इस स्वघोषित सफेदपोशी में अदालत तुरंत दखल दे

7 जुलाई 2011
यूपीए सरकार की अब तक की भागीदार डीएमके के कुकर्म खत्म होने का नाम ही नहीं रहे हैं और न ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कुकर्मियों के मुखिया बने रहने में कुछ बुरा समझ रहे। इस तरह केंद्र सरकार की ही एक जांच एजेंसी सीबीआई के घेरे में आ चुके डीएमके के एक और पूरी तरह और बुरी तरह भ्रष्ट दिख रहे केंद्रीय मंत्री दयानिधि मारन आज भी मंत्री बने हुए हैं और उनकी इस्तीफे की महज चर्चा ही चल रही है। जब सीबीआई का जांच-नतीजा दो दिन पहले ही सामने आ चुका है तो उसके बाद अब तक मारन का इस्तीफा न होना मारन और डीएमके के लिए तो बेशर्मी की बात है ही, यह सरदार मनमोहन सिंह के लिए बेअसरदार साबित होने की एक और बात भी है। एक के बाद एक यूपीए घोटाले सामने आ रहे हैं और मनमोहन सिंह अपने निजी कुर्ते और जाकिट को दिखाते हुए खड़े हैं कि वे खुद कितने ईमानदार हैं। यह लोकतंत्र के साथ एक बड़ा मजाक चल रहा है और केंद्र सरकार की ऐसी  हरकतें भी इस देश में नक्सलियों से लेकर अन्ना-बाबा तक कई अलग-अलग किस्म के विरोधों को जगह दे रही है।
सोनिया गांधी और राहुल गांधी अपने-आपको अपने चुनिंदा प्रधानमंत्री के साथ मिलकर जिस तरह और जिस कदर साफ-सुथरा दिखाना चाहते हैं, वह चाहत किसी जमीन पर नहीं टिकी है। वह एक लुभावनी लोकप्रियता पाने की उनकी हसरत पर तो टिकी है लेकिन हकीकत की जो जमीन किसी भी सच्चाई को अपने पैरों के नीचे लगती है वह सोनिया गांधी की अगुवाई में न यूपीए को हासिल और न ही कांगे्रस को। एक के बाद एक जितने बड़े-बड़े घोटाले इस देश को लूटने के सामने आए हैं और उनमें से हर किसी के बारे में वक्त रहते सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को बताया जा चुका था, उन्हीं की पार्टी या सरकार के लोगों ने बताया था, और उसके बाद हजारों करोड़ के घोटालों से लेकर लाख करोड़ तक के घोटालों तक तमाम डकैती होती रही और यह साफ-सुथरी दिखाई जा रही टोली चुपचाप बैठी रही। अभी-अभी एक मामला सामने आया जो कि इस मुद्दे पर पहले कई बार हमारी लिखी हुई इन्हीं बातों  के बाद आया है। मणिशंकर अय्यर सहित तीन मंत्रियों ने कलमाड़ी के भ्रष्टाचार के बारे में मनमोहन सिंह को बहुत पहले चि_ी लिख दी थी और उसकी प्रधानमंत्री की तरफ से पावती भी अभी छपी है। इस गरीब देश की भूखी जनता के हक को जिस प्रधानमंत्री और जिस यूपीए मुखिया की छत्रछाया में उनकी पार्टी और गठबंधन के लोगों ने लूट खाया, वे सफेदपोश बने मंचों पर सजे रहते हैं और कांगे्रस का भविष्य उत्तरप्रदेश में घूम-घूमकर मायावती की सरकार को कोस रहा है। क्या राहुल गांधी की समझ अब इतनी हो गई है कि वह राजा, कलमाड़ी और मारन जैसे डकैतों के बारे में अपनी राय दे सके? अगर नहीं तो अधेड़ हो चुके इस बच्चे को दिग्विजय सिंह किस आधार पर देश का प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं? वैसे अपनी गठबंधन सरकार, अपने मंत्रियों के कुकर्मों पर चुप रहना इस देश में प्रधानमंत्री बने रहने की राह में रोड़ा नहीं है यह तो मनमोहन सिंह साबित कर ही चुके हैं।
अगर सोनिया गांधी में राजनीति की ईमानदारी के लिए जरा भी सम्मान है और अपने नेहरू-गांधी कुनबे के अकेले सिद्धांतवादी पुरखे जवाहर लाल नेहरू की यादों के लिए जरा सा सम्मान है तो उन्हें अपने इस गठबंधन के लिए एक आचार संहिता तुरंत बनाकर सारे साथी दलों के साथ उस पर सहमति लेकर उसे सार्वजनिक करना चाहिए। अब यह वक्त आ गया है कि यूपीए सरकार के मंत्रियों और कांगे्रस पार्टी की बाकी अनादर्श सरकारों के लिए यह तय कर लिया जाए कि किस-किस अपराध के सुराग किस-किस हद तक पहुंचने पर पार्टी और सरकार अपने लोगों पर क्या-क्या कार्रवाई करेगी। उसके मंत्री या मुख्यमंत्री किन-किन अपराधों में गले-गले तक डूब जाने के बाद हटाने के लायक माने जाएंगे और किन-किन अपराधों में किस ऊंचाई तक डूबे रहने पर पार्टी उनको बचाती रहेगी, यह खुलासा देश की जनता के सामने होना चाहिए।
हमें ऐसा एक भी कारण नहीं दिखता है जो कि मनमोहन सिंह को नैतिकता के आधार पर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहने का हक देता हो। इस प्रधानमंत्री ने इस देश को जिस हद तक लुट जाने दिया है, वह अभूतपूर्व है और पचास फीसदी से अधिक की उस आबादी के साथ बलात्कार सरीखा है जो कि गरीबी की रेखा के नीचे है। अब सफेदपोशों के पाखंड का वक्त खत्म करने का समय है और इस देश में इस बात के लिए इस मौके पर अकेली अदालत ही मददगार दिख रही है। हमारा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट खुद इस मामले में दखल देकर ऐसे लोगों के मंत्री बने रहने के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर सकता है। आज देश की जनता कार्यपालिका के काम में न्यायपालिका के ऐसे अभूतपूर्व हस्तक्षेप का स्वागत करेगी क्योंकि लोकतंत्र को बचाना कार्यपालिका के अधिकारक्षेत्र को बचाने से अधिक जरूरी है। इस स्वघोषित सफेदपोशी में अदालत तुरंत दखल दे।

तेलंगाना में देरी अब नाजायज

6 जुलाई 2011
तेलंगाना राज्य के आंदोलन की रफ्तार बढ़ते जा रही है। दरअसल पिछले बरस जब केंद्रीय गृहमंत्री ने अचानक ही तेलंगाना बनाने की घोषणा कर दी थी तो वह अधपके से भी कम पका हुआ ख्याल था। वह एक किस्म की चूक थी और उसके तुरंत बाद इस सरकार ने जस्टिस श्रीकृष्णा को इस मुद्दे पर एक आयोग के तहत रिपोर्ट बनाने कहा था। उस रिपोर्ट की सिफारिशों से भी कोई बात बनी नहीं क्योंकि उसने सीधे-सीधे कोई हल नहीं सुझाया गया था और बहुत से विकल्प सामने रख दिए गए थे। लेकिन तेलंगाना का उबाल केंद्र के सामने अब बहुत अधिक विकल्प नहीं रख रहा है। सत्तारूढ़ यूपीए गठबंधन के जो भी लोग तेलंगाना के इलाके में आते हैं उनके सामने भी सिवाय इसके और कोई रास्ता नहीं है कि वे जनभावनाओं के मुताबिक संसद और विधानसभा से इस्तीफे देकर इस राज्य निर्माण के लिए दबाव डालें और वह दौर भी अब शुरू हो चुका है इसलिए इस मुद्दे को केंद्र सरकार और अधिक वक्त तक नहीं दबा पाएगी और उसे इस पर फैसला जल्द लेना होगा, और अगर उसे तेलंगाना में अपने अस्तित्व को बचाए रखना है तो उसे यह फैसला राज्य निर्माण के पक्ष में ही लेना होगा।
हम यहां पर तेलंगाना राज्य के पक्ष या विपक्ष में उन बारीकियों में जाना नहीं चाहते जिन पर किसी लंबे लेख में ही अधिक जानकारी लिख पाना मुमकिन है। हम छोटे राज्य के निर्माण के अनुभव पर कुछ चर्चा करना चाहते हैं और तेलंगाना के खास संदर्भ में ऐसे अनुभव जोड़कर देखना चाहते हैं। भारत में आजादी के बाद से जब-जब राज्यों का विभाजन हुआ तब-तब बहुत से दूसरे इलाकों में भी राज्य का दर्जा पाने की हसरत आगे आई। इसमें तेलंगाना आजाद भारत के इतिहास में सबसे बड़ी, सैकड़ों जानों की, शहादत देने वाला इलाका था। देश में कम से कम दर्जन भर ऐसे इलाके हैं जो दुनिया के बहुत से देशों से बड़े हैं और भारत के कई राज्यों से बड़े हैं। उनके दावे के पीछे भाषा, भूगोल, अर्थव्यवस्था जैसे कई तर्क भी सही लगते हैं। लेकिन समय रहते केंद्र सरकारों ने राज्य पुनर्गठन आयोग नहीं बनाया। सन् 2000 में जब तीन नए राज्य अटल सरकार ने बनाए तब भी देश के बाकी कई इलाकों को राज्य बनाने के आंदोलन देखते हुए भी ऐसा कोई आयोग नहीं बनाया गया और हर राज्य में अलग-अलग दर्जे के आंदोलन चलते रहे। पाठकों को यह याद होगा कि छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड को राज्य बनाने के पीछे एक आधार यह बनाया गया था कि इनके मूल राज्यों में विधानसभाओं में इनको अलग राज्य बनाने के प्रस्ताव पहले ही पारित कर दिए थे और वे प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास पहले से पड़े हुए थे। लेकिन इसके बाद से किसी और राज्य से न तो ऐसा कोई प्रस्ताव आया और न ही केंद्र सरकार ने मधुमक्खी के छत्ते को और अधिक हिलाया। लेकिन तेलंगाना का आंदोलन आज एक जलती हुई हकीकत है जिसे अनदेखा करना और अधिक मुमकिन नहीं है।
हम छोटे राज्यों के अनुभव की बात कर रहे थे। छत्तीसगढ़ में बैठे हुए हम मध्यप्रदेश के भोपाल की गुलामी से आजाद होने के फायदे देख रहे हैं और इन दस बरसों का हमारा अनुभव यह है कि जिस तरह अंगे्रजों के राज में लंदन में बैठी हुई ब्रिटिश सरकार भारत का शोषण करती थी, उसी तरह भोपाल में बैठी सरकारें उस वक्त भी छत्तीसगढ़ के शोषण में जुटी हुई थीं जब यहां के दो-दो कांगे्रसी नेता बरसों तक अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। इस इलाके के मुख्यमंत्री रहते हुए भी इस इलाके को कभी उसका हक नहीं मिला। लेकिन पृथक छत्तीसगढ़ के लिए किसी किस्म का कोई वजनदार आंदोलन एक दिन भी नहीं चला और इस इलाके को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के एक फैसले से राज्य का दर्जा मिल गया। तब से लेकर अब तक एक राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ ने जो तरक्की की है, उसका कोई सपना भी भोपाल-राज में छत्तिसगढिय़ा ने नहीं देखा था। लेकिन इसी के साथ ही जो झारखंड भी नया राज्य बना उसकी बदहाली भी देखते ही बनती है। जिस तरह वहां दलबदल, सत्तापलट, जनता की दौलत को सीधे मुख्यमंत्री के स्तर पर लूट खाने का सिलसिला चला उससे लोगों को लगा कि छोटा राज्य कितना बुरा भी हो सकता है। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में वैसा दलबदल नहीं हो पाया जिससे कि सरकार गिर पाती, हालांकि उसके लिए कोशिश पूरी हुई। और न ही यहां पर मधु कोड़ा जैसा हाल हो पाया। अब उसके पीछे राजनीतिक दलों की स्थिरता का योगदान रहा या फिर राज्य के बड़े नेताओं की पार्टी और सरकार पर पकड़ ऐसी रही कि छोटा राज्य होने के बाद भी सरकार नहीं पलटी, इतने बारीक कारणों पर हम यहां जाना नहीं चाहते। तो तीन में से इन दो राज्यों के परस्पर विपरीत अनुभव, दोनों ही देश के सामने और तेलंगाना के बारे में सोचते हुए लोग यह भी सोचते हैं। दूसरी एक बात जो तेलंगाना राज्य के आड़े आ रही है वह है आंध्रप्रदेश की मौजूद राजधानी हैदराबाद का तेलंगाना के इलाके में होना। आंध्रप्रदेश के तेलंगाना के बाहर के लोग अगर एक बार तेलंगाना के अलग हो जाने के लिए तैयार हो भी जाएंगे तो भी वे हैदराबाद के एक बड़े व्यापार, रोजगार और अर्थव्यवस्था के केंद्र के रूप में, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के रूप में शेष आंध्रप्रदेश से बाहर जाने देने नहीं चाहेंगे।
लेकिन हम यहां पर बारीकियों की चर्चा करना नहीं चाहते और केंद्र सरकार को यह सलाह देना चाहते हैं कि तेलंगाना राज्य का निर्माण करने की इस नौबत के पहले उसके पास राज्य पुनर्गठन आयोग के लिए काफी समय था जिसका कोई इस्तेमाल उसने नहीं किया। इसलिए अब और कोई बहाना बनाए बिना उसे सीधे इस राज्य को बनाना होगा। इसमें आने वाली दिक्कतों के लिए किस तरह के राजनीतिक और सरकारी समझौते उसे आंध्र के इन दो प्रस्तावित हिस्सों के बीच करवाने होंगे यह यूपीए सरकार, और मोटेतौर पर कांगे्रस पार्टी का सरदर्द है। लेकिन तेलंगाना को अब राज्य का दर्जा पाने का पूरा हक है और इसमें देर गलत होगी। इसके साथ-साथ देश के दूसरे हिस्सों में ऐसे आंदोलन शुरू हों, उसके पहले ही राज्य पुनर्गठन आयोग बनाकर उससे तेजी से रिपोर्ट लेनी चाहिए। इस देश में अमरीका की तरह करीब पचास राज्यों की गुंजाइश है और उससे ही यह देश अमनचैन से रह सकेगा, तरक्की कर सकेगा।

गुलाम नबी आजाद का कमसमझी का बयान

5 जुलाई 2011
भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने कल एक कार्यक्रम में यह कहकर सनसनी फैला दी कि समलैंगिकता एक बीमारी है जो कि भारत में तेजी से फैल रही है। उन्होंने एड्स की रोकथाम के लिए हुई एक बैठक में कहा कि समलैंगिक सेक्स जो पहले विकसित देशों में ही अधिक होता था वह अब बदनसीबी से भारत में भी आ गया है और अब यहां पर ऐसे लोग पर्याप्त संख्या में हो गए हैं। उन्होंने कहा कि समलैंगिकता अप्राकृतिक है लेकिन भारत में मौजूद है और यहां तेजी से बढ़ रही है जिससे कि इसकी शिनाख्त मुश्किल हो रही है। भारत में समलैंगिकता के आंदोलनकारी केंद्रीय स्वास्य मंत्री के इस बयान से स्तब्ध हैं और वे इसे दुर्भाग्यजनक मानते हैं। भारत में संयुक्त राष्ट्रसंघ के स्वास्थ्य मामलों पर काम करने वाले प्रतिनिधि आनंद ग्रोवर ने मंत्री के बयान पर कहा-'यह बहुत दुर्भाग्यजनक, अफसोसजनक है और एक मंत्री के मुंह से ऐसा बिल्कुल भी मंजूर नहीं किया जा सकता। यह बयान एक ऐसे तबके के प्रति संवेदनाशून्य है जो कि समाज में वैसे भी खतरे झेल रहा हैÓ।
गुलाम नबी आजाद की बात भारत के एक बड़े तबके को पसंद आएगी जो कि परंपरागत तरीके से समाज-व्यवस्था को जारी रखना चाहता है और जो कि समलैंगिकता जैसे बहुत से दूसरे मामलों के खिलाफ एक बहुत दकियानूसी नजरिया रखता है। भारत में तकरीबन तमाम बड़े धर्म समलैंगिकता के खिलाफ हैं। इन धर्मों के इतिहास में समलैंगिकता की चाहे जो जगह रही हो, इन धर्मों को मानने वाली बिरादरियों के बीच इतिहास में किसी समय चाहे इनके लिए कितना ही बर्दाश्त रहा हो या न रहा हो, आज समाज में समलैंगिकता को मान्यता बहुत कम है। इसलिए गुलाम नबी आजाद ने जो बात कही है वह बहुमत को लुभावनी लगने वाली दकियानूसी बात है जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने कुछ महीने पहले ही एक फैसला दिया है और समलैंगिकता को अपराध के दर्जे से बाहर कर दिया है। भारत सरकार ने अब तक उस फैसले के खिलाफ कोई अपील न करके चुप रहकर एक किस्म से यह साबित किया है कि वह समलैंगिकता की ओर से आंखें मूंद ले रही हैं, और अदालती फैसले के खिलाफ न अदालत जा रही और न ही संसद में इस फैसले के खिलाफ कोई कानून बना रही है। लेकिन एक केंद्रीय मंत्री की कही ऐसी बात बहुत ही अवैज्ञानिक, अन्यायपूर्ण और अप्रासंगिक भी है। आज जब तमाम वैज्ञानिक शोध और सामाजिक अध्ययन यह साबित कर चुके हैं कि समलैंगिकता कोई बीमारी नहीं है और न ही यह कोई दूसरे किस्म की मानसिक दिक्कत है। ऐसे में भारत के स्वास्थ्य मंत्री का ऐसा बयान अगर तर्कपूर्ण ढंग से लिया जाए तो वह मंत्री के इस विभाग से हटा देने का पर्याप्त कारण बन सकता है क्योंकि जिस मंत्री की अपने विभाग से जुड़े हुए मुद्दों पर ऐसी अन्यायपूर्ण और अवैज्ञानिक सोच है उसे देश के स्वास्थ्य का मंत्रालय चलाने का हक कैसे दिया जा सकता है? हम केंद्र सरकार से यह उम्मीद करेंगे कि वे अपने मंत्री की इस चूक को ठीक करने वाला बयान जारी करे और समलैंगिकों के इस छोटे तबके के साथ भेदभाव वाले दूसरे फैसले भी वापिस ले या बदले।
समलैंगिकता की हकीकत को अनदेखा करने वाले लोग ऐसी पसंद वाले लोगों को खतरनाक बीमारियों की तरफ धकेलते हैं। जब ऐसे लोगों को समाज हिकारत से देखते रहेगा तो उनकी हिम्मत भी इलाज के लिए जाने की नहीं होगी। अभी कुछ महीने पहले तक तो पुरूष समलैंगिकों के लिए कैद की सजा का इंतजाम भी था जिसे कि सुप्रीम कोर्ट ने खत्म किया। आज जब दुनिया लोगों की पसंद का सम्मान करते हुए समलैंगिकता को मान्यता दे रही है और कुछ विकसित देशों में ऐसे लोगों के बीच शादियां भी पूरे कानूनी तरीके से हो रही हैं, तो भारत को भी अपनी सोच में एक व्यवहारिक बदलाव लाना चाहिए। सरकार के किसी जिम्मेदार व्यक्ति के ऐसा कहने पर देश के साधारण लोग इसे और खतरनाक मान लेंगे और समाज में ऐसे लोगों का जीना मुश्किल हो जाएगा।
जो लोग भारतीय समाज में लोकतांत्रिक और निजी अधिकारों के लिए लड़ते हैं उनके लिए गुलाम नबी आजाद एक निशाना बनकर सामने आए हैं और इस बहाने ही सही इस पर चर्चा बढऩी चाहिए।


 

छोटी सी बात

बहुत से लोग शिष्टाचार में न्यौता दे देते हैं। लेकिन उसे मान लेने के पहले सोच लें कि क्या आपके ऐसे संबंध हैं कि उनसे इतना अहसान लें? शिष्टाचार के जवाब में आपको भी शिष्टाचार में एक-दो बार मना करना चाहिए। इसके जवाब में आपको पता चल जाएगा कि न्योता कितना गंभीर था और कितना औपचारिक था।

रायबहादुरों का अन्नाकरण

4 जुलाई 2011
लोकपाल बिल को लेकर राजनीतिक दलों में एक बात को लेकर सहमति नजर आती है कि कोई भी नया कानून सिर्फ संसद बनाए। अब तक किसी ने भी सरकार को इस बात के लिए नहीं कोसा है कि उसने अन्ना हजारे की टोली की बात अनसुनी की है। कल खुद अन्ना हजारे यह कहते दिखे कि एक बार विधेयक संसद पहुंच जाए तो फिर उन्हें कुछ नहीं कहना रहेगा।
दरअसल अन्ना हजारे या उनकी तरह के बहुत से सलाहकारों के साथ एक सी ही दिक्कत रही है। जब उनकी बात पूरी तरह से नहीं सुनी जाती तो वे विचलित हो जाते हैं। फिर कुछ तो ऐसे सलाहकारों का अहंकार होता है, जैसा कि अन्ना के मामले में है, और कुछ लोगों की कमसमझी होती है, जैसे कि अन्ना के मामले में है, वे अपनी राय को ही अंतिम सच मान लेते हैं। अपने खुद के किए दावों के घेरे में ऐसे बहुत से लोग उलझ जाते हैं। ये तो ठीक है कि अन्ना के बहाने बीजेपी और एनडीए के बाकी दल कांग्रेस और यूपीए की फजीहत का मजा ले रहे हैं, और अन्ना के बहाने ये मौका भी उन्हें मिला हुआ है, लेकिन आज दिख ये रहा है कि 16 अगस्त से एक और अनशन की मुनादी करने वाले अन्ना हजारे के हाथों में आज कोई मुद्दा दिख नहीं रहा है। जब लोकपाल बिल पर संसद में ही चर्चा होनी है, इस पर सभी दल सहमत हैं, तो फिर संसद के अंगने में अन्ना का क्या काम।
लेकिन अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की इंजन अपनी भाप खो चुकी है, और मीडिया को समझ आ गया है कि इनके चेहरे देखते ही लोग अब चैनल बदलने लगे हैं, इसलिए ये दोनों अब हाशिये की तरफ बढ़ चुके हैं। संविधान की इन दोनों की समझ बहुत ही सीमित है, और लोकतंत्र के लिए सम्मान भी इनके मन में बहुत कम है, इसलिए इनका आत्मकेंद्रित, स्वमोहित अभियान ऐसे ही अंत का हकदार था। लेकिन हम इस बहाने सलाहकारों की ऐसी सोच के बारे में चर्चा करना चाहते हैं।
बहुत से अखबारनवीसों या सत्ता तक पहुंच वाले लोगों को रायबहादुर बनने का शौक रहता है। लोकतंत्र में यह वैसे तो हर इंसान का हक भी है और जिम्मा भी, कि वे समझदारी की सलाह दें, लेकिन जब ऐसी सलाह जन कल्याण से अधिक उनके अपने अहंकार से जुड़ जाती है, तो मामला गड़बड़ाने लगता है। हमने ऐसे कई सलाहकार, और अक्सर बिन मांगी सलाह देने वाले लोग, देखते हैं जो पहले तो एक हमले के अंदाज में ताकत की कुर्सियों को सलाह देते हैं, और फिर अपनी बात पूरी की पूरी मांग न लिए जाने पर अन्ना बन जाते हैं। कुछ लोग ऐसे नेताओं और अफसरों के खिलाफ एक अभियान ही छेड़ देते हैं जो उनकी कोई बात पूरी तरह न माने। ऐसे बहुत से लोग भड़ास में जीने लगते हैं और उनकी बातों में उनके लिए नफरत भर जाती है जो कि पूरी सलाह नहीं मानते। उनके लिखने में या भाषणों में, ये नफरत झलकने लगती है। हमारा मानना रहता है कि बिन मांगे सलाह देने वालों को अपना रुख उस वक्त की तरह रखना चाहिए जो मंदिर जाकर ईश्वर से सब कुछ मांग तो लेता है, लेकिन मांगों की फेहरिस्त पूरी न होने पर ईश्वर को गालियां देना शुरू नहीं कर देता। इतना हक सिर्फ फिल्म दीवार के अमिताभ बच्चन को मिलना चाहिए। बाकी इंसानों को समझदारों की तरह रहना चाहिए।
कुछ लोगों का यह भी मानना रहता है कि जो उन्हें पता है, वही पूरा सच है। अपनी सीमित जानकारी को ही वे पूरा सच मान लेते हैं। और अपनी इसी खुशफहमी के शिकार होकर वे अपने शहर, अपने प्रदेश के अन्ना या बाबा बन जाते हैं। ऐसे लोग अपने नारों पर खुद ही इस कदर फिदा हो जाते हैं, कि उन्हें अपनी तर्कों में कोई खामी नहीं दिखती। उन्हें लगता है कि उनकी नीयत(?) तर्कों का विकल्प है। किसी की सोच अच्छी हो सकती है, लेकिन वह सोच जब तक देश और दुनिया की बाकी सोच के साथ बहस के लिए तैयार न हो, तक तक उस सोच का कोई वजन नहीं होता। एक दूसरी दिक्कत यह आती है कि जिन लोगों को लोकतंत्र की पूरी समझ नहीं होती वे उसके अपने हाथ आए पहलू को ही पूरा लोकतंत्र मान बैठते हैं। जैसे देख न पाने वालों को जब एक हाथी के इर्द-गिर्द खड़ा किया गया, तो किसी ने पैर छूकर कहा कि हाथी ऐसा है, किसी ने सूड़ को छूकर कहा कि नहीं, हाथी तो बिल्कुल अलग है। किसी के हाथ दुम आई...एक बड़ी दिक्कत बहुत से लोगों के साथ यह है कि वे लोकतंत्र की अपनी बहुत जरा सी समझ को पूरा लोकतंत्र मान लेते हैं।
समाज में मीडिया या ऐसे जो दूसरे तबके जमात तैयार करने में काम आते हैं, उनका ये जिम्मा होता है कि लोगों के अधूरे तर्कों के साथ लोकतंत्र के बाकी हिस्सों को भी लोगों के सामने रखें। लेकिन टीवी समाचारों से पहले जानकारी मिलने के इस जमाने में बहुत से लोग इस पहली सूचनाओं को पूरी खबर मान लेते हैं, और उनके आधार पर अपनी सोच बनाने लगते हैं। तकलीफ की एक बात यह भी है कि पेशेवर नेताओं और पेशेवर पत्रकारों से परे, समाज के बहुत से बाकी समझदार तबकों में से बहुत कम लोग अन्ना-बाबा जैसे मुद्दों पर मुंह खोलते हैं। पढ़े-लिखे या समझदार ऐसे लोगों का पढऩा या उनकी समझ के अधिक काम की नहीं होती अगर उबलते हुए देश में भी उनका पेन न खुले या उनका मुंह न खुले।
इसलिए सलाहकार, खासकर बिना बुलाए सलाहकार अपने को कुछ कम समझें, और समाज के बाकी समझदार तबके अपने बोलने की जिम्मेदारी को कुछ अधिक समझें, बिना कोई खुशफहमी पाले।
 

छोटी सी बात

छोटी सी बात
किसी बात को करना ही हो, तो उसे लिखकर सामने रखें। याददाश्त एक सीमा से अधिक काम नहीं आती। फिर इंसानी याददाश्त जिस रफ्तार से बढ़ती है, उससे हजार गुना रफ्तार से पिछली सदी में काम बढ़े।

इंटरनेटी अदालत और कथित बुद्धिजीवी जज

3 जुलाई 2011
नीरज ग्रोवर हत्याकंाड में तीन साल की अपनी सजा काटकर छूट गई मारिया सुसईराज, और उनके साथी नौसेना के पूर्व अधिकारी को दी गई सजा पर पूरे देश में हर मंच पर चर्चा छिड़ी हुई है। नीरज ग्रोवर के परिवार वाले अदालते के इस फैसले से नाखुशी जाहिर करते, यह बात समझ में आती थी, लेकिन पूरे देश का खासोआम इस मौके पर मारिया को कोसने के बहाने देश की न्यायापालिका पर, न्यायिक प्रक्रिया पर जैसे लातें बरसाने में जुटे हैं। पुलिस तो इस देश के लोगों को यंू भी सस्ते में  मिली हुई है, जिसकी काबीलियत पर जो भी ,जब चाहे जो भी बोल सकता है। नीरज ग्रोवर के मामले में मारिया को कथित रूप से मिली कम  सजा का दोष पुलिस के निकम्मेपन पर डाला जा रहा है, यह विचारे बिना कि यह पुलिस ही थी जिसने इस हत्याकांड के सुराग ढूंढकर अपराधियों को उनके अंजाम पर पहुंचाया। हमेशा सनसनीखेज खबरों की तलाश में रहना मीडिया का पेशा, और जरूरत दोनों है, लेकिन  बड़े-बड़े विचारक माने जाते लोग, जिन्हें गंभीर मुद्दों पर टेलिविजन पर चर्चा के लिए बुलाया जाता है, जिनकी बातें लोग ध्यान से सुनते हंै, उनके नजरिये से प्रभावित होकर अपनी राय कायम करते हंै, वह भी मारिया और इस तरह इस फैसले के खिलाफ अनर्गल बोले जा रहे हैं। की-बोर्ड, माऊस और इंटरनेट  की सुविधा ने उनकी असली शख्सियत  उघाड़ कर रख दी है, कि बौद्धिक समझे जाते, नफीस जुबान बोलने वाले ऊंचे-ऊंचे आदर्शों का दावा करने वाले इतने कमजोर हैं कि इंटरनेट से मिली बेपनाह आजादी पचा नहीं पा रहे हैं। एक सेक्सी, खूबसूरत, स्ट्रगलिंग अभिनेत्री की बात आते ही, आज तक जो जामा पहनकर वह दुनिया के सामने आते रहे हंै, उसे चीरकर उनके अंदर का असली इंसान ट्विटर पर, सोशल नेट्वर्किंग पर नजर आ रहा है। कल तक बिनायक सेन को सजा देने वाली निचली अदालत को कोसने वाले आज मारिया सुसाईराज को कथित रूप से सस्ते में छोड़ देने वाली निचली अदालत के फैसले पर सवाल उठाने के बहाने, यह लोग उसके बारे में बेलगाम जुबान का इस्तेमाल कर रहे हैं। क्या इसलिए कि इन्हें देश में अदालती इंसाफ की बहुत भारी चिंता है, या इसलिए कि मारिया एक सुन्दर जवान  सिने तारिका है ,जिस पर जो जी चाहे बोलना सब अपना अधिकर समझते हंै?
हमने अभी कुछ ही दिन पहले जे डे के मामले पर इसी जगह यह लिखा है कि आपराधिक मामलों में जांच के नतीजों के बारे में जल्दबाजी में कोई प्रतिक्रिया दिखाना कई बार गलत साबित होता है। किसी घटना में कभी-कभी जो नजर आता है बरसों बाद पता चलता है कि सच उससे कुछ और ही था। ऐसी हालत में किसी मामले में अदालत से बाहर खुद जज बन बैठना, फैसले सुनाना, इंटरनेट की सुविधा के कारण आसान और लुभावना तो लग सकता है, लेकिन इस तरह के फैसले सुनाने वाले क्या कल को इस मामले में कोई और बात सामने आने पर, अपनी कही हुई बातों की जिम्मेदारी ले सकते हैं? क्या इसके लिए उन्हें बाद में जिम्मेदार ठराया जा सकता है? क्या आगे कभी नौबत आने पर उनके ब्लॉग्स, ट्वीट्स, या पोस्ट्स के कारण किसी को हुए नुकसान का मुआवजा चुकाने को वह तैयार  होंगे? अभी कुछ ही दिनों के भीतर ऐसी खबरें आ रही हंै, जिनमें अपराधों में रहस्य 50  साल बाद खुल रहे हैं। यह भारत की हमेशा लतियाई जाने वाली पुलिस नहीं, बेहतरीन और काबिल गिनी जाने वाली अमरीकी पुलिस के साथ हुआ है। हाल ही में इलिनॉइस में पुलिस ने 54 साल पहले 7 बरस की एक बच्ची मारिया रुडालफ के अपहरण और हत्या के मामले में अपराधी को पकडऩे का दावा किया है। यह एक ऐसा मामला था जिस पर देश में इतना बवाल मचा था कि राष्ट्रपति आईजन हावर तक ने इसमें रोज घटनाक्रम से वाकिफ करवाने की ताकीद की थी। यह वह व्यक्ति था, जिसके पास घटना के समय कहीं और मौजूद होने का सुबूत था, लेकिन आज 54 साल बाद वह सुबूत पुलिस को झूठा साबित होता लग रहा है। एक और अहम घटना में नोबल पुरस्कार विजेता  मशहूर साहित्यकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे की आत्महत्या के बारे में यह दावा किया जा रहा है कि एफबीआई ने उन्हें आत्महत्या करने पर मजबूर किया। उनकी आत्महत्या पर पहले यह माना जा रहा था कि एक साहित्यकार के रूप में अपनी प्रतिभा चुक जाने की हताशा में उन्होंने आत्महत्या की। अब उनके एक  करीबी दोस्त ने लिखा है कि किस तरह उन्हें लगातार अपने घर, अपनी कार तक के, एफ बी आई द्वारा "बग" किए जाने का शक था, वह इतने डरे हुए रहते थे कि अपने दिल की बात अपने दोस्त से कहने के लिए दूसरे किसी की कार में सफर करते थे। कहने की बात यह है कि किसी घटना से जुड़े बहुत से पहलू हो सकते हंै,जिनकी जांच के लिए हर देश में एक तंत्र होता है, उसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए एक अलग व्यवस्था होती है, जनता को इन दोनों की राय से अपनी असहमति जताने का हक है, लेकिन उसका एक तरीका है। उसके लिए भी एक व्यवस्था है। इस तरह आमराय के आधार पर फैसला सुनाना, लोकप्रिय भावनाओं का ज़ोर दिखाकर किसी व्यवस्था पर उंगली उठना, वह भी देश के जिम्मेदार समझे जाने वाले लोगों के द्वारा, बहुत डरावना है।
हमने बिनायक सेन के मामले में भी यही लिखा था, जब देश के बड़े-बड़े कानूनविद् तक निचली अदालत के फैसले के खिलाफ टीका कर रहे थे, और आज भी, जब देश में कानून के बड़े जानकार समझे जाने वाले मारिया सुसाईराज को कथित रूप से  सस्ते में छोड़ दिया बता रहे हैं, तब भी हम यही लिखना चाह रहे हंै कि समाज को ऐसे मामलों में मीडिया के साथ नहीं जुड़ जाना चाहिए, क्योंकि एक घटना के सारे पहलुओं को तलाशना, और उसमें से खबर पैदा करना मीडिया का काम है, उसके बाजार में जिंदा रहने के लिए यह उसकी मजबूरी कही जाए या जरूरत, पर यह उसके पेशे का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है, लेकिन नीरज ग्रोवर हत्याकांड पर फैसले पर टिप्पणी करते हुए देश के नामी वकीलों  रामजेठमलानी और मुकुल रोहतगी जैसे लोग जब एक कानूनी फैसले पर खुले आम अखबारों में सवाल उठाएं, तो यह सोचने पर मजबूर हो जाना पड़ता है कि कभी खुद भी इसी कानूनी व्यवस्था में अहम् जिम्मेदार पदों पर बैठ चुके इन लोगों में, खुद इस व्यवस्था के लिए कितना सम्मान है। इस तरह के बयान एक व्यवस्था के खिलाफ देश में अराजक, लोकलुभावनी बातों के पीछे दौडऩे की मानसिकता को ही बढ़ावा नहीं देते, यह उस अदालत का भी सीधे-सीधे अपमान करते हंै जिसके फैसले पर यह सब टिप्प्णियां अदालत से बाहर सार्वजनिक क्षेत्र में अपने नाम के साथ की जा रही है।
अगर किसी अदालती फैसले से असहमति है तो उसके खिलाफ अपील के लिए राष्ट्रपति तक जाने की लंबी सुविधा इस देश में हासिल है ,और अब हम देविन्दर पाल भुल्लर के मामले में तो देख रहे हंै कि जिम्मेदार संगठन  उस  फैसले को भी चुनौती दे रहे हंै। शाहबानो मामले में हमने देखा कि किस तरह देश की संसद ने अपनी संवैधानिक ताकत का इस्तेमाल करते हुए मुस्लिम  समाज में महिलाओं की स्थिति को और कमजोर करते हुए, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को उलट डाला था। जब एक फैसले के खिलाफ खड़े होने के इतने वैध मंच उपलब्ध हंै, तो इंटरनेट पर मिल रही आजादी का गलत इस्तेमाल  एक अदालत के जज की काबीलियत की टीका करने के लिए क्यों किया जा रहा है? पुलिस ने अपनी तरफ से यह मामला सुलझाते हुए, अपनी क्षमता के मुताबिक सुबूत जुटाकर अदालत के सामने रखे, और संबंधित जज ने मामले के तमाम पहलुओं पर विचार कर के अपना फैसला सुनाया। अगर इस तरह सुर्खियां बटोरने के लिए अदालती फैसलों पर टिप्पणिया की जाएंगी, किसी मामले में पुलिस की काबीलियत पर इस तरह सवाल उठाए जाएंगे तो यह दोनों एजेंसियां किस हौसले से अपना काम कर पाएंगी ? या फिर वह भी जनता की भावनाओं के दबाव में आकर अपना काम करेंगी? पुलिस ने कई बार ऐसा किया भी है, लेकिन जिस दिन अदालतों को इसके लिए मजबूर किया जाएगा, इंसाफ क्या केवल उन्हीं लोगों के हाथों का खिलौना नहीं बन जाएगा, जिन्हें इंटरनेट  पर, पेज -3 पर अपनी राय जाहिर करके पूरे देश को एक खास दिशा में हकालने की सहूलियत मिली हुई है ? उस दिन अदालतों की जरूरत ही क्या रहेगी? कंगारू अदालतें लगाकर विशेष सलाहकारों से पूछकर,आम जनता की राय पर ही फैसला कर दिया जाएगा। हमारे यहां ऐसे भी मामले हुए हैं, जब आम राय ने अदालतों को दबंग लोगों के खिलाफ सख्त होने की प्रेरणा दी है, लेकिन उन्हें मजबूर नहीं किया, लेकिन अब मारिया के मामले में लग रहा है कि मीडिया की अदालतों के जमाने से आगे बढ़कर हम इंटरनेट की अदालतों तक पहुंच गए हंै, जहां तक देश के कुछ थोड़े से चुनिंदा अभिजात लोग अपनी अंदरूनी प्रवृत्तियों से मजबूर होकर, एक बड़ी, कच्ची उम्र की आबादी को एक खतरनाक दिशा में मोड़ रहे हंै।  क्या यह लोग अदालती अवमानना के दोषी नहीं हंै? आज जब हमें मजबूर होकर साईबर सुरक्षा, आई टी के कानून बनाने पड़े हंै तब क्या इंटरनेट पर कही जा रही बातों को भी अदालती अवमानना के  कायदों के दायरे में लाने के दिन आ गए हंै ? बात वहीं आ कर अटकती है कि इस तरह फैसले सुनाने बैठे लोगों के पास उस वक्त क्या जवाब होगा, जब ऐसी कोई बात सामने आए, जैसी मरिया रुडाल्फ की हत्या के जुर्म में आज 54 साल बाद पकड़ाए  इंसान के बारे सामने आई है। आज जब कानून एक जुर्म करने के लिए पकड़ाए इंसान को उसका आखिरी मौका तक देने के लिए बरसों बरस की मोहलत देता है। कानूनी व्यवस्था और संविधान में दिए गए रास्ते अपनाए बिना एक अदालत और पुलिस को इस तरह कोसना पूरी तरह गलत और गैर जिम्मेदाराना है। हां, नीरज ग्रोवर पर हुए फैसले का यह अहसान देश पर रहा कि उसने इन बुद्धिजीवियों का दोगलापन उजागर कर दिया है,जो कभी तो महिलाओं के मान सम्मान की बड़ी-बड़ी बातें करते हंै, और आज इनके ही  द्वारा और इनके ही कारण  मारिया सुसाईराज के बारे में जितनी तरह की हो सकती हैं, अपमानजनक बातें इंटरनेट  पर हो रही हैं। यह वही तबका है, जो निचली अदालत द्वारा बिनायक सेन को सजा देने पर हल्ला मचाता हुए कहता है कि सजा क्यों दी,और आज मारिया छूट गई है तो यही तबका कह रहा है कि मारिया को छोड़ा क्यों?

छोटी सी बात

छोटी सी बात
अगल आपके ई-मेल बाक्स तक किसी और की पहुंच है, तो यह बात जाहिर होनी चाहिए। कुछ जोड़े एक ही ई मेल इस्तेमाल करते हैं, जो कि किसी दूसरे को परेशानी में डाल सकता है। कोई ये मानकर आपको लिखे कि उसे सिर्फ आप देखेंगे, और निजी बातें लिखें, तो यह उसके साथ धोखा होगा। वैसे भी पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका का एक ही ई-मेल होना ठीक नहीं होता।

मंडी और सामान

2 जुलाई 11
अमिताभ बच्चन की एक नई फिल्म जो कि शायद उन्हीं के परिवार की बनाई हुई है, के रिलीज होने के मौके पर उसे चर्चा में लाने के लिए वे एक-एक टीवी स्टूडियो घूम रहे हैं और इंटरनेट पर बाप-बेटे रात-दिन ट्वीट भी कर रहे हैं। इंटरनेट को इन दिनों देखें तो नामी-गिरामी पत्रकार भी अपने चर्चित कॉलम को, अपने प्रोग्राम को या अपने लिए इंटरव्यू को बढ़ावा देते दिखते हैं। कुल मिलाकर आज वक्त एक ऐसी मार्केटिंग का आ गया है जिसमें धार तेज रहने पर बिना धार वाला सामान भी चल निकलता है और अच्छा सामान धूल खाते पड़े रह सकता है।
संगीत से लेकर साहित्य तक, इन सबको आज मार्केटिंग के चक्कों पर चलकर ही  ग्राहक तक पहुंचना पड़ रहा है और यह एक अजीब सा जमाना आ गया है जब ढिंढोरा पीटने के तमाम तरीकों का इस्तेमाल करते हुए लोग, नामी-गिरामी लोग भी अपने काम को आगे बढ़ाने पर मजबूर हैं। अगर आप इंटरनेट पर नहीं हैं तो आप खरीदने की ताकत रखने वाले ग्राहकों के बाजार के एक बड़े हिस्से से बाहर हैं। ऐसी बात आज कोई चैनलवाला, कोई फिल्म निर्माता, प्रकाशक या संपादक पसंद नहीं करता। हर किसी को यह लगता है कि ऐसे ही लोगों को रखना ठीक है जो कि अपने काम को खुद बढ़ाना जानते भी हैं। एक वक्त था जब अधिक से अधिक, लेखक अपनी किताब बाजार में आने के मौके पर उसकी बिक्री बढ़ाने के लिए किसी दूकान पर जाकर बैठ जाते थे और ग्राहक वहां किताबें खरीदकर उनसे दस्तखत करवाकर खुशी-खुशी लौटते थे। वह सिलसिला तो अब तक जारी है लेकिन अब बात बहुत आगे बढ़ी हुई है और अब शायद किसी फिल्म या किताब के आने के वक्त उसके कारोबार से जुड़े लोग यह तय कर चुके रहते हैं कि किस तरह उसके खिलाफ कहीं मुकदमे दर्ज होंगे और कहीं सड़कों पर पुतले जलेंगे। चर्चा की लहरों पर तैरकर बाजारू कामयाबी तक पहुंचने में जवान से लेकर बुढ्ढे तक ओवरटाईम करते दिखते हैं और अपने बुढ़ापे को वे मंजूर भी नहीं करते।
बाजार के इस सिलसिले में नुकसान सबसे बड़ा क्वालिटी का हो रहा है। अब किसी रचनात्मक या कलात्मक काम से कारोबार की उम्मीदें इस तरह जुड़ गई हैं कि कारोबारी कुछ साजिशें रचकर तो कुछ रिश्वत फैलाकर लंबी-चौड़ी चर्चा जुटा लेते हैं और रचनाकार या कलाकार से उम्मीद करते हैं कि वे भी ऐसी साजिशों में हिस्सेदार रहें। बाजार के पैमाने किसी बात की उत्कृष्टता को उसकी कामयाबी से तौलते हैं। हमने कुछ बरस पहले कुछ पत्र-पत्रिकाओं की वेबसाईट की चर्चा की थी कि किस तरह उन पर जाने वाले लोग किसी लेखक या संवाददाता, कार्टूनिस्ट या फोटोग्राफर के काम पर अपनी जो राय देते हैं, उसी के आधार पर उन वेबसाईटों पर उनका काम अधिक सामने या अधिक ऊपर रखा जाता है। उसी के आधार पर उन्हें आगे कम या अधिक महत्व दिया जाता है। यह कुछ उसी तरह की बात है कि कपड़े की किसी दूकान में जो सामान अधिक चल रहा है उसे शो-केस के पुतले को पहनाया जाता है।
आज बाजार के नियमों ने कला-साहित्य, अभिनय-संगीत, लिखना और बोलना, इन सबको काबू में कर रखा है और इन्हें हाथ थामकर रास्ता भी दिखाया जाता है। अखबारों के बाजार को देखें तो लगता है कि वे एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी हैं जो कि अखबार भी निकालती हैं। उनका जितना जोर बाजार के सामानों के बाजार बढ़ाने में दिखता है, उसका एक फीसदी भी अखबारनवीसी या समाचार-विचार को आगे बढ़ाने में नहीं दिखता। बाजार तय करता है कि अखबार की शक्ल कैसी हो, किस तरह उसके पन्ने दुख-दर्द से अछूते रहें और किस तरह ज्योतिषियों के साथ मिलकर फर्जी महूरत निकालकर ग्राहक को दूकानों की तरफ धकेला जाए। एक वक्त अखबारों के समाचार और विचार के पन्नों को लेकर एक पवित्रता की सोच रहती थी। यह माना जाता था कि सच में मिलावट का काम सिर्फ इश्तहारों तक सीमित रखा जाए। लेकिन अब अखबारों में असल इश्तहार, इश्तहारों से परे ही रहते हैं। वे खबरों की शक्ल में छाए रहते हैं, विचारों की शक्ल में घुस जाते हैं और अखबार खुद नगाड़ा लेकर ऐसे प्रचार में जुट जाता है। मतलब यह कि जिन तमाम चीजों को इज्जतदार माना जाता था, रचना या कलाकृति माना जाता था, विचार माना जाता था, पत्रकारिता माना जाता था, उन सबके लिए अब लुभावनी पैकिंग के अलावा उनके बाजारू बाजारीकरण को अब जरूरी बना दिया गया है।
पुराने हिसाब के जो लोग यह मानते थे कि काम अपनी क्वालिटी से दाम पाता है, वे अब रिटायर होने लायक हो गए हैं। बाजार के नए आक्रामक तेवर अब बिकने की संभावना को ही क्वालिटी मानते हैं इसलिए अब बिकने और टिकने के दौर में पुरानी सोच के लोगों को खुद होकर हाशिए पर चले जाना चाहिए और इस बात का बुरा भी नहीं मानना चाहिए कि वे अब नाकामयाब हैं। हर मंडी में हर सामान की इज्जत नहीं होती।

इतने नाजुक राजचिन्ह?

1 जुलाई
पिछले ओलंपिक में भारत को एक मैडल दिलाने वाले मुक्केबाज विजेन्द्र के खिलाफ भारत के राजचिन्ह के बेजा इस्तेमाल को लेकर एक मामला दर्ज हो गया है। इस मुक्केबाज ने अशोक स्तंभ को अपनी शादी के कार्ड पर छपवा लिया था और देश में इसके खिलाफ एक कड़ा कानून है जिसके तहत अब हरियाणा की पुलिस ने यह मामला दर्ज कर लिया है। इसके पहले भी कुछ ऐसे मौके रहे हैं जिन पर राष्ट्रीय झंडे की तरफ अनजाने में पैर करके बैठे किसी खिलाड़ी की तस्वीर को देखकर उसके खिलाफ कुछ लोग अदालत चले गए और वहां पर मामला चलने लगा।
देश के प्रतीक चिन्हों का लेकर भारत कुछ अधिक संवेदनशील दिखता है। यहां के प्रतीक चिन्ह छुईमुई पौधे की पत्तियों से दिखते हैं जिनका बात-बात में अपमान होता है। विजेन्द्र वाले मामले को देखें तो जिस नियम के तहत उन्हें अपराधी साबित करने की कार्रवाई शुरू हुई है उसी नियम के तहत इस देश में राजा से लेकर कलमाड़ी तक और भैया राजा से लेकर फूलन तक किस्म-किस्म के अपराधी अलग-अलग समय पर ऐसे राजचिन्हों के इस्तेमाल के हकदार रहे क्योंकि वे सांसद थे। अभी हो सकता है कि तिहाड़ जेल से कलमाड़ी और राजा ने लोकसभा अध्यक्ष को संसद सत्र में आने के लिए जो अर्जी भेजी है वह भी राज चिन्ह वाले सांसद के लैटरपैड पर आई हो। वे चाहे जेल में हों, लेकिन वे सांसद तो हैं ही और हो सकता है कि वे अभी भी वहां अपनी संसद भवन वाली स्टेशनरी का इस्तेमाल कर रहे हों। हम इस नौबत को शर्मनाक मानते हैं कि नियमों को लेकर इस देश के एक होनहार खिलाड़ी पर तो मुकदमा दर्ज हो जाए और नामी-गिरामी अभियुक्त जेल के भीतर भी उसके हकदार रहें, या उसके हकदार लोग बाहर रहते हुए भी अपनी तमाम बदनामी के बावजूद राज चिन्हों का इस्तेमाल करते रहें, पुलिस से सलामी लेते रहें, झंडे फहराते रहें।
राज चिन्हों और राष्ट्रीय प्रतीकों, देश के झंडे इन सबको लेकर भारत को कुछ दरियादिली दिखानी चाहिए। दुनिया के बहुत से देश ऐसे हैं जहां पर खिलाड़ी अपने देश के झंडे के बने कपड़े पहनकर खेलते हैं, झंडे जैसे बनाए गए केक काटते हैं और इसके साथ-साथ उनके मन में अपने देश के लिए न तो सम्मान में कोई कमी होती है और न ही वे भारत के मुकाबले कोई छोटे राष्ट्रभक्त होते हैं। भारत में भावनाओं की जगह प्रतीकों ने ले ली है और हम तस्वीरों, प्रतिमाओं और तारीखों में उलझ गए हैं। राजघाट के सम्मान और अपमान की बात खड़ी हो जाती है या फिर किसी एक तारीख पर किसी महान को याद करके फिर साल भर उसे अलमारी में बंद कर दिया जाता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। झंडा या राष्ट्रगान एक दहशत पैदा करने लगे वह ठीक नहीं है। ऐसी पवित्रतावादी सोच किसी काम की नहीं होती और इतने सारे नियम-कायदे रहने के बाद भी लोग इस देश की वैसी फिक्र करते नहीं दिखते जैसी कि जापान या दुनिया के दूसरे कई देशों में देखने को मिलती है। एक तरफ छत्तीसगढ़ की राजधानी में म्युनिसिपल की नई बनी बिल्डिंग में शायद झंडा फहराने लगेगा लेकिन वहां नई सफेद दीवारों पर लोगों का पान खाकर थूकना इस तरह से शुरू हो गया है कि अधिक साफ-सुथरी दीवार के चलते इमारत को नजर न लग जाए।
जब हम देशपे्रम की बात करें तो इन दिनों कम से कम यह बात बहुत तल्खी से लगती है कि देश में कोई पे्ररणास्रोत न रह जाने से लोगों के मन में तमाम बातों के लिए एक हेठी सी हो गई है। लोगों को बात-बात में यह लगता है कि क्या नियम-कायदे सिर्फ छोटे, गरीब और कमजोर लोगों के लिए हैं या फिर बड़े लोग भी कोई नियम मानेंगे? हवाई अड्डों पर जब चुनिंदा बड़े नेताओं और अफसरों की एक लंबी लिस्ट को, जजों और दूसरे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को सुरक्षा जांच से छूट मिलती है तो साधारण मुसाफिरों को यह लगता है कि इनमें से तो लगभग तमाम पदों पर बैठे कोई न कोई लोग अपराधों से घिरे हुए साबित हो चुके हैं। बहुत से लोग इन पदों पर रहते-रहते गिरफ्तार करके जेल भेजे गए हैं और अदालती कटघरों में खड़े हैं। ऐसे अपराधी या अभियुक्त एक दिन पहले तक तो सुरक्षा जांच से छूट पाते रहे हैं। ऐसे लोगों को छूट देने से बाकी मुसाफिरों की जिंदगी तो खतरे में पड़ती है क्योंकि पैसों के लिए हो सकता है कि एक राजा या एक कलमाड़ी छुपाकर कोई सामान भीतर ले आएं और फिर वह पूरा हवाई जहाज खतरे में पड़े।
कुल मिलाकर हम यह कहना चाहते हैं कि संदिग्ध तबके के लोगों के राजकीय विशेषाधिकार कम होने चाहिए और ओलंपिक में पदक दिलाने वाले खिलाड़ी जैसे लोगों की ऐसी कोई चूक अगर होती है तो उसे भुला देने का इंतजाम भी हमारे कानून में होना चाहिए वरना राज चिन्ह और राष्ट्रगान एक अलग तनाव की वजह रहेंगे जिससे कि जनता के मन में उनका कोई सम्मान नहीं हो सकेगा। लोकतंत्र का कू्ररतंत्र बनना जरूरी नहीं है।