6 जुलाई 2011
तेलंगाना राज्य के आंदोलन की रफ्तार बढ़ते जा रही है। दरअसल पिछले बरस जब केंद्रीय गृहमंत्री ने अचानक ही तेलंगाना बनाने की घोषणा कर दी थी तो वह अधपके से भी कम पका हुआ ख्याल था। वह एक किस्म की चूक थी और उसके तुरंत बाद इस सरकार ने जस्टिस श्रीकृष्णा को इस मुद्दे पर एक आयोग के तहत रिपोर्ट बनाने कहा था। उस रिपोर्ट की सिफारिशों से भी कोई बात बनी नहीं क्योंकि उसने सीधे-सीधे कोई हल नहीं सुझाया गया था और बहुत से विकल्प सामने रख दिए गए थे। लेकिन तेलंगाना का उबाल केंद्र के सामने अब बहुत अधिक विकल्प नहीं रख रहा है। सत्तारूढ़ यूपीए गठबंधन के जो भी लोग तेलंगाना के इलाके में आते हैं उनके सामने भी सिवाय इसके और कोई रास्ता नहीं है कि वे जनभावनाओं के मुताबिक संसद और विधानसभा से इस्तीफे देकर इस राज्य निर्माण के लिए दबाव डालें और वह दौर भी अब शुरू हो चुका है इसलिए इस मुद्दे को केंद्र सरकार और अधिक वक्त तक नहीं दबा पाएगी और उसे इस पर फैसला जल्द लेना होगा, और अगर उसे तेलंगाना में अपने अस्तित्व को बचाए रखना है तो उसे यह फैसला राज्य निर्माण के पक्ष में ही लेना होगा।
हम यहां पर तेलंगाना राज्य के पक्ष या विपक्ष में उन बारीकियों में जाना नहीं चाहते जिन पर किसी लंबे लेख में ही अधिक जानकारी लिख पाना मुमकिन है। हम छोटे राज्य के निर्माण के अनुभव पर कुछ चर्चा करना चाहते हैं और तेलंगाना के खास संदर्भ में ऐसे अनुभव जोड़कर देखना चाहते हैं। भारत में आजादी के बाद से जब-जब राज्यों का विभाजन हुआ तब-तब बहुत से दूसरे इलाकों में भी राज्य का दर्जा पाने की हसरत आगे आई। इसमें तेलंगाना आजाद भारत के इतिहास में सबसे बड़ी, सैकड़ों जानों की, शहादत देने वाला इलाका था। देश में कम से कम दर्जन भर ऐसे इलाके हैं जो दुनिया के बहुत से देशों से बड़े हैं और भारत के कई राज्यों से बड़े हैं। उनके दावे के पीछे भाषा, भूगोल, अर्थव्यवस्था जैसे कई तर्क भी सही लगते हैं। लेकिन समय रहते केंद्र सरकारों ने राज्य पुनर्गठन आयोग नहीं बनाया। सन् 2000 में जब तीन नए राज्य अटल सरकार ने बनाए तब भी देश के बाकी कई इलाकों को राज्य बनाने के आंदोलन देखते हुए भी ऐसा कोई आयोग नहीं बनाया गया और हर राज्य में अलग-अलग दर्जे के आंदोलन चलते रहे। पाठकों को यह याद होगा कि छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड को राज्य बनाने के पीछे एक आधार यह बनाया गया था कि इनके मूल राज्यों में विधानसभाओं में इनको अलग राज्य बनाने के प्रस्ताव पहले ही पारित कर दिए थे और वे प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास पहले से पड़े हुए थे। लेकिन इसके बाद से किसी और राज्य से न तो ऐसा कोई प्रस्ताव आया और न ही केंद्र सरकार ने मधुमक्खी के छत्ते को और अधिक हिलाया। लेकिन तेलंगाना का आंदोलन आज एक जलती हुई हकीकत है जिसे अनदेखा करना और अधिक मुमकिन नहीं है।
