटुता से अलग जो संगठन या लोग रहते हैं उनको अपनी कड़वाहट और निजी मतभेद छोड़कर व्यापक जनहित में कुछ करने की कोशिश करनी चाहिए। यह बात हम आज अन्ना हजारे के खेमे और कांगे्रस पार्टी की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के बारे में कह रहे हैं। दोनों ने एक-दूसरे के साथ मतभेद की ऊंचाईयां देख ली हैं और कम से कम जाहिर तौर पर दोनों ही भ्रष्टाचार के खिलाफ लडऩे की बात कर रहे हैं। यूपीए सरकार या कांगे्रस के पास भी अपने मौजूदा भ्रष्टाचार को जारी रखने का विकल्प अब नहीं बचा है क्योंकि जनता एक चतुर घाघ की तरह नजर गड़ाए बैठी है और कोई ताजा भ्रष्टाचार सामने आने पर अदालतें भी मानो खाल खींच लेने के अंदाज में हैं। पिछले दिनों में जगह-जगह जनता का जो रूख सामने आया है, वह भी भ्रष्ट सरकारों के लिए एक चेतावनी की तरह है। बहुत वक्त बाद शहरी और मध्यम वर्गीय लोग किसी मुद्दे पर इस तरह सड़कों पर आए हैं। यह तबका आमतौर पर किसी संघर्ष से परे रहने वाला है और हम आज भी इसके प्रदर्शन को कोई संघर्ष नहीं गिन रहे, लेकिन यह देश आज शहरों से दूर जंगलों में नक्सलियों की अगुवाई में आदिवासियों का एक अलग किस्म का हिस्सेदारी वाला हिंसक संघर्ष देख रहा है, और सरकार से लोगों की भड़ास शहरों में भी किसी दिन हिंसक होने की आशंका हम बार-बार जाहिर करते आए हैं।
अब मनमोहन सिंह की सरकार में उन्हीं का जेल जाना बचा है और हमें नहीं लगता कि वे ऐसी कोई नौबत आने तक अपनी आंखें और बंद रखेंगे। इसलिए चाहे कांगे्रस पार्टी ने अन्ना हजारे पर बहुत ओछी जुबान में हमले क्यों न किए हों, भले ही सरकार और अन्ना हजारे के बीच सैद्धांतिक मतभेद लोकपाल से परे के भी क्यों न हों इसके बावजूद हमें बातचीत की जगह खत्म नहीं दिखती है। अन्ना हजारे के मिजाज में जितनी भी गांधीगिरी हो वह बातचीत को दुबारा शुरू करने के लिए काफी होनी चाहिए क्योंकि गांधी भी तो पूरे सैद्धांतिक मतभेदों के बावजूद बार-बार अंगे्रजों के साथ बातचीत की मेज पर जाते ही थे। भारत और पाकिस्तान आज दुश्मनी जैसी कड़वाहट के बाद मेज पर बात करते ही हैं। उमा भारती जहाज के पंछी की तरह उड़कर, जहाज को गालियां देकर, लौटकर जहाज पर आती ही हैं। ऐसी बहुत सी मिसालें इस देश में मिलेंगी जब चूर-चूर हो चुका आईना फिर जुड़कर एक हो जाता है और इसीलिए राजनीति के बारे में यह कहा जाता है कि उसमें बड़े अजीब-अजीब हमबिस्तर हो जाते हैं। अन्ना हजारे या बाबा रामदेव का आंदोलन राजनीति से बहुत परे का भी नहीं है और वह राजनीति पर केंद्रित तो पूरी तरह है। हमारे अपने बहुत गहरे मतभेद बाबा और अन्ना से हैं। मुद्दों को लेकर भी हैं और तौर-तरीकों को लेकर भी हैं। उससे सौ गुना अधिक गहरे मतभेद हमारे यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार से हैं और कांगे्रस पार्टी के तौर-तरीकों से भी हैं। लेकिन हमारा यह मानना है कि लोकतंत्र एक इतनी उदार और लचीली व्यवस्था है कि उसमें अलग-अलग तमाम इरादों के, और ख्यालों के लोगों के एक होने की गुंजाइश हमेशा बची ही रहती हैं। पिछले कुछ महीनों से देश के दोनों बड़ी वामपंथी पार्टियों के एक होने की एक चर्चा तो छिड़ी ही है। दूसरी तरफ सोनिया को विदेशी कहते हुए जिन लोगों ने कांगे्रस पार्टी छोड़ी थी उन राष्ट्रवादी कांगे्रसियों के साथ मिलकर आज कांगे्रस देश और महाराष्ट्र प्रदेश दोनों की सरकारें चला ही रही हैं। इसलिए हम अन्ना-बाबा और सरकार के बीच बातचीत की एक गुंजाइश अभी भी देखते हैं फिर चाहे यह बात देश के कुछ राजनीतिक दलों को चाहे ठीक न लगे, अन्ना-बाबा के कुछ साथियों को चाहे यह खराब लगे। एक ऐसी सुगबुगाहट है कि अन्ना के साथियों में से एक जस्टिस संतोष हेगड़े ऐसी कोई पहल कर सकते हैं, और ऐसी पहल हमारे हिसाब से होनी ही चाहिए। इस देश की कोई सरकार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अड़ी रहकर अब जिंदा नहीं रह सकती और इसलिए हम भ्रष्टाचार के खिलाफ सबके एक साथ बैठकर बात करने को जरूरी समझते हैं।
पाठकों ने देखा होगा कि किस तरह पिछले साल भर से कश्मीर में केंद्र सरकार के नियुक्त किए हुए वार्ताकार कश्मीरी अलगाववादियों सहित तमाम लोगों से बात कर रहे हैं। हम यह भी देखते हैं कि किस तरह नक्सलियों से बात करने के लिए आंध्र सरकार ने एक वक्त वहां के एक रिटायर्ड आईएस अफसर की सेवाओं का उपयोग किया था। हम यह भी देख रहे हैं कि किस तरह पिछले बरस कई बार स्वामी अग्निवेश का नाम नक्सलियों से बातचीत के लिए सामने आया, यह अलग बात है कि कुछ मुठभेड़ हत्याओं के बाद वह सिलसिला थम सा गया। लेकिन हम न नक्सलियों से बातचीत की संभावना खत्म होते देखते और न ही स्वामी अग्निवेश के बीच एक-दूसरे से जिंदगी भर का कोई परहेज देखते। कोई निजी मामला रहता तो बात अलग होती। बात जब सार्वजनिक हित की है तो फिर सरकार को या कोई आंदोलनकारी, इन सबको अपने-अपने व्यक्तित्व के टकराव, मुद्दों पर असहमति, काम के तौर-तरीकों का फर्क छोड़कर एक न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर बातचीत करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। कारखानों में मजदूरों और कारखानेदारों के बीच टकराव जगह-जगह होते चलता है, लेकिन बातचीत के बाद समझौते होते हैं और काम आगे बढ़ता है। आज ऐसी ही बातचीत की जरूरत और जगह दिल्ली में दिखाई देती है। हम अन्ना हजारे और सरकार दोनों से अलग-अलग बातों पर असहमति के बाद भी यह चाहते हैं कि कोई विश्वसनीय मध्यस्थ जो कि दोनों पक्षों को मंजूर हो उसके साथ इनको फिर बैठना चाहिए और जिन-जिन बातों पर सहमति हो सकती है उन पर सहमत होने के बाद बाकी पर असहमत बने रहने को नाकामयाबी नहीं मानना चाहिए। आज भी हम जीत इन दोनों पक्षों में से किसी एक को देने के बजाय देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ आम जनता में उठे हुए आक्रोश को देना चाहेंगे क्योंकि अन्ना हजारे को ताकत भी उन्हें मिले हुए जनसमर्थन की ही है और सरकार अगर हड़बड़ाई है तो वह भी अन्ना को मिले जनसमर्थन से ही डरी हुई है।
राजनीतिक दलों में से कुछ लोग यह बात हाथ आए हुए एक बड़े मुद्दे के निकल जाने की तरह की लग सकती है लेकिन देश के हित में यह है कि लोग बातचीत के रास्ते बंद न करें, पूरा का पूरा लोकतंत्र विविधताओं के बीच सहमति और असहमति के साथ चलने वाली एक व्यवस्था है और इसकी भावना का सभी पक्षों को सम्मान करना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें