संपादकीय
2 फरवरी 2018

मोदी सरकार के कल आए बजट की जानकारियां सामने आने के बाद अब यह समझ आ रहा है कि किस तरह पेट्रोल और डीजल पर से एक्साईज ड्यूटी को कम किया गया, और इन्हीं चीजों पर सड़क और बुनियादी ढांचों के रख-रखाव के नाम पर एक सेस लगा दिया गया। कुल मिलाकर आम जनता की जेब से पेट्रोल-डीजल पर शायद उतना ही पैसा निकलेगा जितना इस ड्यूटी के घटने के पहले था, और उस ड्यूटी का हिस्सा राज्यों के साथ भी बांटना पड़ता था। अब केन्द्र सरकार सेस का पूरा पैसा खुद रखेगी। कहने के लिए यह रकम सड़कों और बुनियादी ढांचों पर खर्च होगी, लेकिन ये जिम्मेदारी तो केन्द्र सरकार की पहले से चली आ रही थी, आम जनता को अंधाधुंध महंगे किए गए पेट्रोल-डीजल के मामले में कोई भी राहत नहीं मिली है।
कोई चतुर या शातिर अकाऊंटेंट इसी तरह का एक तिलस्म खड़ा करते हैं जिसमें लोगों को लगता है कि सरकार ने तो रियायत की है। लेकिन इस मामले में केन्द्र सरकार ने जनता पर तो उतना ही बोझ डाला है, राज्यों की कमाई छीन ली है। यहां पर एक बात समझने की जरूरत है कि जब केन्द्र सरकार सस्ते डीजल-पेट्रोल पर पिछले तीन बरस में लगातार भारी-भरकम ड्यूटी लगाकर उसे राज्यों तक पहुंचने में खासा महंगा कर रही थी, तो उस महंगे ईंधन पर राज्यों को अपने आप बहुत अधिक टैक्स मिल रहा था। रूपयों की शक्ल में यह कमाई केन्द्र के महंगे किए ईंधन के साथ-साथ राज्यों को अधिक मिलते चल रही थी। ऐसे में राज्यों की यह जिम्मेदारी है कि वे पेट्रोल-डीजल पर राज्य का टैक्स कम से कम रखें। आज निम्न-मध्यम वर्ग के लोग भी दुपहिया का इस्तेमाल करके रोजगार के लिए आते-जाते हैं। उन पर इस महंगाई का खासा बोझ पड़ रहा है। महंगे ईंधन को लेकर विपक्ष में रहते हुए भाजपा के नेता तरह-तरह से प्रदर्शन करते थे, लेकिन मनमोहन सिंह सरकार के जाने के बाद मोदी सरकार ने अंतरराष्ट्रीय बाजार से सस्ता ईंधन पाकर उस पर बहुत अधिक ड्यूटी या टैक्स जोड़कर जनता तक भेजना शुरू किया है। यह सिलसिला टूटना चाहिए। हो सकता है कि राजस्थान की चुनावी नतीजों की जानकारी बजट से पहले मिल गई होती, तो हो सकता है कि सेस वगैरह लगाने में सरकार हिचकती। अभी सरकार की स्वास्थ्य बीमा जैसी किसी योजना को छोड़ दें तो केवल बड़े औद्योगिक और कारोबारी घराने इस बजट से खुश हैं, बाकी तमाम लोग नाराज हैं। एनडीए के साथी तेलुगुदेशम और शिवसेना ने तो खुलकर बजट का विरोध किया है, भाजपा से जुड़ा हुआ भारतीय मजदूर संघ भी इसके खिलाफ देश भर में आंदोलन की घोषणा कर चुका है।
कल हमने यह बात लिखी थी कि देश में इतनी अभूतपूर्व पकड़ रहने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस बजट को साहसिक पहल वाला नहीं बना पाए, और कल से आज तक बहुत से अर्थशास्त्रियों ने भी यह बात कही है। हमारा ख्याल था कि आयकर को कम करने या खत्म करने जैसा कोई क्रांतिकारी फैसला यह सरकार ले सकती है, लेकिन उसे जस का तस रखा गया। पूरी तरह बेअसर बजट को लेकर देश का शेयर बाजार भी गिर पड़ा है, और जनता के किसी भी तबके में इसे लेकर कोई खुशी नहीं है। मोदी सरकार ने इस बजट में अपना कोई भी छोटा सा भी करिश्मा दिखाने का साहस नहीं किया यह बात कल से आज तक चारों तरफ खुलकर सामने आ रही है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि पचास करोड़ लोगों को सालाना पांच लाख तक इलाज का बीमा देने की योजना का सबसे बड़ा फायदा बड़े-बड़े अस्पताल-कारोबारियों को ही मिलेगा। (Daily Chhattisgarh)

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