आजादी की सालगिरह के मौके पर पाखंड से परे कुछ चर्चा हो


14 अगस्त
सुनील कुमार
आजादी की सालगिरह का मौका एक बार फिर आ खड़ा है। जितनी बार आज़ादी की बात होती है, उतनी ही बार यह भी याद पड़ता है कि आज़ादी कहाँ-कहाँ नहीं है। कहाँ-कहाँ ख़त्म हो रही है या कमजोर हो रही है। जश्न का मौका बहुत लोगों को लगता है, लेकिन हमको लगता है कि यह मौका आत्मविश्लेषण का है। आज़ादी क्यों अपने मकसद में पूरी नहीं हो पाई, कौन सी ताकतें हैं जो आज़ादी को बंधक बनाकर देश में ऐसे हालात पैदा कर रही हैं कि लोग भड़ास से भरे हुए हैं। आज़ादी के मौके पर बड़ी-बड़ी बातें तो होंगी लेकिन छोटे-छोटे लोगों का ऐसा हाल क्यों है, इस पर क्या लाल किले से कल प्रधानमंत्री कुछ कहेंगे?
हम बहुत ही दबे-कुचले और लूटे हुए लोगों की बात नहीं कर रहे, हमारे जैसे लोग जो कि देश के ऐसे तबकों से कोसों ऊपर हैं, वे भी देश में सता और ताकतवर तबके की लूट-मार देखकर हताश-निराश और भड़ास से भरे हुए हैं। लाल किले के पिछले बरस के भाषण के बाद से आज तक देश के लोगों ने सिवाय अपनी बर्बादी और लुटने के और क्या देखा है? यह किस किस्म की आज़ादी है? उनको लूटने की, और बाकियों को लुटने की? देश के, प्रदेशों की अदालतों में सरकारें, मंत्री, अफसर जिस किस्म के अपराधी साबित हो रहे हैं उनको देखकर आम लोगों को अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के अलोकतांत्रिक तौर-तरीके भी लोकतंत्र को बचने वाले लग रहे हैं, और उनके इर्द-गिर्द कुछ तो भीड़ जुट ही रही है। आज संसद के जिम्मे और उसके हक़ को पूरी तरह खारिज कर देने वाले कुछ सामाजिक नेता अगर जनता के एक तबके को देश बचने वाले लग रहे हैं, तो यह शून्य सत्ता चला रहे लोगों ने ही तो पैदा किया है। जिस संसद में लोकपाल बिल से अलग और बहुत से बनने या बदलने वाले कानूनों पर चर्चा होनी है, उस संसद को लगातार बंधक बनाकर भाजपा और उसके साथी जिस तरह देश के हितों की अनदेखी कर रहे हैं, उससे भी अन्ना-बाबा जैसे सनकी और तानाशाही अंदाज वाले लोगों को बढ़ावा मिल रहा है। यह तो ठीक है कि आज भ्रष्टाचार के खिलाफ इस आन्दोलन का निशाना सीधे सरकार की तरफ है, इसलिए बीजेपी या बाकी विपक्ष इसका मज़ा ले रहा है, लेकिन अन्ना में जऱा भी ईमानदारी होती तो कर्नाटक के साबित से हो चके 16 हज़ार करोड़ के भ्रष्टाचार पर उनका मुंह तो खुलता। लेकिन आम जनता इतनी निराश है कि वह अन्ना की बेईमानी को भी अनदेखा करने को इन्साफ मान रही है। वह बाबा के सैकड़ों करोड़ के संदिग्ध लेन-देन को भी अलग रख देना चाहती है। प्रधानमंत्री के पास मुंह तो एक ही है इसलिए हम यह तो नहीं कहेंगे की वे किस मुंह से कल लाल किले से देश के लिए बोलेंगे, लेकिन यह तय है कि यह मुंह कल इस देश को कुछ बोलने के लायक बचा नहीं है।
हम आजादी की सालगिरह के मौके पर फर्जी किस्म की, पाखंड भरी समारोही बातें करने को बेकार मानते हैं। ऐसे मौकों पर कड़वी हकीकत की चर्चा होनी चाहिए और आज कड़वी हकीकत यह है कि आजादी के बाद से आज यह पहला मौका है जब लाल किले से बोलने का दुनिया का यह सबसे बड़ा एक हक चोरों का एक सरदार इस्तेमाल करने जा रहा है। ऐसा सरदार खुद ईमानदार है या नहीं, उसका चाल-चलन कितना अच्छा है यह निहायत फिजूल की बात है जिसका कि जनता की त्रासदी से कुछ भी लेना-देना नहीं है। जब इस देश में भूख से पैदा कुपोषण की वजह से और इलाज न मिलने की वजह से करोड़ों लोग बेवक्त मर रहे हैं, और मरने के पहले बहुत बुरी जिंदगी जी रहे हैं तो उनके हकों पर दसियों हजार करोड़ का डाका कर्नाटक में भाजपा का मुख्यमंत्री डाले या लाखों-करोड़ का डाका यूपीए सरकार के मंत्री और अफसर डालें, गरीब जनता तो दो भ्रष्ट खेमों के बीच की एक कुश्ती दिल्ली में देख रही है तो एक मुंबई में या बेंगलुरू में। यह सिलसिला आजादी के मौके पर तेजाब सा तल्ख लगता है और झंडों के रंग के बीच, शहादत के गानों के बीच, कई किस्म के फर्जी भाषणों के बीच आम जनता का दिल तेजाब से और झुलस जाता है।
जिस तरह से देश भर में किसानों की जमीन लूटी जा रही है उसके खिलाफ अगर एक तरफ जंगलों में नक्सली बंदूकें लिए खड़े नहीं होते और दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट अगर अपनी बंदूक सरकार की कनपटी पर नहीं टिकाता तो क्या आज भूमि-अधिग्रहण के कानून में फेरबदल करने की बात भी हो पाती? हम न तो नक्सलियों की हिंसा को बर्दाश्त करने की बात करते, न ही हम अदालतों द्वारा आए दिन सरकार के कामकाज में दखल की बहुत तारीफ करते, और न ही हम अन्ना-बाबा जैसे लोकतंत्र से बेसमझ सामाजिक नेताओं के हिमायती हैं, लेकिन इस मौके पर यह बात तो बहुत साफ दिखती है कि ऐसा मिलाजुला दबाव अगर सरकार पर नहीं होता तो आज कलमाड़ी से लेकर राजा तक सब मनमोहन सिंह की गोद में बैठे, सोनिया गांधी की मंजूरी से देश को लूटते ही रहते।
आजादी के इस मौके पर हम देश की जनता से यह चाहेंगे कि कहां-कहां उसकी आजादी को कौन-कौन से देश लूट खा रहे हैं, इसके बारे में उसे सोचना चाहिए और पूरी नफरत के साथ उसे समाज के बाकी लोगों से बात करना चाहिए और इस नौबत से निकलने की राह तलाशनी चाहिए। हम एक बार फिर यह कहेंगे कि सबसे अधिक दबे-कुचले और बेइंसाफी झेल रहे आदिवासी इलाकों में चल रहे नक्सल राज से यह राह नहीं निकल सकती, अदालतें भी बहुत लंबे समय तक बहुत अधिक मामलों में बहुत अधिक बारीकी तक जाकर सरकार के काम में दखल नहीं दे सकतीं, और अन्ना-बाबा जैसे कई सामाजिक आंदोलनकारी कोई लंबा लोकतांत्रिक आंदोलन नहीं चला सकते क्योंकि उनका अभियान व्यक्ति केंद्रित है और भावनाओं के सैलाब पर ऊपर टंगा हुआ है। ऐसे में लोकतंत्र की मूलधारा के भीतर, चुनाव के रास्ते, संसद तक पहुंचकर, संविधान की व्यवस्था के तहत ही एक सुधार के बारे में सोचना चाहिए लेकिन हम जानते हैं कि हमारा ऐसा कहना आसान है, जनता का ऐसा कुछ सोचना लगभग नामुमकिन।
फिर भी हम सोचते हैं कि जिस तरह पिछले छह महीनों में दुनिया के कई देशों में जनता के ऐसे आंदोलन छिड़े हैं जिन्हें वहां की सरकारों के फौजी टैंक भी कुचल नहीं पाए, जहां हवाई हमले भी लोगों का हौसला खत्म नहीं कर पाए। बिना अधिक बारीक तुलना किए हुए हम सिर्फ इतना कहना चाहेंगे कि भारत के भीतर भी एक ऐसा लोकतांत्रिक आंदोलन छिडऩे की जरूरत है जो एक लोकतांत्रिक समझ पर भी टिका हुआ हो, न कि आज के जंतरमंतर और रामलीला मैदान की तरह का हो। जिम्मेदार राजनीतिक दल या लोकतंत्र पर भरोसा रखने वाले, लोकतांत्रिक तौर-तरीकों वाले सामाजिक संगठन ऐसा कुछ कर सकते हैं। अन्ना-बाबा के आंदोलन से हमें कोई बहुत अधिक लोकतांत्रिक उम्मीद नहीं दिखती लेकिन जनता के बीच भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने में उनका उसी किस्म का योगदान है जिस तरह आदिवासियों के शोषण को नक्सलियों ने एक मुद्दा बनाकर खड़ा किया ही है। ऐसे में आज एक नए जिम्मेदार आंदोलनकारी अगुवाई की जरूरत है जो कि देश के लोगों की भड़की हुई भावनाओं को एक सही राह पर ले जा सके।
स्वतंत्रता दिवस के इस मौके पर सरकारें अपनी कामयाबी के आंकड़े सामने रखेंगी। लेकिन इन आंकड़ों को हम पूरी तरह झूठे करार देंगे। इसलिए कि ये कागजों पर पहुंची हुई कामयाबी को तो बताएंगे लेकिन लूट न होने पर इस देश की, इसके प्रदेशों की संभावनाएं कितनी रहतीं, उसके बारे में ये कुछ भी नहीं कहेंगे। जो चोरी,  जो लूट, जो भ्रष्टाचार पकड़ में आ चुके हैं उनके आंकड़े समंदर में तैरते हुए बर्फ के उस पहाड़ की तरह के हैं जिसका एक छोटा हिस्सा ही पानी के ऊपर रहता है। पानी के नीचे का लगभग पूरा हिस्सा देश की किसी भी जांच एजेंसी या अदालत की पकड़ में नहीं आ सकता। इसलिए सोने की चिडिय़ा का नारा न सिर्फ इतिहास की एक कल्पना है बल्कि इस देश की आज की संभावना भी यही नारा है। इस संभावना को लूटकर ले जाने वाले लोग इस जुर्म की सुनवाई से अब तक इसलिए बचे हैं कि संभावनाओं की चोरी आसानी से न समझ आती न पकड़ आती। सीएजी ने जिस तरह 2जी घोटाले में संभावनाओं के नुकसान की बात कही थी, वैसा नुकसान पूरे देश में जगह-जगह हो रहा है जहां जनता के सोने को सरकारें लोहे के दाम पर और लोहे को मिट्टी के दाम पर बेच रही हैं।
सत्ता पर पहुंच चुके, किसी भी किस्म की ताकत पा चुके तबके से हम कोई उम्मीद नहीं कर सकते। सत्ताभोगी और सुविधाभोगी हो चुके ऐसे लोग सरकार और संवैधानिक पदों से परे भी कारखानों, कारोबार, और मीडिया जैसे गैरकारोबारी समझे जाने वाले कारोबार में ताकत की जगहों पर बैठे हुए हैं और वे अपने-आपमें एक सत्ता हैं। इन सबसे देश कैसे उबरेगा इस पर चर्चा के लिए ही आजादी की सालगिरह की यह छुट्टी रहेगी और इसे टीवी के सामने बैठकर गंवा देने वाली जनता बस लुटने की हकदार रहेगी।

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