30 अगस्त 2026

सोनिया गांधी के संस्मरणों की किताब लबालब खबरों में है। पेंगुइन नाम के एक अंतरराष्ट्रीय प्रकाशक की भारतीय शाखा ने कहा जा रहा है कि इस किताब को छापने से मना कर दिया है क्योंकि सोनिया के लिखे हुए में संपादन या फेरबदल की मंजूरी नहीं दी गई थी। अभी इन दोनों पक्षों की तरफ से इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है, प्रकाशक ने एक गोलमोल बयान जारी किया है जो कि कांग्रेस के कई नेताओं के आरोपों पर एक कारोबारी का स्पष्टीकरण है। पेंगुइन ने किताब प्रकाशन के कारोबार में जरूरी संपादन और लेखक और संपादक के बीच के कामकाज के तरीके को गिनाया है, जिसे समझे बिना भी लोग तरह-तरह की बातें कर सकते हैं। फिलहाल तो सोनिया गांधी की यह किताब अपने डिजिटल संस्करण में शायद दस दिन में ऑनलाईन बिक्री के लिए आ रही है, और यह तय है कि दुनिया के कई बड़े प्रकाशक उनकी किताब छापने के लिए एक पैर पर खड़े होंगे। ऐसे में हम सोनिया की किताब को लेकर और खबरों, उसके और अंशों का इंतजार करेंगे, लेकिन साथ-साथ नेताओं या सार्वजनिक जीवन के दूसरे लोगों के संस्मरणों, या उनकी आत्मकथा के बारे में थोड़ी सी चर्चा होनी चाहिए।
मैं जाने कितने ही दशक से इस बात की वकालत करते आ रहा हूं कि जिन लोगों ने सार्वजनिक जीवन में लोगों के बीच जगह बनाई या पाई है, उन्हें अपने संस्मरण जरूर ही लिखने चाहिए। यह बात समाज के प्रति उनकी जवाबदेही की भी रहती है, हालांकि यह बात हमेशा बहुत सहूलियत की नहीं रहती। चुनिंदा संस्मरण लिखना तो एक किस्म से आसान रहता है, लेकिन जब आत्मकथा लिखी जाती है तो उसके तो बहुत सारे पहलू बड़ी असुविधा के रहते हैं। आलमारी से निकलकर कंकाल मानो सामने नाचने लगते हैं। अपने ही कभी किए हुए, जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे कुकर्म मुंह चिढ़ाने लगते हैं कि हमारा जिक्र छोड़ तो नहीं दोगे? कई काली यादें आकर खड़ी हो जाती हैं कि मैं हूं न! ऐसे में आत्मकथा भला कोई कैसे लिखे? और फिर जब आप किसी भी पेशे में ऊपर, और ऊपर होते चले जाते हैं, जब आप शिखर पर पहुंच जाते हैं, तो मानो आपका गमछा ही हवा में उडऩे लगता है, कुछ भी अनदेखा नहीं रह जाता, और जिंदगी के इस लंबे सफर में जितने लोगों ने आपको पहले देखा हुआ है, वे सब आप पर कुछ न कुछ कहने के हकदार हो जाते हैं। इतनी बड़ी जवाबदेही के साथ लिखना अपने खुद के लिखे हुए पर सवाल उठाने सरीखा रहता है, जितने जवाब आप लिखने का सोचते हैं, कई बार उससे अधिक सवाल उठ जाते हैं।
लेकिन गांधी से लेकर हिटलर तक, और गोडसे से लेकर आज के किसी संन्यासी तक, हर किसी को यह हक रहता है कि वे अपनी बात लिखकर, या बोलकर जाएं। और फिर यह हक ही नहीं रहता, यह एक जिम्मेदारी भी रहती है। मैं बीते कुछ बरसों से मुझे मिलने वाली कविता या साहित्य की किताबों के लिए मना करते आ रहा हूं कि मैंने उन्हें आमतौर पर नहीं पढ़ पाता। दूसरी तरफ कोई दोस्त किताबों की अपनी भीड़ कम करते रहते हैं, तो मैं उनसे बेशर्मी से यह अनुरोध कर लेता हूं कि अगर वे किसी की आत्मकथा या जीवनी, संस्मरण या यात्रा-वृत्तांत किसी को देना चाहते हैं, तो मैं हूं न। अब और किसी किस्म की किताबों को अधिक पढऩे की न हसरत रह गई, न जरूरत रह गई। बस यही लगता है कि अपने खुद के संस्मरण लिखना हो जाए, तो जिम्मेदारी का एक कतरा पूरा हो जाएगा। इसीलिए कभी कोई मुझसे बात करना चाहते हैं, छापने के लिए या किसी शोधकार्य के लिए इंटरव्यू लेना चाहते हैं, तो मैं खुशी-खुशी वक्त निकाल लेता हूं कि अपने देखे-सुने, और अपने गुजरे-भोगे हुए का कुछ लेखा-जोखा तो छोड़ जाऊं।
सार्वजनिक जीवन में लोगों को शोहरत मिलती है, कुछ को दौलत भी मिलती है। ऐसे में समाज के प्रति उनकी जवाबदेही रहती है कि वे अपने देखे हुए की यादें छोड़ जाएं। जो चर्चित लोग लिख नहीं पाते, उनके लिए भी हमेशा से ही अदृश्य लेखकों की सुविधा रहते आई है जिनमें उनकी कही हुई बातों को सुनकर कोई लेखक लिखते हैं। यह लिखना भी अलग-अलग कई दर्जों का रहता है, कुछ लोग कही हुई बातों को ज्यों का त्यों लिखकर, या टाईप करके दे देते हैं, और वे टाइपिस्ट या स्टेनोग्राफर अधिक रहते हैं, वे घोस्ट राइटर के तबके में नहीं गिने जाते। दूसरी तरफ घोस्ट राइटर रहते हैं जो बुनियादी रूप से लेखक रहते हैं, और जो बातों को सुनकर अपने हिसाब से किताब पूरी कर देते हैं, यह उस प्रमुख व्यक्ति और घोस्ट राइटर के बीच का रहता है कि उसका नाम जाए, या न जाए। यह पूरी तरह से आपसी सहमति की बात रहती है।
जीवनी या संस्मरण की एक और किस्म रहती है जिसे अधिकृत जीवनी कहा जाता है। इसे लेखक लिखते तो अपने हिसाब से हैं, लेकिन जिस व्यक्ति की जीवनी है, उसके सक्रिय सहयोग से जानकारी जुटाई जाती है, और इसलिए किताब छपने के पहले उसे दिखाई जाती है, और वे उस किताब में लिखी बातों से सहमत रहते हैं। यह दर्जा स्टेनोग्राफर से ऊपर का रहता है, उसके भी ऊपर के घोस्ट राइटर के ऊपर का रहता है, और स्वतंत्र जीवनी लेखक के नीचे का रहता है। स्वतंत्र जीवनी लेखक वो होते हैं जो कि किसी की जीवनी उन्हें दिखाए बिना भी लिखते हैं, और इसके साथ यह खतरा भी जुड़ा रहता है कि जिसकी जीवनी है, वे ही उसकी कई बातों का खंडन-मुंडन कर दें।
यह तो मैंने कुछ अधिक प्रचलित विधाएँ गिनाई हैं, और इसकी जरूरत इसलिए पड़ रही है कि सोनिया गांधी की यह किताब उनकी खुद की लिखी किताब की तरह ही सामने आ रही है, इसमें हो सकता है कि कोई टाइपिस्ट रहे हों जिन्होंने उनके डिक्टेशन को सुनकर टाईप कर दिया हो। यह भी हो सकता है कि उनके भरोसेमंद कोई प्रेत लेखक हों जिन्होंने उनकी बातें सुनकर फिर अपनी जुबान में उसे ढाला हो। जो भी हो, किसी की अधिकृत जीवनी सामने आए, आत्मकथा या संस्मरण सामने आएं, मुझे वह बहुत अच्छा इसलिए लगता है कि उसके साथ विश्वसनीयता का एक दर्जा जुड़ा रहता है। यह विश्वसनीयता तथ्यों की नहीं, बल्कि कथन की रहती है। किसने कहा है, यह साफ-साफ दिखता है, सच कहा है या नहीं कहा है, यह तय करना पाठकों का भी अधिकार रहता है, या फिर जिन लोगों का जिक्र ऐसी किताबों में रहता है, उनका भी रहता है।
