नेपाल के सबक, मौसम की सूचना साझा करने मजबूत वैश्विक ढांचा हो

31 अगस्त 2026  

 

नेपाल में अभी आई बाढ़ को लेकर एक सवाल यह उठ रहा है कि क्या चीन ने मौसम के ऐसे किसी खतरे की जानकारी नेपाल को समय रहते दी थी? फिर एक सवाल यह भी उठता है कि क्या खुद चीन को ऐसी कोई जानकारी मिली थी कि चीन-नेपाल सरहद पर किसी झील के किनारे का इतना विशाल हिमखंड टूटकर गिर सकता है जिससे नीचे नेपाल में बाढ़ आ सकती है? अब जब नेपाल इतनी बुरी प्राकृतिक आपदा से गुजर रहा है, तो यह सवाल एक बार फिर उठ रहा है। नेपाल के कुछ अधिकारियों का कहना है कि तीन महीने पहले काठमांडू में दोनों देशों के विशेषज्ञों, और अधिकारियों की एक बैठक हुई थी जिसमें बाढ़, मौसम, और ग्लेशियर से संबंधित खतरों की निगरानी करने, और निपटने के लिए सहयोग को मजबूत करने पर चर्चा हुई थी, लेकिन बैठक के बाद नेपाल को ग्लेशियरों के खतरों और जल स्तर के बारे में उतनी जानकारी नहीं मिली जितनी वे चाहते थे। इस बारे में चीन का कहना है कि हिमालय के क्षेत्र में खतरों की निगरानी करने में चीन और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। 

हम इसे चीन पर तोहमत लगाने के एक मौके की तरह नहीं देखते, क्योंकि धरती पर हर देश कम से कम अपने अड़ोस-पड़ोस के देशों से तो जुड़े हुए हैं ही, और जो अधिक ऊंचाई पर हैं उनसे इस तरह की बाढ़ की आपदा नीचे के देशों में आ सकती है, लेकिन भूकम्प तो किसी नीचे के देश से भी ऊपर के देश में जा सकता है। ज्वालामुखी का धुआं बिना देशों की ऊंचाई का ख्याल किए चारों तरफ फैल सकता है। समुद्री तूफान या सुनामी जैसी घटनाएं आसपास के कई देशों को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए मौसम से जुड़ी हुई प्राकृतिक आपदाएं देशों की सरहद में बंधी रहने वाली बात नहीं है। दूसरी तरफ हाल के बरसों में दुनिया की घटनाएं इस बात की गवाह हैं कि जलवायु परिवर्तन की मार उन देशों पर अधिक पड़ रही है जो कि जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे कम जिम्मेदार हैं। जिन देशों में खपत और प्रदूषण दोनों ही सबसे कम हैं, वे देश कहीं बाढ़ झेल रहे हैं, कहीं सूखा, और कहीं दोनों। इसलिए अब एक स्थाई असलियत बन चुके जलवायु परिवर्तन को लेकर भी देशों के बीच मौसम की जानकारी, चेतावनी, और मदद को बिना किसी दूसरे आधार के बढ़ाने की जरूरत है। भारत और पाकिस्तान जैसे देश, जिनके बीच आपस में फौजी तनातनी जारी है, या भारत और चीन के बीच, ईरान और उसके पड़ोसी देशों के बीच, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तरह-तरह की तनातनी चल रही है, लेकिन बेकाबू कुदरत से जुड़ी हुई जानकारियां पल भर में एक-दूसरे को देने की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का सम्मान सबको करना चाहिए। आज अंतरिक्ष में ऐसी ही व्यवस्था है, वहां स्पेस स्टेशन पर उन देशों के लोग भी एक साथ रहते हैं जिनके बीच धरती पर दुश्मनी है, या फौजी टकराव है। वैसा ही धरती पर मौसम से जुड़े हुए तमाम मुद्दों को लेकर करने की जरूरत है। 

दुनिया में जिस तरह विश्व स्वास्थ्य संगठन, डब्ल्यूएचओ है, उसी तरह विश्व मौसम विज्ञान संगठन, डब्ल्यूएमओ सूचना तंत्र भी है। इसमें मौसम, पानी, जलवायु, और दूसरे पर्यावरण अध्ययन की जानकारी एक-दूसरे से साझा करने की एक व्यवस्था है। अभी इस व्यवस्था के तहत एक-दूसरे से मिलने वाली सूचनाओं का पूरा-पूरा इस्तेमाल इसलिए नहीं हो पाता है कि शुरूआती चेतावनी मिलने पर भी खतरे में घिरे संबंधित देश में यह इंतजाम नहीं रहता कि वे खतरे की आशंका पाकर भी अपने लोगों को बचा सके। कई बार मौसम की जानकारी इतनी तकनीकी रहती है कि उसके जमीनी असर का अंदाज हर देश नहीं लगा सकते, और इसलिए सिर्फ आंकड़े कहीं पहुंच जाने पर वहां के स्थानीय वैज्ञानिक उनसे भविष्यवाणी नहीं कर सकते। इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे एक वैश्विक संगठन की जरूरत है जिसमें अधिकतर सक्षम देशों के वैज्ञानिक और विशेषज्ञ रहें, हर देश के मौसम विज्ञान केन्द्र से मिलने वाली जानकारियां रहें, और एआई की मदद से उनका विश्लेषण किया जा सके। कुछ अड़ोसी-पड़ोसी देश ऐसी आपसी व्यवस्था रखते भी हैं, जैसे भारत और नेपाल के बीच बाढ़ प्रबंधन के लिए एक संयुक्त टीम, और बाढ़ की भविष्यवाणी करने वाली कमेटियां काम कर रही हैं। नेपाल, भूटान, और चीन के साथ द्विपक्षीय सूचना लेन-देन का इस्तेमाल किया भी जा रहा है। लेकिन अब एक आशंका यह है कि हिमालय के क्षेत्र में लगातार बढ़ते हुए तापमान की वजह से ऐसे और ग्लेशियर भी टूटकर गिर सकते हैं जिनसे इसी तरह की, या इससे और अधिक भयानक बाढ़ आ सकती है, तबाही आ सकती है। इसलिए जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ बढ़े हुए खतरों, और नए खड़े हुए खतरों को भी देखते हुए मौसम सूचना केन्द्रों से अधिक जानकारी की जरूरत है, उनके बेहतर विश्लेषण की भी जरूरत है, और एआई इसमें मददगार भी हो सकता है। 

हमारे पास ऐसा मानने की कोई वजह नहीं है कि चीन ने ग्लेशियर टूटने की जानकारी रहते हुए भी नेपाल को नहीं दी होगी। यह इलाका दोनों देशों की सरहद पर है, आबादी से दूर का पूरी तरह निर्जन इलाका है, और हो सकता है कि ऐसी हलचल चीनी नजरों में आए बिना भी पहाड़ों में हो गई हो। एक बार जब ग्लेशियर टूटकर झील में गिर गया, नदी में बाढ़ आ गई, तो उसके बाद तो सब कुछ मिनटों का ही खेल था। बाढ़ तो आते हुए दिखती है, तबाही के वीडियो दर्ज होते हैं। लेकिन जिस तरह जलवायु परिवर्तन से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सूखा पड़ रहा है, भारत में ही अभी कुछ बरस पहले गेहूं की फसल के दौरान जिस तरह लू से तबाही हुई थी, जिस तरह जलवायु परिवर्तन के चलते टिड्डी दल दुनिया में जगह-जगह हमले कर रहे हैं, और उपमहाद्वीप पार करके भी दूसरे इलाकों में चले जा रहे हैं, वह सब कुछ मौसम की मार के अलग-अलग चेहरे हैं। मौसम का अध्ययन, और चेतावनी का इंतजाम एक पहलू है, बचाव का इंतजाम दूसरा पहलू है, लेकिन ये दोनों ही मुसीबत आने के बाद के मामले हैं। मुसीबत की मार को कम करने के लिए जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को घटाना, उसे रोकना जरूरी है। चीन की ऐसी कोई नीयत नहीं हो सकती कि वह नेपाल को डूबकर मर जाने दे, आज मुसीबत में वह एक पड़ोसी की जिम्मेदारी से नेपाल के साथ खड़ा हुआ है। फिर भी ऐसी वैश्विक व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जिससे जानकारी का विश्लेषण हर संबंधित देश तक पहुंचाया जा सके। फिर मौसम की ऐसी बुरी मार को देखते हुए देशों को भी चाहिए कि वे अपना शहरी या दूसरे किस्म का विकास उन इलाकों में न करें जहां इस किस्म की प्राकृतिक मुसीबत आ सकती है। आज तो यह ग्लेशियर से पैदा बाढ़ दिख रही है, लेकिन नाजुक पहाड़ों पर बनने वाले बड़े-बड़े बांधों से भी कभी भी ऐसी मुसीबत आ सकती है, क्योंकि अगर वे बांध टूटेंगे, तो नीचे नदी के किनारे बसे हुए कोई शहर-कस्बे, गांव नहीं बच पाएंगे। इसलिए अब मौसम की अधिकतम बुरी मार के मौजूदा पैमानों को छोडक़र, और बहुत अधिक बुरी मार की सोचकर दुनिया को विकास की अपनी योजनाओं में आशंकाओं को एक बड़ा पैमाना बनाना पड़ेगा। 

(Daily Chhattisgarh)   

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