30 अगस्त 2026
मीडिया, सोशल मीडिया, और मैसेंजर सर्विसों के इस दौर में काम की बात तक पहुंच पाना थोड़ा सा मुश्किल रहता है। जिस तरह किसी राह पर चलते हुए अगर दाएं-बाएं कंटीली झाडिय़ां हैं, तो उनके बीच से गुजरते हुए कपड़े फंसने लगते हैं, कांटे हाथों को चुभने लगते हैं। पार पाना थोड़ा सा मुश्किल रहता है। उसी तरह आज हर किसी को पढऩे, देखने, और सुनने के लिए इतना कुछ हासिल है, और तकरीबन सब कुछ मुफ्त भी है, कि क्या देखा-सुना जाए, और क्या छोड़ा जाए, यह बड़ा मुश्किल चुनाव होता है। कुछ बातें जरूरत की रहती हैं, कुछ बातें मनोरंजक रहती है, कुछ बातें सतह पर सनसनीखेज दिखती हैं लेकिन बाद में बिना झाग वाली फुसफुसी निकलती हैं। कुछ बातें मादक या उत्तेजक रहती हैं, और वे कुछ वयस्क मनोरंजन देती हैं। कई बातें बड़े-बड़े मेडिकल दावों की शक्ल में रहती हैं कि किस चीज का पानी सात दिन तक पीने पर किस तरह डायबिटीज या कैंसर ठीक हो जाते हैं। कुछ बातें पूंजीनिवेश की दावों की शक्ल में रहती हैं कि अजीम प्रेमजी, या निर्मला सीतारमन ने अपनी पूंजी किन शेयरों, या क्रिप्टोकरेंसी में लगाई, अपनी दौलत कितने हजार गुना बढ़ाई, और अब वे किस तरह दूसरों को इसी तरह के पूंजीनिवेश की सलाह दे रहे हैं। ऐसा सैलाब सोशल मीडिया पर है, और मैसेंजरों से भी यह बरसते रहता है। लोगों के दिमाग की हालत एक सुनामी में समंदर किनारे फंसे हुए इंसानों सरीखी हो जाती है, जो किसे थामे, और किसे छोड़ें, यह उनकी समझ के बाहर रहता है। ठीक ऐसा ही आज नजरों और दिमाग के साथ होता है जिनके इर्द-गिर्द हर तरफ से वांछित, और अवांछित हर किस्म की पोस्ट और संदेश बरसते रहते हैं।
अभी 20-25 बरस पहले तक का ही तो दौर था जब लोगों को कुछ अखबार, और कुछ टीवी चैनलों में से एक-दो को छांटना रहता था, और मोबाइल पर कोई संदेश भी टाईप करना हो, तो एक-एक बटन पर तीन-तीन अक्षर रहते थे, और उसी बटन को तेजी से एक, दो, या तीन बार दबाकर उन अक्षरों में से किसी को छांटा जा सकता था। सुख के वे दिन चले गए, और अब तो लोग मनचाही तस्वीरें या वीडियो गढक़र, शब्दों का मतलब भी जाने बिना पोस्ट कर सकते हैं, और एक-एक पोस्ट दंगा करवाने के लिए काफी भी हो सकती है। खासकर धर्म, या गाय, या किसी धार्मिक किताब, या झंडे-डंडे को लेकर तुरंत ही बवाल खड़ा हो सकता है। और लोग हैं कि उन्हें बारूद या आरडीएक्स की तरह की विस्फोटक बातें लिखकर पोस्ट करते हुए जरा भी हिचक नहीं होती। दरअसल बड़े बुजुर्ग एक लाईन कहते थे, जैसा खाओ अन्न, वैसा होए मन। कुछ दूसरे लोग कहते थे कि किसी व्यक्ति की पहचान उसकी संगति से होती है। अलग-अलग किस्म की ऐसी कहावतों का निचोड़ यही रहता है कि लोग जिस तरह की बातों से घिरे रहते हैं, वैसे ही हो जाते हैं।
कभी-कभी हमें हैरानी भी होती है कि आज सूचना और सामग्री की सुनामी के बीच में समंदर से जितना कचरा आकर किनारे इकट्ठा हो जाता है, उसमें से खूबसूरत शंख, और सीप, काम की चीजें कोई कैसे देख पाते हैं! जब हर किस्म का सैलाब चारों तरफ से आकर दिल, दिमाग, कान, आंख, और कुल मिलाकर समझ पर थपेड़े मारते रहता है, तब कोई संभल कैसे पाते होंगे? आज सोशल मीडिया कंपनियों के एल्गोरिदम इस किस्म के हैं कि आप चार दिन जिस सामान के इश्तहार को देखें, तो अगले चौदह दिन इंटरनेट पर आपको वही सामान, या दूसरे ब्रांडों का वह सामान दिखते रहेगा। आप चार दिन कोई वयस्क रील देख लें, तो चौदह दिन तक आपको उसी किस्म की वयस्क रील दिखती रहेंगी, सोशल मीडिया का एल्गोरिदम यह समझ जाएगा कि आपको एक महिला के कपड़ों का नाप लेता हुआ दर्जी देखना बड़ा सुहाता है। इस तरह हम एक ऐसे जाल और पिंजरे के भीतर कैद हो जाते हैं कि हमें बस वही पूरी दुनिया लगने लगती है। जिस तरह रेशम का कीड़ा एक ककून के भीतर कैद रह जाता है, हम उसी तरह अपनी पसंद के एक घेरे के भीतर कैद रह जाते हैं, और सोशल मीडिया चारों तरफ से हमें उसी तरह की चीजों से घेरकर रखता है। उसका कारोबार ही यही है कि लोगों को अधिक से अधिक समय तक किसी भी तरह की तरकीब से अपने घेरे में घेरकर रखना। यही काम वह करता है।
ऐसे में लोग आज क्या करें? अखबार और टीवी चैनल जैसे कुछ या खासे पुराने हो चुके माध्यमों के मुकाबले आज के तरह-तरह के माध्यम लोगों पर हमला कर रहे हैं। ऐसे में हम सोचते हैं कि लोगों की पसंद कहां पर है? कुछ लोगों को लग सकता है कि सोशल मीडिया, और इंटरनेट पर वे अपनी पसंद की चीजों को देख सकते हैं, लेकिन वे यह नहीं देख पाते कि उनकी पसंद को भांपकर टेक्नॉलॉजी यह तय कर रही है कि वे आगे क्या देखेंगे। इसके मुकाबले छपे हुए अखबारों का वह वक्त कितना भला था जिसमें अखबार खबरों के पन्ने तय कर सकता था, पन्नों पर खबरों को ऊपर-नीचे तय कर सकता था, लेकिन अखबार यह तय नहीं कर सकता था कि पाठक किस क्रम में चीजों को पढ़ेंगे, पहले कौन से पन्ने देखेंगे, किस चीज पर कितना वक्त लगाएंगे। वह छपकर आता था, चौबीस घंटे में रद्दी में जाता था, लेकिन लोगों को पसंद का एक मौका देता था कि वे क्या पढ़ें, कितनी देर पढ़ें, और फिर पढक़र दूसरों से अगर चर्चा करनी है, तो दिमाग को कुछ बातों को याद भी रखना पड़ता था। आज तो हालत यह है कि जो खुद को पसंद हो, उसे अगर दूसरों को बढ़ाना हो, तो याद रखना तो दूर रहा, पूरा पढऩे या देखने की जरूरत भी नहीं पड़ती है। पल भर में उसका लिंक सैकड़ों-हजारों लोगों को भेजा जा सकता है। फिर उन हजारों लोगों के सिर पर भी जब यह पत्थर पड़ता है, तो कम से कम कुछ सेकेंड तो उन्हें इस पर लगाने ही पड़ते हैं। मतलब यह कि आपने बिना देखे सिर्फ हैडिंग पढक़र, या कवर-पोस्टर देखकर दूसरों को जो भेज दिया, वे लोग जरूरी नहीं हैं कि उसे बिना पढ़े जिंदा रह पाएं, वे उसे देखने में, सुनने में वक्त गवाएंगे, और हो सकेगा तो दूसरों तक आगे भी बढ़ाएंगे। अखबारों को पढ़ते हुए यह सुविधा नहीं रहती थी कि उसे काटकर उसकी कतरन सौ लोगों को भेज दी जाए। लोगों का वक्त, और उनकी जिंदगी बर्बाद करने की यह सहूलियत स्मार्टफोन की टेक्नॉलॉजी ने ही मुहैया कराई है। इसलिए लोगों को ठंडे दिल से यह सोचना चाहिए कि अखबार उनका क्या-क्या भला करता था। वह दिमाग पर यह जिम्मेदारी डालता था कि वे छपे हुए बहुत सारे पन्नों में से किस पन्ने पर छपी कौन सी खबर, कौन सा लेख, या कौन सा इश्तहार देखे। यह तय करना दिमाग पर कुछ जोर डालना होता था। जब टेलीविजन के बुलेटिन आने लगे, तो यह जिम्मेदारी खत्म हो गई। कोई एक चैनल जिस क्रम से खबरों को दिखाता है, लोगों को उसी सिलसिले से खबरें देखनी पड़ती हैं, और आगे-पीछे करने की अखबारी पसंद अब नहीं रह गई। दूसरी बात यह कि खबर को याद रखने की अब कोई जरूरत नहीं रह गई क्योंकि जब जहां आप हैं, पखाने में बैठे हुए भी आप अपनी पसंद के धार्मिक प्रवचन, राजनीतिक भाषण, नाच-गाने के वीडियो दूसरों को भेज सकते हैं, कुछ भी याद रखने की जरूरत नहीं है। दिमाग का इस्तेमाल कम से कम होते चल रहा है। एक वक्त टेलीविजन को ईडियट बॉक्स कहा जाता था, आज के स्मार्टफोन को उसके मुकाबले क्या कहा जाए? यह तो अपने ही दिल-दिमाग की डाल पर बैठे हुए अपने ही स्मार्टफोन से उस डाल को काटने सरीखी हरकत नहीं लगती कभी-कभी?
नेपाल की अभी बाढ़ के बाद वहां के जमीनी हालात दिखाने के लिए किसी खुले इलाके के बीच कीचड़ का दलदल दिखाने के लिए भारत से गए हुए टीवी रिपोर्टरों में से एक-एक करके शायद एक ही जगह पर अपने पांव धंसाकर शहादत का दर्जा पा रहे हैं। माइक थामे हुए टीवी कैमरे के सामने एक महिला संवाददाता 6 इंच कीचड़ में खड़ी हुई लगातार चीख रही है कि बाढ़ से दलदल इतना हो गया है कि वह निकल नहीं पा रही है। उसका घुटना जींस के भीतर भी कीचड़ से डेढ़ फीट ऊपर दिख रहा है, लेकिन वह अपने को घुटनों तक धंसा हुआ कहती जा रही है। लुग्दी से बने कागज पर छपने वाले अखबारों के रिपोर्टर कैमरे और माइक से दूर रहते थे, कोई सुबूत नहीं रहते थे, फिर भी ऐसा और इतना झूठ नहीं बोलते थे जितना कि आज कैमरों के सामने बोलते हैं। इन सब बातों से लगता है कि सूचना और सामग्री की सुनामी से पहले छपे हुए अखबार एक मजबूत और भरोसेमंद पसंद रहते थे जिनमें संवादाताओं के सनसनीखेज, और झूठे नाटक की गुंजाइश भी नहीं रहती थी। कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन...
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