मैं एक लेखक की हैसियत से किसी भी तरह के लेखन को बुरा नहीं मानता। अपनी आत्मकथा लिखना तो अच्छी बात है ही, किसी और के लिए डिक्टेशन लेना भी बुरी बात नहीं है, उसे उसी तरह लिखकर, या टाईप करके दे देने से मुझे लेखक का दर्जा तो नहीं मिलता, लेकिन रूबरू सुनने का एक सुख और अनुभव जरूर मिलता है। अगर प्रेत लेखक की तरह किसी की आत्मकथा, या उसके संस्मरण लिखने का मौका मिलता है, तो या तो नाम मिलता है, या दाम मिलता है, और सबसे अच्छी नौबत रहती है कि दोनों ही मिल जाएं। किसी की पूरी जीवनी अपने दम पर लिखना खासा मुश्किल काम रहता है, उसके लिए बरसों की रिसर्च लगती है, और फिर भी विवाद का खतरा तो बने ही रहता है। इसलिए कुछ समझौता करके कुछ लोग एक अधिकृत जीवनी लिखते हैं, ताकि जिसकी जीवनी है, उससे तो विवाद कम से कम न रहे, बाकी तो कोई भी अच्छी किताब, या अच्छा लेखन पूरी तरह विवादमुक्त हो नहीं सकते।
आज इस कॉलम को लिखते हुए मुझे मेहनत जरा भी इसलिए नहीं लग रही है कि मैं इन्हीं सब विधाओं को बीते कुछ बरसों से पढ़ रहा हूं, और इन दिनों एक बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति के छोड़े गए आत्मकथ्यात्मक नोट्स को एक आत्मकथा, या जीवनी में ढालने का काम भी कर रहा हूं। एक और दूसरे महत्वपूर्ण व्यक्ति के बहुत से इंटरव्यू करके अभी इस विचार-विमर्श के बीच हूं कि क्या इस पर मैं उनके लिए उन्हीं के नाम से प्रेत लेखन कर दूं? उन्होंने इस पहले विकल्प को खारिज कर दिया। अब हम दो दूसरे विकल्पों के बीच में फंसे हुए हैं कि यह उनकी अधिकृत जीवनी बने, या फिर मैं उनकी सहमति, और अनुमति के बिना भी अपनी मर्जी की और सामग्री तय करके पूरी तरह से एक स्वतंत्र जीवनी लिखूं। इन दो किताबों में वक्त जाने कितना लगेगा, लेकिन दोनों अलग-अलग किस्म से लिखी जानी हैं, और इन्हें पूरा करते हुए मैं कुछ अनुभवसंपन्न हो जाऊंगा, और कुछ आर्थिकसंपन्न हो रहा हूं, यह तो तय है ही। जिस काम को मैं मुफ्त में भी खुशी-खुशी करता, उस काम के लिए भुगतान पाना कितनी अच्छी बात है! अब सोनिया गांधी से किसी को भुगतान मिला है या नहीं, ये तो वे ही बता सकती हैं, या पाने, या न पाने वाले बता सकते हैं। पता नहीं यह बात कभी उजागर होगी या नहीं, लेकिन इतना तो तय है कि सोनिया की किताब से कई दूसरी बातें जरूर उजागर होंगी, और यही करना सार्वजनिक जीवन में मिले सम्मान से उऋण होना होता है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें