25 सितंबर 2026
कर्नाटक के मुखर नौजवान भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या की पत्नी ने अभी अपने एक ट्रेन सफर को लेकर रेलवे से शिकायत की, और सोशल मीडिया पर खुलकर अपनी बात लिखी। शिवश्री ने लिखा कि जिस डिब्बे में वो सफर कर रहीं थीं उसमें करीब 40 अधेड़ पुरूष थे जो कि पूरे समय जोर-जोर से बातचीत और हंसी-मजाक करते रहे। फिर इनमें से कोई एक कार्ड-गेम खेलते रहे और उस पर हल्ला करते रहे। वे फिल्मी गाने भी गाने लगे, और 5 घंटे तक इतना हल्ला-गुल्ला झेलना उनके लिए भारी पड़ा। उन्होंने इसके बारे में रेल अधिकारी से शिकायत करके दूसरे डिब्बे में सीट मांगी, लेकिन वह नहीं मिल पाई। तब उन्होंने सोशल मीडिया पर खुलासे से अपनी तकलीफ के बारे में लिखा है। चूंकि यह भाजपा के एक बहुत चर्चित सांसद की पत्नी का लिखा हुआ है, इसलिए यह भी नहीं माना जा सकता कि यह केंद्र सरकार की ट्रेन की एक बद्इंतजामी के बारे में राजनीतिक साजिश के तहत लिखा गया हो।
यह हाल हिंदुस्तान की अधिकतर सार्वजनिक जगहों का रहता है जहां पर लोग अपने नाजायज अधिकारों को लेकर गुंडागर्दी की हद तक तैयार रहते हैं, और बाकी लोगों के जायज अधिकारों को कुचलना भी अपना हक समझते हैं। किसी भी सार्वजनिक जगह पर दो-चार लोग भी अगर जुट जाते हैं, तो वे जानवरों के किसी रेवड़ से भी अधिक बुरे हो जाते हैं। जानवरों के रेवड़ जोर-जोर से हंसते, चीखते, ट्रेन के डिब्बों में दारू पीते, या जुआं खेलते नहीं दिखते। वे खेलते भी नहीं। वे बस अधिक से अधिक इतना करते हैं कि बारिश से भीगी हुई मिट्टी में जब सडक़ किनारे बैठना मुमकिन न हो, तो वे सूखी सडक़ पर मजबूरी में बैठते हैं और आए दिन गाडिय़ों से कुचलकर खत्म भी हो जाते हैं। इंसान तो किसी मैदान, या बगीचे में बैठकर जब एक साथ जोर-जोर से हंसने का काम करते हैं, तो आसपास के लोगों का जीना हराम हो जाता है। जब रातभर पढ़ाई करने के बाद बच्चे सुबह-सुबह कुछ नींद करना चाहते हैं, तब उनके घर के आसपास इंसान इस कदर चीख-पुकार मचा देते हैं कि न नींद मुमकिन रहती, न बच्चों और बूढ़ों का आराम मुमकिन रहता। हम अपने आसपास के कई ऐसे बगीचे देखते हैं जहां सुबह घूमने, योग, या कसरत करने गए हुए लोगों को अनदेखा करके लोगों का एक जत्था लाउडस्पीकर लगाकर किसी धर्म का शोर करने लगता है, माइक पर चीखने लगता है।
फिर दुनिया के कई देशों के ऐसे वीडियो लगातार आते ही रहते हैं जहां लोकल ट्रेन, बस, ट्राम के भीतर, या फिर एयरपोर्ट जैसी जगह पर गए हुए हिंदुस्तानी सैलानियों के जत्थे भारत की किसी धुन को बजाते हुए समूह नृत्य करने लगते हैं। डिब्बों में उनके साथ बैठे हुए लोगों का जीना हराम हो जाता है, और उन विदेशियों के चेहरों पर खीझ और हिकारत साफ दिखती रहती है, लेकिन एक बड़े जत्थे के सामने वे अकेले कुछ नहीं कर सकते, फिर चाहे वे अकेले अपने देश में क्यों न हों, और ऐसे जत्थे परदेशी ही क्यों न हों। अभी एक भारतीय विमान में जिस तरह से एक साथ सफर कर रहे मुसाफिरों ने पूरे प्लेन में अपने लोगों को जिस तरह से खाना खिलाया, उससे विमान के बाकी मुसाफिर हक्का-बक्का रह गए, कर्मचारियों ने इस जत्थे को रोकने की कोशिश की, लेकिन दर्जनों लोगों के साथ गिने-चुने विमान कर्मचारी भी कितना लड़ सकते थे? बाद में यह खबर आई कि इन सारे मुसाफिरों को उस एयरलाइंस ने ब्लैकलिस्ट में डाल दिया है, यानी अगले कुछ महीनों तक वे उस कंपनी के विमानों पर सफर नहीं कर सकेंगे। जब किसी ट्रेन में किसी धार्मिक यात्रा के लोग चलते हों, कोई बारात चल रही हो, और तो और बड़ी संख्या में पुलिस, या सेना, या अर्धसैनिक जवान चल रहे हों, तो वे बाकी मुसाफिरों से जैसा चाहे वैसा बुरा बर्ताव कर सकते हैं। इसके अलावा भी जहां कहीं सैलानियों का जत्था जरा सा बड़ा होता है वे तमाम जगहों पर अपना मालिकाना हक सा दिखाने लगते हैं। अभी एक ट्रेन का वीडियो सामने आया था जिसमें ऊपर की बर्थ पर बैठा हुआ एक आदमी वहां अपने ईष्टदेव की फोटो सामने रखकर दीया जलाकर, घंटी बजाकर पूजा कर रहा है, और जब आसपास के लोग उसे डिब्बे में दीया जलाने के लिए मना कर रहे हैं, तो उसके कानों में मानो आपत्तियां पड़ ही नहीं रही हैं। इसी तरह मुंबई की लोकल ट्रेन में गणेश के मौके पर एक डिब्बे में प्रतिमा ही स्थापित कर दी जाती है, और चलती ट्रेन में सैकड़ों मुसाफिर आरती गाते रहते हैं, घंटी, मंजीरा, और ढोलक बजाते रहते हैं। अभी एक नया नजारा और देखने मिला जब एक चलती ट्रेन में एक मुसाफिर डिब्बे के भीतर ऊपर की बर्थ पर देवी प्रतिमा को स्थापित कर दिया गया था, और लोग पूरी धूमधाम से पूजा करने में लगे हुए थे। ऐसे ही कई और वीडियो भी है जिनमें किसी धर्म, या आध्यात्मिक संगठन के किसी प्रमुख व्यक्ति के सफर करने पर रेल डिब्बों के भीतर भजन-कीर्तन होने लगते हैं। यह कल्पना इनमें से किसी को परेशान नहीं करती कि इन्हीं डिब्बों में कोई बीमार भी सफर कर रहे होंगे, जिन्हें इलाज के लिए कहीं ले जाया जा रहा होगा, और उनका पता नहीं क्या हाल होगा।
हिंदुस्तानियों में, यहां के अधिकतर लोगों में सार्वजनिक जीवन में जीने का शऊर नहीं है। और यह दूसरे प्रदेशों में, दूसरे देशों में जाकर और खटकने लगता है। भारत के भीतर तो लोग धर्म, राजनीति, जाति-संगठन, आध्यात्मिक संस्थाओं की अराजकता को देखने के आदी हो ही गए हैं। कई जगहों पर सडक़ों पर एंबुलेंस फंस जाती हैं, और मरीज मर भी जाते हैं। कई जगहों पर इस कदर शोरगुल होता है कि लोग मर जाते हैं। सार्वजनिक जगहों पर दूसरों के हक का, और अपनी जिम्मेदारी का सम्मान करने के लिए लोगों के भीतर सभ्यता की जरूरत रहती है, जो कि आत्मगौरव से लबालब इस हिंदुस्तान में बहुत ही कम दिखती है। लोग आसपास महिलाओं की मौजूदगी, बच्चों के मौजूद रहने को अनदेखा करते हुए गालियों की जुबान में बात करते हैं, धक्का-मुक्की करते हैं। हाल के दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से लगातार ऐसे वीडियो सामने आए हैं जिनमें साथ घूमते हुए बालिग, या नाबालिग लडक़े-लड़कियों पर आसपास के जत्थे यौन हमले कर रहे हैं, उन्हें पीट रहे हैं, और उनके वीडियो भी बना रहे हैं। इन दिनों अपने ही जुर्म के वीडियो बनाने का चलन खासा चला हुआ है क्योंकि बहुत से लोगों को यह लगता है कि उनका यह काम उनकी ताकत का एक सुबूत है। बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो सार्वजनिक जगहों पर किसी कर्मचारी को खंभे से बांधकर पीटते हैं, तो अभी उत्तर भारत में कहीं पर बिजली चोरी पकडऩे के लिए गए हुए बिजली कर्मचारी को पूरा गांव मिलकर पीट रहा था, और इसके वीडियो भी बना रहा था। हिंदुस्तान में अब ऐसा लगने लगा है कि वीडियो सुबूत से किसी को डर नहीं रह गया है, बल्कि उनको सिर्फ यह लगता है कि इस वीडियो को देखने वालों पर उनकी गुंडागर्दी चलती रहेगी।
हिंदुस्तानी एक राष्ट्र के रूप में भी दुनिया में कई जगह अपने देश का नाम डुबाने में लगे रहते हैं। अपनी जिस किसी संस्कृति पर इन लोगों को अपार गर्व रहता है, उसी संस्कृति के इस हिस्से के बारे में भी सोचना चाहिए कि क्या यह अपार शर्मिंदगी की वजह नहीं है? भारतीय संस्कृति को लेकर लोग कई बार हिंसक हो जाते हैं, ऐसे लोगों को हिंसा का उन्माद नीचे आने पर यह सोचना चाहिए कि वे एक राष्ट्रीय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शर्मिंदगी की कौन-कौन सी हरकतें करते हैं, और उनसे उन्हें सिवाय एक हिंसक संतुष्टि के और क्या हासिल होता है?
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें