संपादकीय 22 अगस्त 2011
देश के बड़े शहरों के बाद अब उनसे छोटे शहरों की बारी है जहां बढ़ती हुई निजी गाडिय़ों की पार्किंग एक बुरे सपने की तरह शहरों पर लद गई हैं। दिल्ली में लोग आधे-आधे घंटे तक बाजारों की पार्किंग में जूझते रहते हैं और रईसी की आदत के चलते उनकी गाडिय़ों के एयरकंडीशनर भी चलते हैं और रेंगती हुई गाडिय़ों के इंजन भी रफ्तार के मुकाबले कहीं अधिक ईंधन पीते रहती हैं। यह हाल महानगरों के बाद उन तमाम शहरों का हो चला है जहां पर किसी भी वजह से काले या सफेद पैसे का बोलबाला है। लोग आटोमोबाइल उद्योग के आक्रामक कारोबार के उसी तरह शिकार हो रहे हैं जिस तरह आधी सदी या उससे अधिक पहले अमरीका में सार्वजनिक परिवहन को खत्म करके मोटर कंपनियों ने एक ऐसी नौबत शुरू की थी जो आज तक चल रही है और जिसके तहत हर अमरीकी के लिए अपनी निजी और बड़ी मोटर गाड़ी पर निर्भर रहना एक बेबसी है। भारत अपने अतिसंपन्न एक छोटे तबके के लिए जहाज सरीखी बड़ी गाडिय़ों के बाद अब संपन्न तबके के लिए कई किस्म की गाडिय़ों और मध्यम वर्ग के लिए दो लाख से कम की चौपहिया वाला बड़ा बाजार बन गया है और केंद्र सरकार की तमाम नीतियां इस बाजार को बढ़ावा देने वाली हो गई हैं।
जहां राज्यों को अपने शहरों के हित में भी कारों पर चलने वाले तबके लिए एक ऐसी आरामदेह सार्वजनिक यातायात व्यवस्था करनी चाहिए थी जो कि पैसे वाले लोगों को आरामदेह आवाजाही दे पाती। लेकिन शायद ही कोई ऐसा शहर हो जो निजी गाडिय़ों का धंधा मंदा करने के खतरे के साथ शहरों में बसों या वैसे ही किसी और सार्वजनिक परिवहन का ढांचा खड़ा कर रहा हो। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में चौथाई सदी के पहले सफलता से जो सिटी बसें चलती थीं, जिनमें दस-बारह पैसे की टिकट लेकर उस वक्त लोग चलते थे, उनको मामूली नुकसान गिनाकर जो बंद किया गया तो अभी पिछले पांच बरस में ही वे बसें दुबारा शुरू हुईं। शुरू होते ही इन बसों को मुसाफिर पाट चुके हैं और लोग निजी दुपहियों के बजाय इनमें चलने लगे हैं। लेकिन ये बसें ऐसी आलीशान या ऐसी आरामदेह नहीं हैं कि उनमें कारों में चलने वाले लोग भी चलना पसंद करें। लेकिन जब हम दिल्ली जैसे शहर को देखते हैं तो वहां पर कारों वाला एक तबका अपना कुछ-कुछ लोकल सफर मेट्रो से करने लगा है क्योंकि वह साफ-सुथरी, सुविधाजनक और तेज रफ्तार है, किफायती भी है।
शहरों में पार्किंग की दिक्कत, आटोमोबाइल से होने वाले प्रदूषण और टै्रफिक जाम में बर्बाद होने वाला इंसानी वक्त मिलाकर अगर देखें तो लगता है कि पूंजीवादी अमरीका के भीतर भी न्यूयॉर्क जैसा एक महानगर जिस तरह सार्वजनिक परिवहन पर एक सदी से अधिक से निर्भर है, वैसा किसी न किसी जरिए से हिंदुस्तान के शहरों में क्यों नहीं हो सकता? यहां पर हम आटोमोबाइल उद्योग पर सीधे-सीधे किसी साजिश का शक इसलिए नहीं करते कि सरकार में बैठे लोगों की कल्पनाशून्यता पर हमें बाजार की साजिश से अधिक भरोसा है और बसों को होने वाले बहुत मामूली घाटे को गिनाकर सरकारें और शहर उन्हें बंद करने को बेहतर मानते हैं। जहां तक हमें याद पड़ रहा है की शहरीकरण योजना के तहत सार्वजनिक यातायात के लिए बड़ी गुंजाइश रखी गई थी और उसका इस्तेमाल कौन सा प्रदेश या कौन सा शहर करता है इस पर वहां के लोगों को भी नजर रखनी चाहिए। हमारा मानना है कि निजी गाडिय़ों के चलते यह देश उसी तरह धुएं में डूब जाएगा जिस तरह अमरीका गाडिय़ों में डूब गया है। इस देश में तो किसी प्रदूषण पर भी कोई रोक नहीं है और न ही शहरी ढांचा अधिक गाडिय़ों के लायक किसी शहर में बना है। आर्थिक उदारीकरण के नाम पर गाडिय़ां इतनी बढ़ती चली गई हैं कि उनसे शहर पट गए हैं। यह सिलसिला तुरंत खत्म होना चाहिए लेकिन टैक्स बढ़ाकर या पार्किंग फीस बढ़ाकर या ईंधन के दाम बढ़ाकर ऐसा नहीं हो सकता। भारत जैसे काले धनी देश में लोग हमेशा ही फिजूलखर्ची के लिए पैसा पाते रहेंगे और जब तक एक सुविधाजनक, आरामदेह, तेजरफ्तार और पर्याप्त बड़े नेटवर्क वाले सार्वजनिक परिवहन का इंतजाम शहरों में नहीं होगा, यह देश आटोमोबाइल उद्योग को बढ़ावा देने वाला बने रहेगा। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को शहरों को चलाने वाली संस्थाओं का हौसला बढ़ाकर, उन्हें पर्याप्त ग्रांट देकर इस लायक बनाना चाहिए कि वे सार्वजनिक परिवहन के ढांचे को खड़ा कर सकें और उसके घाटे को उठा भी सकें। इसमें जितनी भी देर हो रही है उतना ही इस देश का और धरती का नुकसान हो रहा है।
देश के बड़े शहरों के बाद अब उनसे छोटे शहरों की बारी है जहां बढ़ती हुई निजी गाडिय़ों की पार्किंग एक बुरे सपने की तरह शहरों पर लद गई हैं। दिल्ली में लोग आधे-आधे घंटे तक बाजारों की पार्किंग में जूझते रहते हैं और रईसी की आदत के चलते उनकी गाडिय़ों के एयरकंडीशनर भी चलते हैं और रेंगती हुई गाडिय़ों के इंजन भी रफ्तार के मुकाबले कहीं अधिक ईंधन पीते रहती हैं। यह हाल महानगरों के बाद उन तमाम शहरों का हो चला है जहां पर किसी भी वजह से काले या सफेद पैसे का बोलबाला है। लोग आटोमोबाइल उद्योग के आक्रामक कारोबार के उसी तरह शिकार हो रहे हैं जिस तरह आधी सदी या उससे अधिक पहले अमरीका में सार्वजनिक परिवहन को खत्म करके मोटर कंपनियों ने एक ऐसी नौबत शुरू की थी जो आज तक चल रही है और जिसके तहत हर अमरीकी के लिए अपनी निजी और बड़ी मोटर गाड़ी पर निर्भर रहना एक बेबसी है। भारत अपने अतिसंपन्न एक छोटे तबके के लिए जहाज सरीखी बड़ी गाडिय़ों के बाद अब संपन्न तबके के लिए कई किस्म की गाडिय़ों और मध्यम वर्ग के लिए दो लाख से कम की चौपहिया वाला बड़ा बाजार बन गया है और केंद्र सरकार की तमाम नीतियां इस बाजार को बढ़ावा देने वाली हो गई हैं।
जहां राज्यों को अपने शहरों के हित में भी कारों पर चलने वाले तबके लिए एक ऐसी आरामदेह सार्वजनिक यातायात व्यवस्था करनी चाहिए थी जो कि पैसे वाले लोगों को आरामदेह आवाजाही दे पाती। लेकिन शायद ही कोई ऐसा शहर हो जो निजी गाडिय़ों का धंधा मंदा करने के खतरे के साथ शहरों में बसों या वैसे ही किसी और सार्वजनिक परिवहन का ढांचा खड़ा कर रहा हो। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में चौथाई सदी के पहले सफलता से जो सिटी बसें चलती थीं, जिनमें दस-बारह पैसे की टिकट लेकर उस वक्त लोग चलते थे, उनको मामूली नुकसान गिनाकर जो बंद किया गया तो अभी पिछले पांच बरस में ही वे बसें दुबारा शुरू हुईं। शुरू होते ही इन बसों को मुसाफिर पाट चुके हैं और लोग निजी दुपहियों के बजाय इनमें चलने लगे हैं। लेकिन ये बसें ऐसी आलीशान या ऐसी आरामदेह नहीं हैं कि उनमें कारों में चलने वाले लोग भी चलना पसंद करें। लेकिन जब हम दिल्ली जैसे शहर को देखते हैं तो वहां पर कारों वाला एक तबका अपना कुछ-कुछ लोकल सफर मेट्रो से करने लगा है क्योंकि वह साफ-सुथरी, सुविधाजनक और तेज रफ्तार है, किफायती भी है।
शहरों में पार्किंग की दिक्कत, आटोमोबाइल से होने वाले प्रदूषण और टै्रफिक जाम में बर्बाद होने वाला इंसानी वक्त मिलाकर अगर देखें तो लगता है कि पूंजीवादी अमरीका के भीतर भी न्यूयॉर्क जैसा एक महानगर जिस तरह सार्वजनिक परिवहन पर एक सदी से अधिक से निर्भर है, वैसा किसी न किसी जरिए से हिंदुस्तान के शहरों में क्यों नहीं हो सकता? यहां पर हम आटोमोबाइल उद्योग पर सीधे-सीधे किसी साजिश का शक इसलिए नहीं करते कि सरकार में बैठे लोगों की कल्पनाशून्यता पर हमें बाजार की साजिश से अधिक भरोसा है और बसों को होने वाले बहुत मामूली घाटे को गिनाकर सरकारें और शहर उन्हें बंद करने को बेहतर मानते हैं। जहां तक हमें याद पड़ रहा है की शहरीकरण योजना के तहत सार्वजनिक यातायात के लिए बड़ी गुंजाइश रखी गई थी और उसका इस्तेमाल कौन सा प्रदेश या कौन सा शहर करता है इस पर वहां के लोगों को भी नजर रखनी चाहिए। हमारा मानना है कि निजी गाडिय़ों के चलते यह देश उसी तरह धुएं में डूब जाएगा जिस तरह अमरीका गाडिय़ों में डूब गया है। इस देश में तो किसी प्रदूषण पर भी कोई रोक नहीं है और न ही शहरी ढांचा अधिक गाडिय़ों के लायक किसी शहर में बना है। आर्थिक उदारीकरण के नाम पर गाडिय़ां इतनी बढ़ती चली गई हैं कि उनसे शहर पट गए हैं। यह सिलसिला तुरंत खत्म होना चाहिए लेकिन टैक्स बढ़ाकर या पार्किंग फीस बढ़ाकर या ईंधन के दाम बढ़ाकर ऐसा नहीं हो सकता। भारत जैसे काले धनी देश में लोग हमेशा ही फिजूलखर्ची के लिए पैसा पाते रहेंगे और जब तक एक सुविधाजनक, आरामदेह, तेजरफ्तार और पर्याप्त बड़े नेटवर्क वाले सार्वजनिक परिवहन का इंतजाम शहरों में नहीं होगा, यह देश आटोमोबाइल उद्योग को बढ़ावा देने वाला बने रहेगा। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को शहरों को चलाने वाली संस्थाओं का हौसला बढ़ाकर, उन्हें पर्याप्त ग्रांट देकर इस लायक बनाना चाहिए कि वे सार्वजनिक परिवहन के ढांचे को खड़ा कर सकें और उसके घाटे को उठा भी सकें। इसमें जितनी भी देर हो रही है उतना ही इस देश का और धरती का नुकसान हो रहा है।
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