हम छोटे राज्यों के अनुभव की बात कर रहे थे। छत्तीसगढ़ में बैठे हुए हम मध्यप्रदेश के भोपाल की गुलामी से आजाद होने के फायदे देख रहे हैं और इन दस बरसों का हमारा अनुभव यह है कि जिस तरह अंगे्रजों के राज में लंदन में बैठी हुई ब्रिटिश सरकार भारत का शोषण करती थी, उसी तरह भोपाल में बैठी सरकारें उस वक्त भी छत्तीसगढ़ के शोषण में जुटी हुई थीं जब यहां के दो-दो कांगे्रसी नेता बरसों तक अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। इस इलाके के मुख्यमंत्री रहते हुए भी इस इलाके को कभी उसका हक नहीं मिला। लेकिन पृथक छत्तीसगढ़ के लिए किसी किस्म का कोई वजनदार आंदोलन एक दिन भी नहीं चला और इस इलाके को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के एक फैसले से राज्य का दर्जा मिल गया। तब से लेकर अब तक एक राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ ने जो तरक्की की है, उसका कोई सपना भी भोपाल-राज में छत्तिसगढिय़ा ने नहीं देखा था। लेकिन इसी के साथ ही जो झारखंड भी नया राज्य बना उसकी बदहाली भी देखते ही बनती है। जिस तरह वहां दलबदल, सत्तापलट, जनता की दौलत को सीधे मुख्यमंत्री के स्तर पर लूट खाने का सिलसिला चला उससे लोगों को लगा कि छोटा राज्य कितना बुरा भी हो सकता है। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में वैसा दलबदल नहीं हो पाया जिससे कि सरकार गिर पाती, हालांकि उसके लिए कोशिश पूरी हुई। और न ही यहां पर मधु कोड़ा जैसा हाल हो पाया। अब उसके पीछे राजनीतिक दलों की स्थिरता का योगदान रहा या फिर राज्य के बड़े नेताओं की पार्टी और सरकार पर पकड़ ऐसी रही कि छोटा राज्य होने के बाद भी सरकार नहीं पलटी, इतने बारीक कारणों पर हम यहां जाना नहीं चाहते। तो तीन में से इन दो राज्यों के परस्पर विपरीत अनुभव, दोनों ही देश के सामने और तेलंगाना के बारे में सोचते हुए लोग यह भी सोचते हैं। दूसरी एक बात जो तेलंगाना राज्य के आड़े आ रही है वह है आंध्रप्रदेश की मौजूद राजधानी हैदराबाद का तेलंगाना के इलाके में होना। आंध्रप्रदेश के तेलंगाना के बाहर के लोग अगर एक बार तेलंगाना के अलग हो जाने के लिए तैयार हो भी जाएंगे तो भी वे हैदराबाद के एक बड़े व्यापार, रोजगार और अर्थव्यवस्था के केंद्र के रूप में, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के रूप में शेष आंध्रप्रदेश से बाहर जाने देने नहीं चाहेंगे।
लेकिन हम यहां पर बारीकियों की चर्चा करना नहीं चाहते और केंद्र सरकार को यह सलाह देना चाहते हैं कि तेलंगाना राज्य का निर्माण करने की इस नौबत के पहले उसके पास राज्य पुनर्गठन आयोग के लिए काफी समय था जिसका कोई इस्तेमाल उसने नहीं किया। इसलिए अब और कोई बहाना बनाए बिना उसे सीधे इस राज्य को बनाना होगा। इसमें आने वाली दिक्कतों के लिए किस तरह के राजनीतिक और सरकारी समझौते उसे आंध्र के इन दो प्रस्तावित हिस्सों के बीच करवाने होंगे यह यूपीए सरकार, और मोटेतौर पर कांगे्रस पार्टी का सरदर्द है। लेकिन तेलंगाना को अब राज्य का दर्जा पाने का पूरा हक है और इसमें देर गलत होगी। इसके साथ-साथ देश के दूसरे हिस्सों में ऐसे आंदोलन शुरू हों, उसके पहले ही राज्य पुनर्गठन आयोग बनाकर उससे तेजी से रिपोर्ट लेनी चाहिए। इस देश में अमरीका की तरह करीब पचास राज्यों की गुंजाइश है और उससे ही यह देश अमनचैन से रह सकेगा, तरक्की कर सकेगा।
तेलंगाना राज्य के आंदोलन की रफ्तार बढ़ते जा रही है। दरअसल पिछले बरस जब केंद्रीय गृहमंत्री ने अचानक ही तेलंगाना बनाने की घोषणा कर दी थी तो वह अधपके से भी कम पका हुआ ख्याल था। वह एक किस्म की चूक थी और उसके तुरंत बाद इस सरकार ने जस्टिस श्रीकृष्णा को इस मुद्दे पर एक आयोग के तहत रिपोर्ट बनाने कहा था। उस रिपोर्ट की सिफारिशों से भी कोई बात बनी नहीं क्योंकि उसने सीधे-सीधे कोई हल नहीं सुझाया गया था और बहुत से विकल्प सामने रख दिए गए थे। लेकिन तेलंगाना का उबाल केंद्र के सामने अब बहुत अधिक विकल्प नहीं रख रहा है। सत्तारूढ़ यूपीए गठबंधन के जो भी लोग तेलंगाना के इलाके में आते हैं उनके सामने भी सिवाय इसके और कोई रास्ता नहीं है कि वे जनभावनाओं के मुताबिक संसद और विधानसभा से इस्तीफे देकर इस राज्य निर्माण के लिए दबाव डालें और वह दौर भी अब शुरू हो चुका है इसलिए इस मुद्दे को केंद्र सरकार और अधिक वक्त तक नहीं दबा पाएगी और उसे इस पर फैसला जल्द लेना होगा, और अगर उसे तेलंगाना में अपने अस्तित्व को बचाए रखना है तो उसे यह फैसला राज्य निर्माण के पक्ष में ही लेना होगा।
हम यहां पर तेलंगाना राज्य के पक्ष या विपक्ष में उन बारीकियों में जाना नहीं चाहते जिन पर किसी लंबे लेख में ही अधिक जानकारी लिख पाना मुमकिन है। हम छोटे राज्य के निर्माण के अनुभव पर कुछ चर्चा करना चाहते हैं और तेलंगाना के खास संदर्भ में ऐसे अनुभव जोड़कर देखना चाहते हैं। भारत में आजादी के बाद से जब-जब राज्यों का विभाजन हुआ तब-तब बहुत से दूसरे इलाकों में भी राज्य का दर्जा पाने की हसरत आगे आई। इसमें तेलंगाना आजाद भारत के इतिहास में सबसे बड़ी, सैकड़ों जानों की, शहादत देने वाला इलाका था। देश में कम से कम दर्जन भर ऐसे इलाके हैं जो दुनिया के बहुत से देशों से बड़े हैं और भारत के कई राज्यों से बड़े हैं। उनके दावे के पीछे भाषा, भूगोल, अर्थव्यवस्था जैसे कई तर्क भी सही लगते हैं। लेकिन समय रहते केंद्र सरकारों ने राज्य पुनर्गठन आयोग नहीं बनाया। सन् 2000 में जब तीन नए राज्य अटल सरकार ने बनाए तब भी देश के बाकी कई इलाकों को राज्य बनाने के आंदोलन देखते हुए भी ऐसा कोई आयोग नहीं बनाया गया और हर राज्य में अलग-अलग दर्जे के आंदोलन चलते रहे। पाठकों को यह याद होगा कि छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड को राज्य बनाने के पीछे एक आधार यह बनाया गया था कि इनके मूल राज्यों में विधानसभाओं में इनको अलग राज्य बनाने के प्रस्ताव पहले ही पारित कर दिए थे और वे प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास पहले से पड़े हुए थे। लेकिन इसके बाद से किसी और राज्य से न तो ऐसा कोई प्रस्ताव आया और न ही केंद्र सरकार ने मधुमक्खी के छत्ते को और अधिक हिलाया। लेकिन तेलंगाना का आंदोलन आज एक जलती हुई हकीकत है जिसे अनदेखा करना और अधिक मुमकिन नहीं है।
