7 जुलाई 2011
यूपीए सरकार की अब तक की भागीदार डीएमके के कुकर्म खत्म होने का नाम ही नहीं रहे हैं और न ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कुकर्मियों के मुखिया बने रहने में कुछ बुरा समझ रहे। इस तरह केंद्र सरकार की ही एक जांच एजेंसी सीबीआई के घेरे में आ चुके डीएमके के एक और पूरी तरह और बुरी तरह भ्रष्ट दिख रहे केंद्रीय मंत्री दयानिधि मारन आज भी मंत्री बने हुए हैं और उनकी इस्तीफे की महज चर्चा ही चल रही है। जब सीबीआई का जांच-नतीजा दो दिन पहले ही सामने आ चुका है तो उसके बाद अब तक मारन का इस्तीफा न होना मारन और डीएमके के लिए तो बेशर्मी की बात है ही, यह सरदार मनमोहन सिंह के लिए बेअसरदार साबित होने की एक और बात भी है। एक के बाद एक यूपीए घोटाले सामने आ रहे हैं और मनमोहन सिंह अपने निजी कुर्ते और जाकिट को दिखाते हुए खड़े हैं कि वे खुद कितने ईमानदार हैं। यह लोकतंत्र के साथ एक बड़ा मजाक चल रहा है और केंद्र सरकार की ऐसी हरकतें भी इस देश में नक्सलियों से लेकर अन्ना-बाबा तक कई अलग-अलग किस्म के विरोधों को जगह दे रही है।
सोनिया गांधी और राहुल गांधी अपने-आपको अपने चुनिंदा प्रधानमंत्री के साथ मिलकर जिस तरह और जिस कदर साफ-सुथरा दिखाना चाहते हैं, वह चाहत किसी जमीन पर नहीं टिकी है। वह एक लुभावनी लोकप्रियता पाने की उनकी हसरत पर तो टिकी है लेकिन हकीकत की जो जमीन किसी भी सच्चाई को अपने पैरों के नीचे लगती है वह सोनिया गांधी की अगुवाई में न यूपीए को हासिल और न ही कांगे्रस को। एक के बाद एक जितने बड़े-बड़े घोटाले इस देश को लूटने के सामने आए हैं और उनमें से हर किसी के बारे में वक्त रहते सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को बताया जा चुका था, उन्हीं की पार्टी या सरकार के लोगों ने बताया था, और उसके बाद हजारों करोड़ के घोटालों से लेकर लाख करोड़ तक के घोटालों तक तमाम डकैती होती रही और यह साफ-सुथरी दिखाई जा रही टोली चुपचाप बैठी रही। अभी-अभी एक मामला सामने आया जो कि इस मुद्दे पर पहले कई बार हमारी लिखी हुई इन्हीं बातों के बाद आया है। मणिशंकर अय्यर सहित तीन मंत्रियों ने कलमाड़ी के भ्रष्टाचार के बारे में मनमोहन सिंह को बहुत पहले चि_ी लिख दी थी और उसकी प्रधानमंत्री की तरफ से पावती भी अभी छपी है। इस गरीब देश की भूखी जनता के हक को जिस प्रधानमंत्री और जिस यूपीए मुखिया की छत्रछाया में उनकी पार्टी और गठबंधन के लोगों ने लूट खाया, वे सफेदपोश बने मंचों पर सजे रहते हैं और कांगे्रस का भविष्य उत्तरप्रदेश में घूम-घूमकर मायावती की सरकार को कोस रहा है। क्या राहुल गांधी की समझ अब इतनी हो गई है कि वह राजा, कलमाड़ी और मारन जैसे डकैतों के बारे में अपनी राय दे सके? अगर नहीं तो अधेड़ हो चुके इस बच्चे को दिग्विजय सिंह किस आधार पर देश का प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं? वैसे अपनी गठबंधन सरकार, अपने मंत्रियों के कुकर्मों पर चुप रहना इस देश में प्रधानमंत्री बने रहने की राह में रोड़ा नहीं है यह तो मनमोहन सिंह साबित कर ही चुके हैं।
अगर सोनिया गांधी में राजनीति की ईमानदारी के लिए जरा भी सम्मान है और अपने नेहरू-गांधी कुनबे के अकेले सिद्धांतवादी पुरखे जवाहर लाल नेहरू की यादों के लिए जरा सा सम्मान है तो उन्हें अपने इस गठबंधन के लिए एक आचार संहिता तुरंत बनाकर सारे साथी दलों के साथ उस पर सहमति लेकर उसे सार्वजनिक करना चाहिए। अब यह वक्त आ गया है कि यूपीए सरकार के मंत्रियों और कांगे्रस पार्टी की बाकी अनादर्श सरकारों के लिए यह तय कर लिया जाए कि किस-किस अपराध के सुराग किस-किस हद तक पहुंचने पर पार्टी और सरकार अपने लोगों पर क्या-क्या कार्रवाई करेगी। उसके मंत्री या मुख्यमंत्री किन-किन अपराधों में गले-गले तक डूब जाने के बाद हटाने के लायक माने जाएंगे और किन-किन अपराधों में किस ऊंचाई तक डूबे रहने पर पार्टी उनको बचाती रहेगी, यह खुलासा देश की जनता के सामने होना चाहिए।
हमें ऐसा एक भी कारण नहीं दिखता है जो कि मनमोहन सिंह को नैतिकता के आधार पर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहने का हक देता हो। इस प्रधानमंत्री ने इस देश को जिस हद तक लुट जाने दिया है, वह अभूतपूर्व है और पचास फीसदी से अधिक की उस आबादी के साथ बलात्कार सरीखा है जो कि गरीबी की रेखा के नीचे है। अब सफेदपोशों के पाखंड का वक्त खत्म करने का समय है और इस देश में इस बात के लिए इस मौके पर अकेली अदालत ही मददगार दिख रही है। हमारा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट खुद इस मामले में दखल देकर ऐसे लोगों के मंत्री बने रहने के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर सकता है। आज देश की जनता कार्यपालिका के काम में न्यायपालिका के ऐसे अभूतपूर्व हस्तक्षेप का स्वागत करेगी क्योंकि लोकतंत्र को बचाना कार्यपालिका के अधिकारक्षेत्र को बचाने से अधिक जरूरी है। इस स्वघोषित सफेदपोशी में अदालत तुरंत दखल दे।
यूपीए सरकार की अब तक की भागीदार डीएमके के कुकर्म खत्म होने का नाम ही नहीं रहे हैं और न ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कुकर्मियों के मुखिया बने रहने में कुछ बुरा समझ रहे। इस तरह केंद्र सरकार की ही एक जांच एजेंसी सीबीआई के घेरे में आ चुके डीएमके के एक और पूरी तरह और बुरी तरह भ्रष्ट दिख रहे केंद्रीय मंत्री दयानिधि मारन आज भी मंत्री बने हुए हैं और उनकी इस्तीफे की महज चर्चा ही चल रही है। जब सीबीआई का जांच-नतीजा दो दिन पहले ही सामने आ चुका है तो उसके बाद अब तक मारन का इस्तीफा न होना मारन और डीएमके के लिए तो बेशर्मी की बात है ही, यह सरदार मनमोहन सिंह के लिए बेअसरदार साबित होने की एक और बात भी है। एक के बाद एक यूपीए घोटाले सामने आ रहे हैं और मनमोहन सिंह अपने निजी कुर्ते और जाकिट को दिखाते हुए खड़े हैं कि वे खुद कितने ईमानदार हैं। यह लोकतंत्र के साथ एक बड़ा मजाक चल रहा है और केंद्र सरकार की ऐसी हरकतें भी इस देश में नक्सलियों से लेकर अन्ना-बाबा तक कई अलग-अलग किस्म के विरोधों को जगह दे रही है।
सोनिया गांधी और राहुल गांधी अपने-आपको अपने चुनिंदा प्रधानमंत्री के साथ मिलकर जिस तरह और जिस कदर साफ-सुथरा दिखाना चाहते हैं, वह चाहत किसी जमीन पर नहीं टिकी है। वह एक लुभावनी लोकप्रियता पाने की उनकी हसरत पर तो टिकी है लेकिन हकीकत की जो जमीन किसी भी सच्चाई को अपने पैरों के नीचे लगती है वह सोनिया गांधी की अगुवाई में न यूपीए को हासिल और न ही कांगे्रस को। एक के बाद एक जितने बड़े-बड़े घोटाले इस देश को लूटने के सामने आए हैं और उनमें से हर किसी के बारे में वक्त रहते सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को बताया जा चुका था, उन्हीं की पार्टी या सरकार के लोगों ने बताया था, और उसके बाद हजारों करोड़ के घोटालों से लेकर लाख करोड़ तक के घोटालों तक तमाम डकैती होती रही और यह साफ-सुथरी दिखाई जा रही टोली चुपचाप बैठी रही। अभी-अभी एक मामला सामने आया जो कि इस मुद्दे पर पहले कई बार हमारी लिखी हुई इन्हीं बातों के बाद आया है। मणिशंकर अय्यर सहित तीन मंत्रियों ने कलमाड़ी के भ्रष्टाचार के बारे में मनमोहन सिंह को बहुत पहले चि_ी लिख दी थी और उसकी प्रधानमंत्री की तरफ से पावती भी अभी छपी है। इस गरीब देश की भूखी जनता के हक को जिस प्रधानमंत्री और जिस यूपीए मुखिया की छत्रछाया में उनकी पार्टी और गठबंधन के लोगों ने लूट खाया, वे सफेदपोश बने मंचों पर सजे रहते हैं और कांगे्रस का भविष्य उत्तरप्रदेश में घूम-घूमकर मायावती की सरकार को कोस रहा है। क्या राहुल गांधी की समझ अब इतनी हो गई है कि वह राजा, कलमाड़ी और मारन जैसे डकैतों के बारे में अपनी राय दे सके? अगर नहीं तो अधेड़ हो चुके इस बच्चे को दिग्विजय सिंह किस आधार पर देश का प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं? वैसे अपनी गठबंधन सरकार, अपने मंत्रियों के कुकर्मों पर चुप रहना इस देश में प्रधानमंत्री बने रहने की राह में रोड़ा नहीं है यह तो मनमोहन सिंह साबित कर ही चुके हैं।
अगर सोनिया गांधी में राजनीति की ईमानदारी के लिए जरा भी सम्मान है और अपने नेहरू-गांधी कुनबे के अकेले सिद्धांतवादी पुरखे जवाहर लाल नेहरू की यादों के लिए जरा सा सम्मान है तो उन्हें अपने इस गठबंधन के लिए एक आचार संहिता तुरंत बनाकर सारे साथी दलों के साथ उस पर सहमति लेकर उसे सार्वजनिक करना चाहिए। अब यह वक्त आ गया है कि यूपीए सरकार के मंत्रियों और कांगे्रस पार्टी की बाकी अनादर्श सरकारों के लिए यह तय कर लिया जाए कि किस-किस अपराध के सुराग किस-किस हद तक पहुंचने पर पार्टी और सरकार अपने लोगों पर क्या-क्या कार्रवाई करेगी। उसके मंत्री या मुख्यमंत्री किन-किन अपराधों में गले-गले तक डूब जाने के बाद हटाने के लायक माने जाएंगे और किन-किन अपराधों में किस ऊंचाई तक डूबे रहने पर पार्टी उनको बचाती रहेगी, यह खुलासा देश की जनता के सामने होना चाहिए।
हमें ऐसा एक भी कारण नहीं दिखता है जो कि मनमोहन सिंह को नैतिकता के आधार पर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहने का हक देता हो। इस प्रधानमंत्री ने इस देश को जिस हद तक लुट जाने दिया है, वह अभूतपूर्व है और पचास फीसदी से अधिक की उस आबादी के साथ बलात्कार सरीखा है जो कि गरीबी की रेखा के नीचे है। अब सफेदपोशों के पाखंड का वक्त खत्म करने का समय है और इस देश में इस बात के लिए इस मौके पर अकेली अदालत ही मददगार दिख रही है। हमारा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट खुद इस मामले में दखल देकर ऐसे लोगों के मंत्री बने रहने के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर सकता है। आज देश की जनता कार्यपालिका के काम में न्यायपालिका के ऐसे अभूतपूर्व हस्तक्षेप का स्वागत करेगी क्योंकि लोकतंत्र को बचाना कार्यपालिका के अधिकारक्षेत्र को बचाने से अधिक जरूरी है। इस स्वघोषित सफेदपोशी में अदालत तुरंत दखल दे।
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