1 अप्रैल 2014
संपादकीय
नरेन्द्र मोदी को लेकर मीडिया में यह आम बात है कि वे किसी पैने इंटरव्यू, या पैने सवालों के खिलाफ हैं, और वे सिर्फ एकतरफा बोलना चाहते हैं, जवाब देना नहीं चाहते। यह बात कुछ हद तक सही इसलिए है कि वे बहुत से धारदार अखबार वालों से बात नहीं करते, कुछ ऐसे इंटरव्यू भी पिछले बरसों में उन्होंने दिए, जिनके बीच से वे उठकर चले गए। इसलिए लोगों का यह मानना रहता है कि वे गुजरात दंगे जैसे नाजुक मुद्दे पर सवालों के जवाब देने से बचते हैं, और अपनी आमसभाओं की भीड़ के बीच वे मनचाहे मुद्दों पर मनचाही बात कहकर, किसी भी असुविधा से बचकर चले जाते हैं।
लेकिन जब भारतीय राजनीति में प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की बात करें, तो यह बात साफ होती है कि राहुल गांधी या सोनिया गांधी भी पैने सवालों से दूर रखे जाते हैं, और जब राहुल गांधी का सबसे चर्चित और प्रचारित इंटरव्यू होता है, तो भी उसमें दर्शकों और पाठकों के मन में खड़े हुए सबसे पैने सवालों में से कोई सवाल नहीं पूछा जाता। उससे जाहिर होता है कि ऐसे इंटरव्यू कुछ शर्तों के बाद ही शुरू होते हैं, और उन शर्तों को मानते हुए ही खत्म कर लिए जाते हैं। अपने आपको देश का सबसे बड़ा टीवी पत्रकार बतलाने वाला, हर किसी की धज्जियां उड़ा देने वाला भी जब राहुल गांधी के बड़े लंबे इंटरव्यू में सबसे तीखे हो सकने वाले दर्जन भर सवालों में से एक को भी नहीं छूता है, तो यह जाहिर है कि इंटरव्यू तय करवाने वालों के साथ यह किस तरह की मैच फिक्सिंग रहती है। इसके साथ-साथ लगे हाथों हम यह भी देखें कि सोनिया गांधी से कभी भी पैने सवाल नहीं किए जाते, और अभी जब कांग्रेस का घोषणापत्र जारी हुआ, तो शायद पहले से कुछ चुनिंदा पत्रकारों को चुनिंदा सवालों के साथ छांटकर तय करके रखा गया था, और उनकी बारी पूरी होते ही सवाल-जवाब खत्म कर दिए गए।
इसलिए राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेताओं तक पहुंच रखने वाले बड़े नामी-गिरामी पत्रकारों, और मीडिया हाऊसों की चुप्पी देखने लायक रहती है। हम अकेले मोदी की चुप्पी को कोसना नहीं चाहते, और न ही सोनिया-राहुल जैसे कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद के लायक दिग्गज नेताओं के साथ मीडिया की रियायत को अनदेखा करना चाहते। बड़े मीडिया-कारोबार, और सरकार पर आते-जाते रहने वाले बड़े नेताओं के बीच की सहमति लोकतंत्र के भीतर एक आपसी सहूलियत वाली चुप्पी रहती है, जो कि बाजार के कारोबार से लेकर राजनीतिक कारोबार तक, हर जगह जरूरी रहती है। इसलिए लोकतंत्र को एक पूरी आजादी की व्यवस्था मानकर चलना गलत होगा। यह सैद्धांतिक बात व्यवहार में एक सीमा के बाद दम तोड़ देती है। और जमाने से चलते आ रहा और पिटा हुआ एक लतीफा यह है कि एक पति घर में अपनी आजादी के बारे में कहता है कि उसे अपनी मर्जी का हर काम करने की आजादी है, बीवी की इजाजत से। इसी तरह भारतीय लोकतंत्र में मीडिया के बड़े कारोबार सारे पैनेपन, और सारी धार की पूरी आजादी है, सबसे ताकतवर लोगों को बख्शते हुए।
ऐसे ही मौकों पर आज सोशल मीडिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक कारगर और धारदार औजार बनकर उभरा है। भारतीय लोकतंत्र के तीन स्तंभों को संविधान के तहत दर्जा दिया गया है, और फिर मीडिया में खुद के लिए चौथे स्तंभ का दर्जा अपने हाथ से तख्ती लिखकर जुटा लिया। अब दो नए स्तंभ लोकतंत्र में जमीन फोड़कर निकल रहे हैं, सोशल मीडिया, और जनसंगठन। इन दोनों ही ने अपने-अपने बूते पर स्थापित नेताओं और स्थापित पार्टियों, सत्ता और ताकत के दूसरे तबकों के लिए चुभने वाली दिक्कतें खड़ी करना शुरू किया है। और इसके साथ-साथ इन तबकों ने जनता के मन में जो सवाल नहीं भी उठते हैं, उनको भी उठाने का काम किया है। भारतीय लोकतंत्र में सोशल मीडिया और जनसंगठन, जनआंदोलन, इन सबने पिछले बरसों में सरकार, राजनीति, संसद, और अदालतों की नाकामयाबी को खासा उजागर किया है। ऐसे में बड़े नेताओं को बख्श देने वाले स्थापित और परंपरागत मीडिया की भोथरी हो चुकी धार की जगह अब अराजकता की हद तक आजाद सोशल मीडिया ने एक नई धार पेश की है, जो आज लोकतंत्र के बाजार में सबसे तेज ब्लेड है।
(मीडिया) कारोबार और सरकार के बीच की नूरा-कुश्ती के चलते जो सवाल मोदी या राहुल से, सोनिया या किसी और से जब अखबारनवीस नहीं पूछते हैं, या उनको न पूछने की शर्त पर इंटरव्यू का मौका पाते हैं, और खुद अपनी जुबानी मीडिया का एक इतिहास रचने का दावा करते हैं, तब ऐसे न पूछे गए सवाल ट्विटर और फेसबुक पर छा जाते हैं, और बचे हुए नेताओं के सामने भी खड़े हो जाते हैं, और बचाने वाले मीडिया के सामने भी।

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