हम छोटे राज्यों के अनुभव की बात कर रहे थे। छत्तीसगढ़ में बैठे हुए हम मध्यप्रदेश के भोपाल की गुलामी से आजाद होने के फायदे देख रहे हैं और इन दस बरसों का हमारा अनुभव यह है कि जिस तरह अंगे्रजों के राज में लंदन में बैठी हुई ब्रिटिश सरकार भारत का शोषण करती थी, उसी तरह भोपाल में बैठी सरकारें उस वक्त भी छत्तीसगढ़ के शोषण में जुटी हुई थीं जब यहां के दो-दो कांगे्रसी नेता बरसों तक अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। इस इलाके के मुख्यमंत्री रहते हुए भी इस इलाके को कभी उसका हक नहीं मिला। लेकिन पृथक छत्तीसगढ़ के लिए किसी किस्म का कोई वजनदार आंदोलन एक दिन भी नहीं चला और इस इलाके को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के एक फैसले से राज्य का दर्जा मिल गया। तब से लेकर अब तक एक राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ ने जो तरक्की की है, उसका कोई सपना भी भोपाल-राज में छत्तिसगढिय़ा ने नहीं देखा था। लेकिन इसी के साथ ही जो झारखंड भी नया राज्य बना उसकी बदहाली भी देखते ही बनती है। जिस तरह वहां दलबदल, सत्तापलट, जनता की दौलत को सीधे मुख्यमंत्री के स्तर पर लूट खाने का सिलसिला चला उससे लोगों को लगा कि छोटा राज्य कितना बुरा भी हो सकता है। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में वैसा दलबदल नहीं हो पाया जिससे कि सरकार गिर पाती, हालांकि उसके लिए कोशिश पूरी हुई। और न ही यहां पर मधु कोड़ा जैसा हाल हो पाया। अब उसके पीछे राजनीतिक दलों की स्थिरता का योगदान रहा या फिर राज्य के बड़े नेताओं की पार्टी और सरकार पर पकड़ ऐसी रही कि छोटा राज्य होने के बाद भी सरकार नहीं पलटी, इतने बारीक कारणों पर हम यहां जाना नहीं चाहते। तो तीन में से इन दो राज्यों के परस्पर विपरीत अनुभव, दोनों ही देश के सामने और तेलंगाना के बारे में सोचते हुए लोग यह भी सोचते हैं। दूसरी एक बात जो तेलंगाना राज्य के आड़े आ रही है वह है आंध्रप्रदेश की मौजूद राजधानी हैदराबाद का तेलंगाना के इलाके में होना। आंध्रप्रदेश के तेलंगाना के बाहर के लोग अगर एक बार तेलंगाना के अलग हो जाने के लिए तैयार हो भी जाएंगे तो भी वे हैदराबाद के एक बड़े व्यापार, रोजगार और अर्थव्यवस्था के केंद्र के रूप में, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के रूप में शेष आंध्रप्रदेश से बाहर जाने देने नहीं चाहेंगे।
लेकिन हम यहां पर बारीकियों की चर्चा करना नहीं चाहते और केंद्र सरकार को यह सलाह देना चाहते हैं कि तेलंगाना राज्य का निर्माण करने की इस नौबत के पहले उसके पास राज्य पुनर्गठन आयोग के लिए काफी समय था जिसका कोई इस्तेमाल उसने नहीं किया। इसलिए अब और कोई बहाना बनाए बिना उसे सीधे इस राज्य को बनाना होगा। इसमें आने वाली दिक्कतों के लिए किस तरह के राजनीतिक और सरकारी समझौते उसे आंध्र के इन दो प्रस्तावित हिस्सों के बीच करवाने होंगे यह यूपीए सरकार, और मोटेतौर पर कांगे्रस पार्टी का सरदर्द है। लेकिन तेलंगाना को अब राज्य का दर्जा पाने का पूरा हक है और इसमें देर गलत होगी। इसके साथ-साथ देश के दूसरे हिस्सों में ऐसे आंदोलन शुरू हों, उसके पहले ही राज्य पुनर्गठन आयोग बनाकर उससे तेजी से रिपोर्ट लेनी चाहिए। इस देश में अमरीका की तरह करीब पचास राज्यों की गुंजाइश है और उससे ही यह देश अमनचैन से रह सकेगा, तरक्की कर सकेगा।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें